गद्य के इस टुकड़े पर निगाह डालिए
ये बस दो रेगिस्तानी जिला मुख्यालयों को जोडती है जो दिन में शहर और रात में गाँव हो जाते है.सुबह ये शहर का सपना लिए जगते हैं और रात को सन्नाटा लिए सो जातें हैं.इनके बीच सदियों का मौन हैं, सिर्फ कहीं कहीं जीवन तो कहीं इतिहास मुखर हैं.
बस की खिड़की से शहर छूटता दिखाई पड़ता है और इमारतें विदा करतीं हैं अपने शिल्प की ख़ास भंगिमाओं को थोड़ा छोड़ते हुए.
डेढ़ सौ किलोमीटर का फासला और बीच में तीन स्टॉप हैं जिनमें एक पर सवारियां उतर कर चाय भी पीतीं हैं,जैसा की अक्सर लम्बी लगने वाली यात्राओं में होता है.
इसके अलावा बहुत कुछ जनशून्य है.कुछ पेड़ जो अपनी सारी ऊर्जा झोंक कर भी हरे होने के अहसास को ही जिंदा रख पाए हैं.
ऊंटों के बरग अनंत यात्रा और मरीचिकाओं के मिथ्याभास में सत और असत के बीच झूलते हैं.बस के भीतर देखने पर ही जीवन कुछ नज़दीक लगता है,यहाँ पीछे की सीटों पर लोगों से स्थान साझा करते हैं बकरी के शावक.
पहले स्टॉप पर बस रूकती है.कुछ सवारियां उतरती हैं ,एक दो चढ़ती है.
इस जगह में शहर के नज़दीक होने का दर्प है.ये दीगर बात है कि जिसके नज़दीक होने पर वो इतराती है उसे भी कायदे का शहर होने का गुमान नहीं.
बस फिर लय पकडती है. आगे एक मोड़ पर ड्राईवर होर्न बजाता है.सामने से कोई नहीं आ रहा,एक हाजरी-सी दी गयी है लोकदेवता के थान को. किसी अनिष्ट से मुलाक़ात न हो.
बारात वाली बसें तो बसें तो बाकायदा थान पर रुक कर अफीम,सिगरेट या खोपरा अर्पित करतीं हैं।
अगला स्टॉप आ गया है.बाहर एक पुराने किले के खंडहर हैं,उपेक्षित.पास ही गाँव वाले चाय की दूकान पर बातों में मशगूल हैं.उनकी बातचीत का विषय किला न होकर काळ है,जो लगातार तीसरे साल भी छाती पर बैठा है.किले के इतिहास के विषय में कोई नहीं जानता.यहाँ टूरिस्ट नहीं आते इसलिए इतिहास का गाईडी-गड्ड मड्ड संस्करण भी बन नहीं पाया है.लोक स्मृति में कूटल-सकीना की प्रेम कथा का राग ज़रूर बजता है.गडरिये को गाँव के मुखिया की लड़की से प्रेम हो गया था.ये प्रेम गडरिये की मरदाना सुन्दरता से नहीं था,उसके नड बजाने के हुनर से था जो चांदनी रात में रेत के असीम विस्तार को हूरों की दुनिया में तब्दील कर देता था.
बस फिर दौडती है.पूरे रास्ते में किसी गाँव या आदमी का दिखना एक सुखद क्रम-भंग की तरह होता है.स्टॉप से बस का प्रस्थान पीछे छूटते अनजान लोगों के प्रति भारी बिछोह को जन्म देता है.
ये वाला स्टॉप कुछ देर का है. यहाँ चाय पी जायेगी.
चाय के साथ प्याज के पकौड़ियाँ आँख मूँद कर अनुभव करने के चीज़ हैं.गाँव से बड़ी और क़स्बे से छोटी ये जगह जो भी हो प्याज की पकौड़ियों के लिए याद रखी जाने लायक है.सभी घरों में लोग नहीं रहते. कुछ खाली हैं,पुराने. उनमें भूत रहते हैं. इसी गाँव के बाशिंदे जो समय की रेखीय अवधारणा में भूत हैं और चक्रीय अवधारणा में अभी भी प्याज के पकौड़े खाने का इंतज़ार कर रहें हैं.ये ब्राह्मण तेल में खौलते इस हैरत अंगेज़ स्वाद से जबरन वंचित थे.उनके लिए खाद्य-अखाद्य सुनिश्चित था.एक स्व-निर्मित मर्यादा रेखा,अलंघ्य लक्ष्मण रेखा. फांदी न जा सकने वाली कारा-भित्ति. यजमान वृत्ति के लिए इसे तोडना या लांघना फलदायी नहीं था.पर इसके लिए अपना मोक्ष भी स्थगित रखे हुए.
बस रवाना होती है, रफ़्तार पकडती है.
विश्व-ग्राम की चौंध मारती रौशनी से दूर ये बस लगभग रात पड़ते,अँधेरे के स्थाई भाव में जीते अपने गंतव्य में दाखिल होती है.
