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Friday, January 7, 2011

परिंदे - अंतिम भाग

[पिछली किश्त से जारी]

अगले दिन मिस अर्चना, मीरा कुछ खाना लेकर आये | सुधीर रात भर अस्पताल में ही रहे | प्रोफ़ेसर उप्रेती के साथ वाले बिस्तर पर लेटे रहे | "अब कैसी तबियत है प्रोफ़ेसर उप्रेती की ?" मीरा ने पूछा | "अभी सो रहे हैं | रात भर कुछ -कुछ बोलते ही रहे | अभी जाकर सोये हैं |" सुधीर ने जवाब दिया | "डॉक्टर ने क्या कहा है ?" मिस अर्चना ने बैठते हुए कहा | "ठीक हैं | बस थोड़ा तनाव की वजह से | काफी कमज़ोर भी हो चले हैं, वजन सामान्य से काफी गिर गया है |" सुधीर ग्लूकोज़ की बोतल को खाली होते हुए देखता रहा | "तुम खाना खा लो" मीरा ने सुधीर की ओर खाने का डब्बा बढ़ा दिया | "कुछ रिपोर्ट्स आनी बाकी हैं , उसके बाद ही सही सही कुछ कहा जा सकता है |" सुधीर ने डब्बा मेज़ के ऊपर रखते हुए कहा | "ठीक है, अभी थोड़ी देर में स्वामी सर आयेंगे | वे रहेंगे प्रोफ़ेसर के पास | तुम खाना खा लो" अर्चना ने कहा | "यहाँ पौड़ी में धूप अच्छी आती है | थोड़ी चहल पहल रहती है तो महसूस होता है कि दुनिया में और लोग भी रहते हैं | मैं थोड़ा बाहर हो आती हूँ |" कहते हुए मीरा बाहर चली गयी |

"तुमने खाना खाया " सुधीर ने अर्चना की ओर देखकर पूछा | एक पल के लिए तुम कहना थोड़ा अजीब लगा, लेकिन अधूरी बात अधूरी नहीं रख पाया | अर्चना को अच्छा लगा, "नहीं, अभी नहीं |"
"तो आप भी अभी खा लो, काफी खाना रखा है मीरा जी ने |"
"तुम ही सही रहेगा |" मिस अर्चना मुस्कुराई |
सुधीर ने खाने के डब्बे को खोला | एक ख़ाली डिब्बे में आधी सब्जी डालकर अर्चना ने अपने पास ले लिया |
"क्या हम डॉली को खबर करें ?" अर्चना ने पूछा |
"मैंने पूछा था प्रोफ़ेसर से, उन्होंने मना किया |" खाने का कौर मुँह में डालते हुए सुधीर ने कहा |
"लेकिन...प्रोफ़ेसर की हालत...डॉली को पता तो होना ही चाहिए |" मिस अर्चना ने सुधीर को समझते हुए कहा, "क्या प्रोफ़ेसर ने साफ़ साफ़ मना किया ? तुमने पूछा या उन्होंने खुद कहा ?"
सुधीर खाना हाथ में लेकर रुक गए, "प्रोफ़ेसर रात भर डॉली के बारे में बात करते रहे | डॉक्टर बीच बीच में आके उन्हें चुप होने के लिए कह रहे थे | जब मैंने उनसे पूछा कि प्रोफ़ेसर क्या डॉली को यहीं बुला लें, तो उन्होंने मना कर दिया | इससे ज्यादा मैं पूछ नहीं सका |" धूप दरवाजे तक आ गयी थी | सुधीर ने दरवाजे की ओर देखा | अर्चना ने पीछे मुड़कर दरवाजे की तरफ देखा, कोई नहीं था | "क्या बात है ?" अर्चना ने सुधीर की ओर देखकर पूछा |
"नहीं, कुछ नहीं | क्या तुम पूरी सर्दियाँ यहीं रहोगी ? अभी तुम्हें कोई क्लास नहीं मिली है | छुट्टियों के बाद ही वो सब होगा... एक -डेढ़ महीने बाद |"
"हाँ ... तुम लोग भी तो यहीं हो |"

शाम को वापस ट्रांसिट आकर सुधीर अपने कमरे में लेट गए | चाय पीने का मूड हुआ, उठकर बोयज़ हॉस्टल की ओर जाने लगे | होस्टल की ओर जाने वाली पगडण्डी से एक पल रूककर मेंढक पहाड़ी की ओर देखा, हम शापित लोग हैं , मन ही मन सोचा और फिर आगे बढ़ गए | बोयज़ हॉस्टल में फिफ्थ सेमेस्टर के ही कुछ स्टुडेंट रह गए थे | कुछ स्टुडेंट सुधीर के पास आये, वे प्रोफ़ेसर उप्रेती की तबियत के बारे में जानना चाहते थे | सुधीर का ध्यान बार बार भटक कर प्रोफ़ेसर के कहे वाक्य पर अटक रहा था कि हम शापित लोग हैं | डॉक्टर तुम यहाँ से कहीं और चले जाओ, और अर्चना को भी ..."वे ठीक हैं , कुछ ही दिनों में वापस आ जायेंगे |" सुधीर ने जल्दी से कहा | सुधीर को ऐसा लगा कि जाने से पहले उन्होंने उसे अविश्वास से देखा हो | रमेश को चाय बनाने को कहकर सुधीर एक खाली टेबल पर बैठ गए | हॉस्टल मेस पूरी तरह खाली थी | आज आखिरी पेपर ख़त्म होने के साथ आधे से ज्यादा हॉस्टल खाली हो चुका था | कल सारे लड़के चले जायेंगे | फिर हॉस्टल मेस बन्द हो जायेगी , सुधीर को अपने खाने का इंतजाम बाहर कहीं किसी होटल में करना होगा | सारे टीचर्स भी कल चले जायेंगे | दासगुप्ता सर ने भी सामान पैक कर लिया था, इंदिरा के विरोध के बावजूद | हम शापित लोग हैं ... स्माल सेल लंग कार्सिनोमा ... उफ़ |

तीन साल तक लंग कैंसर से लड़ने के बाद आखिर प्रोफ़ेसर ने अपनी लड़ाई रोक दी | डॉली से लड़ाई भी प्रोफ़ेसर जारी नहीं रख सके, उन्हें बुला लिया गया | प्रोफ़ेसर ने शोभा से दूसरी शादी की थी | डॉली , प्रोफ़ेसर की पहली पत्नी से हुई बेटी थी | अनुपमा, जिसे प्रोफ़ेसर ने तलाक़ दिया था | कुछ दिनों बाद, अनुपमा का शव पंखे से लटकता हुआ पाया गया | डॉली को प्रोफ़ेसर अपने पास लेकर आ गए | जिंदगी भर इस अपराधबोध से प्रोफ़ेसर मुक्त नहीं हो सके | शोभा ने बाद में डॉली को सब कुछ बता दिया था , जिसके बाद डॉली ने कभी प्रोफ़ेसर को माफ़ नहीं किया | अपनी माँ के नाम पर ही अनुपमा नाम डॉली ने अपना लिया |

देहरादून में ही प्रोफ़ेसर का अंतिम संस्कार करना निश्चित हुआ | मुखाग्नि देने के लिए सुधीर से कहा गया | सुधीर की यादों में अभी प्रोफ़ेसर की बातें चल रही थी | स्वामी को ये सब मत बताना, अर्चना और तुम भी कहीं और चले जाना | अर्चना का हाथ थामकर प्रोफ़ेसर बच्चों की तरह रोये थे, "मुझे माफ़ कर देना अनुपमा |"
शव आधा जल गया था | दहक वातावरण में अभी थी | सुधीर बोझिल क़दमों से पीछे पीछे हटे |
तीन दिन बाद राख ली जाती है | सुधीर ने अस्थियों को एक घड़े में भरा, और अनुपमा को दे दिया | राख के एक एक टुकड़े में प्रोफ़ेसर के होने का अहसास था | यार डॉक्टर, यहाँ पहाड़ों में अपनी जिंदगी खराब मत करो | हम लोग तो दुनिया से भागे हुए लोग हैं, तुम क्यूँ भाग रहे हो | राख जैसे पूरे शरीर में चढ़ती जा रही हो |

"पौड़ी!!! पौड़ी!!! " ऋषिकेश बस अड्डे पर पौड़ी की बस तैयार खड़ी थी , कंडक्टर हर आने जाने वाले से पूछ रहा था | सुबह के चार बजे थे | "भेजी, कहाँ जाना है ?" कंडक्टर ने सुधीर को हिलाकर पूछा | "पौड़ी" सुधीर की आँखें कहीं और देख रही थी | "वो वाली में बैठ जाओ |" कंडक्टर ने कहा | सुधीर जाने लगे तो कंडक्टर फिर से चिल्लाया - "अरे भैजी! इधर इधर |" जब ध्यान देने के बाद भी उसने देखा कि सुधीर के कदम कहीं के कहीं जा रहे हैं | उसने मन ही मन कुछ अंदाजा लगाया, भागकर आया | "भेजी ?" सुधीर की अधमुंदी आँखों में देखने लगा | हाथ पकड़ने की कोशिश की तो सुधीर ने हाथ में रखी प्लास्टिक की थैली अपने से सिमटा ली, जैसे कंडक्टर उससे वो थैली छीनना चाहता हो | उसने हाथ पकड़कर सुधीर को बस के अन्दर बिठा दिया | मन्दिर वाले बाबाजी आखिरी दिनों में चल नहीं पाते थे , जमीन पर घिसट घिसट कर चलते थे | "अर बेटा! सुना दे जरा गीता सार |"
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतं |
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ||

"भाईसाहब !" कंडक्टर ने सुधीर को हिलाया, "आपकी तबियत तो ठीक है ?" सुधीर को याद आया, बाबाजी के साथ एक औरत रहती थी | माँ से उसने पूछा कि वो कौन है | वो उनकी चेरी है, माँ ने कहा | सुधीर को लगा कि पत्नी को कहते होंगे | ये तो उसे काफी दिनों बाद पता चला कि चेरी उस लड़की को कहते है, जो किसी बाबा के साथ भाग आई होती है |
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे |
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिता: ||

कंडक्टर ने सुधीर का माथा छुआ "शायद थोड़ा ज्वर है आपको, बस थोड़ी दूर और है आपका कॉलेज | कॉलेज के टीचर हैं न आप ?" सुधीर ने ठंडा हाथ अपने माथे पर महसूस करके आँखें खोली | "हाँ, हाँ कॉलेज ही जाना है | आया क्या ?" कंडक्टर ने तसल्ली जैसे देते हुए कहा , "बस थोड़ी दूर है |"

"आ गया भाई साहब ! आपका कॉलेज |" कंडक्टर ने सुधीर को जगाया, "तबियत ठीक है अब आपकी ?" "हाँ मैं ठीक हूँ |" सुधीर ने उनींदी आखों से बाहर देखा | फिर तेजी से बस से उतर गया | कॉलेज दिखायी दे रहा था, सर्द बैगनी छाँव में | कॉलेज के आसपास का पूरा गाँव धूप में नहाया हुआ था | तेज तेज क़दमों से सुधीर चलना लगा | "चलो " पीछे से कंडक्टर की आवाज आई , और बस आगे बढ़ गयी | सुधीर ने अपने को स्वस्थ महसूस किया | कदम आगे बढ़ाया ही था कि माथे में भयंकर पीड़ा शुरू हो गयी | "गुड मोर्निंग सर |" रमेश मफलर पहने हुए सामने खड़ा था | "सर , आप बड़ी जल्दी आ गए | सामान नहीं लाये |" उसने पूछा | सुधीर को याद आया कि उसके साथ कोई सामान नहीं है | "सर!" रमेश पीछे से चिल्लाता रह गया | कॉलेज के गेट के बगल से एक छोटी सी पगडण्डी थी | सुधीर उसी पगडण्डी पर चलने लगे | बस थोड़ी दूर और, सुधीर अपने आप से कहते जा रहे थे | थकान बढती जा रही थी , सुधीर को महसूस होने लगा था कि उन्हें ज्वर है | पगडण्डी मेंढक पहाड़ी के पास जाकर सर्पिलाकार तरीके से मुड़ गयी | जिससे वो रास्ता खत्म होने का आभास से रही थी | पहाड़ी के सिरे पर पहुंचकर सुधीर ने इधर उधर घूमकर देखा | फिर जल्दी से थैले को उलटकर राख हवा में उछाल दी | सुधीर को काफी हल्का महसूस हो रहा था मानों इस राख के साथ उसने अपने अस्तित्व का कुछ टुकड़ा भी हवा में बिखेर दिया हो | राख उड़ती हुई घाटी से नीचे गिर रही थी, इस उम्मीद में कि कभी हवा में उड़ते हुए वो शायद चौखम्भा पहुँच जाए | वो राख को देखता रहा, हम शापित लोग हैं |


can we do nothing for the dead ? And for a long time the answer had been - nothing! - Katherin Mansfield


: निर्मल वर्मा के लिए

Thursday, January 6, 2011

परिंदे - तीसरा भाग

[पिछली किश्त से आगे]

"जब मैं छोटा था तो सोचा करता था कि पहाड़ों में कहीं मेरा एक छोटा सा घर होगा , जिसमे मैं दिन भर बैठा हुआ विओलिन बजाता रहूँगा |" प्रोफ़ेसर हल्के से हँसे, हाथ सर के पीछे ले जाकर बोले - "अब देखो, घर तो नहीं लेकिन सरकारी कमरा है मेरे पास , जिसमे दिन भर मैं अपने अकेलेपन की विओलिन बजाता रहता हूँ |" सुधीर चुपचाप इस एकालाप को सुनता रहा | धूप खिली हुई थी | तीन दिन हलकी बारिश के बाद आज धूप निकली थी | "यार डॉक्टर ! जीने का मजा तो अकेलेपन में है | है नहीं ?" प्रोफ़ेसर ने धूप में आँखे मिचमिचाते हुए कहा | "जी सर !" सुधीर ने कहा | "रेगिस्तान में चलते रहो , धूप में , न किसी मंजिल की तलाश न कहीं कोई पड़ाव , बस एक सफ़र हो | सफ़र भी ऐसा जिसका कोई नतीजा नहीं निकलना हो , बस एक सफ़र हो , ना आगे कुछ , ना पीछे |" प्रोफ़ेसर ने हथेलियों को आँखों के ऊपर रख लिया , "धूप में आँखें बन्द करो तो नारंगी रंग दिखायी देता है | जोर से पलकों को दबाओगे तो वही रंग काला पड़ जाता है |" आँखें खोलकर उन्होंने गहरी साँस ली | "वो सामने चौखम्भा है न ?" उन्होंने ऊँगली से इशारे किया | सुधीर अनमने भाव से उनकी बात सुन रहा था | अचानक मुड़ कर देखा, बोला "हाँ" | "कभी चलें क्या वहाँ पे ?" प्रोफ़ेसर ने पूछा | सुधीर हल्के से मुस्कुरा दिया | "अरे वाकई ! चलते हैं कभी | कितनी खूबसूरत जगह है वो |" "कब चलना है ?" सुधीर ने पूछा | "यार ! चलते हैं कभी , मई जून में | अगले सेमेस्टर एंड पे" प्रोफ़ेसर पूरे विश्वास से बोले | जेब से सिगरेट निकाली ही थी , कि सुधीर उनकी ओर देखने लगा, " प्रोफ़ेसर! एक दिन में दो , केवल | उससे ज्यादा नहीं |" प्रोफ़ेसर मुस्कुराये - "अरे यार ! आज मौसम अच्छा है |" थोड़ी देर सोचकर बोले , "स्वामी को मत बताना , नहीं तो साला बखेड़ा खड़ा करेगा |" अचानक प्रोफ़ेसर जैसे सोते से जगे, "आज तारीख क्या है ?" "पंद्रह दिसंबर" सुधीर ने हाथ में पकडे हुए अख़बार के उपरी हिस्से में तारीख देखकर उसमे दो जोड़कर बता दिया | "अरे यार ! कल तो मेकैनिकल का जरूरी पेपर है |" ट्रांसिट की ओर जाती सड़क पर दो लड़कों को टहलते हुए देखा , "अरे सुनो ! मेकैनिकल के किसी लड़के को भेज देना यहाँ , जल्दी |" वे दोनों उलटे कदम वापस होस्टल की ओर चल दिए |

