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Wednesday, November 15, 2017

हजारे का चूरा


हजारे का चूरा

- शंभू राणा

आज न जाने कैसे अचानक ‘चूरे’ की याद आ गई- जैसे वर्षों बाद कोई बाल सखा सामने आ जाए. सचमुच यार चूरे तू भी क्या चीज था. अब न तू है, न अपना वो बचपन. पर तेरी यादें हैं, रहेंगी.

मेरे हम उम्र वो सभी लोग जिनका बचपन अल्मोड़ा में गुजरा हो, एक चीज से जरूर वाकिफ होंगे- ‘हजारा का चूरा’. अगर जीवन की आपाधापी में कोई भूल गया हो तो थोड़ा-सा दिमाग पर जोर डालते ही याद आ जाएगा. बचपन में माँ-बाप ने जो दाल-भात खिलाया, जितना एहसान उसका मानता हूं, उतना ही लगभग हजारा के चूरे का भी मान लूं तो यह कम से कम मुझे तो अतिशयोक्ति नहीं जान पड़ता है.

इस चूरे ने हमारे बचपन को हंसाया, गुदगुदाया. कभी हैरान किया तो कभी लॉटरी लग जाने का-सा एहसास भी कराया. उन दिनों हमारे लिए नाश्ते-स्नैक्स का एक सस्ता और बेहतरीन विकल्प था यह चूरा. सबसे अच्छी बात कि इसका कोई निश्चित मूल्य नहीं था. जेब में जितने भी पैसे हों उसी हिसाब और मात्रा में मिल जाया करता था.

इस चूरे का न कोई विज्ञापन था न ही मार्केटिंग. यह एक स्थानीय उत्पाद था जो हर रोज न चाहने के बावजूद स्वतः उत्पन्न हो जाया करता था. बच्चों में मैगी-नूडल्स जितना लोकप्रिय था.

कई बार दो-तीन दोस्त इस लालच में एक साथ चूरा खरीदते कि मात्रा में ज्यादा मिलेगा और उसमें न जाने क्या-क्या हमारे हिस्से आ जाए. एकाध बार चूरे में न जाने क्या खा गया कि मुझे उल्टी-सुल्टी दोनों हो गए. नतीजन डांट खाई और पिटा भी. फिर ज्यों ही अठन्नी-चवन्नी हाथ लगी, तन-मन चूरे की ओर लपका. कई बार बड़े भी ललचा जाते और ‘देखूं तो क्या है’ कहकर वो बच्चों के चूरे में डाका डाल देते. तब बाजार में आज की तरह इफरात में फास्ट फूड नहीं था और न ही अभिभावकों के पास पर्याप्त पैंसा. ऐसे फटीचर समय में उस चूरे ने हमें पोषित किया. यह तबकी बात है जब आम आदमी के कपड़ों-जूतों में पैबन्द एक सामान्य सी बात थी. जब खाते-पीते घरों के पुरूष धारीधार कपड़े का नाइट सूट पहना करते थे. मेरी मांस-मज्जा उस चूरे से भी काफी हद तक बनी है और उसकी कर्जदार है.

दरअसल यह ‘हजारे का चूरा’ हजारा का न होकर लाला बाजार स्थित हजारा की दुकान में मिलने वाला तरह-तरह के बिस्कुटों का चूरा हुआ करता था, जो कि चूरे की ही तरह टूट-फूट कर ‘हजारा का चूरा’ के नाम से बच्चों के बीच मशहूर हो गया था. हजारा बंधु तब भी भले-चंगे थे, आज भी सलामत हैं.

लोगों के बीच हजारा की दुकान के नाम से यह कनफैक्शनरी की दुकान आज भी अपनी जगह मौजूद है. उस जमाने में वह अल्मोड़ा की अपनी तरह की शायद एक मात्र हाई-फाई दुकान हुआ करती थी. उनकी अपनी एक बिस्कुट फैक्ट्री भी थी. जहां तरह-तरह के बिस्कुट, केक, डबल रोटी वगैरा बनते थे. इन्हीं सबके बनने-पैक होने के दौरान जो टूट-फूट होती उसी को एक पेटी में भरकर दुकान में रख दिया जाता था. वही हजारा का चूरा था. अखबार के टुकड़े में पांच पैंसे का भी मिलता था तो रूपये-दो रूपये का भी.

यह चूरा कई बार सरप्राइज भी देता था. चूरे के बीच में अकसर बड़ा माल मिल जाया करता. अब क्या मिलेगा यह तो उस दिन के राशि-फल पर निर्भर होता- आधा क्रीम रोल, केक का टुकड़ा, आधा-चैथाई टुकड़ा महंगा बिस्कुट या आधा डबल रोटी ... कुछ भी. कई बार चूरा इस बात की भी चुगली करता कि फैक्ट्री में चूहे भी मौजूद हैं.

कई बार लड़के झुंड बनाकर चूरा खरीदने जाते और भीड़ का फायदा उठाकर दुकान के बाहर कोने में सजाकर रखे बिस्कुट और डबल रोटी पर हाथ साफ कर देते. पकड़े जाने पर जो अच्छे धावक होते वो बच जाते, जो घबरा जाते वो थोड़ा पिट लेते और अनुभव सम्पन्न होकर फिर कभी कोशिश करते. अगर भाग्यवश ये दोनों बातें हुई तो फिर मजा. मुफत की दावत.

अब न तो ‘हजारा का चूरा’ मिलता है न आज के बच्चे इसे पसंद करेंगे. बस उस चूरे की यादें बाकी हैं. और हां, उस दौर के चूरा पोषक जो लोग आज भी अल्मोड़ा में ही रह गए, अब इतने उमरदार हो चले हैं कि अक्सर शाम ढले हजारा की दुकान से चटपटी नमकीन खरीदते दिख जाते हैं. अब इस बात से आपको क्या लेना-देना जी कि वो नमकीन चाय के साथ लें या.... अरे अंकल छोड़ो भी, देखे का अनदेखा करना भी सीख लो. बच्चे बड़े हो गए. बल्कि उनके भी बच्चे हो गए हैं.