यह संजय व्यास नाम के एक अति विनम्र व्यक्ति का लेखन है. संजय जोधपुर में रहते हैं. आकाशवाणी में काम करते हैं. अभी कुछ माह पहले उनसे एकाध मुलाकातें भी हुई. उनके घर जाकर उनके परिवार के साथ मिलना हुआ. शानदार राजस्थानी भोजन भी किया गया. उनकी दो प्यारी सी शर्मीली बच्चियां हैं. उन दिनों उनके माता-पिता भी जोधपुर आये हुए थे. हमने दुनिया-जहान की बातें कीं. और मैं उनसे ख़ासा प्रभावित हुआ.
संजय से परिचय ब्लॉग जगत के माध्यम से ही हुआ था. मुझे उनका लेखन भाता है. इधर कबाड़ख़ाने में नयी टीम जोड़ने की कोशिश में लगा हुआ हूँ.
संजय हमारे सबसे नए जोड़ीदार हैं. उनकी आमद यहाँ एक नया जायका पेश करेगी, मैं उम्मीद करता हूँ.
उनके स्वागत में उन्ही के ब्लॉग से उनकी नवीनतम पोस्ट लगा रहा हूँ. कविता ज़बरदस्त है और दिल को छू लेने वाली.
जागने का गीत
इससे पहले कि कल सुबह फिर शुरू हो
कानाफूसियों और दुरभिसंधियों से भरा एक और दिन
और शुरू हो कल ही सुबह
एक बेहतर जीवन की आस में
फिर से थका देने वाली दैनिक यात्रा
मैं जागना चाहता हूँ जी भर इस रात में
देख सकूँ जिससे
अपने बच्चों को सपनों की दुनियां में
डूबते उतराते,लोटते
सिहरते किसी काल्पनिक भय में
या खुश होते, खुश होने जैसी ही किसी बात से.
पढ़ सकूँ शायद जिससे
बरसों से बंद पड़ी किताब
या देख सकूँ कायदे से
माँ पिताजी का
युवावस्था का
पीला पड़ता साझा फोटो
जिसे अब पचास बरस होने को है
हालांकि इसे एकाधिक बार फ्रेम किया जा चुका है.
फ्रेम के कांच को माँ अब भी कई बार साफ़ करती है
और पिताजी डालते हैं इस पर अब भी कई बार
उड़ती सी नज़र
पर कायदे से इसे
कई सालों से देखा नहीं गया है
क्योंकि कुछ सवाल अभी भी अनुत्तरित है
मसलन इसमें पिताजी कि टाई उनकी खुद की थी या
इसे फराहम करवाया गया था
फाइन स्टूडियो के मालिक और फोटो ग्राफर खत्री जी ने
बिलुकल सही सही मौका कौनसा था जब ये
एकमात्र साझा फोटो खिंचवाया गया था
इसमें माँ के गले का हार अब कहाँ है
क्या इसे बेचना पड़ा या
घर में रखा है ये कहीं वगैरा वगैरा.
ऐसे मौलिक सवाल जब अभी भी सवाल है
तो संभावना इस बात की भी है कि सच में इसे
बहुत गौर से और गहन उत्सुकता से
कभी देखा ही नहीं गया है
कम से कम हम लोगों ने
माँ पिताजी ने अलग से
इस पर कभी बात की हो तो
अलग बात है.
जी भर जागना चाहता हूँ इस रात
ताकि थोडा वक्त चुपके से रसोई में जाकर
देख सकूँ कि
असल में क्या है वहाँ जमा किये हुए
डिब्बे डिब्बियों में
और घर के खाने में कौनसे मसाले
अमूमन इस्तेमाल हो रहें है.
या यही देख लूं जिससे कि
पत्नी दिन के आखिर में
तमाम दुश्चिंताओं को
पल्लू से झटक कर या बाँध कर
निर्भार
या कि बोझिल
किस तरह की नींद में
सो रही है आज.
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Friday, December 10, 2010
Tuesday, December 7, 2010
एन ला दीस्तान्सीया तू रेकुएर्दो ... नए कबाड़ी का स्वागत
अभी कुछ दिन पहले मैंने यहाँ नीरज बसलियाल को सबसे युवा कबाड़ी के तौर पर परिचित करवाया था.
आज बीस साल के इक़बाल अभिमन्यु कबाड़खाने से जुड़ रहे हैं. इक़बाल दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्पानी भाषा के स्नातकोत्तर की पढाई में लगे हुए हैं. कुछ समय पूर्व गार्सिया लोर्का पर उन्होंने एक मुश्किल सवाल पूछ कर मुझे हैरत में डाल दिया था. मुझे उम्मीद है उनकी आमद से कबाड़खाने के कंटेंट में गुणोत्तर सुधार होगा और वे हमें स्पानी भाषा के कुछ नगीनों से परिचित करायेंगे.
स्वागत भाई इक़बाल!
