Saturday, August 4, 2018

मालवीय नगर की बात क्या कहूं

हमारे समय के बड़े कवि की ताज़ा कविताओं की सीरीज़ – 2


प्रेम वाटिका
- असद ज़ैदी 

''मुस्कुराते क्यों हो?" तुमने कहा, ''यह घर
प्रेम ही से चला है अब तक."

''अभी तुम मिले देखा कितनी सुंदर बहू है मेरी
फ़ादार बेटा और इतना प्यारा सा इनका बच्चा...
और फिर मैं भी यहाँ हूँ जैसा तुमने कहा—
निश्चिंतप्रसन्न और सम्पन्न दिखती विधवा!"

मैंने घूमकर उसका घर देखा इतने बरस बाद
दो दालानउन में फलते फूलते मोगरेअनार,
हरसिंगारमौलसरीकचनारकरौंदाअमरूद,
गुड़हलहरदम गदराई मधुमालती...
''क्या बिना प्रेम के इतना सब हो सकता है?’’
मैंने पता नहीं किस धुन में कहा— बिल्कुल हो सकता है सीमा,
बिल्कुल हो सकता है...

क्या तुमने ज़ालिमों के बागीचे नहीं देखे...
उनकी चहल पहल भरी हवेलियाँ
जिनमें सदा हँसी गूँजा करती थी...
अलबत्ता जहाँ नियति ने अब अपार्टमेंट बना दिए हैं.

''हूँ...’’, उसने कहा, ''और तुम्हें क्या क्या याद है?"

मैंने कहाकुछ नहीं इतना याद है तुम स्कूल में सिर्फ
एक दरजा मुझसे आगे थीं पर रौब के साथ 'ए जूनियर’ कहकर
मुझको तलब किया करती थी.

''हूँ...’’, कहकर उसने पूछा, ''अपने स्कूल का क्या हाल है?"

ठीक ही चलता लगता है—मैंने कहा—उसके चारों तर
बस्तियाँ बस गई हैंपर स्कूल का परिसर बचा हुआ हैऔर हाँ,
पाकड़ का पेड़ अभी भी वहीं खड़ा हैमैदान के किनारे पर.
बच्चों से अब वहाँ रोज़ वंदे मातरम् गवाया जाता है...

''हूँ... और तुम्हारे मालवीय नगर के क्या हाल हैं?"

तुम्हारी ये ''हूँ...की आदत अभी तक गई नहींसीमा!

''ऐसा नहीं है लड़केबस तुम्हें देखकर लौट आई है.:"

और हम हँसने लगे चालीस साल लाँघ कर,
हँसते हँसते लगभग निर्वाण की दहलीज़ तक जा पहुँचे.

रही मालवीय नगर की बात सो क्या कहूं ...
जैसा भारत मालवीय जी चाहते थे वहाँ बसा हुआ है.


29.1.2018

No comments: