Sunday, January 15, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - ग्यारह


(पिछली क़िस्त से आगे)

परमौत की प्रेम कथा - भाग ग्यारह

हरुवा भन्चक के एक स्टेटमेंट ने हमें सन्नाटे में डाल दिया था. इतनी आसान भाषा में इसके पहले मानव इतिहास में आशिकों को शायद ही कभी वर्गीकृत किया गया होगा. मिनट भर के भीतर परमौत की समझ में दो बातें आ गईं - पहली कि मोहब्बत एक ऐसी चीज़ का नाम है जिससे कोई भी अछूता नहीं  रह सकता. हरुवा जैसा घोषित निखट्टू और भन्चक चचा भी नहीं. दूसरी यह कि उसे पिरिया के साथ चल रहे अपने चक्कर को किसी भी निर्णायक बिंदु तक पहुंचाने के लिए उसे अपनी भूमिका छांट लेना होगी - पतंगा या भौंरा.

अपने घायल पैर को श्रमपूर्वक दूसरी तरफ रखकर हरुवा भन्चक ने कराहते हुए करवट बदली और कहना शुरू किया - "पतंगा टाइप इज ऑफ़ दी डैथ एंड भौंरा टाइप इज दी इन्जॉय ऑफ़ ए लाइफ. माई डीयर नब्बू डीयर प्लीज़ डोन्ट कन्फयूजिंग माई भतीजा विद दिस फुकसट नॉनसन. ... "

हरुवा भन्चक के इस असमय प्रत्याशित अंग्रेज़ी हमले ने नब्बू डीयर को ही नहीं हम सब को असमंजस में डाल दिया था. समझ में नहीं आ रहा था कि खुद को किस कैटेगरी में डाला जा सकता था. नब्बू डीयर का केस देखा जाय तो बिना नाम वाली काल्पनिक प्रेमिका चक्कर में मुकेशपीड़ा से ग्रसित हो चुके इस स्वार्थ के पुतले में पतंगा होने के सारे लक्षण मौजूद थे लेकिन तमाम लड़कियों को देखते ही जिस तरह सबसे पहले उसके मुंह से लार टपक जाती थी वह उसकी सतत भौंरावस्था का घोषित मैनिफेस्टो हुआ करता. गिरधारी लम्बू और मैं अभी तक पतंगे नहीं बने थे अलबत्ता एक भौंरे के सारे लक्षण हममें थे. बचा परमौत.

परमौत की मोहब्बत ही असली वाली मोहब्बत थी जिसने बकौल गिरधारी उसे "चूतियों का कप्तान" बना डाला था. पिरिया के प्रति अपने विकट अनुराग के चलते उसने मुटल्ली ससी और उसकी लम्बसखी के प्रेम-प्रस्तावों को तवज्जो न देने का महामानवीय कृत्य भी इन्हीं दिनों किया था जो बताता था कि भौंरा बनना उसके नेचर में था ही नहीं और वह पतंगा बनकर शमा के इर्दगिर्द मंडराते हुए अपने विध्वंस की तरफ तीव्रता से अग्रगामी था. यह कोई बहुत अच्छी बात नहीं थी.

अगले कुछ दिन तक हरुवा भन्चक को हमारे अड्डे पर देखा नहीं गया क्योंकि परकास उसे हल्द्वानी में किसी बिजनेस में सैट कर देना चाहता था. वह क्या कर रहा था न हमें कोई खबर थी न उसमें हमारी कोई दिलचस्पी थी. उस रात उसने मोहब्बत को लेकर हमारे विचारों को सलीके से अलाइन कर दिया था और अब गोदाम में प्रेम की बाबत चलने वाले अधिवेशन शनैः-शनैः समाप्त होते गए. सच तो यह था कि उस रात के बाद हमारा अगला जमावड़ा लगने में हफ्ते से ऊपर का समय लगा.  

इस हफ्ते भर में परमौत ने पहला काम यह किया कि कम्प्यूटर की क्लास में जाना बंद कर दिया. चैंटू सेंटर में हुई उस घटना के बाद वह एक ही दिन क्लास करने गया था. घुसते ही उसने ससी और उसकी दो सखियों को लगातार पलट-पलट कर अपनी तरफ देखते पाया. उसे झेंप लगी. उसे भय लगा कि उसकी चुप्पी को ससी कहीं फ्रेण्डसिप के प्रस्ताव का स्वीकार न समझ ले. पिरिया की तरफ उसने एक बार भी नहीं देखा. हरुवा भन्चक ने घर पर मोहब्बत वाला पाठ उसे अलग से पढ़ा दिया था और "इसमें मिलने वाला कद्दू के टुक्के के अलावे कुछ नहीं परमोदौ" कहकर भरसक प्रिया से दूर रहने की सलाह दे दी थी. फिलहाल एक तरफ़ अभी वह पतंगे की नियति स्वीकार करने की इच्छा नहीं रखता था वहीं दूसरी तरफ़ अपने अरमानों को ईश्वर के भरोसे छोड़ देने के अलावा कोई रास्ता भी नहीं दिखाई देता था.

जितना परमौत अपना ध्यान वापस मसालों के धंधे में लगाता, उतनी अधिक उसे विरह-वेदना होती. उसका मन प्रिया की एक झलक देखने का करता होता और सामने रुद्दरपुर के चाट और छोले-भटूरों के ठेलों की लाइन लगी होती. ठेलों के इर्दगिर्द चटोरी स्त्रियों-लड़कियों का सतत मेला लगा हुआ रहता लेकिन उसका मन उनमें से किसी एक की तरफ निगाह डालने का न होता. अपनी कल्पना के पटल पर वह पिरिया को इन्हीं में से एक ठेले पर कुछ खाते हुए देखता. पिरिया पेमेंट करने को पर्स में हाथ डालती और ठेलेवाले उससे "बहिनजी आपके पैसे हो गए" कह रहा होता क्योंकि दूर से यह देख रहे परमौत ने उसे इशारे से ऐसा करने को कह दिया था. असमंजस में पड़ी पिरिया जब ठेलेवाले द्वारा परमौत का सन्दर्भ लिए जाने पर पलटकर देखती - परमौत मोपेड की तरफ देख रहा होता. पिरिया नज़दीक आती और उससे थैंक्यू कहती. वह कहता कि थैंक्यू की क्या बात थी और फिर वे किसी बात पर मुस्कराने लगते. उफ़! कितनी अच्छी लगती है जब हंसती है पिरिया. उसके बाद वह उसे मोपेड पर बिठाकर हल्द्वानी उसके घर छोड़ने जाता. ... मतलब तीस-पैंतीस किलोमीटर का सफ़र पिरिया के साथ. पिरिया लम्बी उँगलियों वाले अपने सुन्दर मुलायम हाथों से उसकी कमर में कसकर घेरा बनाए बैठी होती. घर पहुंचकर पिरिया उसे चाय पीने को अन्दर बुलाती और दरवाज़े पर लगी घंटी बजाती. इस पॉइंट पर आकर उसका ख्वाब टूट जाता. कभी लम्बू अमिताब दरवाज़ा खोलता तो कभी चैंटू सेंटर वाला मुकेस.  

दिनभर खूब दौड़भाग से थके परमौत की थकन इन दिवास्वप्नों से दूनी हो जाया करती और उसका मन गोदाम जाने का भी नहीं होता. घर आकर बिस्तर पर लेटते ही पिरिया वाली पिक्चर फिर शुरू हो जाती. पिरिया उसका माथा दबा रही है. पिरिया उसके लिए चाय बना रही है. पिरिया उसकी बगल में लेटी है. मोहब्बत से झिड़कती पिरिया उसे मूंछों को बार-बार सहलाने की गंदी आदत छोड़ने को कह रही है. वह पिरिया के लम्बे बालों पर उंगलियाँ फिरा रहा है जैसे एक पिक्चर में उसने देखा था. फिर वह मनोज कुमार की तरह नदी किनारे एक पत्थर पर फुलवा की जगह पिरिया लिखकर 'चाँद सी मैबूबा' गाने लगता. मालासिन्ना की तरह दांतों में उंगली दबाये पिरिया शर्माने का नाटक करने लगती ... पिरिया! पिरिया! ... क्या मेरी मौत के बाद आएगी तू मेरे पास ... 