Wednesday, July 12, 2017

कोयले की अठन्नी, धागे पर हड्डी उर्फ़ जरा माचिस देना


भूतचरित 
-शंभू राणा 

न जाने क्या बात है कि आज-कल लोग भूतों की बात नहीं करते, उनकी कहानियां नहीं सुनाते. जो कि एक ज़माने में बड़ी ही आम बात हुआ करती थी. कहीं ऐसा तो नहीं कि आज आदमी इतना कमीना हो गया है कि भूतों को उससे मेल-मुलाकात न करने में ही भलाई जान पड़ी हो कि ना यार अब ये अपने वश का नहीं. वर्ना हर पीपल का पेड़, सुनसान जगह, खँडहर और वीरान इमारत में कम से कम एक भूत तो रहता ही था. कहीं-कहीं तो एक से ज्यादा भी. हर आदमी के पास भूतों की कई कहानियां हुआ करती थीं. सुनने-सुनाने का दौर जब चलता तो ख़त्म ही होने को नहीं आता था. अब कोई भूत का किस्सा नहीं सुनाता.

कई बार यूँ सुनने को कि एक बार फलां आदमी का सामना भूत से हो गया. अब भूत तो भूत हुआ पर वह आदमी भी कुछ कम नहीं था. जब भूत ने उसका रास्ता रोका तो उसने भी दो-दो हाथ करने की ठान ली. दोनों में गुत्थम-गुत्था होने लगी. कभी भूत आदमी पर भारी तो कभी आदमी भूत पर हावी. किसी ने मैदान नहीं छोड़ा. डटे रहे. होते-करते रात बीत गयी. ज्यों ही पौ फटने को हुई भूत की ताकत कुदरती तौर पर कम होने लगी. भूत रात ही में भूत होता है. दिन के उजाले में पस्त पड़ जाता है.तो अंत में भूत ने कहा कि भाई तू जीता मैं हारा. मुझे बख्श दे. मैं तेरा गुलाम हुआ. जब कहेगा हाजिर हो जाऊंगा और जो हुक्म होगा बजा लाऊंगा.

ऐसा ही एक किस्सा अल्मोड़ा शहर के मुख्य मुर्दाघाट विश्वनाथ में कभी घटा था. बात काफी पुरानी है. तब न मोटर न गाड़ी. सभी मुर्दे अपनी अंतिम यात्रा पैदल ही तय करते थे. अल्मोड़ा से विश्वनाथ तक का रास्ता ज्यादातर वीरान और सुनसान. उन दिनों विश्वनाथ में एक बड़ा ही ताकतवर और मशहूर भूत रहा करता था. रात ढलते ही वह अपनी जटाओं की फायबर केबल शहर के मोहल्ले धारानौला और उससे भी कुछ ऊपर बावन सीढ़ी तक बिछा देता. भूला-भटका कोई राहगीर उस रास्ते आ बैठता तो जटायें उसे जकड़ लेतीं और उसका काम तमाम.

एक रात की बात है. कीर्ति अनरिया नाम का एक आदमी अकेला ही उस रास्ते पर चल पड़ा. उस दिन न जाने कैसे उसे इतनी देर हो गयी घर लौटने में. उसका गाँव अनरियाकोट विश्वनाथ और सुयाल नदी के उस पार काफी चढ़ाई पर था (और अब भी है). तो साहब! कीर्ति ज्यों ही धारानौला पहुंचा, जटाओं ने उसे लपटने की कोशिश की. हर दिन की तरह हर रात भी एक सी नहीं होती. उस रात भूत का भूत का राशिफल कुछ उत्तम नहीं था. उसके वहमो-गुमान में भी नहीं था कि उसका पाला आज गुरु से पड़ने वाला है. तो जी कीर्ति ने जटाओं में उलझने के बजाय उन्हें कसकर पकड़ा और ऊन की-सी लच्छी बनानी शुरू कर दी. जटायें लपेटते-लपेटते वह भूत के हेडक्वार्टर विश्वनाथ पहुँच गया. भूत और कीर्ति के बीच हुज्जत हुई जो कि मारपीट में बदल गयी. रात भर घमासान का रन पड़ा. फिर वही हुआ जो पहले कहा. पौ फटते ही भूत ने कीर्ति के पाँव पकड़ लिए और सदा के लिए गुलामी लिख दी. बाद में कीर्ति अनरिया ने भूत से खेती-किसानी के कई काम करवाए. और यूँ उसकी कीर्ति अमर हो गयी.

अनरियाकोट और आस-पास के गाँव वालों को आज भी कभी रात-बेरात विश्वनाथ घाट से गुजरना होता है तो वो अपना जबानी परिचय-पत्र दिखाते हैं कि रे भूतों, हम कीर्ति अनरिया के वंशज हैं. हमें कुछ मत कहना. याद रहे कि हमारे-तुम्हारे बुजुर्गों के बीच जेनेवा कन्वेंशन टाइप का कुछ हुआ था. तुम उस संधि से बंधे हो.

भूत चाहे जहाँ हो, जैसा हो काला-भूरा, देशी-फिरंगी, जिस भी किमाश का हो उसके साथ किसी को भाषा की दिक्कत आई हो, सुनने में नहीं आया. वे सही मायने में बहुभाषाविद हुआ करते थे. आप उनकी तुलना टूरिस्ट गाइडों से कर सकते हैं जो हर देश-प्रान्त की भाषा काम चलाऊ ही सही जानते हैं. एक अंगूठा छाप ग्रामीण की मुलाकात अगर किसी फिरंगी भूत से हो जाये तो वह गंवई भाषा में ही बात करता है. कोई इंसान चार भाषाएँ जान-समझ लेता है तो इतराता फिरता है. भूत लोग जो संसार की हर भाषा-बोली जानते हैं, उनकी तारीफ में दो शब्द बोलते हमारी नानी मरती है. क्यों न भूत हमसे दूरी बनाकर रखें भला.

इसी तरह लगभग सारे ही भूतों को बीड़ी पीने की लत होती थी पर इनके पास माचिस नहीं होती थी. वे राह चलते इंसान से पूछते थे- ए भाई, माचिस है क्या?

भूतों के अलावा चुड़ैलें भी हुआ करती थीं. उनमें से कई तो बहुत ही आशिक मिज़ाज और अय्याश किस्म की भी होती थीं. उनके शिकार नौजवान लोग हुआ करते थे. मसलन एक खाता-पीता, हट्टा-कट्टा  नौजवान अचानक सूखकर छुआरा हो जाता. लोग पूछते कि भाई सब खैरियत तो है. ये क्या हाल बना लिया तुमने अपनी सेहत का? घर वाले उसे बैद-हकीमों के पास ले जाते. जांच-पड़ताल से पता चलता सब कुछ तो ठीक है. सारी इन्द्रियां सुचारू ढंग से चल रही हैं. पर लौंडा है कि दिन पर दिन सूखता ही चला जाता है. बताता कुछ नहीं अपने आप में गुम रहता है. फिर एक दिन पानी नाक तक आ चढ़ता है, वह किसी राजदार के सामने अपनी गिरती सेहत का राज उगल देता है. पता चलता है कि पिछले कई महीनों से उसके कमरे में एक बला की खूबसूरत औरत आती है, रात भर ऐश करती है तडके ही गायब. ओ हो, बेटा तो ये बात है. अरे पहले बताते यार, हम किस मर्ज की दवा हैं. तुम पर किसी चुड़ैल का दिल आ गया है.

फिर वह राजदार उपाय बताता कि आज रात उसके पल्लू से एक लंबा धागा बाँध देना बिना खबर लगे. सुबह को आकर बताता हूँ क्या करना है. अगली सुबह देखने में आता कि धागे का एक सिरा दरवाजे या खिड़की की झिर्री से बहार को चला गया है. उसका पीछा करने वाले किसी खंडहर, पीपल के पेड़ या किसी वीरान-सी जगह जा पहुँचते. धागा खींचने पर पाया जाता उसका  दूसरा सिरा एक हड्डी से बंधा है. जिसका बाकायदा कफ़न-दफ़न कर दिया जाता और सूखता हुआ लौंडा कुछ ही दिनों में फिर से हरा-भरा हो जाता. अफ़सोस कि अब इस तरह की चुड़ैलें भी नहीं पाई जातीं.

कई जगहों पर बच्चा भूत भी पाए जाते थे. जो कि अमूमन किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते थे. जिस घर में इनका अड्डा होता वहां रहने वालों को रात-भर चैन से सोने नहीं देते. रात भर की ही-ही, खी-खी, धमाचौकड़ी, सामान की उठा-पटक, सोये आदमी के बदन से चादर खींचना, पैर के तलवों में गुदगुदी करना, खिड़की-दरवाजे के पल्ले पकड़ कर झूलना और कान में तिनके से खुजली कर भाग जाना जैसे काम करते. अब बच्चे तो बच्चे होते हैं न जी. बचपन का दूसरा नाम ही शैतानी है. आपने कभी सुना है कि फलाना भूत उम्र में काफी सयाना हो चला है मगर हरकतें उसकी अब भी बच्चों सी हैं.

अल्मोड़ा की लाल बाजार में ‘शिब्बन पान भण्डार’ नाम से बड़ी ही मशहूर दूकान हुआ करती थी. सुबह जल्दी ही खुलने और रात बारह बजे बाद बंद होने के लिए भी यह दुकान जानी जाती थी. रात को नौ से बारह बजे वाला सिनेमा का शो देखकर आने वालों के लिए पान-सिगरेट की आखिरी और सौ फीसदी भरोसेमंद दुकान हुआ करती थी. पता नहीं खुली भी होगी या नहीं वाला कोई धड़का नहीं था. यकीनन खुली ही होगी. तब अल्मोड़ा जैसे शहर में इतनी देर तक किसी दुकान का खुले रहना कोई आम बात नहीं थी. इस दुकान के बारे में लोगों ने एक किस्सा गढ़ रखा था कि जब तक भूत लोग आकर पान नहीं खा लेते तब तक दुकान बंद नहीं होती. दुकान उन्हीं के इन्तजार में इतनी रात तक खुलती है. वे लोग बारह बजे के बाद ही कभी आते हैं. पान का दाम कोयले से चुकाते हैं जो गल्ले में डालते ही अठन्नी-रुपये में बदल जाता है.

मेरे पिता भी भूत से मुलाकात का एक किस्सा सुनाया करते थे. गढ़वाल कैडर का वह भूत उन्हें देहरादून में मिला था. वह एक मजहबी मुस्लिम बुजुर्ग के रूप में मिला. बकौल पिताजी के – गुरु, एक बार की बात है. लखनऊ से हमारा डिप्टी डायरेक्टर आया था. हमको उसके पास जाना था कि डाकबंगले कि किसी चीज की जरूरत तो नहीं. हम साइकिल लेकर निकले. रास्ता भटक गये. अँधेरा होने लगा. हम अंदाजे से एक गली में घुस गए. सोचा कोई मिले तो रास्ता पूछें. चलते-चलते क्या देखते हैं कि गली ख़तम हो गई. तभी हमारी नजर सामने एक टूटे-फूटे से घर पे पड़ी. आले पे ढिबरी जल रही है. पुरानी-सी चारपाई पर हमारी ओर पीठ किए एक बूढ़ा आदमी बैठा माला जप रहा है. बदन पर सफ़ेद कुरता-पायजामा, सर पे टोपी, चेहरे में सफ़ेद दाढ़ी और अजीब सी चमक, हमने आवाज दी –बड़े मियां जरा सुनिएगा. आवाज सुनते ही उसने धीरे से गर्दन हमारी ओर घुमाई और बोला – मैसेन-मैसेन ... हम झट से समझ गए और सर पर पाँव रखकर वहां से भागे.

अब इसे भूत की महिमा नहीं तो और क्या कहेंगे कि देखने वाला भूत को पीठ की ओर से देख रहा है फिर भी हाथ में माला, चेहरे पर दाढ़ी और नूर साफ़ देख पा रहा है. मेरे पिता गर उर्दूदां होते तो बड़े मियां के मुंह से निकलता बू-ए-आदम. अगर गढ़वाली भाषा जानते तो शायद वे फरमाते मनख्याण ... भूत और भगवान में काफी हद तक समानता है. अतः विधान है कि दोनों की ही कथा का बिना व्यवधान, श्रद्धापूर्वक श्रवण किया जाए. 

Thursday, July 6, 2017

इक नग़मा है पहलू में बजता हुआ

यह अद्वितीय और एक्सक्लूसिव संस्मरण हमारे उतने ही अद्वितीय और एक्सक्लूसिव मित्र शंभू राणा ने ख़ास कबाड़खाने के वास्ते भेजा है. इसे कंप्यूटर पर थेचने अर्थात टाइप करने का सद्कार्य बागेश्वर के मित्र केशव भट्ट ने किया है. दोनों का शुक्रिया.


इक नग़मा है पहलू में बजता हुआ
- शंभू राणा


करीब पांचेक साल बीत गए सतीश को गुजरे हुए. वह मेरा बालसखा था और इस शहर में बनने वाला पहला दोस्त भी. करीब पैंतीस-छत्तीस साल पहले जब हम पहली बार मिले तो दोस्ताना अंदाज में नहीं मिले थे, हमारे बीच न जाने क्या बात हुई कि उसने बुरी तरह मेरी बांह मरोड़ दी और मुझे रोता छोड़ भाग खड़ा हुआ. उस उम्र का झगड़ा ज्यादा दिन चलता नहीं. हम दोनों जल्दी ही अच्छे दोस्त बन गए. 

सतीश जिला पंचायत परिसर में बने सरकारी क्वार्टर में अपने पिता व बड़े भाई के साथ रहता था. उसके पिता जिला पंचायत में नौकर थे. मेरे पिता का दफ्तर भी इसी परिसर में था. 

अल्मोड़ा जिला पंचायत का यह परिसर तब आज से बिल्कुल अलग था. काफी खुला-खुला सा. कई पेड़-पौंधे वहां थे. हमारे खेलने-कूदने को इफरात से जगह थी. आज की तरह इतनी इमारतें नहीं थी कि आदमी एक गली से निकलता है तो दूसरी में जा घुसता है. और न जाने क्यों एक मंदिर भी वहां बन गया है. कुछ ही दिनों में उस जगह से मैं अच्छी तरह से परिचित हो गया. गिनती के दफ्तर थे. उन दफ्तरों के कई पुराने कर्मचारियों को आज भी पहचान लेता हूं. भले ही उनसे कभी राब्ता न रहा हो. कुछ गुजर गए होंगे. कई रिटायर होकर अपने गांव या कहीं और जा बसे होंगे. आज जब कभी किसी काम से उस परिसर में जाना होता है तो कुछ वैसा ही अहसास होता है जैसे कोई भूतपूर्व प्रेमी जोड़ा एक जमाने बाद मिलने पर एक-दूसरे को देखकर सोचता होगा- कैसे थे, क्या हो गए, क्या वो तुम ही थे? 

कुछ दिन बाद मेरा भी दाखिला उसी स्कूल में करवा दिया गया जहां सतीश जाता था. वह मुझसे एक दर्जा आगे था. सतीश मुझसे कुछ लम्बा और तगड़ा था. उसका हैंडराइटिंग काफी अच्छा था और पढ़ाई में मुझसे कहीं बेहतर भी. वह शुरू से ही बड़ा फितरती किस्म का रहा. चूल्हे के धुंए की आड़ लेकर अपने पिताजी की मौजूदगी में बीड़ी पीने की कला वह तभी सीख चुका था. किसी लावारिस मगर काम की चीज को वह यूं उठाकर झोले में रख लेता जैसे वह उसी की हो. खाली अध्धे-पव्वे, टिन-प्लास्टिक को बटोरकर कबाड़ी को बेचना और पैसा कमाना मैंने उसी से सीखा. और यह भी कि अगर पांच लीटर कैरोसीन मंगवाया है तो साढ़े चार लीटर लो और बाकी पैसों से ऐश की जाए. उसमें चालाकी धूर्तता की हद तक थी. काश कि वह रचनात्मक और सकारात्मक हो पाती. 

आठवीं  के बाद उसका दाखिला जीआईसी में हो गया. तब अल्मोड़ा जीआईसी में जिस लड़के को एडमिशन मिलता था वह पढ़ाई में औसत से अच्छा माना जाता था. दाखिले के लिए बकायदा एक इम्तहान होता था. सतीश मुझसे बेहतर था पर इतना भी नहीं कि जीआईसी वाले उसे ले लेते. मेरा ख्याल है कि उसके दाखिले के पीछे उसके पिता के किसी प्रभावशाली यजमान का हाथ रहा होगा. वे नौकरी के साथ-साथ पार्ट टाइम पुरोहिती भी किया करते थे. सतीश नवीं में फेल हो गया. दुबारा दाखिल मिला नहीं या उसने खुद ही सख्त अनुशासन से तंग आकर नाम कटवा लिया, याद नहीं. वो नवीं फेल, मैं आठवीं पास. हम दोनों ने अल्मोड़ा इंटर कॉलेज का रूख किया. एक से विषय, एक ही क्लास. हम रहते भी एक ही दिशा में थे. स्कूल आना-जाना साथ ही होता. तब हम ये सोच के इतराते थे कि कुल जमा सोलह जमातें तो पढ़नी होती हैं. आधी तो हमने पढ़ डालीं.

सतीश में दूसरों की आवाज का मीटर पकड़ने की अद्भुत काबिलियत थी. यही नहीं वह सामने वाले आदमी के चलने, बोलने या किसी खास अदा को झट से आत्मसात कर लेता और उसे हू-ब-हू कर-बोलकर हंसाता था. उसमें एक अच्छा मिमिक्री कलाकार के गुण जन्मजात थे. फिल्मी गीतों की अश्लील पैरोडी करने में उसे महारत थी. बल्कि उसने स्कूल में की जाने वाली प्रार्थना के भी कुछ हिस्सों की ऐसी ही पैरोडी रच डाली थी. प्रार्थना के समय चेहरे को निर्विकार रखकर वह उसे गाता जिससे अगल-बगल खड़े लड़कों की हंसी छूट जाती. और वो पिट जाते. 

इसी दौरान हमें फिल्में देखने का चस्का लगा. हम दोनों ही कड़के बापों की औलाद थे. सिनेमा का सबसे सस्ता टिकट सवा दो या ढाई रूपये का मिलता था. यह रकम तब हमारे लिए बड़े मायने रखती थी. पैसों के लिए हम क्या-क्या जुगत नहीं करते थे. लिपाई के काम आने वाली लाल मिट्टी खोदकर बेचने से लेकर कबाड़ी को बेच जा सकने लायक चीजें उठाने और छोटी-मोटी चोरी तक. जिस दिन स्कूल की फीस पड़ती उस दिन दूसरे पीरियड के बाद भागकर हर हाल में सिनेमा हॉल पहुंच जाते. एक बार सतीश ने किसी को पिछले दिन का टिकट यह कहकर बेच दिया कि हमार एक साथी नहीं आया, एक टिकट बच गया है. टिकट न जाने कैसे गेटकीपर के हाथों से बचा रह गया और उसका एक हिस्सा जो गेटकीपर फाड़कर अपने पास रख लेता था, नहीं फटा था. यकीनन बाद में एक सीट के दो दावेदारों में झगड़ा हुआ होगा.

