Tuesday, March 8, 2016

मैं यूं नाचती हूं जैसे मेरी जांघों के जोड़ पर हीरे लगे हुए हों


मैं तब भी उठूंगी

-माया एन्जेलू

तुम चाहो तो दर्ज़ कर सकते हो मुझे
अपने कड़वे मुड़ेतुड़े झूठों से
तुम रौंद सकते हो हरेक धूल में मुझे 
लेकिन तो भी मैं उठूंगी मिट्टी में से

क्या मेरा ढीठपन तुम्हें परेशान करता है?
इतने उदास क्यों दिखते हो तुम?
क्योंकि मैं इस तरह चलती हूं कि 
मेरे ड्राइंगरुम में तेल के कुंए उलीचे जा रहे हैं.

ठीक चन्द्रमाओं और सूर्यों की तरह
किसी ज्वार की निश्चितता के साथ
ठीक ऊंची बल खाती उम्मीदों की तरह
मै तब भी उठूंगी

क्या तुम मुझे टूटा हुआ देखना चाहते थे?
झुका हुआ सिर और ढुलकी आंखें?
आंसुओं की तरह गिरे हुर मेरे कन्धे
मेरे आर्तनाद से कमज़ोर

क्या मेरा अहंकार तुम्हें पसन्द नहीं आता?
क्या तुम्हें भयावह नहीं लगता 
जब मैं यूं हंसती हूं जैसे
मेरे घर के पिछवाड़े सोने की खदानें खोदी जा रही हों.

तुम अपने शब्दों से मुझे गोली मार सकते हो
तुम काट सकते हो मुझे अपनी निगाहों से
तुम अपनी नफ़रत से मेरी हत्या कर सकते हो
लेकिन तब भीमैं उठूंगी हवा की मानिन्द

क्या मेरा उत्तेजक रूप तुम्हें तंग करता है?
क्या यह तुम्हें अचरज में नहीं डालता
कि मैं यूं नाचती हूं जैसे मेरी जांघों के जोड़ पर हीरे लगे हुए हों?

इतिहास की झोपड़ियों की शर्म से उठती हूं मैं
दर्द में जड़े बीते समय से उठती हूं मैं
मैं हलकोरें मारता एक चौड़ा काला समुद्र हूं,
फूलती हुई मैं सम्हालती हूं ज्वार को
आतंक की रातों और भय को पीछे छोड़कर मैं उठती हूं
एक भोर के प्रस्फुटन में जो आश्चर्यजनक रूप से स्पष्ट है
मैं उठती हूं
उन तोहफ़ों के साथ जो मेरे पूर्वजों ने मुझे दिए
मैं ग़ुलाम का सपना और उसकी उम्मीद हूं.
मैं उठती हूं
मैं उठती हूं
मैं उठती हूं.

1 comment:

abha sonakia said...

Adbhut hai ye adamya jijivisha.Salaam hai is mahaan sangharsh aur joojhne ke jajbe ko.