ऐसे ही एक रात वह अपना दिल भींचे पिरिया के साथ एक ड्रीम सीक्वेंस में था कि उसकी विचार-श्रृंखला को हरुवा चचा ने "सो गया रे परमोदौ" कहकर भंग किया.

हरुवा भन्चक ठीकठाक टैट होकर आया था. परकास ने उसे पुश्तैनी दूकान में मुनीमगीरी का काम सीखने में लगा दिया था. उसने मुनीमगीरी अच्छे से सीखनी शुरू कर दी थी जिसका प्रमाण यह था कि उसने तीसरे ही दिन से गल्ले पर इतना हाथ साफ़ करने के कला में निपुणता हासिल कर ली थी कि शाम का कोटा खरीदने लायक रकम बन जाए.

"ना बे चचा, सो कौन साला रहा है. दिमाग का मठ्ठा बना पड़ा है यार. तू बता कहाँ से आ रहा है कीटा फाइट करके ..." हल्द्वानी के रचनात्मक मद्यपों द्वारा दारु पार्टी के पर्यायवाची के तौर पर प्रचलन में लाये गए अनेक मुहावरों में से हरुवा भन्चक के सबसे प्रिय मुहावरे का इस्तेमाल करते हुए परमौत ने अपने दिमागखाऊ चचा की नैसर्गिक प्रतिभा को सुलगाने का काम किया.

"तेरे हल्द्वानी वालों के बस की जो क्या होने वाली ठैरी साली कीटा फाइट ... उसके लिए तो हमारे वहां के खड़क दा, फतेसिंग हौलदार और गबरसिंग मास्साब जैसे बफौले चइये होने वाले हुए. तब होने वाली ठैरी असली कीटा फाइट साली. अभी परसों हौलदार साब के यहाँ उनके भतीजे का नामकन्द था. दो तो मारे बकरे और अट्ठार आई रही घोड़िया रम की बोतल. सुबे से लग गए ठैरे हम काटने-हाटने में. अरे भुटुवा गजब बनाने वाले हुए गबरसिंग मास्साब. अब वो बना रहे ठैरे भुटुवा और क्या नाम कहते हैं खड़क दा बना रहे ठैरे दारू के पैक. इतने में साला पारभिड़े का हरकुवा आ पड़ा वहां. मैंने सोचा आया होगा वो भी न्यौते में. पारभिड़े वाले भी फतेसिंग ज्यू के रिश्तेदारी में आने वाले ठैरे लेकिन पराड़के साल हमारे यहाँ से एक एक बरात गयी रही उनके वहां. खाना-हाना खाने में थोड़ी देर हो पड़ी और जब गरम रोटी नहीं मिली तो फतेसिंग जी वहां के चार-पांच लौंडों को फतोड़ आये ठैरे. एक तो उनका साला भी लगने वाला हुआ. तब से ज़रा हमारी इधर को कम आनेवाले हुए पारभिड़े के लोग ... परमोदौ तेरे पास कुछ धरा है माल-फाल यार? तीस लग री जरा ..." किस्से को क्षणिक विराम देकर हरुवा भन्चक ने शेष बची रात के लिए व्यक्तिगत मौज की संभावनाएं तलाशना शुरू किया.

"मेरे पास कहाँ से आई यार चचा. मैं घर में रखता नहीं तू जानने वाला हुआ. ऐसी तीस लग रई थी तो पैले से जुगाड़ कर के लाना चाइये था. अब ये आधी रात तेरे लिए दारू कहाँ से लाऊँ मैं ..."

अभी आधी रात नहीं हुई थी और परमौत जैसे काबिल भतीजे की इस बात से हरुवा भन्चक उखड़ गया.

