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Wednesday, November 15, 2017

हजारे का चूरा


हजारे का चूरा

- शंभू राणा

आज न जाने कैसे अचानक ‘चूरे’ की याद आ गई- जैसे वर्षों बाद कोई बाल सखा सामने आ जाए. सचमुच यार चूरे तू भी क्या चीज था. अब न तू है, न अपना वो बचपन. पर तेरी यादें हैं, रहेंगी.

मेरे हम उम्र वो सभी लोग जिनका बचपन अल्मोड़ा में गुजरा हो, एक चीज से जरूर वाकिफ होंगे- ‘हजारा का चूरा’. अगर जीवन की आपाधापी में कोई भूल गया हो तो थोड़ा-सा दिमाग पर जोर डालते ही याद आ जाएगा. बचपन में माँ-बाप ने जो दाल-भात खिलाया, जितना एहसान उसका मानता हूं, उतना ही लगभग हजारा के चूरे का भी मान लूं तो यह कम से कम मुझे तो अतिशयोक्ति नहीं जान पड़ता है.

इस चूरे ने हमारे बचपन को हंसाया, गुदगुदाया. कभी हैरान किया तो कभी लॉटरी लग जाने का-सा एहसास भी कराया. उन दिनों हमारे लिए नाश्ते-स्नैक्स का एक सस्ता और बेहतरीन विकल्प था यह चूरा. सबसे अच्छी बात कि इसका कोई निश्चित मूल्य नहीं था. जेब में जितने भी पैसे हों उसी हिसाब और मात्रा में मिल जाया करता था.

इस चूरे का न कोई विज्ञापन था न ही मार्केटिंग. यह एक स्थानीय उत्पाद था जो हर रोज न चाहने के बावजूद स्वतः उत्पन्न हो जाया करता था. बच्चों में मैगी-नूडल्स जितना लोकप्रिय था.

कई बार दो-तीन दोस्त इस लालच में एक साथ चूरा खरीदते कि मात्रा में ज्यादा मिलेगा और उसमें न जाने क्या-क्या हमारे हिस्से आ जाए. एकाध बार चूरे में न जाने क्या खा गया कि मुझे उल्टी-सुल्टी दोनों हो गए. नतीजन डांट खाई और पिटा भी. फिर ज्यों ही अठन्नी-चवन्नी हाथ लगी, तन-मन चूरे की ओर लपका. कई बार बड़े भी ललचा जाते और ‘देखूं तो क्या है’ कहकर वो बच्चों के चूरे में डाका डाल देते. तब बाजार में आज की तरह इफरात में फास्ट फूड नहीं था और न ही अभिभावकों के पास पर्याप्त पैंसा. ऐसे फटीचर समय में उस चूरे ने हमें पोषित किया. यह तबकी बात है जब आम आदमी के कपड़ों-जूतों में पैबन्द एक सामान्य सी बात थी. जब खाते-पीते घरों के पुरूष धारीधार कपड़े का नाइट सूट पहना करते थे. मेरी मांस-मज्जा उस चूरे से भी काफी हद तक बनी है और उसकी कर्जदार है.

दरअसल यह ‘हजारे का चूरा’ हजारा का न होकर लाला बाजार स्थित हजारा की दुकान में मिलने वाला तरह-तरह के बिस्कुटों का चूरा हुआ करता था, जो कि चूरे की ही तरह टूट-फूट कर ‘हजारा का चूरा’ के नाम से बच्चों के बीच मशहूर हो गया था. हजारा बंधु तब भी भले-चंगे थे, आज भी सलामत हैं.

लोगों के बीच हजारा की दुकान के नाम से यह कनफैक्शनरी की दुकान आज भी अपनी जगह मौजूद है. उस जमाने में वह अल्मोड़ा की अपनी तरह की शायद एक मात्र हाई-फाई दुकान हुआ करती थी. उनकी अपनी एक बिस्कुट फैक्ट्री भी थी. जहां तरह-तरह के बिस्कुट, केक, डबल रोटी वगैरा बनते थे. इन्हीं सबके बनने-पैक होने के दौरान जो टूट-फूट होती उसी को एक पेटी में भरकर दुकान में रख दिया जाता था. वही हजारा का चूरा था. अखबार के टुकड़े में पांच पैंसे का भी मिलता था तो रूपये-दो रूपये का भी.

