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Tuesday, July 21, 2009

यह यथार्थ का जादू है कि मैं योगी के साथ खड़ा हूं

मित्रों के आग्रह पर मैं आखिरी पोस्ट लिख रहा हूं। मेरी तरफ से यह विवाद खत्म। सदा के लिए पटाक्षेप। जिस "चीज" पर भरोसा करके मैने ... के हिंदू वाहिनी के नेता योगी से सम्मान लेने पर सवाल उठाया था, उस चीज की जगह शून्य है। खोखल, निर्वात। शर्मिंदा हूं कि गलत जगह, एक अश्लील सवाल उठाया था। खोखल के भीतर क्या है, अब नहीं सोचना चाहता।

क्यों?

यह यथार्थ का जादू है।



नाटक से भी नाटकीय। सस्वर कपट हंसी और रुलाई के लंबे अलाप से बांधी गई लोककथाओं से भी दिलफरेब।

यह जीवन है।

सारी दुनिया के लेखकों ने इसकी चाल की फोटो उतारने की हर हद से आगे जाकर जानलेवा कोशिशें की हैं। उनकी अनुभूति का कैमरा 'रामकै' हो गया और वे खुद सिजोफ्रेनिक 'कखले' हो गए लेकिन वे उसकी कानी उंगली की जुंबिश भी नहीं पकड़ पाए।

सपने में भी नहीं सोचा था, ऐसा भी दिन आएगा कि ... ... के बजाय योगी की दिल से प्रशंसा करनी पड़ेगी।

***

मुझे मालूम है कि हम ऐसे धुंधले, जालसाज समय में जी रहे हैं जब देश के सवा सौ शासक खानदान एक साझा मकसद के लिए धार्मिक कट्टरपंथियों (सांप्रदायिकों) और सेकुलरों के बीच का फर्क लगभग मिटा चुके हैं। ये दोनों जैसे एक ही धड़ पर उगे दो चेहरे बन गए हैं। राजनीतिक सत्ता की मलाई सामने होती है तो सारे सेकुलर सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता में आने से रोकने के 'पवित्र' उद्देश्य से सरकार में शामिल हो जाते हैं। जब सांप्रदायिक शक्तियों के साथ मलाई काटनी होती है तो वे देश को एक और चुनाव के बोझ से बचाने का अहसान कर डालते हैं।

खुद सांप्रदायिक जब सत्ता में आते में हैं तो चिरकाल तक राज करने की लालसा में पिघल कर पंथनिरपेक्ष होने लगते हैं सत्ता से बाहर होते ही फिर कीर्तन मंडलियां सजतीं हैं और चिमटे बजाता उग्र हिंदुत्व का जगराता प्रारंभ हो जाता है। तथाकथित सेकुलर भी महीन ढंग से चुनाव में वोटों के ध्रुवीकरण के लिए मुस्लिम, ईसाई या हिंदू कार्ड खेलने से परहेज नहीं करते। जाति का खुला कार्ड तो खैर सनातन है। चुनावी राजनीति की चंद्रकांता संतति में ये दोनों ऐयारों की तरह बाना बदल कर मतदाता को छलते रहते हैं।

सेकुलर को चुनाव में टिकट नहीं मिला ... खटाक ... मंदिर बनाने लगा। सांप्रदायिक को मंत्री नहीं बनाया ... खटाक ... गंगा-जमुनी तहजीब बचाने लगा। मंत्री था, हटा दिया तो साइकिल पर सवार होकर लालटेन की रोशनी में हाथी का खरहरा करने लगा।

यूं भी कह सकते हैं कि सांप्रदायिक और धर्मनिरपेक्ष दो सोशियोलाइट, बिंदास यार हैं। हर शाम, सज-धज कर किसी न किसी पार्टी में जाते हैं। एक दूसरे के टैटू, मसल्स और चाल की तारीफ करते हैं। छक कर माल उड़ाते हैं, मौज करते हैं। नशे में बहकते, लौटते हुए सड़क पर लड़ने लगते हैं। लैंपपोस्ट के नीचे नेलपालिश वाले नाखून चमकते हैं, "कैसा सांस्कृतिक राष्ट्रवादी है तू अपना क्लब छोड़कर सेकुलरों की गे-पार्टी में गया था।"

"आय-हाय..कैसा सेकुलर है तू। अपनी उजड़ी लिपस्टिक देख। तू भी तो कट्टरपंथियों के क्वियर-कार्निवाल से लौट रहा है।" (यह दृश्य उपलब्ध कराने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का शुक्रिया)

***

राजनीति के इस विद्रूप तमाशे से कई प्रकाश वर्ष दूर भारतीय समाज में धार्मिक सहिष्णुता की प्रबल अंतर्धारा बहती है जिसके कारण ही तमाम नस्लों, धर्मों, भाषाओं और परस्परविरोधी स्वार्थों की टकराहटों के बावजूद इस देश में लोग एक साथ रहते हैं। हिम्मत के साथ हर विपदा से हर बार उबर आते है। घृणा हर बार दांत पीसती, सिर धुनती रह जाती है और जीवन मुस्काराता आगे बढ़ चलता है। इस सहिष्णुता का उत्स बिल्कुल साधारण, आम लोगों की करूणा में है। इसी करूणा की झिलमिल ... ... की रचनाओं में मुझे दिखती थी। इसी जगह खड़े होकर मैने सवाल उठाया था कि ... ... ने हिंदू वाहिनी के नेता, भाजपा सांसद योगी के हाथों सम्मान क्यों लिया?