इक़बाल के ब्लॉग से उनके गद्य की एक बानगी पेश है:
ऐसे समय में जब गूढ़ को सुन्दर और सरल को गया बीता मानने की परम्परा चल निकली है, मै पिछले एक महीने से क्या लिखूं इस जगह पर यही सोच रहा था। लेकिन अब मैंने तय कर लिया है कि ऐसा लिखूंगा जो कम से कम मुझे तो समझ में आ जाये। हाँ यह बात जरूर है कि जो लिखूंगा वह ज़रूरी नहीं कि एक ही विषय से जुड़ा हो, मेरी आदत है कि मैं लिखते लिखते भटककर कहीं का कहीं पहुँच जाता हूँ।
मेरी ज्यादातर कहानियाँ-आपबीतियाँ बचपन से शुरू होती हैं, वह भी ऐसा बचपन जो सुदूर अतीत में कहीं स्थित है। यह मानते हुए कि अब बचपन नहीं है, और उसे गए हुए काफी अरसा बीत चुका है। ऐसा मानने के पीछे शायद बचपन का एक चाशनी चढ़ा हुआ चित्र और साथ ही वर्तमान की परेशानियों- दुविधाओं के चलते उसे अपने सुन्दर-सहज 'बचपन' से बहुत दूर और अलग मानने की चाह निहित है। लेकिन यहाँ मैं कुछ लिखूंगा जो मेरे बचपन से लेकर आज तक के जीवन में एक हिस्सा रहा है।
यह है अधर में लटकने का एहसास। मैं कहीं भी रहा, गाँव में, कस्बे में, या महानगरीय टापू 'विश्वविद्यालय' में हमेशा से अधर में ही रहा हूँ। मेरा गाँव भुमकापुरा, जहां ज्यादातर बच्चों के माँ बाप मजदूरी-किसानी करते... मेरे माँ बाप राजनैतिक कार्यकर्ता थे। बहुत कम उम्र से ही अपने यार-दोस्तों के साथ कंचे खेलते, कबड्डी खेलते या धूल में लोट-पोट होते हुए कभी भी अजनबीपन का एहसास नहीं हुआ लेकिन यह मालूम था कि मेरे जीवन के कुछ हिस्से उनसे बिलकुल अलग हैं, जैसे छुट्टियों में बाहर रिश्तेदारों के घर जाना, या अपने माँ-बाप से खड़ी बोली में बात करना। कुछ बड़े होने पर जहां वे शिकार खेलने या जंगल घूमने जाते, या खेती के काम में हाथ बंटाते वहीं मैं बस मोहल्लों में घूमता या कभी उनके साथ जाता भी तो उतना कुशल नहीं होता जितना वे... पेड़ पर चढने या शहद का छत्ता तोड़ने में। स्कूल जितना महत्व मेरे जीवन में रखता उतना उनके में नहीं। वहीं दूसरी और स्कूल में कुछ गैर-आदिवासी बच्चे मिलते जिनके भी जीवन मुझसे बिलकुल अलग होती... टीवी और क्रिकेट काफी महत्व रखता था॥ और टीवी के कीड़े ने मुझे काटा भी लेकिन घर पर टीवी नहीं होने से उसका असर कम रहा। मैं खेलों में हमेशा फिसड्डी रहा और कम उम्र में चश्मा लग जाने से कई खेलों से वंचित हो गया। किताबों की लत लग जाने पर एक बड़ा हिस्सा समय के पढने में जाने लगा, मैं अखबार का कोना-कोना चाट जाया करता था...
जब नौवी कक्षा में पढने अपने दादाजी के घर रामपुरा आया तो यहाँ और भी अलग हो गया... दोस्तियाँ स्कूल तक सीमित थीं, क्योंकि घर के आसपास कोई हमउम्र हमखयाल रहता नहीं था। जीवन लगभग टीवी को समर्पित हो गयी या 'न पढने' और अपने दादा-दादी के खिलाफ बेमतलब का विद्रोह करने में। जो दोस्त स्कूल में थे वे भी कई तरह के थे ज्यादातर गरीब - दलित परिवारों से जो छुट्टियों में काम करते, क्रिकेट खेलते, मोहल्लाई दुश्मनियों में हिस्सेदारी करते और 'तेरे नाम' को अपने जीवन का आदर्श मानते। चर्चाएं लड़कियों से शुरू होती, सिनेमा, क्रिकेट, समाज और दुनिया पर से होती हुई फिर लड़कियों पर ही ख़त्म होती, जिनमे मैं अपने आप को बाहरी महसूस करता क्योंकि, मैं शुरू से ही डरपोक किस्म का लड़का था, जो इस तरह की बातों का रस लेते हुए भी अपनी कोई काल्पनिक कथा सुनाने से गुरेज करता था। शाम को रिंगवाल पर घूमते हुए हम कई हवाई किले बनाते और तोड़ते... लेकिन उन सभी को यह एहसास था कि जल्द ही उन्हें रोजी-रोटी की चिंता में जुट जाना है, और एक मैं जिसे कभी यह पता नहीं चल पाया कि उसे क्या करना है। यह कुछ साल बहुत कठिन थे॥ क्योंकि मैं न तो स्कूल में अपेक्षानुरूप नंबर ला रहा था, घर में नालायकी और आलस के नए रिकार्ड कायम कर रहा था, और अन्दर ही अन्दर बहुत परेशान और खालीपन महसूस कर रहा था।
यहाँ विश्वविद्यालय में मामला अलग है, एक ओर वे क्रांतिकारी उच्चवर्गीय छात्र हैं, जिन्हें 'बुद्धिजीविता' घुट्टी में पिलाई गयी है, या वे शहरी बांके छैला जो अपनी ही चकाचौंध, महंगे कपड़ों,पार्टियों और आधुनिकता में डूबती उतराती आरामतलब जिंदगियों के सपने में मस्त हैं। या मेरे अजीज दोस्त हैं, जो अपनी कस्बाई विरासत से निकलकर यहाँ तक पहुंचे हैं और अब किसी भी तरह उससे बाहर निकल एक अदद नौकरी और स्थायित्व से ज्यादा कुछ नहीं चाहते।
और मैं... शायद पलायनवादी हूँ, या आत्ममुग्ध छद्म -क्रांतिकारी, या शायद एक निठल्ला जो कुछ न कर सका....