यह चूरा कई बार सरप्राइज भी देता था. चूरे के बीच में अकसर बड़ा माल मिल जाया करता. अब क्या मिलेगा यह तो उस दिन के राशि-फल पर निर्भर होता- आधा क्रीम रोल, केक का टुकड़ा, आधा-चैथाई टुकड़ा महंगा बिस्कुट या आधा डबल रोटी ... कुछ भी. कई बार चूरा इस बात की भी चुगली करता कि फैक्ट्री में चूहे भी मौजूद हैं.

कई बार लड़के झुंड बनाकर चूरा खरीदने जाते और भीड़ का फायदा उठाकर दुकान के बाहर कोने में सजाकर रखे बिस्कुट और डबल रोटी पर हाथ साफ कर देते. पकड़े जाने पर जो अच्छे धावक होते वो बच जाते, जो घबरा जाते वो थोड़ा पिट लेते और अनुभव सम्पन्न होकर फिर कभी कोशिश करते. अगर भाग्यवश ये दोनों बातें हुई तो फिर मजा. मुफत की दावत.

अब न तो ‘हजारा का चूरा’ मिलता है न आज के बच्चे इसे पसंद करेंगे. बस उस चूरे की यादें बाकी हैं. और हां, उस दौर के चूरा पोषक जो लोग आज भी अल्मोड़ा में ही रह गए, अब इतने उमरदार हो चले हैं कि अक्सर शाम ढले हजारा की दुकान से चटपटी नमकीन खरीदते दिख जाते हैं. अब इस बात से आपको क्या लेना-देना जी कि वो नमकीन चाय के साथ लें या.... अरे अंकल छोड़ो भी, देखे का अनदेखा करना भी सीख लो. बच्चे बड़े हो गए. बल्कि उनके भी बच्चे हो गए हैं.

Friday, October 16, 2009

आलू कथा वा कृषि विज्ञान का प्रेक्टिकल

आज आलू पर बहुत प्यार आ रहा है. धनतेरस , नरक चतुर्दशी, दीपावली और भैया दूज के शुभ अवसर पर आलू की बात करना कुछ अशुभ तो नहीं है लेकिन थोड़ा अजीब और अजूबा जरूर हो सकता है , पर क्या किया जाय ? यत्र - तत्र - सर्वत्र अगर कोई कोई चीज व्याप्त है तो वह आलू है ! आलू है !! आलू है !!!. 'जब तक सूरज चाँद रहेगा ' की तर्ज़ पर ' जब तक रहेगा समोसे में आलू' के कहन की रवायत भी खूब चल पड़ी है. कुछ बरस पहले इसी तरह की पंक्तियों वाला एक गाना भी सुनने को मिला था. आजकल बाजार में आग लगी है. हर चीज मँहगी बिक रही है. धनतेरस भी इस बार 'मद्दा' और फीका - सा रहा फिर भी आलू जी महाराज की दुकान खूब चल रही है. क्यों न हो; अगर आम फलों का राजा है तो सब्जियों और तरकारियों का राजा शायद आलू ही होता होगा ! क्या बात है - आलू सब्ज ( हरा ) नही होता फिर भी सब्जी है ! इस समय नया पहाड़ी आलू २५ रुपये किलो के भाव से बिक रहा और पुराना कोल्ड स्टोर वाला २० रुपये किलो के भाव फिर भी उसकी खपत में कुछ खास कमी नहीं आई है क्योंकि आम आदमी आलू नहीं खाएगा तो और क्या खाएगा ? आँकड़ों की बात करें तो भारत आलू के उत्पादन में विश्व तीसरे स्थान पर है. आलू भक्षण के आँकड़े मुझे ज्ञात नहीं लेकिन उम्मीद है इस मामले में अपन सबसे ऊपर ही होंगे !