"बड़ा साला रईस बनता है ... अभी इग्यारा भी नहीं बजे और तू ऐसे पौंक रहा है. चल मेरे साथ चल मैं दिखाता हूँ कां मिलेगी साली दारु तेरी हल्द्वानी में ... चल यार मेरा कोटा पूरा नहीं हुआ अभी ..."

परमौत के पास बिस्तर से उठकर हरुवा के साथ बाजार की राह लगने के सिवा दूसरा रास्ता नहीं था. इसके अलावा खुद इतने दिनों से घर पर शामें बिताने की वजह से वह खुद ऐसे किसी एडवेन्चरनुमा बहाने की तलाश में था.

चचा-भतीजा रोड पर थे और नए उत्साह से ठुंसा हरुवा रौ में आ चुका था - "... त्तो हरकुवा को देखा तो फतेसिंग पर तो जैसे द्यप्ता आ गया. कैने लगे इन साले पारभिड़े वालों की हिम्मत देखो बिना न्यौते के हमारे गौं का माहौल खराब करने आ गए. खैर मैंने जैसे-तैसे उनको सांत कराया कि चचा नामकन्द के सुभ दिन किसी से लड़ाई करने का क्या फायदा हुआ करके और हरकुवा को अपनी बगल में बैठा लिया. तब जा के उसने बताया कि दिदी ने जिठानी ने ग्वेल द्यप्ता की कसम खिलाई हुई कि इस नामकन्द में जरूड़ी आना हुआ तुझको. दो चार पैक खींच के फतेसिंग भी राजा सिवी बन गए हुए. कैने लग गए और पिलाओ इस हरकुवा को. जो भी हुआ सालिगराम ठैरा हमारा. तो साब ... टैंकर होने हुए ये साले पारभिड़िये ... आधी बोतल ऐसेई हड़का जाने वाले हुए. बोतल-होतल, बकरा-हकरा साम तक सब्ब निबट गया तो खड़कदा तास की गड्डी निकाल लाया कहा ..."

ठेका आने को था और दूर से देखा जा सकता था कि वह बंद था. खबर हरुवा भन्चक अपनी शौर्यगाथा चालू रखे हुए था - " पारभिड़िये ऐसे हुए परमोदौ मल्लब समझ ले कि दहलपकड़ और सीप में उनको कोई नहीं हरा सकने वाला हुआ. तो खड़कदा ने ग्वांक्क जैसा करते हुए कहा कि पारभिड़े वालों में है हिम्मत तो सीप में हरा के दिखाओ सालो. अब पारभिड़े वाला वहां ठैरा कौन हरकुवा के अलावा. लौंडा ही हुआ बिचारा. पी-पा के टोटिल हुआ रहा एक कोने में. धो-धो करके साले को उठा-उठू के होस में जैसा लाये और कहा कि सीप खेल खड़कदा के संग ..."

परमौत ने ठेके के बंद शेयर शटर के बगल में लगे एक गुप्त बिंदु पर लगी घंटी बजाई तो शटर में से एक झिरी जैसी खुली और "क्या चाइये" की आवाज़ के साथ एक हथेली बाहर आई. परमौत ने कुछ नोट उस हथेली पर रखे और बीस सेकेण्ड के भीतर रम की एक पूरी बोतल उसके हाथ में थमा दी गयी. झिरी बंद हो गयी. अपना किस्सा रोक कर हरुवा भन्चक ने इस चमत्कार को देखा और अंग्रेज़ी मुहावरे में कहा जाय तो उसका जबड़ा नीचे गिर गया.

"गजब हुई साली हल्द्वानी यार परमोदौ. गजब्बी कहा ..."

बोतल हाथ में आते ही पीने के सुरक्षित अड्डे के नाम पर परमौत के गोदाम की याद आई और वे उसी दिशा में चल पड़े.

"हाँ चचा फिर बता क्या कै रा था तू ... क्या हुआ पारभिड़े वाले का?"