दसवीं में हम दोनों साथ फेल हुए. एक बार प्राइवेट इम्तहान दिया. फिर दोनों ने ही हाथ जोड़ दिए. मैं घर बैठकर मशीन की-सी तेजी और सफाई से लिफाफे बनाने लगा. सतीश ने कोई काम नहीं छोड़ा. बल्कि यूं कहना बेहतर होगा कि किसी भी काम को कभी ढंग से पकड़ा ही नहीं. शुरू में उसे ड्राईवर बनने का शौक था. शुरूआत उसने यहीं से की. उसने एक पंडित जी से दोस्ती गांठ ली. पंडित जी नगर पालिका में कूड़ा-ट्राली ढोने वाला टैक्टर चलाते थे. सतीश उनका शागिर्द हो गया. तबके गुरू लोग अपनी विद्या इतनी आसानी से चेलों को नहीं दिया करते थे. फिर भले ही वह टैक्टर चलाने का हुनर ही क्यों न हो. हर गुरू अपने फन का बड़े गुलाम अली खां हुआ करता था. मैं बीच-बीच में पूछता रहता- कितना आ गया सतीश ? कभी वह बताता कि स्टार्ट करना आ गया तो कभी यह प्रगति टैक्टर को आगे-पीछे करने तक भी चली जाती. उसे शिकायत थी कि बुढ़ढा स्टेयरिंग मुझे देता ही नहीं. प्रगति बेहद धीमी रही. फिर एक दिन पंडितजी के दिन पूरे हो गए. स्टाफ ने उन्हें शाल-श्रीफल, लाठी और गीता थमा कर विदा कर दिया. और यूं सतीश की पहली हसरत का अंतिम संस्कार संपन्न हुआ.

एक दिन पता चला कि उसकी शादी होने वाली है. मैंने उससे पूछा कि भाई खाएगा क्या ? मेरा इशारा उसकी बेरोजगारी की ओर था. उसने जबाब दिया- घर वाले जिद कर रहे हैं. ज्यादातर लोग घर वालों की ही ‘जिद’ पर शादी करते हैं. अपनी इच्छा से करने वालों का आंकड़ा बड़ा छोटा है. करीब साल भर बाद एक दिन उसने अपना हाथ मेरे आगे फैला कर कहा- यार देख तो मेरे हाथ में दूसरी शादी का योग है या नहीं ? न जाने कैसे उसे मेरे भविष्यवक्ता होने की गलतफहमी हो गई. मैंने पूछा- क्या बात है ? उसने मुझे एक अन्तर्देशीय पत्र दिखाकर कहा- क्या बताऊं यार, मेरी शादी एक भ्यास से हो गई. अब देख, चिट्ठी लिख रही है मायके को और पता लिखा है ससुराल का. हुई कि नहीं अधपगली ? तू ही बता ? भला मैं क्या बताता. 

सतीश के पिता रिटायर होकर गांव जा चुके थे. कुछ समय बाद सरकारी क्वार्टर भी नहीं रहा. सतीश एक तरह से खानाबदोशों की-सी जिंदगी जीने लगा. किसी चीज का कोई ठिकाना नहीं रह गया था. वह अकसर जिला पंचायत के चौकीदार के साथ सो जाता या गर्मियों के दिन हुए तो बाहर पड़ी बैंचों में ही रात गुजार देता. शराब वह पहले ही पीने लगा था. शराब का कोई समय नहीं था. जब, जहां, जितनी मिले गटक लो. माना अगर कोई उससे कहे कि फलां जगह पचास रूपये में पांच लीटर शराब मिल रही है तो वह यह नहीं पूछेगा कि वह शराब कैसी होगी, बल्कि पचास रूपया और जरकिन के जुगाड़ में लग जाएगा. खाने-पीने का कोई ठिकाना नहीं. नहाने-धोने से उसे विशेष परहेज रहने लगा था. उसके बदन से अकसर बास आती थी. 

एक बार न जाने किसने, किस मजबूरी या गलत फहमी के चलते उसे बच्चे का नामकरण करने बुलवा लिया. बाद में उसने मुझे यह किस्सा सुनाया. वह नशे में था और पिताजी की पुरानी पुस्तकों में से कोई एक पुस्तक झोले में डालकर चला गया. नामकरण संस्कार शुरू होने से पहले जब उसने पुस्तक बाहर निकाली तो तब जाकर गलती का एहसास हुआ. उसने यजमान से कहा मुझे एक पुराना अखबार दे दो, जिल्द चढ़ा दूं वर्ना पुस्तक मैली हो जाएगी. नामकरण संस्कार सफलता पूर्वक संपन्न हुआ. कौन-सी किताब उठा ले गया ? तो उसने बताया कि यार दारू की झौंक में ध्यान ही नहीं रहा, मैं प्रेतमंजरी उठा ले गया. कौन साला संस्कृत जानता है. न पढ़ने वाला, न सुनने वाला. दावे से कहा जा सकता है कि दुनिया का पहला नामकरण संस्कार होगा जो प्रेतमंजरी पढ़कर संपन्न हुआ होगा. नामकरण संस्कार संपन्न हुआ, पंडितजी दक्षिणा लेकर ठेके की ओर चले.  कर्मकाण्डों पर अपनी आस्था पहले ही हिलते हुए दांत-सी थी, इस वाकए के बाद वह दांत निकल भी गया. 

सतीश और मेरे पिता के संबन्ध बड़े ही विचित्र किस्म के थे. वह अकसर हमारे कमरे में आ जाया करता था. बीच-बीच में मेरे पिता के साथ कोई छोटी-मोटी हेराफेरी कर दिया करता था. ऐसे में वे उसे डांट कर भगा दिया करते कि सती निकलो यहां से, तुम साले बड़े फोर ट्वेंटी किसम के आदमी हो. दुबारा हमारे यहां मत आना. खबरदार. फिर वह कई दिनों तक नहीं आता. पिता हफ्ते भर के भीतर ही मुझसे पूछ लेते- अरे सतुवा बामण कहां है रे आजकल? 

हफ्ते-दस दिन बाद वे सतीश को फिर पकड़ लाते. वह उन्हें किसी दुकान या राह किनारे बैठा मिल जाता. उसे देखते ही कहते- अरे सती गुरू, तुम यहीं हो? हमने सोचा गांव चले गए. दिखे नहीं? और सुनाओ? खाना खाया? तो चलो पालक का कापा बनाया है. अपने लिए कहीं से हरी मिर्च ले आओ. इतनी मिर्च मत खाया करो सती. अल्सर हो जाएगा तो याद करोगे. 

तीन थालियां लगतीं. सतीश और मैं अगल-बगल बैठते. कई बार यह होता कि प्रेशर कुकर के ढक्कन में चावल का जरा भी अंश नहीं लगा होता, पिता ढक्कन को ध्यान से देखते और यह कह कर उसे किनारे रख देते कि ये तो हो गए हमारे तिवाड़ीजी, इन्हें तो धोने-धाने की कोई जरूरत ही नहीं. यह उनका तंज होता सतीश के न नहाने-धोने पर. वे पूछते - हां सती कैसा बना, नमक मिर्च? सतीश के जबाब कुछ इस तरह के होते- हां, बढ़िया, मजेदार, मजे के लिए तो कुतिया लाहौर तक चली गई थी. पिता कुछ उंचा सुनते थे इसलिए ऐसे जबाब के बावजूद मैं सर उठाकर खाना खा पाता था. कभी विस्तार से पूछ नहीं पाया उससे कि ये कुतिया के लाहौर जाने का किस्सा क्या है? 