जनसाधारण की इस करूणा को कायरता (जिस हिंदू का खून न खौला खून नहीं वह पानी है) बताकर कर योगी की पार्टी भाजपा अयोध्या से गुजरात तक उसके चिथड़े उड़ाते हुए घसीट रही थी। हर सूबे लेकर दिल्ली तक खून की लकीरें और घसीट के निशान अभी मिटे नहीं हैं। आजकल भ्रम और कलह का काल है। कल क्या होगा पता नहीं। लेकिन योगी के उग्र, रौद्र हिंदुत्व के आगे भाजपा भी हर चुनाव से पहले पनाह मांग जाती है। पूर्वांचल में वही होता है जो वे चाहते हैं।

... ... का पछतावानामा आयाः"मैं सच्चे मन से अपने उन पाठकों और प्रशंसकों से क्षमा मांगता हूं, जिन्हें मेरे इस पारिवारिक आयोजन के राजनीतिक संदर्भॊं को समझ पाने में मुझसे हुई भूल के कारण ठेस पहुंची है।"

लेकिन खुद योगी ने ... ... को "राजनीतिक संदर्भ" समझाने की कोशिश की थीः
यहां मैं तमाम वैचारिक विरोध के बावजूद योगी की सदाशयता, साफगोई, दूरदर्शिता और ... ... की खास लेखकीय इमेज की गहरी समझ की प्रशंसा करता हूं। उसे बचाने की फिक्र की तो और भी ज्यादा।

"इस समारोह में जाने से पहले मैने खुद आगाह किया था कि ... ... जी को कठिनाई हो सकती है लेकिन एक निजी (संदर्भ किसी परिवार का नहीं, गोरखनाथ पीठ के अपने कालेज का) समारोह मानकर चला गया था।"

यानि आप तब भी नहीं समझ पाए। ...(?)

फिर बचा क्या।

किसी से भी कोई शिकायत नहीं बची। गालियों, धमकियों का क्या, वे तो पहले भी इफरात में मिलती रहतीं थीं। अब मुझे कुछ नहीं कहना है। मेरे लिए यह विवाद सदा के लिए खत्म हो चुका है। कुछ जानने की इच्छा ही नहीं बची।

***

(इस बहस में ... ... की सादगी और सरलता से विचलित होकर कूदे उनके तमाम मुखर समर्थकों (जो स्वाभाविक ही था) और ऐसा हंगामाखेज मौका पाते ही अपनी कुंठाओं को पंख बनाकर उन्मादी उड़ान भरने वाले मौसमी फतिंगों से जरूर पूछना चाहता हूं कि जब योगी आपके प्रिय लेखक को को आसन्न कठिनाई से आगाह कर रहे थे तब विरोध पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले तथाकथित ईर्ष्याग्रस्त "रंगे सियार", तथाकथित सामूहिक "पाखाने" के निवासी धूर्त कबाड़ी, वह जातिवादी नेक्सस का हवस का मारा तथाकथित सरगना, उनकी कीर्ति के सुनहरे घेरे में घुस कर थोड़ी देर के लिए हुस्यारी से खुद को चमकाने की दयनीय हरकत करने वाला यह तथाकथित "जातिवादी" कर्मचारी... और इनके गुमराह करने पर आपके प्रिय लेखक के भविष्य को जीने के लायक नहीं रहने देने का षडयंत्र करने वाले मेरे देखे-अनदेखे दोस्त लोग सब कहां थे?

काश, पांच जुलाई को उस निर्णायक क्षण वे गोरखपुर में होते तो वे सभी योगी की 'चिंता' से सहमत होते और हिंदी के 'कानटूटे प्याले' में यह तूफान न खड़ा न होने पाता।
***

(कबाड़ी साथियों से माफ़ीनामे के साथ सरगना का निवेदन: भाई अनिल यादव की यह एक महत्वपूर्ण पोस्ट है - मैं दोबारा कह रहा हूं बहुत ज़रूरी पोस्ट - इस ख़ौफ़नाक प्रकरण पर हमारी तरफ़ से अब अन्तिम! . कृपया इसे कल पूरे दिन भर लगे रहने दें. कष्ट के लिए क्षमा साथियो! - अशोक पाण्डे.

पुनश्च हाहाहाहा: नीचे लगी तस्वीर मैं लगा रहा हूं अनिल नहीं. पढ़ने के लिए क्लिपिंग पर क्लिक करें)



(साभार : अमर उजाला, २० जुलाई २००९)