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Wednesday, September 26, 2012

कुछ इत्तेफ़ाक़ हो ऐसा कि एक शाम कहीं

अख़्तर-उल-ईमान की एक और नज़्म पेश है - 



इत्तेफ़ाक़

दयार-ए-ग़ैर में कोई जहाँ न अपना हो
शदीद कर्ब की घड़ियाँ गुज़ार चुकने पर
कुछ इत्तेफ़ाक़ हो ऐसा कि एक शाम कहीं
किसी एक ऐसी जगह से हो यूँ ही मेरा गुज़र
जहाँ हुजूम-ए-गुरेज़ाँ में तुम नज़र आ जाओ
और एक-एक को हैरत से देखता रहे

(कर्ब- गम, हुजूम-ए-गुरेज़ाँ - भागती हुई भीड़) 

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चित्र- चीनी कलाकार वांग जियान की कृति 'ओरिजिनल डिज़ायर'

Tuesday, September 25, 2012

संभले हुए तो हैं, पर ज़रा डगमगा तो लें


एक प्रिय कवि अख़्तर-उल-ईमान की एक नज़्म प्रस्तुत करता हूँ. उर्दू से लीना नियाज़ ने लिप्यान्तरण किया है.

आख़िरी मुलाक़ात

आओ कि जश्न-ए-मर्ग-ए-मुहब्बत मनाएँ हम

आती नहीं कहीं से दिल-ए-ज़िन्दा की सदा
सूने पड़े हैं कूचा-ओ-बाज़ार इश्क़ के
है शम-ए-अंजुमन का नया हुस्न-ए-जाँ गुदाज़
शायद नहीं रहे वो पतंगों के वलवले
ताज़ा न रख सकेगी रिवायात-ए-दश्त-ओ-दर
वो फ़ितनासर गए जिन्हें काँटें अज़ीज़ थे

अब कुछ नहीं तो नींद से आँखें जलाएँ हम
आओ कि जश्न-ए-मर्ग-ए-मुहब्बत मनाएँ हम

सोचा न था कि आएगा ये दिन भी फिर कभी
इक बार हम मिले हैं ज़रा मुस्कुरा तो लें
क्या जाने अब न उल्फ़त-ए-देरीना याद आए
इस हुस्न-ए-इख़्तियार पे आँखें झुका तो लें
बरसा लबों से फूल तेरी उम्र हो दराज़
संभले हुए तो हैं, पर ज़रा डगमगा तो लें

(जश्न-ए-मर्ग-ए-मुहब्बत - प्यार की मौत का उत्सव, गुदाज़ – पिघलता हुआ, वलवले – उत्साह, फ़ितनासर – पागल, उल्फ़त-ए-देरीना – पुरानी मोहब्बत.)

Sunday, April 3, 2011

मेरी मां अब ढेरों मन मिट्टी के नीचे सोती है


आज पढ़िये मशहूर उर्दू कवि अख़्तर-उल-ईमान की एक नज़्म. 



तहलील

मेरी मां अब मिट्टी के ढेर के नीचे सोती है
उसके जुमले, उसकी बातों,
जब वह जिंदा थी, कितना बरहम हो जाती थी थी
मेरी रोशन तबई, उसकी जहालत
हम दोनों के बीच एक दीवार थी जैसे

‘रात को ख़ुशबू का झोंका आए, जिक्र न करना
पीरों की सवारी जाती है’
‘दिन में बगूलों की जद में मत आना
साये का असर हो जाता है’
‘बारिश-पानी में घर से बाहर जाना तो चौकस रहना
बिजली गिर पड़ती है- तू पहलौटी का बेटा है’

जब तू मेरे पेट में था, मैंने एक सपना देखा था-
तेरी उम्र बड़ी लंबी है
लोग मोहब्बत करके भी तुझसे डरते रहेंगे

मेरी मां अब ढेरों मन मिट्टी के नीचे सोती है
सांप से मैं बेहद ख़ाइफ़ हूं
मां की बातों से घबराकर मैंने अपना सारा जहर उगल डाला है
लेकिन जब से सबको मालूम हुआ है मेरे अंदर कोई जहर नहीं है
अक्सर लोग मुझे अहमक कहते हैं।

तहलील - अन्तर्विश्लेषण 
रोशन तबई - उदारता
बरहम - ग़ुस्सा
ख़ाइफ़ - भयभीत
अहमक - मूर्ख