लेकिन मैं अधर में हूँ...
और इक़बाल की शान में एक स्पानी गीत मेरे प्रिय गायकों में एक हूलियो इग्लेसियास के स्वर में:
(साभार : यूट्यूब)
आज बीस साल के इक़बाल अभिमन्यु कबाड़खाने से जुड़ रहे हैं. इक़बाल दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्पानी भाषा के स्नातकोत्तर की पढाई में लगे हुए हैं. कुछ समय पूर्व गार्सिया लोर्का पर उन्होंने एक मुश्किल सवाल पूछ कर मुझे हैरत में डाल दिया था. मुझे उम्मीद है उनकी आमद से कबाड़खाने के कंटेंट में गुणोत्तर सुधार होगा और वे हमें स्पानी भाषा के कुछ नगीनों से परिचित करायेंगे.
स्वागत भाई इक़बाल!
इक़बाल के ब्लॉग से उनके गद्य की एक बानगी पेश है:
ऐसे समय में जब गूढ़ को सुन्दर और सरल को गया बीता मानने की परम्परा चल निकली है, मै पिछले एक महीने से क्या लिखूं इस जगह पर यही सोच रहा था। लेकिन अब मैंने तय कर लिया है कि ऐसा लिखूंगा जो कम से कम मुझे तो समझ में आ जाये। हाँ यह बात जरूर है कि जो लिखूंगा वह ज़रूरी नहीं कि एक ही विषय से जुड़ा हो, मेरी आदत है कि मैं लिखते लिखते भटककर कहीं का कहीं पहुँच जाता हूँ।
मेरी ज्यादातर कहानियाँ-आपबीतियाँ बचपन से शुरू होती हैं, वह भी ऐसा बचपन जो सुदूर अतीत में कहीं स्थित है। यह मानते हुए कि अब बचपन नहीं है, और उसे गए हुए काफी अरसा बीत चुका है। ऐसा मानने के पीछे शायद बचपन का एक चाशनी चढ़ा हुआ चित्र और साथ ही वर्तमान की परेशानियों- दुविधाओं के चलते उसे अपने सुन्दर-सहज 'बचपन' से बहुत दूर और अलग मानने की चाह निहित है। लेकिन यहाँ मैं कुछ लिखूंगा जो मेरे बचपन से लेकर आज तक के जीवन में एक हिस्सा रहा है।
यह है अधर में लटकने का एहसास। मैं कहीं भी रहा, गाँव में, कस्बे में, या महानगरीय टापू 'विश्वविद्यालय' में हमेशा से अधर में ही रहा हूँ। मेरा गाँव भुमकापुरा, जहां ज्यादातर बच्चों के माँ बाप मजदूरी-किसानी करते... मेरे माँ बाप राजनैतिक कार्यकर्ता थे। बहुत कम उम्र से ही अपने यार-दोस्तों के साथ कंचे खेलते, कबड्डी खेलते या धूल में लोट-पोट होते हुए कभी भी अजनबीपन का एहसास नहीं हुआ लेकिन यह मालूम था कि मेरे जीवन के कुछ हिस्से उनसे बिलकुल अलग हैं, जैसे छुट्टियों में बाहर रिश्तेदारों के घर जाना, या अपने माँ-बाप से खड़ी बोली में बात करना। कुछ बड़े होने पर जहां वे शिकार खेलने या जंगल घूमने जाते, या खेती के काम में हाथ बंटाते वहीं मैं बस मोहल्लों में घूमता या कभी उनके साथ जाता भी तो उतना कुशल नहीं होता जितना वे... पेड़ पर चढने या शहद का छत्ता तोड़ने में। स्कूल जितना महत्व मेरे जीवन में रखता उतना उनके में नहीं। वहीं दूसरी और स्कूल में कुछ गैर-आदिवासी बच्चे मिलते जिनके भी जीवन मुझसे बिलकुल अलग होती... टीवी और क्रिकेट काफी महत्व रखता था॥ और टीवी के कीड़े ने मुझे काटा भी लेकिन घर पर टीवी नहीं होने से उसका असर कम रहा। मैं खेलों में हमेशा फिसड्डी रहा और कम उम्र में चश्मा लग जाने से कई खेलों से वंचित हो गया। किताबों की लत लग जाने पर एक बड़ा हिस्सा समय के पढने में जाने लगा, मैं अखबार का कोना-कोना चाट जाया करता था...