मीरा (स्वामीजी की पत्नी) और मिस अर्चना बैठे हुए बात कर रहे थे | प्रोफ़ेसर उप्रेती के आते ही दोनों चुप हो गए | "स्वामी कहाँ है ?" प्रोफ़ेसर ने पूछा | "आज सुबह से ही मुझसे नाराज हैं | मुझे लगा कि शायद आपके पास गए होंगे |" मिसेज स्वामी ने जवाब दिया | " अरे मेरे पास तो नहीं आया |" प्रोफ़ेसर कुछ सोचते हुए वापस जाने लगे | "अंकल , पापा बहुत गुस्से मे थे |" जाह्नवी ने पास आकर कहा | "अरे तेरा पापा तो ऐसे ही नाराज होता रहता है | अभी तेरे से भी छोटा है वो |" प्रोफ़ेसर ने उसकी नाक को छूकर कहा | जाह्नवी हँसने लगी, घर के अन्दर भाग गयी | "सर , जाह्नवी की पढाई भी रुक रही है यहाँ | देहरादून में कुछ दिन मम्मी के पास जाना चाहती हूँ , उसके बाद जाह्नवी को बोर्डिंग स्कूल में डाल देती |" मीरा अपनी भड़ास निकाल रही थी , स्वामी ने जरूर ये सब सुनने से मना कर दिया होगा, प्रोफ़ेसर ने मन में सोचा | "ठीक है ! मैं देखता हूँ | शायद मेरे ही रूम पे गया होगा वो |" प्रोफ़ेसर ने मीरा को तसल्ली देने की कोशिश की | "मुझे जाह्नवी के करियर की बेहद चिंता होती रहती है | अगर यहाँ रहेगी तो ..." प्रोफ़ेसर जाना चाहते थे लेकिन मीरा की बातें मानों आज ही ख़त्म होना चाहती हों, "आपने सही किया था सर, जो डॉली को पढ़ने के लिए दिल्ली भेज दिया था | सुना है डॉली अब बाहर जाने वाली है |" प्रोफ़ेसर को अचानक अपनी साँस फूलती सी लगी, वहीं सीढ़ी पर बैठ गए - "हाँ ! जर्मनी जा रही है, दो महीने के लिए | कुछ रिसर्च फेलोशिप का मामला है | " मीरा "बहुत अच्छा है | बहुत तरक्की मिली है बेटी को | हमारी जाह्नवी जितनी थी , जब गयी थी न ? उसका चेहरा अभी भी याद आता है |" प्रोफ़ेसर जल्दी से बोले - "मीरा , मैं अभी स्वामी को ढूंढ के लाता हूँ | तुम बैठो |" तेज क़दमों से बाहर निकल गए |

कॉलेज होस्टल से पीछे के रास्ते से सीधा सीधा उतर जाओ तो सामने कई छोटे मंझोले खेत दिखाई देते हैं , जो जानवरों को चराने के ज्यादा काम आते हैं | उसी पर बनी हुई पगडण्डी चलते हुए एक छोटी पहाड़ी के पास से गुजरती है | दूर, हॉस्टल से ये पहाड़ी एक मेंढक के मुँह जैसी लगती है | लोग इसे मेंढक पहाड़ी कहते हैं | इसी पहाड़ी के दूसरे छोर पर , जहाँ गहरी खाई है, स्वामी बैठे हुए दिखायी दिए | प्रोफ़ेसर चुपचाप जाकर उनके साथ बैठ गए | " प्रोफ़ेसर यार ! हम शापित हैं , हीदन देवताओं का सोना चुराने वाले समुद्री लुटेरों की तरह | न हम जी सकते हैं , न मर सकते हैं | है न ?" स्वामी प्रोफ़ेसर की ओर देखकर मुस्कुराये | प्रोफ़ेसर ने आश्वस्त भाव से स्वामी की बात को सुना , जवाब देना ही चाहते थे कि यकायक चुप हो रहे , धीरे से इतना ही कहा , "स्वामी |"
"पहले डॉली, अभी जाह्नवी | हम लोग, ऐसा लगता है जैसे विस्थापित लोग हैं | अतीत से विस्थापित, भविष्य में हमारे लिए कोई जगह नहीं |"
"क्या तुम सेल्फिश होना चाहते हो ?" प्रोफ़ेसर ने पूछा |
स्वामी ने मुँह फेर लिया, सामने पहाड़ियों पर बादल उतर आये थे | आँखों में धुंध गहराने लगी थी, "प्रोफ़ेसर , तुम रिटायर कब होने वाले हो ?"
"दो या तीन साल में , क्यूँ?" प्रोफेसर खुश हुए कि स्वामी ने विषय बदल दिया है |
"नहीं , मैं सोच रहा हूँ कि तुम उसके बाद क्या करोगे ?"
प्रोफ़ेसर उप्रेती से कुछ कहते न बना, ज़मीन पर उगी घास को उखाड़ने लगे | पहाड़ी से नीचे अलकनंदा बहती हुई दिखायी दे रही थी | पानी से उठती हुई भाप ने उसके किनारे बसे छोटे कसबे को अपने में समेट लिया था | पहाड़ी कस्बों की अपनी कोई इच्छा नहीं होती | एक तरफ पहाड़ और दूसरी तरफ पानी , उनकी रोजमर्रा के जीवन की दिशा तय करते हैं | पहाड़ और पानी , बारहों महीने ठण्ड सहते सहते, ठिठुरते हुए पहाड़ | पानी बर्फ बनकर जम सकता है , पहाड़ वो भी नहीं कर सकते | पहाड़ सिर्फ टूट सकता है |

"सुधीर ! दरवाजा खोलो |" दासगुप्ता सर दरवाजे को लगातार पीट रहे थे | सुधीर अचानक चौंककर उठे | बाहर जाकर देखा, दासगुप्ता सर दरवाजे के बाहर खड़े हैं | "प्रोफ़ेसर की तबियत खराब हो गयी है | उनको लेकर पौड़ी जाना है | चलो |" सुधीर और दासगुप्ता तेज क़दमों से चलते हुए ट्रांसिट के बाहर के मैदान में गए | हल्के हल्के रुई के फाहे जैसे आसमान से बूँदे गिर रही थी | इंदिरा और मीरा बाहर मैदान में एक ओर बैठे हुए थे | कुछ और टीचर भी एक एक झुण्ड सा नियत करके उसमे शामिल थे | "स्वामी सर कहाँ हैं ?" सुधीर ने इधर उधर घूमकर पूछा | "कॉलेज की एम्बुलेंस लेने गए हैं | प्रोफ़ेसर ने तुम्हें बुलाया था |" दासगुप्ता धीरे से सुधीर के कान में बोले , "कुछ कहना मत, बस सुनते जाना उनसे |" सुधीर एकाएक डर से गए, माँ ने एक बार ऐसे ही बुलाकर दादा के पास भेजा था, फिर कान में कहा कि कुछ कहना मत, बस सुनते जाना | सुधीर एकटक दासगुप्ता सर को देखते रहे, दादा को सुधीर ने फिर कभी अपने सामने नहीं देखा |

प्रोफ़ेसर सो रहे थे, या शायद थक गए थे | थकान से आँखें मूँद लीं थी | सुधीर बिना कोई आवाज किये आये, अर्चना ने चुप रहने का इशारा करके कुर्सी पर बिठा दिया | "सुधीर !" प्रोफ़ेसर ने हलकी सी आहट भांप ली | "जी सर !" सुधीर चौकन्ने से हो गए | "थोड़ा देखके चलना आगे फिसलन है |" प्रोफ़ेसर बड़बड़ाये | सुधीर ने बहुत ध्यान लगाकर सुनने की कोशिश की | "ये कौन है ?" प्रोफ़ेसर ने अचानक आँखें खोल दी | "मैं हूँ...सुधीर " सुधीर ने फिर से जवाब दिया | "सुधीर, तुम्हारे पास माचिस है ?" प्रोफ़ेसर ने पूछा | "यस सर !" सुधीर ने जवाब दिया | "दिया जला दो, एक अगरबती |" प्रोफ़ेसर ने अपना कमरा समझकर भगवान के आले की ओर इशारा किया | अर्चना अल्मिरा से एक अगरबत्ती लेकर आई और सुधीर को दे दी | सुधीर ने अगरबत्ती जलाकर प्रोफ़ेसर के सिरहाने रख दिया | प्रोफ़ेसर ने राहत की साँस ली , "हाँ, अब आराम है | शोभा , ये तकिया हटा दो |" प्रोफ़ेसर ने अर्चना को शोभा कहकर संबोधित किया | अर्चना चौंकी, पास नहीं गयी | सुधीर ने पास आकर तकिया हटा दिया | "शोभा ! तुम डॉली को लेकर...बस कुछ दिन की तो बात थी ... उसके बाद मैं ..." प्रोफ़ेसर अचानक चुप हो गए, "सुधीर ? ये तुम हो क्या ?"
"जी सर! क्या बात है ?" सुधीर ने पूछा | प्रोफ़ेसर चुप रहे | "सर ?" सुधीर पास आये | "नहीं, कुछ नहीं" प्रोफ़ेसर झल्लाकर बोले, "मैं ठीक हूँ | चलो, मैं चलता हूँ |" ये कहकर प्रोफ़ेसर चुपचाप लेट गए | थोड़ी देर बाद उठकर बोले - "सुधीर ! चौखम्भा चलेंगे हम, ठीक है ?" सुधीर ने हाँ में सर हिला दिया |

- क्रमश:

Wednesday, January 5, 2011

परिंदे - दूसरा भाग

[पिछली किश्त से आगे]

अगले दिन दरवाजे पर हुई थाप से सुधीर यकबयक चौंक कर उठा | दरवाजा खोला तो प्रोफ़ेसर और मिस अर्चना खड़े थे | "जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई हो भई डॉक्टर " प्रोफ़ेसर ने हाथ आगे बढ़ाया
सुधीर अभी उन्नींदा सा ही था, "लेकिन आप लोगों को कैसे पता चला ?" प्रोफ़ेसर एक ओर को हट गए
"हमें तो हमारी स्लैम बुक से पता चला है |" मिस अर्चना ने हाथ आगे बढ़ा लिया |
सुधीर ने बढ़कर हाथ मिलाया,"मिस ! इतनी पुरानी चीजें आपने रखी हुई हैं ? और आपको मेरा जन्मदिन भी याद है उसमे ?"
सुधीर को याद आया कि बहुत सारे जूनियर मिस अर्चना के काफी प्रशंसक थे | और उन्होंने ही मिस अर्चना से अनुरोध करके उनकी स्लैम बुक भरी थी |
"तुम भी क्या मिस मिस लगाये रहते हो यार |" प्रोफ़ेसर ने जैकेट की जेब में हाथ डाल लिए थे | सुधीर की तन्द्रा टूटी, ध्यान आया बरामदे में ठंडी हवाएं चल रही हैं |
"अन्दर आ जाइए |" सुधीर ने एक ओर हटते हुए कहा, "आदत नहीं जाती सर, शुरू से ही मिस कहते रहे हैं |"
मिस अर्चना और प्रोफ़ेसर उप्रेती अन्दर आकर बिस्तर पर बैठ गए (घर में कुर्सियां नहीं है) | "हाँ सुधीर ! और तुम्हारा वो हाँजी हाँजी करना भी | क्या पंजाबियों की तरह हिंदी बोलते हो |"
सुधीर खिसिया गए, "ठीक है मिस , अब से नहीं बोलूँगा |"
प्रोफ़ेसर ने दो दिन पुराना अखबार उठा लिया, "सुधीर तुम्हारा कमरा तो बाकी ट्रांसिट से भी ठंडा है | अरे यार, कुछ बंदोबस्त करो हीटर वगैरह का |" अर्चना ने गंभीर भाव से कहा - "अरे! दासगुप्ता सर को बोल दो , बोयज़ होस्टल से जब्त कर लेंगे तुम्हारे लिए भी |" प्रोफ़ेसर और सुधीर हँसने लगे, अर्चना ने दोनों की ओर देखा, "अरे सही में |" प्रोफ़ेसर उप्रेती दासगुप्ता को बेहद पसंद करते थे , "दासगुप्ता थोड़ा शरारती सा है, लेकिन अच्छा टीचर है |"
सुधीर ने उनकी ओर अविश्वास से देखा | "अरे मानों भई !" प्रोफ़ेसर सुधीर का असमंजस समझ गए थे, "दासगुप्ता साला अपनी इमेज सही नहीं रखता , पता नहीं क्यूँ |"
"दासगुप्ता सर ने प्रेम विवाह किया है न ?" अर्चना ने जिज्ञासा रखी |
"हाँ , मिस आपके ही बैच की हैं, कंप्यूटर साइंस ब्रांच से हैं, मिस इंदिरा सेन |"
"वो मिस नहीं , मिसेज हैं अब |" प्रोफ़ेसर ने टोका | "इंदिरा सही स्टुडेंट थी सी एस के टॉप लोगों में से थी | लेकिन टीचर से शादी ..." अर्चना ने अपने शब्दों को रोक दिया |
"दासगुप्ता ने सारा मामला बहुत अच्छी तरह संभाला था | उसके घर से मंजूरी नहीं मिली थी , हम लोगों ने उसकी शादी करवाई थी | स्वामी ने लड़की का कन्यादान किया था |" प्रोफ़ेसर हौले से हँसे, "तो आज क्या करने का प्लान है भई?" सुधीर ने बारी बारी से दोनों की ओर देखा, कुछ समझ नहीं आने पर कह दिया, "कुछ नहीं सर |"
"अरे ऐसे कैसे कुछ नहीं | आज कुछ मीठा तो बनाना होगा | मन्दिर में प्रसाद चढ़ाना चाहिए |" मिस अर्चना अपनी लय में बोलती जा रही थी | सुधीर को माँ का स्मरण हो आया | हर जन्मदिन पर फ़ोन करके ये दोनों चीजें प्राथमिकता में गिनवाती, मन्दिर में प्रसाद, घर पर मीठा | इन सब से जिंदगी की कड़वाहट शायद थोड़ी कम होती हो , सुधीर ने मन ही मन सोचा |
"अरे कहाँ खो गए ?" अर्चना ने सुधीर के कंधे पर हाथ रखा, "मैं कह रही थी कि इन सबसे जिंदगी में थोड़ी मिठास घुलती है |" सुधीर हँस दिए, लड़कियों की आदत एक जैसी होती हैं, माँ जैसी |
"तुम्हारा जन्मदिन भी बड़े अच्छे दिन आया है, आज मुझे मन्दिर जाना है | तुम भी चलो " मिस अर्चना के स्वर में सुधीर को हमेशा एक आदेश का भान रहता है |
"नहीं , मिस .. मन्दिर के लिए तो मुझे माफ़ ही करो " सुधीर ने कहा |
"अच्छा ? क्यूँ भई ?" प्रोफ़ेसर ने पूछा जिसका सुधीर ने कोई जवाब नहीं दिया |
"तुम आखिरी बार मन्दिर कब गए थे ?" मिस अर्चना ने पूछा |
"याद नहीं पड़ता | ऐसा नहीं कि भगवान से कोई दुश्मनी हो, बस वहाँ अन्दर रहा नहीं जाता |" सुधीर ने अपना बचाव किया | "ठीक है, फिर तुम अन्दर मत आना, बाहर से ही पूजा करना | वैसे भी यहाँ मन्दिर में एक साथ सिर्फ दो ही आदमी अन्दर रह सकते हैं | तुम अन्दर आ जाओगे तो पुजारी को बाहर खड़ा होना पड़ेगा |" मिस अर्चना मुस्कुरायी | सुधीर ने अब प्रतिरोध करना छोड़ दिया |

