Saturday, November 25, 2017

जब चली रेल


जब चली रेल
- इब्बार रब्बी

जब चली रेल तो रुलाई आई!
छूट रही है दिल्ली,
खुसरो का पीहर।
निजामुद्दीन औलिया,
यमुना पुल, मिंटो ब्रिज और
प्रगति मैदान

छूट रहा है घर, अपना जीवन,
जब चली रेल तो वर्षा आई,
गलने लगी स्मृति, झपने लगी आँख
दिल्ली! बहुत याद आई

[1990]


2 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

अलग आनन्द देती है इब्बार जी की लेखनी।

Dhruv Singh said...

महिला रचनाकारों का योगदान हिंदी ब्लॉगिंग जगत में कितना महत्वपूर्ण है ? यह आपको तय करना है ! आपके विचार इन सशक्त रचनाकारों के लिए उतना ही महत्व रखते हैं जितना देश के लिए लोकतंत्रात्मक प्रणाली। आप सब का हृदय से स्वागत है इन महिला रचनाकारों के सृजनात्मक मेले में। सोमवार २७ नवंबर २०१७ को ''पांच लिंकों का आनंद'' परिवार आपको आमंत्रित करता है। ................. http://halchalwith5links.blogspot.com आपके प्रतीक्षा में ! "एकलव्य"