जब नौवी कक्षा में पढने अपने दादाजी के घर रामपुरा आया तो यहाँ और भी अलग हो गया... दोस्तियाँ स्कूल तक सीमित थीं, क्योंकि घर के आसपास कोई हमउम्र हमखयाल रहता नहीं था। जीवन लगभग टीवी को समर्पित हो गयी या 'न पढने' और अपने दादा-दादी के खिलाफ बेमतलब का विद्रोह करने में। जो दोस्त स्कूल में थे वे भी कई तरह के थे ज्यादातर गरीब - दलित परिवारों से जो छुट्टियों में काम करते, क्रिकेट खेलते, मोहल्लाई दुश्मनियों में हिस्सेदारी करते और 'तेरे नाम' को अपने जीवन का आदर्श मानते। चर्चाएं लड़कियों से शुरू होती, सिनेमा, क्रिकेट, समाज और दुनिया पर से होती हुई फिर लड़कियों पर ही ख़त्म होती, जिनमे मैं अपने आप को बाहरी महसूस करता क्योंकि, मैं शुरू से ही डरपोक किस्म का लड़का था, जो इस तरह की बातों का रस लेते हुए भी अपनी कोई काल्पनिक कथा सुनाने से गुरेज करता था। शाम को रिंगवाल पर घूमते हुए हम कई हवाई किले बनाते और तोड़ते... लेकिन उन सभी को यह एहसास था कि जल्द ही उन्हें रोजी-रोटी की चिंता में जुट जाना है, और एक मैं जिसे कभी यह पता नहीं चल पाया कि उसे क्या करना है। यह कुछ साल बहुत कठिन थे॥ क्योंकि मैं न तो स्कूल में अपेक्षानुरूप नंबर ला रहा था, घर में नालायकी और आलस के नए रिकार्ड कायम कर रहा था, और अन्दर ही अन्दर बहुत परेशान और खालीपन महसूस कर रहा था।
यहाँ विश्वविद्यालय में मामला अलग है, एक ओर वे क्रांतिकारी उच्चवर्गीय छात्र हैं, जिन्हें 'बुद्धिजीविता' घुट्टी में पिलाई गयी है, या वे शहरी बांके छैला जो अपनी ही चकाचौंध, महंगे कपड़ों,पार्टियों और आधुनिकता में डूबती उतराती आरामतलब जिंदगियों के सपने में मस्त हैं। या मेरे अजीज दोस्त हैं, जो अपनी कस्बाई विरासत से निकलकर यहाँ तक पहुंचे हैं और अब किसी भी तरह उससे बाहर निकल एक अदद नौकरी और स्थायित्व से ज्यादा कुछ नहीं चाहते।
और मैं... शायद पलायनवादी हूँ, या आत्ममुग्ध छद्म -क्रांतिकारी, या शायद एक निठल्ला जो कुछ न कर सका....
लेकिन मैं अधर में हूँ...
और इक़बाल की शान में एक स्पानी गीत मेरे प्रिय गायकों में एक हूलियो इग्लेसियास के स्वर में:
(साभार : यूट्यूब)
Monday, December 6, 2010
अपराजेय अजेय का कबाड़ख़ाने में स्वागत
बहुत दिनों से मैं चाहता था कि लाहौल के केलोंग में रहनेवाले भाई अजेय कबाड़खाने से जुड़ें. मैं प्रसन्न हूँ कि उन्होंने मेरी विनती सुनी और हमारे कबाड़-मंडल का हिस्सा बनने को अपनी सहमति दे दी. इस आदमी के भीतर पहाड़ की ठोस आत्मा बसती है. एक मीठी लेकिन पौरुष से भरपूर जिद और हिमालय जैसा ऊंचा हौसला. व्यक्तिगत पहचान यह है कि हमारे बीच चार-पांच दफा टेलीफोन पर बातचीत हुई है और कभी यह अहसास नहीं हुआ कि वे मुझसे या हमारे साझा कबाड़ीपन से ज़रा भी जुदा हैं.
हमारे बहुसंख्य कबाड़ी आजकल हाईबर्नेशन में गए दीखते हैं. होंगी उनकी भी मजबूरियां, जो होती ही हैं. मेरी भी हैं लेकिन मैं चाहता हूँ यह सिलसिला जारी रह सके.
अजेय भाई, आप का स्वागत है.