कुछ दिनों बाद फिर वही-निकलो सती यहां से, तुम ठग हो, बेईमान हो...

एक बार वह दिवाली में किसी परिचित के घर गया. उसने पूछा- चाची कुछ फूल तोड़ लूं, चाची ने कहा- हां, सतीश तोड़ लो. सतीश ने फूल चुने और धन्यवाद कह कर चला आया. रास्ते में उसे बाजार से खरीददारी कर लौट रहे एक चाचाजी मिले. उसने फूल उन्हें बेच दिए. यह वही चाचाजी थे जिनके घर से वह फूल तोड़कर लाया था.

हाजिरजवाबी में उसका कोई जवाब नहीं था. उसकी चुस्त जुमलेबाजी गुजरे जमाने के सड़क छाप मदारियों-दवाफरोशों की-सी थी. मसलन कोई आदमी अपनी टांगों के उद्गम स्थल पर खुजला रहा हो तो वह बड़ी ही गंभीरता से कहता- अरे-अरे क्या कर रहे हो, ऐसे कानून अपने हाथ में नहीं लेते. मान लीजिए कि सतीश बीड़ी की जगह सिगरेट पी रहा है और किसी परिचित ने टोक दिया कि क्या बात सद्दा, आज तो बड़े ऐश हो रहे हैं. तो वह बिना एक पल गंवाए जवाब देगा- अपना तो ऐसा ही है यार, जेब फटे तो फटे, स्टेंडर न घटे. किसी को इस हाल में देखने पर वह कहता- क्या बात, आज औकात से बाहर हो, किसकी जेब काटी? 

मेरा आंखों देखा एक वाकया है. एक दिन किसी परिचित ने सतीश से कहा - क्या बताऊं यार पंडितजी, आज का पूरा दिन इतनी भाग-दौड़ में बीता कि खड़े होने की भी ताकत नहीं बची है. सतीश ने उससे सहानुभूति जताते हुए कहा - हां यार तभी मैं भी कहूं कि आज तुम्हारी सूरत जूते खाए सी क्यों हो रखी है. वह आदमी वाकई दिमागी रूप से भी इतना थक चुका था कि उसने सतीश की बात सुनी मगर समझ नहीं पाया. 

कई बार वह इतनी बारीक चीजें पकड़ लेता कि मुझे उससे रश्क-सा महसूस होता था. मसलन एक बार जिला पंचायत के मीटिंग हॉल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का कोई सम्मेलन था. सतीश उन दिनों पास ही एक चाय की दुकान में काम करता था. मीटिंग के दौरान चाय पिलाने का ऑर्डर उसी दुकान को मिला था. चाय पिलाने के कुछ देर बाद जब सतीश खाली कप लेने गया तो तब का अनुभव बकौल उसी के- सब लोग हड़बड़ा कर अपने-अपने कप उठा कर ट्रे में रखने लगे. साहब लोगों की मीटिंग में कप खुद झुक कर उठाने पड़ते हैं. 

सब्जी का फड़ लगाने, दुकानों में काम करने, लाटरी बेचने, कैटरिंग में हैल्परी करने जैसे न जाने क्या-क्या काम उसने किए. पर कहीं भी टिका नहीं. कारण वही शराबखोरी, चंचलता और फौरी फायदे के लिए छोटा-मोटा चूना लगा देने की आदत. 

मेरे पिता कई बार उसे समझाते - सती गुरू, यार तुमने अपनी क्या हालत बना ली है. अरे यार पंडित के बच्चे हो, जरा ढंग से रहोगे तो लोग इज्जत करेंगे. तुम्हारे पिताजी का इतना मान है, नाम है. तुम्हारे तो नजदीक ही में हैं, सुबह को धारे पर जाकर ठीक से नहा-धो लिया करो, फटा-पुराना ही सही, साफ कुर्ता-पायजामा पहनो, माथे पर तिलक लगाकर पंडित जैसे बनके निकलो, दाढ़ी ससुर या तो ढंग की रखो या कटवा लो. ढंग से रहोगे तो क्या नहीं हो सकता. अपने बड़े भाई को देखो, कितनी अच्छी पंडिताई जमा ली है. तुम क्यों नहीं कर सकते. क्यों कंजड़ों जैसे बने फिरते हो. दारू आज-कल कौन नहीं पीता, शाम को लिमिट की पिओ, कौन पूछता है ? जो अपना ढर्रा छोड़ दे वह फिर सतीश नहीं हो सकता. उसे नहीं बदलना था, नहीं बदला. दूसरों के प्रति तो दूर की बात वह कभी खुद के साथ भी ईमानदार न हो सका. 

दूसरी संतान के रूप में जब उसको बेटा हुआ तो लोगों ने बधाई दी- सद्दा बधाई हो बेटा हुआ है. तो उसका जवाब था- अरे काहे का बेटा, पितर हुआ है कहो, देख नहीं रहे इन दिनों पितृपक्ष चल रहा है. हाजिर जवाबी और न सिर्फ दूसरों का बल्कि खुद का भी मजाक उड़ाने की उसकी आदत अंत तक बनी रही. 

यह बात पहली नजर में बड़ी अटपटी और विरोधाभासी-सी लगती है कि अभावग्रस्त आदमी में कई बार उंचे पाए का हास्यबोध उत्पन्न हो जाता है. एक विपन्न आदमी आए दिन जीवन की ऐसी-ऐसी विद्रूपताओं से दो-चार होता है जिन्हें कोई साधन संपन्न आदमी सोच भी नहीं सकता. यहीं पर वह दो रहा है जहां से एक लम्बा और पथरीला रास्ता दीनता की ओर जाता है. इस रास्ते पर जो चला वह न सिर्फ अपना जीवन और कठिन बना लेता है बल्कि वह निपट अकेला पड़ जाता है. एक दिन वह खुद को इंसान ही मानना छोड़ देता है. दूसरा रास्ता व्यंग मिश्रित हास्य की ओर मुड़ता है. चार्ली चैपलिन की फिल्में इसी की पैदाइश हैं. अपने दुखों और अभावों की अगर कोई खिल्ली उड़ाना सीख ले तो उनकी धार उतनी नहीं चुभती कि जितनी दीनता में. सतीश अनजाने ही इस राह पर चला आया था. बयालिस-तितालिस साल का उसका जीवन घोर अभावों में बीता मगर दीनता या बेचारगी कभी चेहरे पर देखी हो याद नहीं पड़ता. हमेशा आंखों में एक शरारत का भाव और कोई नई खुरापात करने की ताक में वह दिखता था. 