आज माता के मन्दिर की ओर जाने वाले काफी लोग ट्रैकरों का इंतज़ार कर रहे थे | कुछ लोग पैदल ही चलने लगे | "सुधीर ! पैदल चलें ? तुम चल लोगे ?" अर्चना ने सुधीर की ओर देखा | आसमानी लिबास में बेहद हल्के रंग का दुप्पटा हवा में उड़ रहा था | "हाँ जी | हम तो कॉलेज टाइम में पौड़ी तक पैदल ही निकल जाते थे |" सुधीर मुस्कुराया | "अच्छा ?" अर्चना को आश्चर्य हुआ | माथे पे उड़ रही अलकों को कान से पीछे करती, और दूसरे हाथ से दुप्पटे को उड़ने से बचाती अर्चना को देखकर सुधीर ने मदद का प्रस्ताव किया | "मिस, आप चाहें तो मैं आपकी ये पूजा की डलिया पकड़ लूँ ?" सुधीर ने हाथ आगे बढ़ाया | "ओह , श्योर , थैंक यू |" मिस अर्चना ने डलिया सुधीर की ओर बढ़ा दी | जल्दी में सुधीर की उँगलियाँ उनकी उँगलियों से छू गयी | "ओह माय ... तुम्हारी उँगलियाँ इतनी ठंडी क्यूँ है ? अरे खून नहीं है क्या शरीर में ?" अर्चना ने सुधीर को झिड़का , "देखो, यहाँ सही से खाना खाया करो , नहीं खाओगे तो वजन गिरने लगेगा |" "जी मिस " सुधीर से कुछ कहते न बना | "अपने हाथ जैकेट के अन्दर रखो " अर्चना ने दुबारा आदेश दिया | सुधीर ने चुपचाप बाँया हाथ जेब में रख लिया , और दाहिने की उँगलियाँ भी जेब में डाल ली | सामने एक नवविवाहिता चल रही थी, उसकी बाजुओं तक भरी लाल चूड़ियाँ बार बार खनक रही थी | उसी के आगे एक प्रौढ़ा थी, जो संभवत उसकी सास थी | जरा सा हट कर चलता युवक उसके कान में कुछ कहता और वो हौले से हँस देती | युवक ने थोड़ा सा पीछे हटकर, युवती से डलिया अपने हाथ में ले ली, और दाहिने हाथ से युवती का हाथ कसकर पकड़ लिया | वो थोड़ा कसमसाई , लेकिन फिर दाहिना हाथ भी उसने अपने बाँयें हाथ से मिला लिया | "तुम्हारा शादी करने का कोई इरादा भी है या ... ?" मिस अर्चना ने सुधीर से पूछा | सुधीर झेंप गए , मिस ने उन्हें सामने चल रहे विवाहित युगल को देखते हुए पकड़ लिया है शायद |
"पता नहीं मिस |"
"कभी कोई लड़की पसंद नहीं आई ?"
"आई थी मिस" सुधीर को अपने बेबाकी पर खुद भी आश्चर्य हुआ |
"फिर?"
"बस , जब तक मैं इंजीनियरिंग पूरी करता उसकी शादी तय हो गयी थी |"
"ओके !"
"हमारे यहाँ तो आप जानती ही हैं मिस कि एक बार लड़की की शादी तय हो गयी , इसका मतलब कि शादी हो ही गयी | फिर कुछ कहना सुनना बाकी नहीं रह जाता |"
"हूँ ..." मिस अर्चना अपने पैरों की ओर देखने लगी | पहाड़ी का ये मोड़ अन्दर की ओर था इसलिए हवा लगनी बन्द हो गयी थी, लेकिन काफी ठंडा और प्रकाश भी थोड़ा कम था |
अचानक से एक जीप उनके बगल में रुकी | उन्होंने मुड़कर देखा तो दासगुप्ता जीप से मुँह बाहर किये दिखाई दिए, "अरे मैडम, अरे सुधीर | आओ आओ, जगह है थोड़ी इसमें |" फिर मुड़कर अपने साथ वाले लोगों से विनय की, "भाईसाहब! आप कृपया पीछे बैठ जाएँ |" एक साधारण सा ग्रामीण इस विनम्र निवेदन से पानी पानी हो गया | जल्दी से उतर कर पिछली सीट पर चला गया | दासगुप्ता और उनकी पत्नी एक ओर, एक आदमी दांयी ओर बैठा था | सुधीर और मिस अर्चना बीच में एक आदमी की सीट पर बैठ गए | इंदिरा अर्चना से बातचीत का सिलसिला बढ़ने लगी | पुरानी बातों, और यादों को, ताजा करते, और हँसते रहते | दासगुप्ता बोले, "हाँ अर्चना, कैसा लग रहा है तुमको यहाँ ?"
"सर, पूरे चार साल यहीं गुज़ारे थे , कोई पहली बार थोड़े ही आई हूँ |"
"हाँ सो तो है , लेकिन फिर भी , काफी चेंजेज भी तो हुआ है इधर |"
"नहीं सर , कुछ भी तो नहीं बदला है | वही सर्दियाँ हैं, वहीं हम हैं |"
"पिछले साल हम यहीं रुके थे , बर्फ पड़ी थी , इस साल भी पड़ेगी न ?" इंदिरा ने दोनों हाथो को रगड़ना शुरू कर दिया जैसे पिछली बर्फ़बारी की याद आने से ही ठण्ड ज्यादा तेज़ लगने लगी हो |
"अभी फिफ्थ सेमेस्टर के एक्साम बाकी हैं , तब तक तो हम यहीं है |" दासगुप्ता ने मुस्कुराके इंदिरा की ओर देखा |
"इस बार भी यहीं ... रहते हैं न ..."इंदिरा साफ़ तौर पर नाराज दिख रही थी |
"देखेंगे" कहकर दासगुप्ता सर पहाड़ियों पर उग रहे सूर्य को देखने लगे |

सुधीर बाहर खड़े हो गए | मिस अर्चना ने अन्दर बुलाया तो नहीं आये | "भगवान को नहीं मानते हो क्या ?" मिस अर्चना ने दबी जुबान में गुस्से से कहा | "मानता हूँ |" सुधीर ने जवाब तो दिया लेकिन मन की कशमकश नहीं ख़त्म कर पाए | हाथ जोड़ दिए , लेकिन मन या आँखों में कोई भाव प्रकट न हुआ | अर्चना ने दुपट्टे का एक छोर सर पे रख लिया, पूजा का नारियल गर्भ-गृह में बैठे पंडित जी को दिया | धूप के तीन चार बत्तियां बनाकर जला लीं | अगरबत्तियां और धूप पहले से ही काफी जली हुई थी, फिर और धुंआ करके क्या... | सुधीर हाथ जोड़े हुए सोचते जा रहे हैं | माँ होती तो हाथ पकड के मन्दिर के अन्दर लेके जाती | उस दिन भी जब मैं गुस्सा होता था, किसी चीज को पाने की जिद करने के लिए | मेरा सबसे आसान तरीका होता था रोते रोते सड़क पर लेट जाना | माँ हँसती, कहती ठीक है लेकिन मन्दिर के अन्दर तो चल ले पहले | मन्दिर के अन्दर ही एक घर में बहुत बूढ़े बाबाजी रहते , जिनकी उम्र मुझे सौ साल की लगती | वे मुझे खूब सारे फल खाने को देते और मैं उनके मन्दिर में कहीं भी घूम सकता था | बस बदले में मुझे मन्दिर में आये लोगों को गीता सार सुनाना होता | मन्दिर से बाहर आते आते मैं भूल जाता कि मैं किस चीज़ के लिए जिद कर रहा था, और माँ का हाथ थामकर उछल उछल कर एक के बाद एक बातें बनाने लगता | माँ, भैया कहता है कि ... "प्रसाद ले लो ! कब तक हाथ जोड़े खड़े रहोगे ?" अर्चना की आवाज सुधीर के कानों में पड़ी | सुधीर की तन्द्रा टूटी, लोग जाने की तैयारी में हैं | सुधीर ने प्रसाद लेने के लिए हाथ बढ़ाया | "अरे मुझसे नहीं , पंडित जी से ले लो | फिर तुम्हें सबको बाँटना है, आज तुम्हारा जन्मदिन है न |"

सुधीर अपने कमरे में लेटे हुए छत को घूर रहे थे | दोपहर का वक़्त होने के बावजूद कमरे में अँधेरा था , सर्दियों की वजह से दीवारों में सीलन थी | छत पर पानी से बने हुए पैटर्न देखते रहे | बाल सफ़ेद होने लगे हैं क्या ? उसने उठकर आइना ढूँढने की कोशिश की | बैग के अन्दर वाले हिस्से मे से आइना निकालकर देखा | कमरे की लाईट जलाई, ओह लाईट तो कल रात से ही गायब है | खिड़की के पास ले जाकर आईने में कुछ खोजने जैसे लगा | नहीं , बाल सफ़ेद नहीं हुए हैं , सुधीर ने आईने को चेहरे के दायें बाएं घुमाया | शेव भी नहीं की है, लेकिन अभी गरम पानी कहाँ से मिलेगा | दुबारा जाकर बिस्तर पर लेट गए | कुछ सोचने के बाद एकदम से उठे और गैस पर गरम करने के लिए पानी चढ़ा दिया | पुरानी डायरी खोल के पढ़ने लगे जो आदमी, समझिये उसे पढ़ के कुछ और बूढ़ा होता जा रहा है | शायद वाकई मैं बूढ़ा हो रहा हूँ , सुधीर ने मन ही मन सोचा | ये डायरी एक ज़माने से पढ़ी नहीं , लेकिन हर जगह इसे अपने साथ रखकर घूमता हूँ | इसे फेंक देना चाहता हूँ , लेकिन पुरानी चीज़ों से पता नहीं लगाव क्यूँ होता जाता है | छः दिसंबर बयानवे, पौड़ी , आज मैंने श्रद्धा को फ़ोन किया | सोलह दिसंबर बयानवे, श्रद्धा को फ़ोन किया | टेड़े मेड़े अक्षरों में कुछ कुछ गूढ़ जानकारी सी लिखी हुई थी | तीस जनवरी तेरानवे, श्रद्धा के घर फ़ोन किया , बात नहीं हो पायी | सुधीर ने डायरी को टेबल की ओर उछाल दिया | ओंधे मुँह गिरने से पहले डायरी के बीच से एक छोटा सा कार्ड गिर गया | तीन दिसंबर बयानवे , हैप्पी बर्थडे टु माय डियरेस्ट फ्रेंड , फ्रॉम श्रद्धा |

- क्रमश:

Monday, January 3, 2011

परिंदे - पहला भाग

[कहानी अधूरी है , पूरी कब तक होगी , होगी भी या नहीं , पूरे विश्वास से नहीं कह सकता | अधूरे ड्राफ्ट पढ़ने का भी अपना मजा है | सोचते रहो , अंदाजे लगाते रहो, कहानी पूरी करो , आपके अन्दर भी तो एक अफ़सानानिगार छुपा बैठा है]

शाम का धुंधलका छाने लगा था | पगडण्डी की मोड़ों पर अँधेरा पाँव पसारने लगा था | बेतरतीब उग आई झाड़ियाँ अँधेरे को पनाह देती सी महसूस होती हैं | पहाड़ों में हरे रंग की कालिमा के बीच बीच में भूरा रंग उजला लग रहा था | प्रोफ़ेसर उप्रेती चलते चलते ठिठक गए | जैकेट की जेब में हाथ डालकर अपना पसंदीदा सिगरेट ब्रांड निकाला, कैप्सटन | पीछे पीछे जमीन देखता सुधीर भी रुक गया | प्रोफ़ेसर हर एक जेब में हाथ डालकर माचिस ढूँढने की नाकाम कोशिश करने लगे | बीच बीच में हाथ झटककर नाउम्मीद भी होते | सुधीर ने माचिस की डिबिया उनकी तरफ बढ़ा दी | प्रोफ़ेसर खिसियानी हँसी हँस पड़े | "भगवान् की तलाश सबसे ज्यादा नास्तिक को ही होती है | तुम कब से माचिस रखने लगे ?" सुधीर ने सिर्फ हूँ किया, प्रोफ़ेसर के भूलने की आदत वो जानता था |
"तुमको अर्चना याद है ? अर्चना सेमवाल ? शायद तुम्हारी सीनियर रही होगी |" प्रोफ़ेसर ने धीरे से कहा | सुधीर का कोई जवाब नहीं आया, बात उस तक नहीं पहुंची |

"जिंदगी का गणित कुछ अजीब नहीं लगता तुम्हें ?" प्रोफ़ेसर ने सवाल किया | सुधीर का ध्यान इस ओर नहीं था | प्रोफ़ेसर ने अपना सवाल दोहराया |
"आपको ऐसा क्यों लगता है प्रोफ़ेसर ?"
"अर्चना के बारे में सोचकर लगता है | मेरी सबसे होनहार स्टुडेंट |" प्रोफ़ेसर आगे आगे चल रहे थे | पगडंडी इतनी छोटी थी कि दो लोग एक साथ नहीं चल सकते थे | बात करने के लिए लगभग चिल्लाना पड़ रहा था |
"प्रोफ़ेसर! अब वापस चलें ? हम लोग काफी दूर आ गए हैं कॉलेज से | अँधेरा भी घिरने लगा है |" सुधीर ने चिल्लाकर कहा | दोनों वापस मुड़ गए | अब सुधीर आगे आगे चल रहा था, प्रोफ़ेसर पीछे | पटकथा वही थी, बस पात्र आपस में बदल लिए | कॉलेज के मैदान में पीली रौशनी जलने लगी थी | फ़ुटबाल खेलने वाले लड़के अब होहल्ला करते हुए, एक दूसरे को गाली देते हुए अपने होस्टल की ओर जा रहे होंगे | गंगोत्री गर्ल्स होस्टल के गेट पर खड़े लड़के लड़की अब एक दूसरे से विदा लेने लगे होंगे | कॉलेज में ऑफिशियल रात हो गयी थी |
"आप कुछ कह रहे थे प्रोफ़ेसर |" सुधीर ने प्रोफ़ेसर को याद दिलाया |
"हाँ, अर्चना वापस आई है यहाँ पढ़ाने के लिए | तुम तो जानते हो अर्चना तुम्हारी सीनियर थी |"
सुधीर तब फर्स्ट इयर में आया था, जब अर्चना सेमवाल फाइनल इयर में थी | कॉलेज की जीनियस लडकी, मैकेनिकल इंजीनियरिंग में अपने बैच की अकेली लडकी | मैकेनिकल लेने वाली, बाद की कई लड़कियों के लिए वो प्रेरणाश्रोत बनी थी, मिस अर्चना | "मुझे पता है प्रोफ़ेसर लेकिन मेरी उनसे कोई जान-पहचान नहीं थी |"
"अर्चना ने प्रेम विवाह किया था, कुछ सालों में तलाक़, जब विवाह में प्रेम ही नहीं रहा |" प्रोफ़ेसर अब सुधीर के बगल में आ गए थे | "पगडण्डी पे सावधानी से कदम रखना, आगे फिसलन है |"
प्रोफ़ेसर ने एक गहरी सांस भरी, "शोभा और डॉली को अपने साथ रखने के लिए मैंने क्या क्या कोशिशें नहीं की | लेकिन शोभा गयी तो गयी, डॉली ने भी पूरा बचपन बाप के बिना गुज़ार लिया |" सुधीर चुपचाप चलता रहा, कहने के लिए कुछ नहीं था | प्रोफ़ेसर अपनी रौ में बोलते रहे, "डॉली की शादी भी हो गयी, लेकिन मुझे नहीं बुलाया | कभी कभी मिल आता हूँ उससे दिल्ली जाकर, लेकिन दिल्ली बहुत दूर है शायद अभी | वक़्त भी कितनी तेज़ भागता है न ? कल तक तो मेरी बच्ची थी डॉली, मेरी दुनिया | आज उसकी अपनी दुनिया है, जहाँ मेरे लिए कोई जगह नहीं |"
"आप, वहाँ क्यों नहीं चले जाते ? क्या रखा है यहाँ ?" सुधीर ने बेपरवाही से कहा |
"सूरज बुझते ही यहाँ रात हो जाती है | है न ?" प्रोफ़ेसर ने सिगरेट फेंक दी |
हलकी बूंदाबांदी फिर से होने लगी थी | दोनों तेज़ क़दमों से ट्रांसिट की ओर चलने लगे |
"प्रोफ़ेसर ! अभी स्वामी जी के पास गयी थी, लगा कि आप वहाँ होंगे | आज रात का खाना मेरे रूम में, ठीक ?" सामने मिस अर्चना खड़ी थी |
"क्या कर रहा है वो साला ? हमारे साथ घूमने भी नहीं आया |" प्रोफ़ेसर ने गुस्से से कहा | मिस अर्चना हँस पड़ी, सुधीर ने कनखियों से देखा, मिस अर्चना अभी भी सुन्दर लगती हैं |
"सुधीर! तुम भी हमारे साथ ही खाओगे |" मिस अर्चना ने आदेश के स्वर में कहा |
"मिस, मैं ...खुद..." सुधीर सकपका गए |
"अरे! सुधीर खा लो, कब तक विश्वामित्र की तरह तपस्या करते रहोगे |" प्रोफ़ेसर ने धीमे से कहा |
"क्या कहा आपने ?" मिस अर्चना ने दोनों हाथ कमर पे रख लिए |
"मैं कह रहा था कि खा लो, अर्चना खाना बहुत अच्छा बनाती है |" प्रोफ़ेसर ने शरारती मुस्कान से कहा |