"हाँ हाँ ... फीर क्या हुआ कि परमोदौ लला उस साले छटांक भर के लौंडे ने एक के बाद एक तीन गेम पेल दिया खड़कदा को. दस-दस रुपये का एक गेम ठैरा. एक-एक गेम फतेसिंग हौलदार और गबरसिंग मास्साब ने भी हार दिया हुआ तब जा के खड़कदा ने मुझसे कहा कि हरुवा तू खेल एक हाथ इस साले के साथ. अब हमारा गेम चल रा हुआ और उस साले को लग गयी पिसाब. उसके हो रहे ठैरे बहत्तर पॉइंट और मेरे निल. जीतता तो मैं क्या ही ठैरा, मैंने लौंडे के गए हुए में जरा बेमांटी कर दी और हुकुम का बाश्शा छिपा के जेब में रख लिया. फतेसिंग हौलदार तीस रूपये हार के झंड जैसे हो रहे ठैरे तो अन्दर से दो घोड़िया बोतल और निकाल लाये और सबके लिए पैक बना दिए. लौंडा आया तो पत्ते बांटने लगा. पत्ते पूरे हुए ही नहीं ... कहाँ से होते ... मैं भी महीन-महीन हंस रहा ठैरा कि बेटा अब हरा के दिखा कन्नल हरीस चन को ... बहुत ढूंढ-ढांड के भी पत्ता नहीं मिला तो लौंडा बोलने लग गया कि तुम सब मिल के बेमांटी कर रहे हो कर के. उसने ऐसा कहना था और मारी साले के भेल में गबरसिंग मास्साब ने कि बेमांटी करते होंगे पारभिड़े वाले कि इकावन पत्तों वाली गड्डी से पांच बाजी जीत दीं. उसके बाद तो क्या खड़क दा, क्या फतेसिंह और क्या मैं ... हमने साले को आधी रात तक मुर्गा बना के बाहर खड़े करा दिया बाहर अरड़पट्ट में  ... उसके बाद जब तक उसने जीते हुए पैसे वापिस नहीं करे साले को जाने नहीं दिया ... उसके बाद जैसे ही जरा हमारी नजर इधर-उधर हुई वो बिचारा वापिस अपने घर को भाग गया रहा ... उसके बाद भतीजे क्या हुआ ... "

हरुवा ने परमौत की तरफ निगाह डालकर अपनी क़िस्सागोई के प्रति भतीजे का रेस्पोंस देखने का प्रयास किया. परमौत ने इस बात को ताड़ लिया और ठहरकर बोला - "तू बोर बहुत करनेवाला हुआ चचा यार. तीसरी बार सुना रहा है ये चूतियापन्थी का किस्सा तू ... ज़रा बोतल थाम तो देखूं चाबी कहाँ रखी है साली." वे गोदाम के बाहर खड़े थे. चारों तरफ वीरानी सी थी और कूड़े के ढेर पर बैठने वाले पुरातन लुरिया कुत्ते के अलावा जीवन का कहीं कोई लक्षण दिखाई नहीं देता था. नब्बू डीयर उस रात गोदाम की चाभी अड्डे पर रखना भूल उसे अपने साथ ले कर चला गया था. काफी देर अँधेरे में टटोलने पर जब चाभी नहीं मिली तो परमौत ने हरुवा चचा को वहीं खड़ा रहकर इंतज़ार करने को कहा और गोदाम के बगल वाली गली में घुस गया जहां गिरधारी लम्बू का घर था. भतीजे द्वारा हाल ही में अपमानित किये गए हरुवा भन्चक ने हाथ में धरी बोतल खोल ली और दो बड़े बड़े नीट घूँट गटककर बाकी का किस्सा कूड़े की बगल में बैठकर कुत्ते को सुनाना शुरू किया. अजनबी को इस तरह का व्यवहार करता देख कुत्ता सावधान हुआ और उसने अर्ध-गुर्राहट के साथ 'हू... हू...' शुरू कर दी. इस से हरुवा भन्चक हकबका गया और 'हट हट' करता खड़ा होने का प्रयास करने ही लगा था कि गली के भीतर से परमौत और गिरधारी लम्बू नमूदार हुए.


(जारी)    

1 comment:

Ajay Singh said...

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