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Tuesday, September 25, 2012

संभले हुए तो हैं, पर ज़रा डगमगा तो लें


एक प्रिय कवि अख़्तर-उल-ईमान की एक नज़्म प्रस्तुत करता हूँ. उर्दू से लीना नियाज़ ने लिप्यान्तरण किया है.

आख़िरी मुलाक़ात

आओ कि जश्न-ए-मर्ग-ए-मुहब्बत मनाएँ हम

आती नहीं कहीं से दिल-ए-ज़िन्दा की सदा
सूने पड़े हैं कूचा-ओ-बाज़ार इश्क़ के
है शम-ए-अंजुमन का नया हुस्न-ए-जाँ गुदाज़
शायद नहीं रहे वो पतंगों के वलवले
ताज़ा न रख सकेगी रिवायात-ए-दश्त-ओ-दर
वो फ़ितनासर गए जिन्हें काँटें अज़ीज़ थे

अब कुछ नहीं तो नींद से आँखें जलाएँ हम
आओ कि जश्न-ए-मर्ग-ए-मुहब्बत मनाएँ हम

सोचा न था कि आएगा ये दिन भी फिर कभी
इक बार हम मिले हैं ज़रा मुस्कुरा तो लें
क्या जाने अब न उल्फ़त-ए-देरीना याद आए
इस हुस्न-ए-इख़्तियार पे आँखें झुका तो लें
बरसा लबों से फूल तेरी उम्र हो दराज़
संभले हुए तो हैं, पर ज़रा डगमगा तो लें

(जश्न-ए-मर्ग-ए-मुहब्बत - प्यार की मौत का उत्सव, गुदाज़ – पिघलता हुआ, वलवले – उत्साह, फ़ितनासर – पागल, उल्फ़त-ए-देरीना – पुरानी मोहब्बत.)

Friday, January 1, 2010

आज पूरे साठ के हो गये हैं शायर डॉ.राहत इन्दौरी.



वो अब भी इक फ़टे रूमाल पर ख़ुशबू लगाता है !

यक़ीनन हमारे राहत भाई ऐसे ही हैं. उर्दू शायरी का परचम उठा कर वे पूरी दुनिया में घूमते हैं;महंगे एयरलाइन्स में सफ़र करते हैं,सात सितारा होटलों में ठहरते हैं,रईस मेज़बानों के मेहमान होते हैं लेकिन अपने अतीत के उस फ़टे रूमाल को नहीं बिसराते जिसमें मध्यमवर्गीय ज़िन्दगी के संघर्ष की ख़ुशबू महकती है.कभी ग़ौर से सोचियेगा; हमें राहत की शायरी इतना क्यों छूती है,क्यों अपनी सी लगती है,क्यों उसमें हमार्री ज़िदगी के दु:ख-दर्द दिखाई देते हैं...इसका सीधा और आसान जवाब यह है कि यह शायर अपनी तमाम क़ामयाबियों के बाद भी अपने को बेहद मामूली इंसान मानने से नहीं झिझकता.
यूँ राहत इन्दौरी इतनी आसान भी नहीं कि अपने स्वाभिमान को दाँव पर लगा दें;वे पूरे होशो-हवास में सरल बने रहते हैं और फ़िर भी अपने ज़मीर की आवाज़ विक़ार विक़ार को दरकिनार नहीं करते. आज 2010 के की पहली तारीख़ को ज़िन्दगी के साठ साल पूरे कर रहे हैं देश के नामचीन शायर डॉ.राहत इन्दौरी.