खाना खाने के बाद सभी सुर-स्तव(बकौल स्वामी) का पान करने के लिए बैठ गए | सुधीर उनसे थोड़ी दूर बैठ गया, फ्रान्ज़ काफ्का में मुँह डालकर | किताबों में सुधीर की कोई दिलचस्पी नहीं है , लेकिन... | मिस अर्चना ने सुधीर से भी लेने का आग्रह किया, पर सुधीर टाल गए | बातों की कोई धुन छेड़े बिना सभी पी रहे थे | अचानक स्वामी बोले, "यार डॉक्टर, तुम कहाँ यहाँ हम लोगों के बीच चले आये | अच्छा खासा बेंगलोर में थे | पैसा भी बना रहे थे | बढ़िया कुलीन परिवार, शादी वादी करे रहते और फिर ..." बोलते बोलते रुक गए | सुधीर के लिए ये सवाल कभी आया न हो ऐसी बात नहीं थी | बस सुधीर को खुद कभी ये कोई सवाल नहीं लगा, "माँ ने शादी कराने के लिए काफी जोर लगाया था | तीनों भाई अपनी गृहस्थी में खुश हैं | फिर माँ चल बसी तो उस दुनिया के साथ जो ताना बाना था वो भी नहीं रहा | ऐसे ही एक दिन यहाँ चला आया |" ख़ामोशी एक बार फिर सबके मन में पसर गयी थी | बाहर टिन शेड पर बारिश की धीमी धीमी टप टप सुनी जा सकती थी | आज सुधीर का जन्मदिन था, माँ थी तो जन्मदिन भी याद रहता था | अब तो पता ही नहीं चलता और गुज़र जाता है | प्राग से कभी कभी भैया भाभी का फोन आ जाता है, साथ में छोटा अंशुल भी होता है |
"जिंदगी का गणित भी अजीब है प्रोफ़ेसर !" मिस अर्चना पहली बार बोली, सुधीर ने चौंककर प्रोफ़ेसर की ओर देखा, प्रोफ़ेसर धीमे से मुस्कुराये | अर्चना ने सिप लेकर अपनी बात जारी रखी, "जहाँ से नफ़ा होने की उम्मीद होती है, वहाँ से नुक्सान, है न प्रोफ़ेसर ?" प्रोफ़ेसर बन्द खिड़की को घूर रहे थे, "लाइफ इस व्हट हैपंस टु यू व्हाइल यू आर बिजी मेकिंग अदर प्लान्स" | स्वामी हल्के से हँस दिए, "प्रोफ़ेसर साला, हमेशा कुछ न कुछ फिलोसोफी मारता है | किताबें पढ़ पढ़ के पागल हो गया है |" सुधीर जानना चाहता था कि मिस अर्चना क्यों इस जगह पर चली आई, पूछने में संकोच हुआ तो नहीं पूछा | प्रोफ़ेसर ने कुछ कहा तो था कि तलाक़ लिया था मिस अर्चना ने, लेकिन फिर यहाँ आने की क्या जरूरत थी | सुबह की बरसात होने से धूप की उम्मीद बेमानी तो नहीं होती | जिंदगी एक बार फिर से भी तो शुरू हो सकती है | सपनों से हार जाना भी जीवन का एक अहम् पड़ाव है, सफ़र फिर भी जारी रहता है |
"मीरा देहरादून जाना चाहती है, जाह्नवी को लेकर |" स्वामी ने अपना सर झुका लिया |
प्रोफ़ेसर ने धीमे से पूछा "तुम क्यों नहीं चले जाते उनके साथ ?"
स्वामी ने बदले में कुछ न कहा | प्रोफ़ेसर उप्रेती ने शोभा को ऐसे ही जाते देखा था | शोभा, फिर कभी वापस नहीं आई | डॉली भी बदलकर अनुपमा हो गयी | दिल्ली विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की प्रोफ़ेसर, मिसेज़ अनुपमा कोहली | "चलो खैर, देहरादून जाकर जाह्नवी की एडुकेशन ठीक से हो जायेगी, फ्यूचर अच्छा रहेगा |" प्रोफ़ेसर ने सिगरेट जलाते हुए कहा | "आपके घर से कोई पत्र नहीं आया, मिस अर्चना ?" स्वामी ने पूछा |
"नहीं" अर्चना एक बेबस हँसी हँस दी, "बाबूजी और छोटे भाई ने जो कहा था, पूरा किया | पिछले दिनों माँ की चिट्ठी आई थी, बाबूजी की तबियत खराब होने का जिक्र भी था |"
"तुम्हें जाना चाहिए था |" प्रोफ़ेसर ने खांसते खांसते कहा |
"पी एस में भाई ने लिखा था कि आने की कोई जरूरत नहीं है, पोस्ट करते वक़्त लिखा होगा |" अर्चना हाथ में पकडे ग्लास को काफी देर तक देखती रही, "धमकी के स्वर में अपने साइन भी किये थे |"
बाहर बारिश तेज़ हो चली थी, टिन शेड की टप टप अब संगीत न रहकर एक कुंठा हो चली थी | लैम्प की बत्ती अचानक तेज़ हो गयी थी | प्रोफ़ेसर ने आगे बढ़कर उसे थोड़ा धीमा किया | अर्चना के अन्दर भावनाओं का आलोड़न जारी था, "बाबूजी शायद न बचें, फिर उसके बाद भाई घर अपने नाम करना चाहेगा | आखिर उसके बीवी-बच्चे हैं, घर-गृहस्थी है | सब कुछ जानते हुए भी बाबूजी उसके नाम कर देंगे | पुरुषप्रधान समाज की हकीकत यही है | स्त्री पुरुष बराबरी, भेदभाव नहीं, से सब बातें सिर्फ घर से बाहर ही अच्छे लगती है | जिंदगी के गणित का एक अजीब सा समीकरण |" कॉलेज के शिवमंदिर से टन...टन की आवाज आ रही थी | शाम की आरती के बाद पुजारी रात को २ किलोमीटर दूर जंगल में अपने घर जाएगा | सर्दी , गर्मी , बरसात हो लेकिन पुजारी का नियम नहीं टूटता | सन्यास उसने लिया नहीं है, लेकिन अकथ, अदृश्य, अनाम को लेकर ऐसा पागलपन एक गृहस्थ में बिरले ही देखने को मिलता है | स्वामी ने हाथ जोड़कर हरिओम का घोष किया |
"बाबूजी ने बचपन से दिल्ली की लड़की बनाके रखा | पिछ्ड़ेपंथी से कहीं दूर, मोडर्न दुनिया में | इस दुनिया में लड़के -लड़कियों के बीच कोई फर्क नहीं है | दोनों जींस पहनते हैं, बाल कटाते हैं, फर्राटेदार अंग्रेजी में बात करते हैं | इंजीनियरिंग में एडमिशन के टाइम पर उन्हें अपना गाँव याद आया, गाँव से मेरा बर्थ सर्टिफिकेट बना लिया गया | फिर इंजीनियरिंग में विक्रांत से प्यार | एक साल के करीयर को समर्पित किया, फिर शादी | विक्रांत के रूप में सब कुछ मिला, और भी बड़ा परिवार, और भी बड़ा घर, और और भी बड़े बुद्धिजीवी | विक्रांत के साथ हर तरह से खुश थी मैं, मेरी मनमर्जी चलती थी | फिर वही, जिसपे खबरें बनती हैं; अविश्वास, शक, रोज़ रोज़ के झगड़े | मेरी जॉब छुड़वा दी गयी,फिर एक दिन चरित्रहीनता का आरोप लगाकर तलाक़ की अर्जी डाल दी गयी | अदालत में बैठकर सुनती रही कि मेरे अफ़ेयर किस किस से हैं | बदले में मेरे वकील ने भी विक्रांत के ऐसी ऐसी लड़कियों से रिश्ते निकाले, जिनके नाम मैंने भी नहीं सुने थे | तलाक़ तो खैर लेना ही था, लेकिन होड़ लगी थी कि कौन सामने वाले को ज्यादा पतित और स्खलित साबित कर सकता है | वो लोग जीत गए |" अर्चना के चेहरे पे सख्ती आने लगी थी | प्रोफ़ेसर फिर से बन्द खिड़की के बाहर देखने लगे, काले शीशे को, जैसे जानते हों कि सच और काला होने जा रहा है | अर्चना ने एक सिप और भरा, "अदालती कार्यवाही में मेरे वकील ने वो सब गलत साबित किया , लेकिन अब कोई फ़ायेदा नहीं था | कुछ दिन माँ के आँचल में चुपचाप सोई कुछ घूरती रही | एक दिन मेरा सारा सामान मेरे घर वापस पहुंचा दिया | उस दिन महसूस हुआ मानो दलदल में गिरी हुई हूँ | बस अब कोई रास्ता नहीं है, संघर्ष से और भी हार मिलेगी |"
"आपके घर वालों ने तो आपको सपोर्ट किया होगा |" सुधीर ने पहली बार मिस अर्चना से सीधा संवाद किया |
"भाई को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा पर आंच आती दिखने लगी थी | हर एक बात में टोकाटोकी होने लगी थी | कभी कभी मुँह पर कह भी दिया जाता कि तुम तो हमें मत ही समझाओ | अपने आस पास बैठे बुद्धिजीवियों की नस्ल को गिद्धों से भी नीचे गिरते हुए देखा मैंने | कॉलेज में नियुक्तियां निकली तो माँ ने अपने अकाउंट में छुपाये हुए पैसे निकालके मुझे रोते हुए विदा किया |" अर्चना की आँखों में एक आँसू छटपटा रहा था |
"नफरत होती है ऐसे लोगों से |" प्रोफ़ेसर अपने आप में बड़बड़ाए |
"नफरत मुझे माँ से होती है | क्यों, इस सब के बीच में बेचारी सी बनी रही, लाचार बनी रही| अरे लोगों के खिलाफ मेरा पक्ष नहीं ले सकती थी, तो लोगों के साथ ही हो लेती | मेरे चरित्र को जब मेरे अपने ही बाजार में बेच रहे थे, तो वो भी कुछ नफ़ा कमा लेती | क्यों दोनों तरफ से हिस्सेदार बनना ?"
"अर्चना! उन्होंने तुम्हें यहाँ भेजा है, सबके विरोध के वावजूद |"
"यही तो ग़लतफ़हमी है स्वामीजी, उन्होंने मुझे वहाँ से भेज दिया | जो काम भाई, बाबूजी सारी लानत-मलानत भेजने के बाद भी नहीं कर सके, उन्होंने मुझे ममता के धोखे में रखकर कर दिया |"
"तुम अभी बहुत निर्दयता से आकलन कर रही हो अर्चना, वक़्त के साथ शायद तुम्हें ... |" प्रोफ़ेसर जानते थे वक़्त के साथ भी धारणाएं बदलनी बहुत मुश्किल होती हैं | आखिर यही था तो वक़्त उनके रिश्तों में जमी बर्फ क्यों नहीं पिघला पाया |
"वैसे आप सही कहते हैं प्रोफ़ेसर |" अर्चना के चेहरे पर सायास मुस्कान थी, "शान्ति और नीरवता के इस शमशान में, गिद्धों की आमद मंदिरों से कम है |"
"प्रोफ़ेसर! डॉली की तरफ से कोई ख़त आया ?" स्वामी ने एक हलकी झिझक के बाद पूछ लिया | खारापन जुबान पर अभी ताजा ही था, समंदर में थोड़ा सा नमक और डालने से समंदर नहीं बदलेगा |
"फोन आया था | एक बेटा हुआ है | कह रही थी, पापा, माथा बिलकुल आप का लगता है |" प्रोफ़ेसर बच्चों जैसे खुश हुए, लेकिन एक वक़्त के बाद हँसी को जबरन खींचा भी तो नहीं जाता, "फिर कहने लगी कि, पापा! पूछोगे नहीं माँ पर क्या गया है ?" सुधीर चौंका, लेकिन शांत बैठा रहा | मिस अर्चना अपने ग्लास को ध्यान से देखती रही | स्वामी खिड़की की ओर देखने लगे, जहाँ थोड़ी देर पहले तक प्रोफ़ेसर देख रहे थे |

- क्रमश:

Saturday, December 25, 2010

कहानी कैसे लिखें : एक निबंध

लिखना मन की परतों को खोलने जैसा है, एक के बाद एक सतह | लिखकर आप लगातार भीतरी सतह पर प्रवेश करते जाते हैं | यह सब मैं पढ़ चुका हूँ, कई बार , कई जगह | शब्द थोड़े बहुत इधर उधर होते होंगे, मजमून नहीं बदलता | शायद औरों के लिए लिखना अपनी दबी हुई इच्छाओं को निकालना, कुछ के लिए अपनी अन्दर छिपी आदमियत को रचनात्मक संतुष्टि देना है | कुछ स्वान्त सुखाय जैसा शब्द भी बताते हैं, जिसका अर्थ मुझे नहीं पता | मुझे याद है मेरा एक सहपाठी कहता था कि ये आर्ट, कुछ लिखना, पेंटिंग वगैरह ये उन लोगों के काम हैं जो समाज के सामने अपने आप को व्यक्त नहीं कर पाते | अपनी भावनाएं सबके सामने न व्यक्त कर पाने की मजबूरी ही इन्हें कलाकार, लेखक, पेंटर बनाती है | फ़िलहाल आप मेरे बारे में जानना चाहेंगे | मेरे लिए लिखना दर्द से गुजरने जैसा है | कुछ कुछ ऐसा जैसे बिलखना चाहते हैं , मगर नहीं रो पाते | ठहाका लगाना चाहते हैं, हँस भी नहीं पाते | मेरे समानांतर दो दुनिया चलती है | कहानी में बेग साहब के बेटे को मार दिया है; मेरी माँ, भाई , बहनें ये सब सहज ही रहते हैं , और मुझे भी सहज समझते हैं | लेकिन मियां लियाकत, सुधीर, ओलिवर, जोनाथन रिवेट मेरी मनोदशा जान जाते हैं | पडोसी का पच्चीससाला बेटा एक्सीडेंट में मर जाता है, आपको दुःख होता है | उसके घरवालों को आप सांत्वना देते हो; लेकिन श्रद्धा, जब्बार नाई , बेग साहब को इन ख़बरों का कुछ नहीं पता |

लिखना एक ऑपरेशन जैसा है | ऑपरेशन थियेटर, एक परिवेश जो एक पूरी दुनिया है , आप अपनी कहानियाँ इसी परिवेश से तो चुराते हो | कभी गए हो वहाँ अन्दर ? गौर किया है कि वहाँ अन्दर जाने पर डर ख़त्म हो जाता है, लेकिन राहत मिले ऐसा भी नहीं | आपका दिमाग सोचना बन्द कर देता है, वहाँ पर डर, गुस्सा, तकलीफ ख़त्म होती है , लेकिन साथ ही साथ ख़ुशी, संतोष, आराम जैसी चीजें भी नहीं मिलती | आप किस अवस्था में है ? क्या आपको डर लग रहा है ? नहीं | फिर आप क्या महसूस कर रहे हैं ? कुछ भी नहीं | कुछ भी नहीं, क्योंकि जिस वक़्त से आपको स्ट्रेचर पर रखकर अन्दर ऑपरेशन टेबल पर पटका है आप कुछ सोच ही नहीं पा रहे | आपके लिए आप अपनी कहानी के पात्र हैं, महज़ एक पात्र | आपके अन्दर जन्म ले रही है कहानी , लेकिन विचारों के सिरे का आपको कुछ नहीं पता | आगे किस पात्र के साथ क्या होगा , क्या पता, आप ये सब भी नहीं सोचते | आप बस लेटे हुए अपने आपको स्ट्रेचर पर देख रहे हैं | स्ट्रेचर को धकेलकर ले जाया जा रहा है , आप एक और करवट लेके दुनिया को देखने की कोशिश करते हैं , इनमे से कोई पात्र कहानी में आएगा क्या ?