आज आलू पर बहुत प्यार आ रहा है. आना भी चाहिये.इसकी महिमा का बखान करने का मन तो कर रहा है लेकिन धनतेरस , नरक चतुर्दशी, दीपावली और भैया दूज के शुभ अवसर पर मिठाइयों , पकवानों और मेवों - मखानों की बात के बदले आलू की बात ? चीनी , तेल , वनस्पति घी का भाव हाथ नहीं रखने दे रहा है.मावा - खोया - पनीर में मिलावट के अनुप्रयुक्त रसायन विज्ञान की प्रयोगशालाओं से निकला उत्पाद हमारे पेट तक पहुँच रहा है.पटाखे खरीदने जाओ तो दाम सुनकर ऐसा लगता है कि जैसे किसी ने पूँछ में पटाखा बाँध दिया है. तब क्या किया जाय? आलू जी की शरण के अलावा और कहीं ठौर नहीं. यह सब जानकारियाँ तो पुरानी हो गईं कि 'गुलाब दिवस' .'कद्दू दिवस' , 'हस्त - प्रक्षालन दिवस' आदि - इत्यादि दिवसों की तरह 'आलू दिवस' भी मनाया जाता है. और तो और २००८ को अंतरराट्रीय स्तर पर 'आलू वर्ष' के रूप में मनाया गया तथा इस महान वानस्पतिक उपहार की शान में न केवल खूब कसीदे पढ़े गए बल्कि इस विपुला पृथ्वी के असंख्य मनुष्यों के उदर में जलने वाली आदिम आग भूख के विरुद्ध एक सहज उपलब्ध नैसर्गिक साधन के रूप में प्रतिष्ठित किया गया. इंसानी ज्ञान, जुगतऔर खेती - किसानी की अधुनातन खोजों के फलस्वरूप धरती की कोख से निकलने वाला आलू अब नाना रूप धर पैकेटों और पाउचों में कैद होकर हमारी जिह्वा पर स्वाद की तरह तैर रहा है. गैस से भरे गुब्बारों की की फूले ( न समाते ! ) पैकेटों और पाउचों को खोलते फाड़ते हुए तनिक सोचिएगा कि इस पैकेट - पाउचबंद आलू का क्या भाव है ? यह भाव दो अंकों में शायद ही हो !

आज आलू पर बहुत प्यार आ रहा है. कई - कई चीजें , तरह - तरह के प्रसंग याद आ रहे हैं. एक उम्र है जो आलू के सानिध्य में गुजर रही है - तमाम स्मृतियों और संदर्भों के साथ - साथ चलते हुए. कक्षा सात में दिया गया कृषि विज्ञान का प्रेक्टिकल इक्जाम याद आ रहा है. अपने पड़ोसी और वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर पी. के. चक्रोबोर्ती महोदय के किचेन गार्डेन में आलू की बुआई याद आ रही है. हिन्दी साहित्य की दुनिया में उपन्यास सम्राट कहे जाने वाले प्रेमचंद की मशहूर कहानी 'कफ़न' के पात्र माधव , घीसू और बुधिया याद आ रहे हैं.इस कहानी में एक और पात्र भी है - पड़ोसी के खेत से चोरी कर लाया गया और अलाव भुनता हुआ आलू. वैन गॊग का जगत्प्रसिद्ध चित्र ' द पोटैटो ईटर्स ' ( १८८५) भी इसी क्रम में स्मृति के कैनवस पर उभर रहा है जिसके आलूखोरों की उंगलियाँ अजब इशारे करती जान पड़्ती हैं. क्लास थर्ड बी में पढ़ने वाले अपने पुत्र अंचल सिद्धार्थ की साइंस और ई.वी .ई. की किताब का एक प्रश्न भी याद आ रहा है - 'पोटैटो इज रूट आर स्टेम ?' भारतीय आलू अनुसंधान केन्द्र , कुफरी ( शिमला ) की खूबसूरत पहाड़ियाँ याद आ रही हैं. आलू का इतिहास , भूगोल, पाकशास्त्र याद आ रहा है. पेरू और बोलीविया से लगभग आठ हजार साल पहले यात्रा आरंभ करते हुए आलू के भारत आगमन का काल्पनिक मानचित्र भी बनकर लगभग तैयार है. आलू में पाए जाने वाले तत्वों की तालिका भी तैयार - सी हो रही है. और 'सबार ऊपरे आलूर सत्य' की सत्य तरह असम , अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और लगभग समूचे उत्त्तर - पूर्व भारत के भोजनालयों में 'भात' अर्थात भोजन में अतिविशिष्ट पकवान की तरह परोसा जाने वाला सरसों के तेल में तर बिना छिले आलू का 'भाजा' मुँह को द्रवित - सा कर रहा है तब भला आलू पर प्यार क्यों न आए ?