अनियमित जीवन और खान-पान की लापरवाही ने उसे असमय ही बूढ़ा-सा बना दिया था. अच्छा-खासा शरीर ढल गया था. बाल कुछ ज्यादा ही सफेद हो गए थे और ज्यादातर दांत गिर गए थे. वह अपनी वास्तविक उम्र से काफी बड़ा लगने लगा था. कई बार वह अपनी उल्टी-सीधी हरकतों के चलते इसी कारण पिटने से बच गया कि लोगों ने सोचा छोड़ो यार, बुढ़ढा आदमी है. जबकि वह उम्र में मुझसे कुछ माह छोटा था. वाकई उसने अपनी गत बुरी बना ली थी. 

आखिर के कुछ सालों को छोड़कर मेरे-उसके सम्बन्ध मधुर रहे. मैं उसकी ज्यादातर बातों की सच मानता था. उसका भरोसा करता था. उसकी सारी हरकतों को जानने के बावजूद न जाने क्यों मुझे लगता था कि कम से कम वह मुझसे झूठ नहीं बोलता, बेइमानी नहीं करता. यह कच्ची उम्र की दोस्ती का असर रहा होगा. कई मौकों पर मैंने उसका बचाव किया और जो भी बन पड़ा मदद की. पर धीरे-धीरे मानना पड़ा कि यह महज मेरी खामख्याली है. वो तो मुझे भी नहीं बख्शता. पर हमारी दोस्ती जारी रही. घर आना-जाना, साथ खाना-पीना, घूमना-फिरना, पिक्चर देखना लगा रहा. पर अब मैंने जरा सतर्कता से काम लेना शुरू कर दिया था. मैं खुद उसी जैसा फटीचर रहा इसलिए सतीश कभी मुझे कोई बड़ा जर्क तो नहीं दे सकता था, पर किसी का भरोसा खो देना किसी हादसे से कम नहीं होता. कई बार आदमी अपनी नासमझी के चलते छोटी-छोटी राहतों के स्रोत बंद कर बैठता है. और सतीश ने जीवन भर यही किया 

बावजूद इस सबके, मैं जिसकी कल्पना भी नहीं करता था, एक दिन वह हो गया. सतीश कहीं से नशे की हालत में लड़खड़ाता हुआ मेरे कमरे में आया. उस समय एक मित्र मेरे पास बैठे थे जो उसके भी परिचित थे. उसने अजीब-सी बेसिरपैर की बातें करनी शुरू कर दी. जरूरत से ज्यादा पिए था और एक साबुत पव्वा उसकी कमर में अड़ा था. उसने शराब के लिए पैसों की मांग की. जिसके पेट में भरपूर शराब हो और एक सील बंद पव्वा पास में हो, वह शराब के लिए पैसा मांगे, यह बड़ी ही बेतुकी और चिढ़ पैदा करने वाली ही बात मानी जाएगी. मैं जब्त करता रहा, टालता रहा. बड़ी देर तक बक-झक के बाद उसने कहा बीड़ी पिलाओ. मैंने पांच रूपये दिए, सोचा कि ये टले तो सही किसी तरह. उसने पैसे उछाल दिए यह कहकर कि साले मुझे भिखारी समझ रखा है क्या? मैंने उसे सख्ती से बाहर जाने को कहा. उसने बाहर निकल कर सीढ़ियों में रखे पानी के जरकिन उठा कर पटक दिए. गालियां और असंभव किस्म की धमकियां देता हुआ चला गया. क्या अजब दुर्योग है कि दोस्ती की शुरूआत अंत एक जैसा था. 

इसके बाद कई दिनों तक वह मेरे सामने नहीं आया. काफी समय तक कटा-कटा-सा रहा. धीरे-धीरे हमारी बातचीत शुरू हो गई मगर रिश्ता पहले-सा न हो सका. उसमें एक औपचारिकता आ गई थी. मैं उसकी खैरियत यहां-वहां से लेता रहा और बिना मांगे कोई मदद, जो मेरी हैसियत में थी, करनी बंद कर दी. 

लेकिन बावजूद इस सबके मैं कैसे भूल जाउं कि हमने बचपन का काफी अर्सा साथ बिताया, साथ खेले, एक साथ स्कूल गए. न जाने क्या-क्या जुगाड़ करके ढेर सारी पिक्चरें एक साथ देखीं ... अनगिनत खट्ठी-मीठी यादें उसमें बावस्ता हैं. स्कूल से वापसी में हम अकसर चलती बसों के पीछे छत में जाने के लिए जो सीढ़ी होती है उसमें लपक कर लटक जाया करते और बस स्टेशन तक पैदल चलना बच जाता. इस कोशिश में कई बार टपकते-टपकते बचे भी. जब मेरे पिता गुजरे उस समय सतीश ने ही सब किया. पब्लिक नल से पानी ढोना, खाना बनाना, आने वालों के लिए चाय और बाजार का सौदा-सुलफ सब उसी ने निभाया. 

जब कभी सतीश के बारे में सोचता हूं तो कुछ इस तरह के नतीजे पर पहुंचता हूं कि आदमी चाहे लाख अवगुणों का आदी हो जाय, उसे कोई एक ऐसी चीज अंत तक बचा कर रखनी ही चाहिए कि समाज एक दम ही उसे लतियाए नहीं, अवांछित न मान ले. कोई तो एक साएदार पेड़ हो कि हर तरफ से धकियाए जाने पर उसकी छांव तले बैठ सके. सतीश से यहीं पर चूक हुई और वह हमदर्दी तक खो बैठा. 

आखिरी बार मैंने उसे अस्पताल के बिस्तर पर देखा. मुझे उसके वहां होने की जानकारी नहीं थी. किसी और का हाल जानने गया था. उस आदमी को खोजते हुए सतीश के वार्ड में घुसा. उसे क्या तकलीफ थी, अब याद नहीं. उसने कुछ मांगा नहीं, मैंने दिया नहीं. कुछ देर उसके पास बैठा रहा फिर चला आया बाद में आने का वादा करके. अगली सुबह किसी का फोन आया कि सद्दा निकल लिया.