आपका डर केवल रिसेप्शन तक रहता है | दर्द का ग़ज़ल से सदियों का नाता है , लेकिन खूबसूरत रिसेप्शनिस्ट को अपने दर्द का दोष न दें | आपका डर वहाँ पर सबसे ज्यादा मुखर होता है, जब प्राइवेट हॉस्पिटल की रिसेप्शनिस्ट हौले से धवल दंतपंक्ति दिखाते हुए कहती है "आपका नाम ?" ओह! तो इस चीज़ का डर है; आपका नाम | नाम ? नाम का डर ? नाम से डर ? क्या ? नहीं पता | क्या मेरा नाम सुन के कोई पूछेगा कि ये कौन था ? या कोई मेरा नाम ही न सुने, न पूछे | ज़ेरेसेस की सेना का एक सिपाही मैं भी रहा हूँगा जो बेनाम मर गया | रिसेप्शनिस्ट जिन्दगी खूबसूरत है कि तर्ज़ पर फिर से मुस्कुराती है, और आप आश्चर्य करते हो कि हमेशा दर्द देखने वाली आँखें कैसे हँस सकती हैं | ये अलग बात है कि रिसेप्शनिस्ट आपको नहीं बताती कि आज सुबह उसने एक नामचीन मैगज़ीन में इस हॉस्पिटल पर एक आलेख पढ़ा, जिसमे इसकी काफी तारीफ़ की गयी है | उसके मुस्कुराने पे आपकी खीझ बढ़ जाती है , लेकिन खीझने का अधिकार आपको खुद नहीं मिला है | आपके चेहरे से उसे अंदाजा हो भी जाता है , तो ग्लानि, क्षोभ दबाकर भी वो मुस्कुराती है | क्या करे बेचारी, डॉक्टर तो है नहीं जो जान जाए कि मरीज लाइलाज है | सवाल फौजी कदमताल से आगे बढ़ते हैं | आप हिन्दू हैं, आप भारतीय है, आप मर्द हैं, जवाब भी रस्म पूरी करते हैं | और भी बाकी डिटेल्स ले लो, इससे कहानी में बहुत फर्क पड़ने वाला है | मसलन मज़हब मुसलमान कर दो , पढ़ने वाले ज्यादा हो जायेंगे | हिन्दू करोगे, ऑपरेशन करने शल्य आयेंगे , भगवान विष्णु के गरुड़ पे लिफ्ट लेकर |

नर्स आपकी डिटेल्स देख रही है , और आप नर्स में अपनी कहानी की नायिका की डिटेल्स तलाश रहे हो | मौत के वक़्त भी पात्रों को बाजीगरी सूझती है, मेरी कहानियों में तो सालों को मौत के वक़्त ही बाजीगरी सूझती है | दो मरीज थे, एक दूसरे से बोलता है , "साले, बात करा यार उससे कभी |" दूसरा बोलता है , "हाँ , हाँ , करवा दूंगा | एक बार हमारे वार्ड में लग जाने दे उसकी नाईट ड्यूटी |" गरीब गुरबे कहानियाँ उसी रात सुनाते हैं , जब पेट खाली होने की वजह से नींद नहीं आती | जिस रोज़ रोटी नसीब हो , पेट भर जाए तो फुटपाथ पे लम्बी तान के सो जाते हैं साले | फिर किसकी कहानी , कौन सी कहानी | अरे हाँ , फुटपाथ से याद आया; ये वो जगह है जहाँ मेरी कहानियों का गरीब आदमी हगता है और अमीर आदमी अपने कुत्ते को हगाता है | एक तरह से ये ब्रिटिश मानसिकता 'डॉग्स एंड इंडियंस आर नॉट अलाउड' का जवाब है | तो मैं कह रहा था, कि लेखक भी उसी गरीब की तरह होता है | उन विषयों पर चीखता है , जो बुद्धिजीवी लोगों के लिए बस एक बौद्धिक बहस है | मन में हाहाकार था , ग्रन्थ तभी लिखे गए है | कलम की तलवार लेकर अपने मन से लड़ते रहता है | आसपास की दुनिया में कुछ लड़ने लायक नहीं देखता तो काल्पनिक दुनिया बनाकर तलवार भांजता है | आपके ऑपरेशन की पूरी तैयारी हो चुकी है | ड्यूक ऑफ़ वेलिंग्टन ने 1815 में नेपोलियन को हराया था | मेवाड़ राजवंश की नींव बप्पा रावल ने रखी थी | पाकिस्तान स्वतन्त्रता संग्राम 1905 -1947 तक चला था, ये आपने पाकिस्तान की ऑफिशियल वेबसाइट से पढ़ लिया है | आपने असाम और उसकी सात बहन प्रदेशों के इतिहास, भूगोल को पढ़ लिया है | आपको ये भी पता है कि कंप्यूटर में अब चिप्स के साइज़ के रजिस्टर होंगे जो उसे मोड़कर जेब में रखने लायक बना देंगे | क्या कहा ? मस्जिद बाबर ने नहीं मीर बाकी ने बनायीं थी ? ठीक है , ये जानकारी भी रख लो , काम आएगी | आपके पास अभी बहुत सारी जानकारी है , जो नर्स भी देख रही है | अब आपको डर लग रहा है , है न ? सारी जानकारी होने के बाद ऑपरेशन की सफलता संदिग्ध लगती है, एक दो सेकेण्ड के लिए | हाँ .. ठीक है .. जिंदगी थोड़े ही खत्म हो जाएगी |

अब आप शांत हैं , आपको अनास्थीसिया दे दिया गया है | लेकिन आप इस वजह से शांत नहीं है | आप शांत हैं क्योंकि आप कहानी बुन रहे हैं , बिना डर के , बिना तसल्ली के, बिना भावुकता के | आप शब्द बिखेरते जा रहे हैं | बिना कोई कशमकश के , आप अपने पात्रों को चला रहे हो शुरू के दो कदम | अभी पात्रों ने खुद चलना शुरू किया है | नन्हे -मुन्ने उनके पांवों की थाप आप महसूस कर सकते हो अपने सर पर, किरर्र... किरर्र | नाक बहती है अभी उनकी , गीलापन रुई के बड़े बड़े पैडों से सोखा जा रहा है , नोज़ी साफ़ कलो ...| बड़े हो गए हैं आपके पात्र, सहज मानवीय गुण भरे हैं आपने उनमें | लड़ते हैं , झगड़ते हैं , प्यार भी करते हैं | किसी का खून भी हो गया , किसी ने डूबते को भी बचाया | आपके पात्र भी न ! कहानी अटक रही है क्या ? यहाँ पर पाठक बोर हो रहा है | आप सोचते ही जा रहे हैं | हाहाकार से ही ग्रन्थ उपजते है | बेचैनी ख़त्म नहीं हो रही | लिखना एक दर्द है, सिर्फ एक दर्द |

डॉक्टर बाहर आता है, "आई ऍम सॉरी ...उनका बचना काफी मुश्किल है | लगभग नामुमकिन ..." कहानी की पूर्ण तृप्ति के साथ आप आँखें बन्द कर लेते हैं | आखिरी सांस एक अधूरा उपन्यास है | बाहर पाठक खड़े हैं; माँ, भाई, बहनें रो रहे हैं | कहानी की भावनात्मकता के साथ बह गए हैं | पिता अभी आलोचना कर रहे है | विचार एक ब्रेन ट्यूमर है |

Wednesday, December 22, 2010

No Greater Love

वो मेरे सामने खड़ा था, सर झुकाए हुए, पेरिस का मशहूर गैंगस्टर, जोनाथन रिवेट उर्फ़ ली टिरेयर (दी शूटर) | "जोनाथन रिवेट, आप पर मुकदमा चलाया गया था, 12-06-1956, जगह ल्योन,  तीन पुलिसवालों की हत्या का | आप दोषी साबित होते है | 3-12-1960, यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका में वाशिंगटन नरसंहार जिसमे कि बेंजामिन डेमी, एंजेलो बेनिटो, गुस्ताव लोस्सेलिअनी और इतालियन माफिया फॅमिली हेड विनसेंजो अंतोनियो मारे गए थे, आप के इशारे पे हुआ था | आप दोषी पाए जाते हैं |" उसने एक नजर मेरी ओर देखा | मैं लगातार उसकी तरफ देखता रहा | "माइकल कार्लसन ने आपकी शिनाख्त जोनाथन रिवेट उर्फ़ ली टिरेयर उर्फ़ दी  शूटर के रूप में की है | इस अदालत को इस बात में कोई शक नहीं कि आप ही जोनाथन रिवेट हैं | आप पर लगे इलज़ाम सही पाए गए हैं | आप को फांसी की सजा सुनाई जाती है |" उसकी आँखों में कोई भाव प्रकट नहीं हुए | ये मेरे लिए कोई हैरानी की बात नहीं थी | अक्सर सुनवाई के दौरान मुजरिम पूरी तरह खामोश रहता है | उसके चेहरे पर दुःख, पश्चाताप, अवसाद के कोई चिन्ह नजर नहीं आते | "08-02-1963, पीपुल'स बैंक में लूट | दोषी पाए गए, बीस साल कैद की सजा | 11-05-1965, मार्सिली कैदखाने से चार पुलिसवालों की हत्या करके फरार | दोषी, 20 साल कैद |" हर सज़ा के साथ मेरी बेचैनी बढती जा रही थी, "आप एक जुर्मों की फेहरिश्त काफी लम्बी है | आप पर कोई भी रहमदिली करना गवर्नमेंट ऑफ़ फ्रेंच रिपब्लिक की कमजोरी होगी | साथ ही हमारी सुरक्षा से समझौता भी | आपको कहने का मौका दिया गया था, जिसमे आपने अपने ऊपर लगे सारे आरोपों को खारिज किया था, किन्तु आप दोषी पाए गए है | कई बार आपको सुधरने का मौका दिया गया था, किन्तु आप हर बार सुरक्षा घेरा तोड़कर भाग गए थे | इसलिए ये अदालत आपको सजा-ऐ-मौत का ऐलान करती है |" मेरी नम आँखों में उसके प्रति कोई हमदर्दी नहीं थी | "ये अदालत इस बात का भी ध्यान रखेगी कि अब जब आपके जुर्म साबित हो चुके है तो सजा भी आपको जल्द ही मिले, क्योंकि सजा में देर करना इन्साफ के खिलाफ होगा |" कोर्ट में तालियाँ गूँज उठी | इन लोगों को सिर्फ सज़ा से मतलब है, किसे क्यों मिल रही है ये जानने की कोई जहमत नहीं | 'आर्डर इन द कोर्ट' कहते हुए मैंने पेन एक तरफ रख दिया और न्यायलेखा को बन्द कर दिया, "जोनाथन रिवेट! आपको कुछ कहना है ?"

1939, विले ग़ाइअ | वो दूसरे महायुद्ध के दिन थे | अफवाहें थी, कि जर्मन फौजों ने पेरिस पर कब्ज़ा कर लिया है और कुछ ही दिनों में फ्रांस पूरी तरह से जर्मन उपनिवेश बन जायेगा | जॉनी कहता था कि जर्मन को हम गाइअ में नहीं जीतने देंगे | वो कई तरह की रणनीति बनाने की भी बात करता था | हमारे घर के पास में दो बड़ी बड़ी चट्टानें थी, जिन्हें जॉनी हॉट गेट्स कहता था | जॉनी की योजना के मुताबिक वो जर्मन फौज को यहाँ पर रोकेगा | ग्रीक आर्मी ने  हॉट गेट्स के युद्ध में पर्शिया के लाखों की फौज का मुकाबला केवल कुछ हज़ार सैनिकों से किया था | मैं हमेशा कमजोर खिलाडी था इसलिए उसके बैटल ऑफ़ हॉट गेट्स मुझे ही नाज़ी बनना पड़ता था | मैं हमेशा हार भी जाता था क्योंकि यही होना भी चाहिए था | रेडियो में एक दिन खबर आई कि युद्ध टल गया है क्योंकि चेकोस्लोवाकिया जर्मनी से हार गया है और उसने जर्मनी को सुदेतेंलैंड सौंप दिया है | हमारे स्कूल फिर से खुल गए थे | मुझे पढ़ने का बहुत शौक था इसलिए मुझे स्कूल जाना अच्छा लगता था, लेकिन जॉनी ने स्कूल जाना छोड़ दिया था | जॉनी के पिता के अचानक गायब होने के बाद उसकी माँ स्टेला को शराब में ही सुकून मिला | लोगो का यही मानना था कि स्टेला ने ही अपने पति की हत्या की है | जॉनी अक्सर मेरे घर पर ही रहने लगा था | उसकी ख़ामोशी धीरे धीरे उसके अन्दर एक अजीब सा गुस्सा भर गयी | जॉनी मेरा सबसे अच्छा दोस्त था, जिसे मैं उसके अपने ही गुस्से से हार रहा था | अगर उस वक़्त किसी ने मुझे संभाला था तो वो थी एलेनोर मेलविले, लेकिन जॉनी को कोई नहीं संभाल सका | विले गाइअ में ये खबर गर्म थी कि जर्मनी ने फिर से फ्रांस पर हमला कर दिया है |

1945, जॉनी का कहीं कोई पता नहीं था | कुछ साल पहले उसका घर जल गया था, जिसमे स्टेला की मौत हो गयी थी | उसके बाद से ही जॉनी ग़ाइअ छोड़ चुका था | नयी कहानियों के अनुसार जॉनी ने ही स्टेला को जलाकर मार डाला है | मुझे पता था कि वो ऐसा नहीं कर सकता, लेकिन मैं किसी को कुछ नहीं समझा सकता था | उस शाम वो मेरे पास आया था, "हिटलर सारी दुनिया पे राज करेगा" उसने कहा था | लेकिन ऐसा नहीं हुआ | हिटलर का कहीं कोई पता नहीं चला था | अमेरिकंस ने उसे उसी के कैम्प्स में तडपा तडपा के मारा | कुछ कहते कि उसने ख़ुदकुशी कर ली | कुछ कहते कि वो अभी छुपा हुआ है और सही वक़्त आने पर दुनिया के सामने आएगा | इस बीच मैं वकालत पदने के लिए बोरेदोक्स चला गया | एल मुझे हर महीने ख़त लिखती रही | उसके खतों से पता चला कि जॉनी ग़ाइअ वापस आ गया है और वो माफिया बेनिटो शेरिफ्फ़ के गैंग में काम करने लगा था | जॉनी के बारे में सुनकर मुझे दुःख होता था, मैं कहीं से भी ये स्वीकार नहीं कर सकता था कि वो किसी की हत्या कर सकता है | इस बात की ख़ुशी थी कि वो अभी भी मेरे आसपास ही है | नाज़ी जर्मनी के अफसरों पर मुकदमा चला, जो हमारे लिए एक कोर्टरूम रिहर्सल थी | एक समर प्रोजेक्ट से ज्यादा उसकी अहमियत थी भी नहीं | 45 अफसरों को उम्र कैद की सजा सुनाई गयी, ऐसे जैसे बच्चों के झुण्ड को टॉफी बांटी जाती है | उनका सिर्फ एक ही वजूद था कि वो नाज़ी जर्मनी के अफसर थे| सजा सुनाने के बाद जज ने कहा "न्याय में देर करना, न्याय नहीं करना है |"