एक जरूरी अवांतर :

आज आलू पर बहुत प्यार आ रहा है. इधर आलू पर लिखी कुछ कवितायें भी पढ़ने को मिलीं. हास्य - व्यंग्य के नाम पर की जाने वाली तुकबंदी को अगर छोड़ दें जिनमें आलू के साथ लालू , भालू , चालू, टालू , शालू, कालू आदि शब्दों की तुक भिड़ाने के अलावा कुछ और नहीं होता है, तो उनके लिए , जो कविता को सचमुच कविता मानते हैं , प्रस्तुत है रामजी यादव की कविता 'आलू' का एक अंश - ( पूरी कविता पढ़ने के लिए नई कविता तक की यात्रा कर लें )

गरीब-गुरबा तो एक आलू पकाकर शोरबे में
काट देते हैं दिन

थके हुए श्रमिक आलू के चोखे में जरूरत से

ज्‍यादा मिर्च डालकर निकाल लेते हैं जरूरत भर रंगीनी

सिनेमा हाल के अंधेरे में
प्रेमी बनने के फेर में पड़ा यह छोकरा

अंकल चिप्‍स ठूंस देता है लड़की के मुंह में

और कान के पास सरगोशियों में इल्तिजा करता है.

मैं देखता हूं तुम विनम्र बना देते हो बड़े से बड़े तुर्रमों को

एक ही गोष्‍ठी में
सभी चाव से खा लेते हैं समोसा

और डकार लेते हुए चाय की तलब होती है

तुम मौजूद हो हर जगह
जैसे भाषा मौजूद रहती है

मगर गायब है तुम्‍हारा सम्‍मान
जैसे भावनाएं गायब हों
मनुष्‍यों के बीच.

फुट (मिड !) नोट : ( हिन्दी में बोले तो : पाद - मध्य टिप्पणी )

इस पोस्ट को लिखते समय मन था कि अपने कक्षा सात के कृषि विज्ञान का प्रेक्टिकल इक्जाम और प्रोफेसर पी. के. चक्रोबोर्ती की आलू बुआई की कथा बाँचूंगा लेकिन कहाँ से कहाँ बहक गया. अगर अभी तक आप बोर न हुए हुए हों तो दोनो में से कम से कम एक सत्यकथा तो आज सुनाई ही जा सकती हैं -

आलू कथा : कक्षा सात में दिया गया कृषि विज्ञान का प्रेक्टिकल इक्जाम ...