राहत इन्दौरी की शायरी बहुत दिलकश है और पानीदार भी. वे अपनी लोकप्रियता के लिये कोई ऐसा सरल रास्ता नहीं चुनते जो शायरी की इज़्ज़त को कम करे. उनका लिखा उनसे ज़्यादा सामईन को याद रहता है. ये किसी शायर की लोकप्रियता का सबसे अहम पहलू है. राहत जब ग़ज़ल पढ़ रहे होते हैं तो उन्हे देखना और सुनना दोनो एक अनुभव से गुज़रना है. राहत के भीतर का एक और राहत इस वक़्त महफ़िल में नमूदार होता है और वह एक तिलिस्म सा छा जाता है. गुफ़्तगू सी लगती उनकी शायरी में सुननेवाला राहत के क़लम की कारीगरी का मुरीद हो जाता है. वे मुशायरों के ऐसे ऑलराउंडर हैं जिन्हें आप किसी भी क्रम पर खिला लें, वे बाज़ी मार ही लेते हैं. उनका माइक्रोफ़ोन पर होना ज़िन्दगी का होना होता है. यह अहसास सुननेवाले को बार-बार मिलता है कि राहत रूबरू हैं और अच्छी शायरी सिर्फ़ और सिर्फ़ इस वक़्त सुनी जा रही है. उनके शब्द और आवाज़ का करतब हिप्नोटाइ़ज़ सा कर लेता है. हाँ आवाज़ से याद आया...राहत इन्दौरी की शायरी इसलिये भी ध्यान से सुनी जाती है क्योंकि उनकी आवाज़ का तेवर अशाअर के मूड को रिफ़्लेक्ट करता है.

डॉ.राहत भाई कितना भी घूम-फ़िर रहे हों, समाज और अवाम के हालात पर उनकी सतर्क नज़र रहती है. परिवेश,रिश्ते,राजनीति,इंसानियत के सरोकार और उसके साथ होती ज़्यादतियों पर राहत भाई हमेशा बेबाकी से अपनी बात कहते आए हैं.उनकी कहन में सचाई भी होती है नसीहतें भी...

मेरी ख़्वाहिश है कि आँगन में न दीवार उठे
मेरे भाई,मेरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले.

या ये देखिये राहत भाई क्या कह रहे हैं....

लोग हर मोड़ पे रूक रूक के सभलते क्यूं हैं.
इतना डरते हैं, तो फिर घर से निकलते क्यूं हैं.


राहत इन्दौरी ख़ालिस यारबाज़ शख़्सियत हैं. उन्हें गुज़रे से गुरेज़ नहीं,वे बड़ी शिद्दत से अपने किसी भी ग़रीब दोस्त के घर खाना खाते मिल जाएंगे,बुज़ुर्ग के पैर छूते दीख जाएंगे,या अपने शहर के भीड़ भरे बाज़ार के ओटले पर चाय सुड़कते जाएंगे.

राहत इन्दौरी की शायरी में रूमानी ग़ज़लों के सारे रंग दिखते हैं लेकिन साथ ही उनकी ग़ज़ल में बाग़ी तेवर भी मौजूद हैं जो राहत की इस सिफ़त की वजह से उन्हें अदबी दुनिया का बड़ा नाम भी बना देते हैं. वे अपनी शायरी में साहित्यिक उत्कृष्टता को शुमार कर सकते हैं तो बहुत आसान और घरेलू शब्दों का लिबास भी पहना सकते हैं..मुलाहिज़ा फ़रमाएं....


जुगनुओं को साथ लेकर रात रोशन कीजिये
रास्ता सूरज का देखा तो सहर हो जाएगी

और


चाँद को हमने कभी ग़ौर से देखा ही नहीं
उससे कहना के कभी दिन के उजालों में मिले

और ये देखिये एक जुदा अंदाज़....

उसकी कत्थई आँखों में हैं, जन्तर-वन्तर सब
चाकू-वाकू,छुरिया-,वुरियाँ,ख़जर-वंजर सब

या

गाय के कच्चे दूध के जैसे सादा हम
और हमारे नीले-नीले रिश्तेदार.



डॉ.राहत इन्दौरी को पूरे मालवा को फ़ख्र है. वे हमारी तहज़ीब की आन हैं.वे अपने शब्द का मान रखना जानते हैं और शायरी को उसकी श्रेष्ठतम ऊँचाइयों पर ले जाना चाहते हैं.
ग़ज़ल एक ऐसा शफ़्फ़ाक़ आइना है जिसके हर शे’र में एक नई तस्वीर मुस्कुराती है,
सिर्फ़ हुस्न और इश्क़ की बात नहीं वह ज़िन्दगी के हर पहलू की बात भी समझाती है.
यही वजह है साढ़े सात सौ बरसों से ग़ज़ल का हुस्न क़ायम है. राहत इन्दौरी का क़लम उस हुस्न की ख़ूबसूरती में इज़ाफ़ा कर रहा है. उनके हस्ते शायरी की आबरू महफ़ूज़ है.