उनकी कविता यह तक कह सकने का माद्दा रखती है कि -
सुनो,
आज ईश्वर काम पर है
तुम भी लग जाओ
आज प्रार्थना नहीं सुनी जाएगी।
उनके ब्लॉग से एक कविता प्रस्तुत है:
पैरों तक उतर आता है आकाश
यहां इस ऊँचाई पर
लहराने लगते हैं चारों ओर
मौसम के धुंधराले मिजाज़
उदासीन
अनाविष्ट
कड़कते हैं न बरसते
पी जाते हैं हवा की नमी
सोख लेते हैं बिजली की आग।
कलकल शब्द झरते हैं केवल
बर्फीली तहों के नीचे ठंडी खोहों में
यदा-कदा
अपने ही लय में टपकता रहता है राग।
परत-दर-परत खुलते हैं
अनगिनत अनछुए बिम्बों के रहस्य
जिनमें सोई रहती है ज़िद
छोटी सी
कविता लिख डालने की।
ऐसे कितने ही
धुर वीरान प्रदेशों में
निरंतर लिखी जा रही होगी
कविता खत्म नही होती,
दोस्त ...
संचित होती रहती है वह तो
जैसे बरफ
विशाल हिमनदों में
शिखरों की ओट में
जहाँ कोई नही पहुँच पाता
सिवा कुछ दुस्साहसी कवियों के
सूरज भी नहीं।
सुविधाएं फुसला नही सकती
इन कवियों को
जो बहुत गहरे में नरम और खरे
लेकिन हैं अड़े
संवेदना के पक्ष में
गलत मौसम के बावजूद
छोटे-छोटे अर्द्धसुरक्षित तम्बुओं में
करते प्रेमिका का स्मरण
नाचते-गाते
घुटन और विद्रूप से दूर
दुरूस्त करते तमाम उपकरण
लेटे रहते हैं अगली सुबह तक स्लीपिंग बैग में
ताज़ी कविताओं के ख्वाब संजोए
जो अभी रची जानी हैं।
(एक और नया कबाड़ी बस आया ही चाहता है कल. इंतज़ार कीजिये.)
हमारे बहुसंख्य कबाड़ी आजकल हाईबर्नेशन में गए दीखते हैं. होंगी उनकी भी मजबूरियां, जो होती ही हैं. मेरी भी हैं लेकिन मैं चाहता हूँ यह सिलसिला जारी रह सके.
अजेय भाई, आप का स्वागत है.
उनकी कविता यह तक कह सकने का माद्दा रखती है कि -
सुनो,
आज ईश्वर काम पर है
तुम भी लग जाओ
आज प्रार्थना नहीं सुनी जाएगी।
उनके ब्लॉग से एक कविता प्रस्तुत है:
पैरों तक उतर आता है आकाश
यहां इस ऊँचाई पर
लहराने लगते हैं चारों ओर
मौसम के धुंधराले मिजाज़
उदासीन
अनाविष्ट
कड़कते हैं न बरसते
पी जाते हैं हवा की नमी
सोख लेते हैं बिजली की आग।
कलकल शब्द झरते हैं केवल
बर्फीली तहों के नीचे ठंडी खोहों में
यदा-कदा
अपने ही लय में टपकता रहता है राग।
परत-दर-परत खुलते हैं
अनगिनत अनछुए बिम्बों के रहस्य
जिनमें सोई रहती है ज़िद
छोटी सी
कविता लिख डालने की।
ऐसे कितने ही
धुर वीरान प्रदेशों में
निरंतर लिखी जा रही होगी
कविता खत्म नही होती,
दोस्त ...
संचित होती रहती है वह तो
जैसे बरफ
विशाल हिमनदों में
शिखरों की ओट में
जहाँ कोई नही पहुँच पाता
सिवा कुछ दुस्साहसी कवियों के
सूरज भी नहीं।
सुविधाएं फुसला नही सकती
इन कवियों को
जो बहुत गहरे में नरम और खरे
लेकिन हैं अड़े
संवेदना के पक्ष में
गलत मौसम के बावजूद
छोटे-छोटे अर्द्धसुरक्षित तम्बुओं में
करते प्रेमिका का स्मरण
नाचते-गाते
घुटन और विद्रूप से दूर
दुरूस्त करते तमाम उपकरण
लेटे रहते हैं अगली सुबह तक स्लीपिंग बैग में
ताज़ी कविताओं के ख्वाब संजोए
जो अभी रची जानी हैं।
(एक और नया कबाड़ी बस आया ही चाहता है कल. इंतज़ार कीजिये.)