कृषि विज्ञान की प्रयोगात्मक परीक्षा के लिए प्रत्येक विद्याथी को छोटी - छोटी क्यारियाँ अलाट हुई थीं. एग्रीकल्चर माट्साहेब का आदेश था सभी लड़के अपनी - अपनी क्यारियों में आलू बोयेंगे और इसके लिए घर से एक रुपया लाना है और स्कूल के गेट पर वाली दुकान से आलू का बीज खरीदना है.इस होनहार विद्यार्थी ने अपने गुरुदेव की आज्ञा का आधा पालन किया और आधा खा गया. मतलब कि घर से एक रुपया तो जरूर लाया लेकिन क्या करता ! इंटरवेल में दुकान तक गया था तो आलू का बीज ही खरीदने बुरा हो ठेले पर सिंकतीं और बिकतीं उन आलू की टिक्कियों का जिन्होंने अपनी ओर खींच लिया. खैर,अपनी क्यारी में बिना बीज के ही आलू 'बो' देने का चत्कार कर दिया गया और बढ़िया मेंड़ें बना दी गईं.अब माट्साहेब अपना हाथ थोड़े न गंदा करते और गोपीचन्द जासूस की तरह मेंड़ों की तलाशी लेते. वे आए और मौखिक परीक्षा ली-
'
किस चीज की बुआई कर रहे हो लड़के ?'
लड़के
ने कहा _ 'श्रीमान जी , आलू बोया गया है.'
गुरु
- 'लड़के , बताओ तो आलू में कौन - सा तत्व पाया जाता है ?'
लड़का
- 'जी, स्टार्च.'
गुरु
- 'बहुत अच्छे , बहुत अच्छे'.
और
एक होनहार विद्यार्थी , जिसके भीतर भारत का भविष्य छिपा हुआ था को, शाबासी व आशीर्वाद से सिंचित कर गुरुदेव अगली क्यारी की ओर बढ़ लिए. कुछ दिन बीते . सबकी क्यारियों में हरे - हरे कोमल पत्तों वाले आलू के पौधे आधुनिक हिन्दी कविता में प्रयोगवाद के प्रणेता कविवर अज्ञेय के शब्दों में 'फोड़ धरा को रवि को तकते निर्भय' दिखाई देने लगे लेकिन अपनी क्यारी में कुछ हो तब न उगे ! वहाँ तो प्रकृति के सुकुमार कवि पंत की तरह मैंने 'छुटपन छिपकर सिक्के ( भी नहीं ) बोए थे जो पैसों के पेड़ उगते. चोरी पकड़ी गई थी और अब सजा की बारी थी.यह स्कूल के अनुशासन का प्रश्न था कोई 'मेरा गाँव मेरा देश' फिल्म का सीन नहीं जिसमें चक्कू लेकर नाचने वाली लक्ष्मी छाया पूछती कि -'मार दिया जाय कि छोड़ दिया जाय , बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाय !' . माट्साहेब ने क्लास सेवेन्थ ए के मानीटर दर्शनलाल 'मोटू' से बेहाया / बेशरम / सदाबहार का मजबूत डंडा स्कूल के पिछवाड़े से मँगवाया और जो पौधे कभी क्यारी में उगने चाहिए थे वे इस होनहार विद्यार्थी , जिसके भीतर भारत का भविष्य छिपा हुआ था , की हथेलियों पर उगे. पता नहीं व आलू के पौधे थे या किसी और वानस्पतिक उपहार के फिर भी जब भी कभी आलू देखता हूँ तो कक्षा सात में दिया गया कृषि विज्ञान का प्रेक्टिकल इक्जाम याद आ जाता है और क्यारी की जगह हथेलियों पर उगने वाले देह व दिलदुखाऊ पौधे भी.

और अंत में सूचना की तरह ( किन्तु सूचना के शिल्प में नहीं ) :

*आलू पहेली - 'पोटैटो इज रूट आर स्टेम ?'
** माना कि आज आलू पर बहुत प्यार आ रहा है. आलू से जुड़े प्रसंग भी बहुत परेशान किए हुए हैं लेकिन धैर्य की भी कोई सीमा होती है! अत: सभी पाठकों को सूचित किया जाता है कि आलू की अगली किश्त के रूप में प्रोफेसर पी. के. चक्रोबोर्ती की आलू बुआई की कथा जल्द ही.अभी तो धनतेरस बीता है , नरक चतुर्दशी, दीपावली और भैया दूज बाकी हैं . ये त्योहार सबको शुभ हों ,ऐसी कामना है. शुभ दीपावली ! हैप्पी भाई दूज !
*** बोलो , आलू बाबा की जय !