1950, एल और मैं एक दूसरे के लिए समर्पित थे | एक शाम हम हाथ थाम कर डौन गिओवानी के विओलिन कंसर्ट से आ रहे थे | तभी मैंने देखा कि लेन के आखिरी छोर पर एक साया खड़ा है, उसके हाथ में रिवोल्वर देख कर हम ठिठक गए | वो हमारे करीब आया, लैम्पपोस्ट की हलकी सी रौशनी उसके चेहरे पर पड़ी | इस चेहरे को मैं पहले से पहचानता था, अचानक एल मेरे सामने आ गयी, "प्लीज़, नो! नो!" एल की चिंता मैं समझ सकता था, वो मेरे लिए चिंतित थी ...लेकिन ...लेकिन एल नहीं पहचान सकी थी उसे शायद | उफ़, कितना खतरनाक हो गया था वो | दांयी आँख के नीचे गहरा जख्म का निशान अब सिर्फ क्रूरता ही प्रदर्शित कर रहा था | उसने एक नजर मुझे देखा, फिर एल को, फिर किसी उहापोह में वो थोडा आगे आया | अचानक मुड़कर एक दिशा में अँधेरे में घुल गया | एल की आँखों में अब भी डर समाया था | उसे सहारा देकर मैं धीरे धीरे चलने लगा | आज, अचानक इतने सालों बाद, मगर क्यों ... मेरा दिमाग सवालों का जवाब नहीं ढूंढ पा रहा था | क्या वो मुझसे मिलने आया था ... क्या वो मुझे मारने आया था ... वो क्यों आया था | कुछ देर बाद मैंने दो पुलिसवालों को भी उसी दिशा में भागते हुए देखा |

1952, एल मेरी दुनिया में ख़ुशी बनकर आई | मैं, एल और हमारी बेटी एन, हर तरह से हँसता खेलता परिवार | एल ने मुझे सहारा दिया, जिसकी मुझे हमेशा से बहुत जरूरत थी | एल का हौसला, उसकी साफगोई, जिंदगी को लेकर सीधा द्रष्टिकोण, समस्याओं का सीधा समाधान खोजने की क्षमता ने मुझे कभी भी टूटने नहीं दिया | वक़्त गुजरता गया, और एल मेरे अपने अस्तित्व के लिए जरूरी होती गयी | इस बीच जॉनी के बारे में खबरे आती रहती थी | वो ल्योन छोड़ चुका था, शायद हर शहर जहाँ उसके होने का जरा भी शक होता वो छोड़ चुका था | कुछ कुछ महीनो में वारदातों की खबर आने पर पता चलता कि जॉनी उस शहर में था | 
"पापा, हिटलर क्या सचमुच बहुत बुरा आदमी था ?" दस साल की एन ने मुझसे पूछा |
"तुम्हें ये सब किसने बताया ?" मैं हैरान था | 
"आपकी पुस्तक 'अ डेविल'स मोकिंग' में मैंने पढ़ा |"
"हाँ माय लव! बहुत बुरा था | लेकिन तुम मेरी ये सब पुस्तक क्यों पढ़ती हो |" 
"ऐसे ही ... आपके समय में तो दुनिया बहुत खतरनाक रही होगी न ?" 
"एन! दुनिया हर दौर में ऐसी ही रहती है | बुराई और अच्छाई का संघर्ष हमेशा ही रहता है |" 
   

1965, मेरी कांच की दुनिया का एक कोना दरक चुका था | मैं अभी भी उसी जगह पर था, पार्क में उसी बेंच पर, जहाँ एल मेरी कमीज़ पर फूल पतियाँ बनाने का शौक पूरा करती थी |  पत्तों की सरसराहट के साथ मैं जागा | मेरे गालों को एल ने छुआ शायद, मैंने झटके से उसका हाथ हटा दिया | वो पत्ता जमीन पर गिर गया | एल कहीं नहीं थी | आखिरी वक़्त में उसने मुझसे कहा - "जॉनी और मैं एक दूसरे को चाहते थे | लेकिन अपनी ही माँ का क़त्ल किया था उसने | उसके बाद उसने गाइअ छोड़ दिया और मैंने उसका इंतज़ार..." सांस टूटने लगी थी, "मुझे लगा था कि मुझे शायद अपने निर्णय का पछतावा होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ ... तुम एक अच्छे पति ही नहीं, मेरे एक अच्छे दोस्त भी साबित हुए | मुझपर इतना विश्वास करने के लिए तुम्हारा शुक्रिया | मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ |" 
मेरी आँखें नम हो चली थी | हवा काफी तेज़ चलने लगी | खिड़की खुली, और एल डायरी के पन्नो की तरह मेरे वजूद में बिखर कर रह गयी | अब वहां पर सिर्फ एक ठंडा अहसास था | जिंदगी में पहली बार मुझे खुद से शिकायत हुई थी , एल मेरा हिस्सा थी |

1975, कोर्टरूम में जॉनी सर झुकाए हुए सारे फैसले सुन रहा था | "जोनाथन रिवेट! क्या आपको कुछ कहना है ?" मैंने पानी का एक घूँट भरा | "मुझे एलेनोर मेलविले से मिलना है | क्या मुझे इजाज़त है ?" जॉनी ने धीमे स्वर में कहा | "इजाज़त है |" मैंने कोर्ट की कार्यवाही स्थगित कर दी | आज जॉनी मेरे घर पर आया है | मेरे घर के आसपास की सुरक्षा बढ़ा दी गयी है | जॉनी पहले भी कई बार भागने के प्रयास कर चुका है | 
"ये हमारी बेटी एन है |" मैंने एन को जॉनी से मिलाया | 
"हाई एन! क्या आप मुझे जानती है ?" जॉनी ने पूछा | 
एन के चेहरे पर असमंजस के भाव थे, अजनबी लोगों से मिलना एल को बिलकुल पसंद नहीं है | 
"एन एक क्राइम रिपोर्टर बनना चाहती है |" मैंने कहा | 
जॉनी मुस्कुराया, "तब तो मुझे जरूर जानती होंगी |" 
"एन! ये मेरे और तुम्हारी माँ के बचपन के दोस्त जोनाथन रिवेट हैं |" मैंने एन का परिचय जॉनी से करवाया | 
"ली टिरेयर !" एन ने मुस्कुराकर कहा | "माँ ने एक-दो बार कहा था आपके बारे में |"
"तुम्हारा चेहरा बिलकुल एल पर गया है, लेकिन थोड़ी देर पहले का गुस्से भरा चेहरा अपने पापा पर |" जॉनी ने कहा और एन हँस पड़ी | एल मेरी आँखों के सामने आ गयी और नजरें कब पिघलकर पलकों से लड़ने लगी , पता ही नहीं चला | आँख बन्द कर मैंने एल को बह जाने दिया | 
"शाम को यहाँ हवा काफी तेज़ हो जाती है |" मैंने जॉनी को अपना कोट दिया | हम दोनों साथ साथ चलने लगे | ठंडी हवाएं चलने लगी थी, हम पार्क में ही उस बेंच पर बैठ गए जहाँ ... "तुम और एले यहाँ बैठते हो ?" जॉनी ने पूछा | 
"अब नहीं" मैंने छोटा सा जवाब दिया | 

"मुझे पता है कि तुम अपनी माँ की मौत के लिए जिम्मेदार नहीं हो |" वक़्त ये सवाल काफी पीछे छोड़ चुका था, लेकिन फिर भी ये पूछना मुझे जरूरी लगा | "मेरी माँ बहुत हिम्मती और बहादुर औरत थी |" जॉनी की आँखें क्षितिज के पार देख रही थी | "तुम जानते हो कि मेरे पिता अचानक गायब हो गए थे | बेंजामिन रिवेट, एक किसान ... किसी की क्या दुश्मनी हो सकती थी उनसे ?  डौन अल्ताबेलो का विरोध करते  हुए उन्हें अपनी जान गवानी पड़ी थी | यहाँ बन्दूक की नली रखी थी उनके |" जॉनी ने अपनी आँखों की तरफ इशारा किया | "और एक झटके में आँखे सर को फाड़कर बाहर आ गयी थी | ये सब हुआ था, ग़ाइअ शहर के क़ानून-रक्षक के सामने ... तुम्हारे पिता के सामने |" उसने मेरी तरफ देखा | मेरे जबड़े भिंच गए थे | "गाइअ ने मेरी माँ के बारे में वो सब कुछ कहा जो वो कह सकते थे | वो बेचारी सब कुछ सहती रही | हर रोज़ डौन हमारे घर आता था , और मैं माँ को बेबस देखता था | सिर्फ मेरी खातिर , डौन की इच्छाओं को पूरा करना उसकी मजबूरी बन गयी थी | डौन ने धमकी दी थी कि वो मुझे भी वैसे ही मार डालेगा जैसे मेरे पिता को |" 
सूरज डूब रहा था | नीला आसमान सांझ के हलके पीली रौशनी में और भी अकेला लगने लगा था | "तो क्या डोंन ने स्टेला को मारा ?" मेरा सवाल मेरे हलक में कांटे सा चुभता रहा | "एक रात जब डौन नशे में धुत्त माँ के साथ था, तो माँ ने घर को आग लगा दी | उस शाम मैंने गाइअ छोड़ दिया | हॉट गेट्स से मैंने एक बार मुड़कर देखा था, माँ का बदला पूरा हो गया था |" जॉनी ये सब कुछ इस सहजता से कह गया जैसे कुछ हुआ ही न हो | 
"क्या तुम्हें पता था कि ऐसा होने वाला है ? तुम्हारी माँ खुद भी तो ..." मैंने फिर से पूछा | "क्या एल ये सब जानती थी ?" 
मेरा सवाल एक पल को उसे भी चौंका गया | "एल के पिता जीन-पट्रित मेलविले ये सब जानते थे | लेकिन उन्होंने किसी को कुछ नहीं बताया, एल  को भी नहीं | और वो हमेशा मुझे ही कातिल समझती रही |"
"तुमने एल को कभी खुद क्यों नहीं बताया ?" मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा | 
"एल के परिवार ने मुझे कभी उससे मिलने नहीं दिया, और उस रोज जब मैं उसे ये सब बताने आया था, तो वो तुम्हारे साथ थी | यकीन मानो, मैंने एल को इतना खुश कभी नहीं देखा था | वो मुझसे नफरत करने लगी थी शायद |" और वो ये कहते हुए हँसने लगा |
मुझे उसका ये कहना कुछ कुछ एक व्यंग्य सा लगा | इसलिए बातों को बदलना जरूरी हो गया | "तुम क्या यहाँ से भागने की कोशिश करोगे ?" मैंने उसकी आँखों में देखा | 
"शायद |" वो हँसा |
"तुम जानते हो कि अब तुम्हारे भागने की कोशिश करने पर तुम्हें पकड़ने के बजाय शूट करने का आदेश दिया है |" 
मेरे सवाल का जवाब उसने सवाल से दिया | "क्या अब मैं एल से मिल सकता हूँ ?" 

मैं उसे एल के पास ले गया | 'जॉनी! मैं तुमसे प्यार करती हूँ' एल के आखिरी शब्द थे | एल ने मुझे वादा लिया था कि उसकी कब्र पे यही शब्द लिखे जायेंगे | वो रो पड़ा, पहली बार मैंने जॉनी को रोते हुए देखा था | सजा सुनते वक़्त मुजरिम पूरी तरह से खामोश रहता है, जैसे न्याय को, या अपनी नियति को मुंह चिढ़ा रहे हों | अब शायद उसे उसकी सजा की गंभीरता का अहसास हो गया था | उन बहती आँखों में दुःख था, पश्चाताप था, और थी हताशा | हताशा कि वो कभी एल को नहीं बता पायेगा कि वो निर्दोष था | अँधेरा हो गया था, थोड़ी ही देर में जोंनी को लेकर वो लोग चले जायेंगे | काश, एल  एक बार तुम्हें हकीकत का पता चल जाता | उसके शब्द भावनाओं के घेरे को नहीं तोड़ पा रहे थे | उससे अपने पैरों पर खड़ा नहीं रहा गया | वो घुटनों पर गिर पड़ा | "मैं तुमसे प्यार करता हूँ, एल!" वो बदहवास सा चिल्लाया | मैं भी अपने घुटनों पर बैठ गया- "मैं भी तुमसे प्यार करता हूँ, एल!"

अगली सुबह तीन बजकर पैंतालीस मिनट पर सजायाफ्ता मुजरिम भाग चुका था | इस दुनिया से ...

1975,  पुलित्ज़र प्राइज़ फॉर जनरल नॉन-फिक्शन, फ्रेंकलिन ग्रेटो, 'अ डेविल'स मोकिंग'
हिटलर के तथाकथित आर्यन जाति प्रभुत्व, विस्तारवादी विचारधारा एवं दमनकारी नीतियों का उस समय और उसके पश्चात यूरोपीय समाज पर पड़े प्रभाव को दिखाया है |    
1985, पुलित्ज़र प्राइज़ फॉर जनरल नॉन-फिक्शन, एन फ्रेंकलिन ग्रेटो, 'अ डेविल'स स्नीयर' 
जिसमे उन्होंने हिटलर की जिंदगी के उन पहलुओं पर रिसर्च की है कि कैसे जर्मनी पर प्रथम विश्व युद्ध के बाद लगाये गए प्रतिबंधों ने एक साधारण देशभक्त जर्मन को प्रतिशोध के इस महासमर में खड़ा कर दिया | 

Thursday, December 16, 2010

फेरी वाला

हम ख्वाब बेचते हैं | पता नहीं कितने सालों से | शायद जब से पैदा हुआ यही काम किया, ख्वाब बेचा | दो आने का ख्वाब खरीदा, उसे किसी नुक्कड़ पे खालिश ख्वाब कह के किसी को बेच आये | जब कभी वो शख्स दुबारा मिला तो शिकायत करता, "जनाब पिछली बार का ख्वाब आपका अच्छा नहीं रहा |" अब अपने ख़्वाबों की बुराई किसे बुरी नहीं लगती | तुरंत तमककर बोले, "आज अगर नींद के मोहल्ले में कोई कह दे कि मेरे ख़्वाबों में वो मजा नहीं है, जायेका नहीं है, या फिर तंदुरुस्ती नहीं है, तो सब छोड़ के काशी चला जाऊं |" ख्वाब खरीदने वाला सहम जाता है | इधर नाचीज़ देखता है कि साहब शायद नाराज हो गए, कहीं अगली बार से हमसे ख्वाब खरीदना बंद न कर दें | तुरंत चेहरे का अंदाज बदल कर कहते हैं, "अरे साहब, बाप दादों की कमाई है ये ख्वाब, उनका खून लगा है इस ख्वाब में | अपना होता तो एक बार को सुन लेता, चूं-चां भी न करता | लेकिन खानदान की याद आते ही दिल मसोस कर रह जाता हूँ |" साहब का बिगड़ा अंदाज फिर ठीक हो जाता है | दिल ही दिल में खुद को तस्दीक मिलती होगी कि हाँ अभी भी मैं ही साहब हूँ, क्या हुआ जो कल का लौंडा एक बार बिगड़ गया तो | बाप के नाम पे ही तो जीना होता है कई लोगों का | तुरंत ही गलती से सीख ली और मुआफी मांगने लगा है |


ऐसे ही एक मोहल्ले में आज ख्वाब बेचने आया हूँ | पिछली बार ख्वाब बेचते बेचते यहाँ से एक ख्वाब चुपके से जेब में रख लिया था, आयशा | नहीं, मुहब्बत कह के इस ख्वाब को बदनाम न कीजिये, इसे सिर्फ आयशा ही कहें | दो साल से ऊपर गुजर गए हैं, लोग अब पहचान में नहीं आते | गली के नुक्कड़ पे सियाराम का मंदिर था | पिछली बार रात को वहीँ रहा था, रामेसर पंडा के दालान में | इन दो सालों में मंदिर का निशां मिट गया था | उधर वो मियांजी का छापेखाना आज भी छप रहा है | हर दम सोचता हूँ कि कुछ तालीम ली होती तो शायद कुछ नए ख्वाब खरीद के उन्हें सजा संवार के बाजार में बेच आता, शायद ख्वाब खरीदने का शऊर होता | सुलेमान दर्जी का लड़का पिछली दफे लाहौर भाग गया था | सुना है, उधर कुछ सनीमा में काम भी करने लगा है | बाप को पैसे भी भेजता है | सुलेमान ने पानी पिला के बताया था | ताहिर अली और माहिर अली की तकरार अब इस कदर बढ़ गयी थी कि जमीन के उस टुकड़े पर कोई न रहता था, जिस पर दोनों अदालत के चक्कर काटते हैं | बेग साहब, आज भी लोगो को ईमान, नेकी और मुहब्बत से रहने का, हजरत के बताये रास्ते पर चलने की ताकीद करते हैं | बस अब कुछ ज्यादा ही कमजोर हो गए हैं | सकीना ने फ़य्याज़ से सबके सामने अपना इश्क क़ुबूल किया, तो सारा मोहल्ला दोनों की जान का दुश्मन हो गया था | बेग साहब ने ही दोनों का निकाह मंजूर करवाया |
इन सब के बीच मैंने पूछा, "रामेसर पंडा किधर चले गए ? क्या हिंदुस्तान वापस चले गए ?"
"नहीं, हिंदुस्तान तो नहीं गए, अब किस आसरे हिंदुस्तान जायेंगे | वहां है ही कौन उनका ?"