उसके जिस भेजे में गजब की हाजिरजवाबी थी, अद्भुत हास्यबोध था और थी ‘ढेर सारी मजेदार खुराफातें’, जब उसी भेजे को चिता में पिघल कर बहते देखा तो लगा जैसे कोई कीमती चीज सदा के लिए मिट्टी में मिल गई हो.

Monday, December 15, 2008

ये संसार कागद की पुड़िया

एक दोस्त हैं श्रीमान राजेन्द्र बोरा. अल्मोड़ा रहा करते थे. रोहित उमराव के कैमरे से इस साल अल्मोड़ा के दशहरे की जो तस्वीरें आपने देखीं थीं उनमें ज़्यादातर को बनाने का श्रेय उन्हीं को जाता है. पिछले कोई चालीस सालों से अल्मोड़ा की सांस्कृतिक गतिविधियों के केन्द्र में रहे बोरा जी की पुतले बनाने की कला के ऊपर बाकायदा एक फ़िल्म बनाई जा चुकी है: 'द बर्निंग पपेट्स'. राजेन्द्र बोरा के कुमाऊंनी फ़िल्में बनाई हैं, उनमें अभिनय किया है, गीत लिखे हैं और जाने क्या-क्या. अल्मोड़ा के विख्यात हुक्का क्लब के ऐतिहासिक महत्व के वार्षिक प्रकाशन 'पुरवासी' के सम्पादक मंडल के वे मुख्य सूत्रधारों में रहे हैं. वे कवि हैं, भाषाविद हैं, संगीतकार हैं और भले आदमी.

मेरा उनसे परिचय कोई पांच साल पुराना है. पहली दो मुलाकातें दारू के भीषण नशे में हुईं. दूसरी मुलाकात के अगले दिन मैंने उनका दूसरा रूप देखा - वे वहां एक बैंक के मैनेजर भी थे. और दूर-दराज़ के गांवों से आए ग्राहकों के साथ बहुत ही मानवीयता से पेश आने वाले सहृदय इन्सान के तौर पर उनकी छवि अब भी मन में जस की तस है. लंच टाइम में वे मुझे बैंक के ही पिछले कमरों में स्थित अपने आवास में ले गए और अपने हाथों से स्वादिष्ट खिचड़ी बना कर खिलाई.

पिछले साल इन्हीं दिनों एक रात करीब दस बजे हल्द्वानी में उनका फ़ोन आया: "यार बहुत बीमार हूं. इलाज कराने आया हूं. जल्दी मिलो." उनकी आवाज़ बता रही थी वे धुत्त थे. इत्तफ़ाकन घर पर रोहित था. हम दोनों हल्द्वानी के रेलवे बाज़ार में एक होटल में उनसे मिले जहां वे क़याम किये थे. बहुत ही रद्दी होटल था - गन्दा और बदबूदार. मैंने घर चलने का आग्रह किया पर किसी ज़िद्दी बच्चे की तरह वे आदतन बोले "मैं किसी के घर - वर नहीं जाऊंगा!". उन्होंने मुझे नोटों की गड्डी थमाई और कहा: "शायद इसकी ज़रूरत पड़े. कम होंगे तो और आ जाएंगे. अब गुड नाइट!"

खैर! सुबह उन्हें एक परिचित अस्पताल में दाखिल कराया. डॉक्टर बोले कि हल्द्वानी में इलाज़ सम्भव नहीं. मुझे पता था उनकी बीमारी की जड़ में दारू और सिगरेट थे. मैंने उन्हें कुछ दिन फ़कत आराम दिलाने के उद्देश्य से प्राइवेट वार्ड में भर्ती करा दिया. दो दिन में उनके चेहरे पर नूर उतरने लगा. तीन टाइम खाना, न दारू न सिगरेट, और वक्त पर ज़रूरी चिकित्सकीय सहायता. दिन भर हम बतियाया करते. दुनिया जहान की बातें होतीं. उन्हें अचानक बहुत सारी बातों पर अफ़सोस होने लगा था. ठीक हो जाने के बाद खूब काम करने की अनेक योजनाएं थीं उनके जेहन में. कोई तीन दिन बाद उनके एक बहनोई साहब नैनीताल से तशरीफ़ लाए. रात को उन्होंने वार्ड में सोने का ज़िम्मा सम्हाला और कोई सप्ताह भर बाद उनके बड़े भाई आए. दिल्ली ले जाने को. बस अड्डे पर उन्हें विदा किया. दिल्ली पहुंचकर उन्होंने फ़ोन किया और आगामी दो महीनों में होने वाले तीन आपरेशनों के बाबत बताया.

कई माह उनका फ़ोन आउट ऑफ़ रीच आता रहा. पर मैं निश्चिन्त था. मुझे दूसरे सूत्रों से खबर लगी कि उनके आपरेशन सफल रहे. वापस अल्मोड़ा आ कर उनका फ़ोन आया. मैं डरा हुआ था कि कहीं वे पुनः अल्मोड़ा की पुरानी बुद्धिजीवी राह न थाम लें.

अचानक मेरे अपने घर पर विपदाएं पड़नी शुरू हुईं जो अब तक जारी हैं. ... खैर, मैं उनसे न तो मिल ही सका न फ़ोन कर सका. दशहरे के समय रोहित अल्मोड़ा जा कर फ़ोटो खींचने को लालायित था. मैंने बोरा जी को फ़ोन किया. वे खुश हुए. "गुंडागर्दी कैसी चल रही है आपकी?" मैंने उनसे पूछा. "न न अब कोई गुंडागर्दी नहीं." उन्होंने बच्चों की तरह आश्वस्त करने की शैली में जवाब दिया.

रोहित गया और वापस आ गया. फ़ोटो खींच कर लाया. खुश था. बोला बोरा जी बिल्कुल बदल गए. मुझे अच्छा लगा.

अभी कुछ दिन पहले वे मुझे आश्चर्यचकित करने मेरे घर पधारे. उनके एक हाथ में सोनी का अल्ट्रामॉडर्न वीडियो कैमरा था और दूसरे में कमंडल. "अब तो काम करना है. बस." वे बोले और उन्होंने मुझे शर्मसार करते हुए सब के सामने मेरे पैर छू लिए. तब पता नहीं कैसा लगा पर अब अच्छा सा लगता है कि वे जहां भी होंगे जीवन के नज़दीक होंगे. और मैं दुआ करता हूं खुश भी. राजेन्द्र बोरा से त्रिभुवनगिरि स्वामी बनने उपरोक्त क्रम की बानगी ये रही. सारे फ़ोटो रोहित उमराव के हैं.