Thursday, November 25, 2010
सबसे युवा कबाड़ी का स्वागत

नीरज बसलियाल सॉफ़्टवेयर इंजीनियर हैं. पूना में रहते हैं. उनके ब्लॉग कांव कांव पब्लिकेशन्स लिमिटेड की कुछेक पोस्ट्स ने मेरा ध्यान खींचा था. उन्हें कबाड़ख़ाने का सदस्य बनाने की नीयत से मैंने उन्हें एक मेल लिखी और कल रात टेलीफ़ोन पर कुछ देर बात भी की. थोड़ा सा शर्मीला सा लगने वाला यह नजवान अभी फ़क़त पच्चीस साल का है. कबाड़ख़ाना अपने सबसे युवा साथी का इस्तकबाल करता है और यह उम्मीद भी कि उनके बेबाक और अनूठे गद्य का रसपान करने का हमें यहां भी मौका मिलेगा. फ़िलहाल प्रस्तुत है उनकी नवीनतम पोस्ट उन्हीं के ब्लॉग से:
नयी, पुरानी टिहरी
जमनोत्री आज सुबह से कुछ अनमनी सी थी| सर्दियों की धूप वैसे भी मन को अन्यत्र कहीं ले जाती है| इतवार का दिन सारे लोग घर पर ही थे, छत पर धूप सेंकने के लिए| जेठ जेठानी, उनके बेटे, बहुएँ भी अपनी छत पर घाम ताप रहे थे| ऐसा नहीं कि अलग छत पे हों, दोनों छत मिली हुई थी, लेकिन मनोमालिन्य ने दूरियों को एक छत से ज्यादा बढ़ा दिया था| सुधीर छुटियाँ लेकर आया था, बहू भी साथ आई थी, अमेरिका से| अमेरिका बोलने में जमनोत्री को मे पर काफी जोर डालना पड़ता था| सुधीर के पापा तो सुबह ही उठकर भजन गाने लगते हैं, अभी भी इस आदत को नहीं छोड़ा| 'बस भी करो, थोड़ा धीमे बोलो या चुपचाप सो जाओ, बच्चे सो रहे हैं|' जमनोत्री ने उलाहना दिया| सुधीर के पापा गाते रहे 'इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकलें...' हारकर जमनोत्री को उठना पड़ा|
बहू अमेरिका से साड़ी लेकर आई थी| 'नहीं मम्मी जी, इसे पहनों... देखो , आप पर कितनी अच्छी लग रही है|' जमनोत्री हतप्रभ थी- 'उस देश में साड़ी मिलती है क्या? साड़ी पहनती है तू वहां'| सुधीर नाश्ता करते हुए बोला- 'अरे माँ, इसके पास तो इतनी साड़ी हैं कि उनके लिए एक कमरा खाली करना पड़ा हमें वहां'| 'अच्छा' जमनोत्री ने बनावटी आश्चर्य प्रकट किया| 'और आप मेरी दी हुई साड़ी पहनती भी नहीं' बहू की नाराजगी जायज़ थी| 'अरे बेटा, यहाँ कहाँ पहनूं मैं अब? कभी कभी शादियों पार्टियों में पहन लेती हूँ|' जमनोत्री बचाव कर रही थी, बहू को दुःख नहीं पहुँचना चाहिए| 'क्या बात कर रही हो मम्मी जी, अरे वो तो मैंने घर पे पहनने के लिए लायी थी, आप उन्हें घर पे पहना कीजिये' बहू कहीं से भी उनका उपहास नहीं कर रही थी| यहाँ भी हारकर जमनोत्री को बहू की लायी गयी साड़ी पहनकर बैठना पड़ा|
जेठानी समझदार थी, बाहर से ही घर में चल रहा वातावरण समझ गयीं| 'अरे बहू! क्या बात है, क्यूँ डांट रही हो इसे|' जमनोत्री की जेठानी ने वातावरण को और हल्का करने की कोशिश की|'नहीं मम्मी जी, मैं मम्मी जी को कह रही थी कि....और आप भी मेरी दी हुई साड़ी नहीं पहनती|' बहू अब जेठानी से सवाल जवाब करने लगीं| 'नहीं बेटा, पहनती हूँ...' जेठानी जी भी सकपका गयीं 'मैंने अभी स्नान-ध्यान कुछ नहीं किया, उसके बाद पहनूंगी'| 'आज बहू सबकी तलाशी लेगी|' जमनोत्री को अपनी बहू पर लाड़ आ गया| कभी कभी बच्चों जैसी जिद पे उतर आती है, सुधीर की दादी तो अभी तक हमपे इतने ताने मार चुकी होती कि...खैर जमाना बदल गया है, तो हमें भी बदलना चाहिए 'अरे बहू! हम लोगों का भी क्या पहनना ओढ़ना| पूरा बचपन और जवानी जंगल में काट दी| घर से निकले मुँह-अँधेरे और जंगल गए घास-पात कभी लकड़ी लेने, खेतों में काम, बैलों को सानी, दिन भर में इतने काम होते कि किसे याद कि फैशन भी करना है| हाँ , कभी किसी की शादी-ब्याह के वक़्त देख लिया ऐना तो ठीक, नहीं तो ऐसे ही चल दिए|' बहू के मुँह से बेसाख्ता निकल गया -'हाँ तो अब थोड़े ही जंगल में हो|'