रामेसर पंडा ने भी मेरे ख्वाब खरीदे थे कि तकसीम के बाद शायद ये गुबार ख़तम हो जायेगा | वो भी अपने बाप दादों के ख्वाबो को जी रहे थे | सियाराम का मंदिर वीराना कैसे छोड़ के जाएँ | इस लोक में जितनी सेवा हो सकती थी उन्होंने की, पर बाप दादों और खुद का परलोक भी उन्हें सुधारना था | किसी तरह से जलजला थमने तक किसी मुसलमान दोस्त के यहाँ रुके | लोगो का, और मेरा भी यही सोचना है कि वो दोस्त बेग साहब ही थे | पंडा जी की एक बेटी थी, आशा | आशा सचमुच पंडा जी की इकलौती आशा थी | माँ के मरने के बाद आजादखयाल लड़की को ख्वाब चुराने में डर ही किसका था | सुहैल से मुहब्बत कर बैठी | बेग साहब का लड़का, सुहैल | बेग साहब इस हरक़त से कतई खुश न थे, लेकिन हारकर मंजूरी देनी पड़ी | मगर कुर्बानी तो पंडा जी ने दी थी, आशा को आयशा मानकर | अब पंडा जी की अगली पीढ़ी का हिंदुस्तान से नाता ही टूट गया था |


पिछली बार यही ख्वाब मैंने आयशा के नाजुक हाथों में दिए थे | ख्वाब देते वक़्त चुपके से उसकी उँगलियों को छू कर मैंने एक छोटा सा ख्वाब अपनी रूह में हमेशा के लिए जज़्ब कर दिया | आँखों में बच्चों सी मस्ती, लाहौल-बिला-कुवत कहती बूढी अम्मायें, और उस पर सुहैल का बार बार उसे देखकर बलिहारी हो जाना, दिल में पहली बार रश्क उठा था किसी के नसीब से | सुहैल एक होनहार नौजवान था | मियांजी के छापेखाने पर काम करता, बाप से अच्छी तालीम तो मिली ही थी, दो-चार अखबारों के लिए लिखता भी था | रामेसर पंडा अभी भी छुआछूत को मानते थे | बेटी जमाई जब घर आते तो बेटी के गले लग के खूब रोते, लेकिन उसके बाद स्नान-ध्यान कर के सियाराम से क्षमा-याचना करते |


"लेकिन पंडा जी गए कहाँ ?" मैंने बेताबी से पूछा | दिल ही दिल में डर रहा था कि कहीं मेरी बेताबी को सुलेमान ताड़ न जाये | लेकिन सुलेमान बीडी फूंकता रहा, फिर धीरे से बोला, "जलजला फिर आया था | पिछली बार बेग साहब ने हिम्मत दिखाई, इस बार सुहैल ने मुहब्बत का फ़र्ज़ अदा किया | जान गँवा दी, लेकिन आयशा और रामेसर पंडा को दूर भेज दिया | जाने कहाँ ?" सुलेमान भी उन्ही लोगो में से था जिन्होंने इस निकाह की खिलाफत की थी | ताहिर अली और माहिर अली ने एक दिन के वास्ते रंजिश भुला दी थी होगी | फ़य्याज़ सबसे आगे-आगे रहा होगा | सुलेमान की आँखों में कहीं कोई ख्वाब नहीं था, बस वो नहीं देख पाया था तो मेरी आँखों से दो नन्हे ख्वाब चूं पड़े | मेरा तो कोई मजहब नहीं था, मेरे बाप ने गाय खा कर हिन्दू धरम से हमेशा के लिए नाता तोड़ लिया था, लेकिन मुसलमान नहीं बना | धरम नहीं रखूँगा, मैंने भी हमेशा बाप के ख्वाब ही बेचे थे |


अल्लाह भी गली गली जाके ख्वाब बेचता है | "खालिश ख्वाब है साहब, जन्नत से सीधे आप ही के वास्ते उतार के लाये हैं | देखो तो सही कैसा है| अरे एक बार लेके तो देखो | अजी चार पैसे न मिलें पर ख्वाब हमारे पाक हाथों में जाएँ, इससे ज्यादा और हमें क्या चाहिए |" कुछ इंसान ख्वाब खरीद लेते है, मजहब उन ख्वाबो को खरीदने वाले को खा जाता है | क्या ये मजहब का तकाज़ा है | वो लोग तो कह भी नहीं पाते, "तुमने पिछली बार नकली ख्वाब, असली कह के हमें थमा दिया था, भाई जान!!!"

सहर की तलाश

 "सो जा लल्ला, सवेरे जल्दी उठके इस्कूल जाना है, न ?" माँ उसके बालों पे हाथ फेरकर उसे सुला रही है | वो सोने की कोशिश करता है, माहौल ने उसे उम्र से ज्यादा समझदार बना दिया है | वो जानता है कि उसका सोना क्यों जरूरी है | वो जानता है कि उसका बाप कहलाने वाला कोई आदमी अभी थोड़ी देर में आएगा, जी भरके उसकी माँ को मारेगा | उस दौरान भी उसे सोते रहना है, कम से कम सोते रहने का नाटक तो करना ही है | माँ जागी रहेगी, मार खाके सो जायेगी | तीनों बहनें एक कोने में चुपचाप सुबकती रहेंगी | सुबह उठकर वो बाप को घर के एक कोने में नाक जमीन में घुसेड़े सोते हुए एक झलक देखेगा | उसे स्कूल छोड़ने के लिए जाने के बाद माँ कुछ घरों में झाड़ू -पोछा करेगी, लोगों के झूठे बर्तन धोएगी | इस दौरान दिन भर वो स्कूल में सारे सपने देखते रहेगा जो माँ ने उसके लिए बनाये हैं | सबसे पहले सवाल हल करेगा, क्योंकि ऐसा माँ ने कहा है | किसी के साथ झगड़े नहीं, क्योंकि ऐसा माँ ने कहा है | हर शाम माँ उससे पूछती है कि वो अच्छा बच्चा है न ? वो सब सीख रहा हैं न जो उसे एक नेक इंसान बनायेंगे | वो गर्दन एक ओर झुकाकर हाँ में जवाब देता, शॉल में लिपटी हुई माँ के टूटे हुए चेहरे की परतें एक हँसी से जुड़ जाती | शाम को माँ एक बड़े से घर में खाना बनाने के लिए जायेगी, उसे भी साथ जाना होगा | वो नहीं जाना चाहता, लेकिन वहाँ कभी कभी अच्छा खाना मिल जाता है | इस घर के कमरों में कभीकभी शोर, और वैसे ही अजीब सी महक आती है जैसे उसके बाप के कपड़ों से | क्या माँ को वहाँ भी उसके बाप का डर लगा रहता है, जो उसे हमेशा साथ लेकर आती है |

आज रात वो सो नहीं सका, आज महीने का आखिरी दिन था | "नहीं , ये पैसे मैं नहीं दूँगी |" "कुतिया, साली ... " शब्द उसके कानों में गूंजते रहे | "कल इस्कूल की फीस... कैसे बाप हो तुम ?" गुर्राहट सिसकियों में तब्दील होने लगी थी | लगातार कुछ टूटने की आवाज आ रही थी, हर आवाज के साथ वो अपनी आँखें मींचता रहा | छन्न... आवाज के साथ कांच टूट गया, बाप ने बोतल ही दे मारी थी | डर गया वो, उठकर बैठ गया | बन्द दरवाजे के झिर्री से बाहर देखा, खून की एक पलती सी लहर माथे पर बह चली थी | क्या, और कब हुआ, कुछ याद नहीं | उसके अपने हाथ में टूटी हुई बोतल का हत्था पाया, बाप की जांघ से खाल उधड़ गयी थी | एक कोने में रेत की तरह भरभराकर गिरी हुई माँ में जाने कहाँ से ये ताक़त आई | "यही सब सिखाया तुझे ? अपने बाप पर हाथ उठाया तूने ?" पहली बार उसने माँ के हाथ से तमाचे खाए थे | वो रोया नहीं, हर तमाचे के साथ माँ के शरीर से शक्ति का संचार उसके शरीर में हो रहा था | माँ फिर से ढह गयी | उसने अपने को देखा, काँच अभी भी कांपते हाथ में ही था, बुरी तरह से डर गया था वो |

"बस कुछ साल बेटे, उसके बाद तो... " अपने दोस्त के कहने पे बरसों बाद कुछ नए ख्वाब देखे उसने | माँ के पुराने टूटे हुए, अच्छा इंसान बनने जैसे सपनों से इतर ये ज्यादा आसान लगे | उसने अपनी जिंदगी का पहला और आखिरी गलत काम किया | घर से पैसे चुराए और उड़ चला वो अपने ख़्वाबों की जमीन तलाशने के लिए | जो कुछ सोचा था, उससे उबड़-खाबड़, पथरीली राहें थी | वो वापस नहीं जाना चाहता था, इसलिए हर वो मुमकिन काम किया जो उसे पैसा दे सके | आसान पैसा बनाने का भी रास्ता था, लेकिन माँ का चेहरा आँखों में आता रहा | शाम को तेज़ तेज़ क़दमों से घर आती माँ | महीने की आखिरी तारीख को पैसे लेती हुई माँ | रात को अक्सर ज्यादा ठण्ड होने पर उसे शॉल ओढाती हुई माँ | हर रात को थककर चूर होने पर हमेशा उसके अन्दर एक जंग छिड़ी होती थी, अच्छा इंसान बनाम बड़ा आदमी | बाप के लिए घिन से ज्यादा कभी कुछ उसके जेहन में नहीं आया | न वो अच्छा इंसान था, न बड़ा आदमी | बड़े घरों के रहस्य उसकी आँखों में खुलने लगे थे | शराब की गंध वहाँ भी थी, खून की कुछ बूंदे उसने वहाँ भी देखी थी कभी |

वो वापस लौट आया था, लेकिन घर जाने की हिम्मत न होती थी | उस रात के बाद उसमे इतना आत्मबल रह ही नहीं गया था कि माँ की नजरों का सामना कर पाता | खबर लेता रहा दूर दूर से सबकी, बहनों को कुछ न कुछ खरीद देता रहता था | बाप उसके जाने के कुछ सालों बाद कहीं चला गया, फिर दुबारा किसी को नहीं दिखा | माँ के मरने की खबर मिली उसे, वो भागता हुआ आया | देहरी पर सारा बचपन फिर से सजीव हो उठा | अन्दर घुसा तो पूरे बदन में झुरझुरी सी दौड़ गयी | माँ के पास बैठा हुआ था उसका बाप | सारी नफरत गले में उमड़कर आ गयी | गिरेबान पकड़कर उठाया उसने अपने बाप को, झंझोड़ना चाहा उसे जिस्म समेटकर | माँ गुज़र गयी थी, आज अपनी नफरत को अंजाम देने का वक़्त था | "अपने बाप पर हाथ उठाया तूने !" माँ अभी भी मरी नहीं थी, उसके अन्दर कहीं अभी भी जिन्दा थी | कांपते हाथो से गिरेबान छोड़ दिया उसने | दूसरी लाश बना उसका बाप धम्म से वहीं बैठ गया | वो अभी भी डरा हुआ था |

वो बहनों को अपने साथ, अपने घर ले आया | ये उसका अपना घर था, अपनी मेहनत से कमाया हुआ | उसका बाप भूत की तरह उस पुराने घर में घूमता रहा | दीवारें हिल गयीं थी, बस छत का ही थोड़ा सहारा था | बड़ा आदमी बनने की धुन उसने अभी भी नहीं छोड़ी थी | मिनट के साठ सेकेण्ड उससे बेहद कम लगते थे | इक शाम ऐसे ही लोगों का मजमा लगा हुआ देखा | "क्या हुआ ?" उसने किसी से पूछा | वो आदमी उछल उछल कर देखने में मशगूल था | उसने हिलाकर पूछा, कोई जवाब नहीं | एक बूढ़ा बोला - "अरे साहब ! फलों की रेहड़ी लगाता है, मेरी दूकान के आगे | अभी सड़क पार कर रहा था तो , गाड़ी से टकरा गयी रेहड़ी | वही लोग मार-पीट कर रहे हैं |" "तुम लोग कुछ बोलते क्यों नहीं ? ये लोग मारते रहेंगे | अगर तुम उसकी जगह पर होते तो ?" गुस्से से दांत पीसने लगा वो | वो बाजुओं में हुई फडकन को महसूस करने लगा | बूढ़े ने सर झुका लिया, जिसने उसके गुस्से में और इजाफा किया | भीड़ को चीरता हुआ वो आगे आया | बचपन का देखा हुआ हिंसक निडर, शाक्त समर्थ इंसान को जमीन चाटते हुए देखा उसने | इंसान इतना कमजोर था, उसे आश्चर्य हुआ | गुस्से का गुबार बैठ गया | बाजुओं में फड़कती हुई मछलियाँ दम तोड़ने लगी | अजीब से सुकून से खुद को नहलाने की नाकाम कोशिशें करने लगा वो | सड़क पर रेहड़ी उलटी पड़ी थी, फल दूर तक बिखर गए थे | इन सब के बीच में उसने देखा वो शॉल, उसके नीचे से झांकती माँ की दो आँखें | वो बार बार कोशिश करता कि उन आँखों से नजरें हटा ले और वो मंजर देखे जिसके लिए वो हमेशा तरसता रहा | एक वो पल जिसने उसका बचपन छीन लिया, क्या ये पल उसका जवाब है ? लाख कोशिशों के बाद भी वो इस सवाल का जवाब नहीं दे सका कि क्या वो खुश है |

उसके बाप को मारने के बाद गन्दी गालियाँ देते हुए, वो लोग चले गए | तमाशबीन भीड़ भी धीरे धीरे छंटने लगी थी | धूल में लिपटे हुए उसके बाप में उठने की ताक़त शायद नहीं बची थी | वो धीरे धीरे आगे बढ़ा | उसने सहारा देकर अपने बाप को उठाया | उलझी हुई दाढ़ी में छिपी हुई दो आँखें थी, बस | उसके बाप ने एक नजर भी नहीं देखा कि उसे उठाने वाला कौन था | चुपचाप उठकर सड़क के एक कोने से झुककर उसने तस्वीर उठाई, जेब के हवाले किया | उसने अपने बाप को शॉल ओढा लिया | रात गहराने लगी थी | आसमान से आँखें अभी भी उसे देख रही थी | बाप को सहारा देकर वो चलने लगा, आहिस्ता आहिस्ता...