प्रतीक भी अब इस ओर नहीं आता, जाने उसकी दादी ने क्या कहा उससे कि अब सिर्फ अपनी छत पे ही खेलता रहता है| जमनोत्री ने नन्हे प्रतीक को अपनी गाडी को उलट पलटकर ठीक करते हुए देखा| पिछली छुट्टी में सुधीर लेके आया था प्रतीक के लिए, अमेरिका से| 'ए प्रतीक! इधर आ!' जमनोत्री ने पुकारा| प्रतीक ने सर उठाकर देखा, और फिर सर झुका लिया 'देख नहीं रहे, मैं अभी बिजी हूँ|' प्रतीक भी बिजी था, प्रतीक की दादी ने स्नान-ध्यान करके बहू की दी हुई साड़ी पहनी थी| इधर सुधीर के पापा धूप में चटाई बिछा के लेट गए और अखबार पढ़ने लगे| अभी थोड़ी देर में अखबार पढ़ते पढ़ते ही सो जायेंगे| सुधीर इस बीच छत पे आ गया, अपने मोबाइल पे गाने बजाने लगा| जरूर सुधीर ने बहू के साथ कुछ चुहल की होगी, तभी भागते भागते छत पे आया है| जमनोत्री का अनुमान बिलकुल सही था, बहू भी भागते भागते छत पे आई, और आँखों ही आँखों में सुधीर से गुस्सा भी थी|
रास्ते में लगे हुए पेड़ों की शाखाएं बिजली के तारों को छूने लगे थे| एक निश्चित समय अंतराल पर उनकी शाखाएं काटने के लिए बिजली विभाग किसी को भेजता था| खट-खट की आवाज आने लगी, और एक शाख काट दी गयी| शाख के गिरते ही छत की आखिरी छोरों पे खड़ी जमनोत्री और उसकी जेठानी की आँखों आखों में ही कुछ बातें हुई| फ़ौरन से दोनों उठ गयी| मंहंगी अमेरिकन साड़ी के आँचल को कमर में बाँधा, और दोनों चल पड़ी टूटी हुई शाखें उठाने के लिए| 'मम्मी जी , कहाँ जा रही हैं' बहू ने सुधीर से पूछा| सुधीर का ध्यान रास्ते पे गया, जहाँ जमनोत्री टूटी हुई डाल को कंधे पे उठा के विजयी मुद्रा में चली आ रही थी| उनके पीछे ही जेठानी भी दूसरी डाल लेकर आ रही थी| 'माँ, क्या कर रही हो उनका' सुधीर ने जिज्ञासा प्रकट की| जमनोत्री का ध्यान सुधीर की बातों पे नहीं था, जेठानी एक डाल अपनी छत पे रखके दूसरी लेने के लिए जल्दी कर रही थी| जमनोत्री ने जल्दी से डाल रखी और चली गयी| सुधीर के पापा ने धूप में लेटे लेटे एक आँख खोली| 'पिता जी! माँ ये डालें क्यों ला रही है| क्या करेगी इन लकड़ियों का?' सुधीर ने माँ की ओर दिखाकर पूछा| तभी, जमनोत्री ने कई सारी टूटी शाखों का गट्ठर बना लिया| उसे पीठ पर लादकर लाने लगी| 'पता नहीं बेटे! तभी तो मैं इसे गंवार कहता हूँ|' सुधीर के पापा हँसते हुए बोले| 'अरे सूखी लकड़ियाँ बहुत काम आती हैं|' जमनोत्री ने झुके झुके ही जवाब दिया| सुधीर के पापा ने गट्ठर को पीठ से उतार दिया| 'अरे लेकिन अब तो गैस है, और नहाने के लिए गीज़र है बाथरूम में| फिर भी?' सुधीर ने अपना तर्क प्रस्तुत किया| जिस पर जवाब देने की जमनोत्री की कोई इच्छा नहीं थी| सुधीर के पापा, जमनोत्री का ये भाव समझ गए| 'और रखोगे कहाँ? छत पे? छत खराब हो जायेगी|' सुधीर ने आखिरी तर्क प्रस्तुत किया| 'ए जमनोत्री| और भी हैं अभी वहां, रास्ते के दूसरी तरफ, जल्दी चल' छत के दूसरे छोर से जेठानी की आवाज आई|
सुधीर चुपचाप माँ को शाखें ला लाके इकट्ठी करता हुआ देखता रहा| बीच बीच में सुधीर के पापा, सुधीर की ओर देखकर सांत्वना भरे स्वर में कहते रहे 'गंवार है, कभी शहर देखा ही नहीं, तो ये हरकत तो करेगी ही|' सुधीर जानता था कि पापा की इसमें मौन सहमति है| बहू, अपनी अमेरिकन साड़ी की दुर्दशा देख रही थी| सड़क के दूसरे छोर से जमनोत्री और जेठानी खिलखिलाते हुए आ रहे थे, प्रतीक भी एक छोटी सी डाल कंधे पे लादके चला आ रहा था, उन छोटे छोटे बच्चों की तरह जो बड़ी दीदी के साथ पहली बार स्वेटा पीठ पे बाँध के घास-पात लेने जाते हैं| इधर सुधीर के मोबाइल पे गाना अभी भी बज रहा था
'अब मैं राशन की कतारों में नजर आता हूँ,
अपने खेतों से बिछड़ने की सज़ा पाता हूँ|'
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