Sunday, December 12, 2010

स्वाल (संदेसा)

अबकी बम्बई से कमल की चिट्ठीपत्री कुछ न आयी, तो रामचरण को थोड़ी चिंता हुई | कमल हर तीन मास में एक चिट्ठी तो लिखता, कम से कम | कहीं कुछ हो तो...न न, राम राम ये पापी प्राण भी हमेशा कुछ अपशकुनी ही सोचता है | वैसे भी पिछली चिट्ठी में उसने लिखा था कि यू पी, बिहार के पुरब्यों से है बम्बई वालों को परेशानी, हम पहाड़ियों से थोड़े ही | हमें तो जैसे ही सुनते हैं कि उत्तराखंड से है, तो खुश हो के पूछते हैं, वो रिशिकेस, हरिद्वार वाला ? कभी किसी ने पूछ लिया कि जाति क्या है, और हम बताते हैं सकलानी, ब्रह्मण हैं, गढ़वाली ब्रह्मण | पंडा जी कह कर पैर छूते हैं, आज भी | रामचरण भी बहुत खुश हुआ था चिट्ठी पढ़कर | बरसों पहले पिताजी गए थे परदेस, क्या जगह थी यार वो, काफी जजमानी थी वहां पे पिताजी की | आज तक चिट्ठी भेजते हैं वो लोग | यादों पर काफी जोर डालने पर भी रामचरण को जगह का नाम याद नहीं आया, अलबत्ता ये जरूर याद आ गया कि कमल ने चिट्ठी नहीं भेजी | यहाँ बैठे रहने से तो कुछ होगा नहीं, भागवत के लड़के को पूछ आते हैं | वो भी वहीँ था बम्बई में, आजकल छुट्टी आया हुआ है |

"रमेश!ऐ रमेश!!!" रामचरण ने आँगन से आवाज लगायी | भागवत आँगन में ही था, 'भैजी प्रणाम' के एक छोटे से संबोधन के बाद मुंह फेरकर घाम तापने लगा |
"बडा प्रणाम!" रमेश ने भी द्वार तक आते आते उत्तर दिया "बडा! आओ, भीतर आ जाओ |"
रामचरण ने आगे कदम नहीं बढ़ाया, मन ही मन झुंझलाए भी | ये रमेश हर बार क्यूँ भूल जाता है कि भागवत के साथ मेरी अनबन है | कभी समझता ही नहीं कि भागवत ने जुदा माँगा था | वहीं से बोले, "न बाबा, मैं तो ये पूछने को आया था कि कमल की चिट्ठी नहीं आयी | क्या बात हुई होगी ? ऐसा तो कभी न करता था वो | मंगसीर में आई थी उसकी चिट्ठी | इधर होली आने वाली |" रामचरण ने बोल तो दिया लेकिन मन को अभी और खंगाल रहे थे कि कहीं शायद कुछ था जो मैं घर से सोच के चला था कि पूछूँगा, यहाँ पे आते ही भूल गया |
"बडा! मैं तो दूसरे होटल में काम करता हूँ | फ़ोन फान भी नहीं किया क्या प्रधान चाचा के मोबाइल पे | करना तो चाहिए था, ऐसे ही किसी काम में उलझ गए होंगे भाईजी |" रमेश भी थोड़ा चिंतित हो गया, बोला, "बडा! तुम फिकर न करो, मैं दिन में जाता हूँ लाटा मार्किट | वहां से मैं फ़ोन करता हूँ आसीस को, देवी चाचा का लड़का है मुंबई में, उसको पूछता हूँ |"
रामचरण गदगद हो उठे, "हाँ बेटा, पूछ तो जरा |"
तभी रमेश की घरवाली ने रामचरण के पैरों की धूल माथे ली | "जीती रहो बहु, खूब खुश राख्य चौरंगी" रामचरण ने दुआ दी | रमेश की घरवाली को देखकर उन्हें अपने कमल की बहू का स्मरण हो आया | सुनीता मायके गयी हुयी है, क्या पता वहां फ़ोन या चिट्ठी कुछ किया हो |

रामचरण घर आ गए, पर किसी काम में जी नहीं लगा | "ऐ कमल की माँ| जरा ज्य़ा बना देना थोड़ी |"
जमुना ज्य़ा बना के लाई, "क्या बोला रमेश ने ? क्यूँ नी आरी बल कमल की चिट्ठी |"
रामचरण ने जमुना की तरफ देखा, "दिन में फ़ोन करेगा बल रमेश बम्बई |"
जमुना के सबर का बाँध टूट गया, "ब्वारी को भी एक महिना होने वाला है मैके में | वो भी भली, एक बार गयी तो दुबारा मुड के भी न देखी |" आवाज लगायी, "ऐ परकास! चल नास्ता करके इस्कूल के लिए तयार हो जा |" रामचरण शान्ति से घाम तापने के लिए बैठ गए, पता था कि अब जमुना किसी के रोके रुकने वाली नहीं |
जमुना ने बैट ले जाते प्रकाश को रोका, "चल जल्दी इस्कूल के लिए तयार हो जा, नहीं तो इसी से कूट दूँगी |"
प्रकाश एक पल को सहम गया | लेकिन माँ के इस रूप को पहले भी देख चुका था, इसलिए एक चांस लेते हुए बोला, "माँ, आज ग्यार बजे है इस्कूल, उससे पहले हमारी किलास नहीं है |"
"ज्यादा जबान तो तू चला न, तेरा काल आया है शायद |" जमुना रौद्र हो गयी |
"आँ... जब मैंने भी होटल में ही काम करना है तो बथेरा तो पढ़ लिया मैंने हायस्कूल तक | अब क्या मैंने प्रधान मंत्री..." चट्टाक ...आगे कुछ बोलने से पहले ही जमुना के तमाचे ने उसे खामोश कर दिया, "आज हेरोगिरी सूझ रही है बेटा, जब गाँव में इस्कूल खुल गया| कमल चार गदरा पार करके जाता था इस्कूल पढ़ने |"
बच्चों को वाक्य पूरा करने की भी जिद होती है, अपना लाल हुआ कान थामे प्रकाश बोल ही पड़ा, "हाँ तो कमल कौन सा प्रधान मंत्री बन गया |"

रामचरण के चले जाने के बाद भागवत को घाम काफी अखरने लगा था | अन्दर आकर सुमनी से बोले, "घाम आज काफी चढ़चढ़ाया हुआ है |"
सुमनी समझदार थी, तुरंत ताड़ गयी, "जेठजी आज क्यूँ आये थे ?"
भागवत कुछ खिसियाकर बोले, "अरे वो कमल की चिट्ठी नहीं आई बल तीन मास से |"
सुमनी ने चौरंगी को सुमिरन कर हाथ जोड़ा, सर माथे लगाया, "हे भगवान्! हमारे बच्चों की रक्षा करे |" फिर भागवत से पूछा, "तुमने जेठजी को भीतर क्यूँ नी बुलाया ?"
भागवत सफाई देने लगे, "अरे रमेश ने बोला था, वो आये ही नहीं |
सुमनी ने अविश्वास से भागवत की तरफ देखा, कहना चाहती थी कि तुम बुलाते कि भैजी भीतर आ जाओ तो क्यूँ नी आते, मगर कहा नहीं | "क्यूँ नी भेजी मगर लड़के ने चिट्ठी, अर फ़ोन ही करता कमस कम |" सुमनी ने जैसे खुद से कहा | किसी अनिष्ट की आशंका से उसकी आँख फडकने लगी, जल्दी से देवता के कमरे में जाकर रोने लगी, "हमारा लड़का सही सलामत हो, हे चौरंगी!" कुछ सोचते हुए उसने अपने आंसू पोंछ दिए | रमेश को आवाज दी -"रमेश,ऐ रमेश!"
रमेश महाशय थोड़े आलसी प्रवृत्ति के हैं, जरा देर में जवाब दिया | "बेटा! जा जरा लाटा मार्किट से मिठाई ले आना, ब्वारी के साथ तेरे को अपने ससुराल भी जाना होगा | अर वही से जरा फोन कर देना वो देवी के लड़के को, क्या नाम उसका ...आसीस" सुमनी ने अपनी साड़ी ठीक करते हुए कहा | "माँ, मैं दिन में जाऊँगा | पर तुम कहाँ जा रही हो अभी ?" रमेश ने आँख मीचते हुए पूछा | "मेरे को जाने दे और तू अभी वो कर जो मैंने कहा, जा" सुमनी लगभग चीख उठी|


भागवत की घरवाली, सुमनी आई | रामचरण के पैरों की धूल माथे लेकर बोली, "जी, फ़ोन  नि आया कमल का, हमारा रमेश बता रहा था |" जमुना के पैर छूकर दीदी प्रणाम कहा, "क्या बात हुई होगी दीदी ?"
रामचरण कुछ नहीं बोले | औरतों की बातचीत में आखिर क्या बोले | रामचरण को सुमनी हमेशा दोनों भाइयों में जुदा का कारज लगती है | ये सुमनी की ही बनिक बुद्धि थी जिसने भागवत को उलटी सीधी पट्टी पढाई थी | रामचरण को आज भी याद आता है सुमनी का बोलना, "बड़े है, तो हम हमेशा आदर करेंगे, लेकिन हमारा हक क्यूँ छोड़ दें ?"
रामचरण को अपना बचपन याद आ गया | 10 साल का था रामचरण, 5 साल की राजी और 2 साल का नन्हा भागवत, जब पिताजी भोपाल चले गए थे | अरे हाँ, याद आया, भोपाल थी वो जगह | दो साल बाद, सात साल की राजी को हैजा ने लील लिया | पिताजी भोपाल से नहीं आये | राजी को गदरा में बहाने के बाद कुछ रातें दोनों माँ बेटे ने आँखों में ही काटी थी | भागवत तो इतना छोटा था कि उसे पता ही नहीं कि उसकी दीदी कहाँ गयी | रामचरण को आज भी याद आती है राजी की | धीरे धीरे भागवत राजी की कमी पूरी करने लगा | रामचरण की हर ख़ुशी भागवत की ख़ुशी में ही होती थी | 17 साल का हो गया था रामचरण, तो पिताजी उसे लेकर भोपाल चले आये | यहाँ पर सभी लोग लोग उसे प्यार करते थे | उसे देखते ही पंडित जी का लड़का कहने लगते थे | पिताजी के काम में कुछ मदद भी करने लगा था | विष्णु सहस्रनाम और शिव स्त्रोतम का जाप सीख गया था | कुछ कुछ जन्मपत्री भी लगाने लगा था, मगर फलादेश अभी भी पिताजी ही लिखते थे | कुछ ही दिनों में रामचरण उकता गया | गाँव के बिना उसका जी नहीं लगता था | छोटे भागवत की हमेशा याद आती, तो वापस चला आया | पिताजी अबकी बार भागवत को अपने साथ ले गए | भागवत का मन भी रमा और ऐसा रमा कि भागवत ने खूब सारी जजमानी भी ले ली | इस बीच ७१ की लड़ाई छिड़ी तो रामचरण फौज में भर्ती हो गए | बाद में जब पिताजी भोपाल से आये तो स्वास्थ्य काफी बिगड़ गया था | भागवत ने गाँव में ही नया घर बना लिया | यहीं से सुमनी ने कलह  के बीज बोने शुरू कर दिए | भागवत ने पिताजी की जमीन में भी हिस्सा माँगा, और जुदा हो गया | माँ ने मरते वक़्त भी वादा ले लिया कि कुछ भी हो जाये तू कभी भागवत को किसी भी चीज़ के लिए न नहीं कहेगा | "नहीं माँ, कभी न नहीं कहूँगा |" रामचरण के नयन सजल थे |

भागवत अँधेरे कमरे में बैठे थे | बत्ती जलाने की हिम्मत न पड़ती थी | पता नहीं भैजी के आते ही वो इतने असहाय क्यूँ हो जाते है | न उनसे सही से कुछ बात कर पाते हैं, न ही उसके बाद अपने मन में आये अपराधबोध को हटा पाते है | आज भी उन्हें लगता है जैसे इस बंटवारे का दोष ज़बरदस्ती उन्ही के सर पे मढ़ दिया जाता है | गाँव उनकी तरफ ऐसे ही देखता है, जैसे उन्ही में ऐब रहे हों | अब तो सुमनी भी उन्हें ही कह रही थी कि जी को अन्दर क्यूँ नहीं बुलाया | अरे, यही था तो क्यूँ माँगा था वो मंदिर के पास वाले खेत का हिस्सा | जब एक एक गहने अलग कर रही थी भाभी, तब भैजी ने उनको रोका क्यूँ नहीं | ये हंसुली मेरी, ये बुलाक तेरी, कर्णफूल में लूंगी | अब लो कर्णफूल, ये सब तो रोज़ होगा ही | भैजी प्रणाम कहते हुए एक झलक देखा था उन्होंने रामचरण भैजी को | सुगर की दवाइयां चलती है भैजी की | अपने खलियान से नीचे आते आते तो थक जाते होंगे भैजी, भागवत ने पल भर को सोचा | कभी वो भी दिन था जब भैजी उसे पीठ पे बिठा के महासरताल मेला दिखाने ले गए थे | सुबह से शाम तक चलते रहे भैजी बिना रुके, बीच में उसे पूछते भी रहे कि भूख तो नहीं लगी | उसे याद आया जब उसने चूल्हे अलग करने की बात की थी, भैजी ने कहा था- "तेरे पैर पकड़ने है तो बोल, पर तू ऐसा मत कर भागवत | गाँव में कोई घर भी सुखी नी रह पाया जुदा होके |" 
"जी, सुखी तो गाँव में अब कोई भी नी है | अपनी खेती बाड़ी भी कहाँ रही अब किसी की |" भागवत के कुछ बोलने से पहले ही सुमनी बोल उठी| 
भागवत ने किसी तरह बात संभाली थी- "न भैजी! खेती बाड़ी तो अपने बस की नी है, तभी तो अपने हिस्से के खेत ले के उसे बुवाई पे किसी को दूंगा |" 
रामचरण बस एक गहरा उच्छ्वास लेके रह गए | गहने छांटते हुए भाभी ने ठिठोली की - "सासू जी, तुम भी कुछ ले लो |" माँ कुछ न बोली, गहनों की पोटली इस घर में सालों बाद खुली थी | इतने गहने होने के बावजूद माँ ने सारी जिंदगी गले में एक कांच के दानों की पतली सी माला पहनी थी | गहनों की पोटली को ध्यान से देखा, जाने क्या सोचकर दो कंगन उठाये, सीने से चिमटा के बोली- "ये मेरी राजी के हैं |" और वही पर होश खो बैठी |

अगला दिन चढ़ आया था | रामचरण स्यूरा जाने को तैयार हुए ही थे कि भागवत नज़र आया , "भैजी! सिद्ध तुम्हारी |" 
रामचरण बोले- "कुछ नहीं, कमल के ससुराल जा रहा हूँ कि कहीं वहां तो कोई चिट्ठी न आई | भागवत के अपनी चौखट पे आने पे रामचरण को थोड़ा आश्चर्य भी हुआ- "रमेश ने किया वहां फ़ोन ?" 
भागवत ने कहा, "हाँ भैजी, बोल दिया उसने देवी के लड़के को, अर होटल में काम करता है न वो भी | तो आजकल में उसको बोल दिया कि पता कर आये कि कमल सकलानी किधर रहता है, कमस कम एड्रेस तो ले ही आये |" 
थोड़ी देर की झिझक के बाद अवरुद्ध गले को साफ़ करते हुए भागवत बोले, "भैजी मैं भी चलता हूँ तुम्हारे साथ |" 
भिमा बैंड तक पैदल आते आते रामचरण रस्ते में तीन बार बैठ गए | यहाँ से बस मिलनी थी स्यूरा के लिए | 
"भैजी आजकल दवाई कहाँ से चल रही है तुम्हारी" भागवत ने पूछा | 
"दवाई तो निर्मल हॉस्पिटल का डाकटर है एक, विक्रम अहलुवालिया कि विक्रम सलूजा |" रामचरण को नामों को गड्मड करने की आदत थी| 
"अहलुवालिया होगा| अर वो इटारसी से रामचन्द्र तिवारी की चिट्ठी आई थी| आपकी खोज खबर पूछ रहे थे| उनके बेटे महेशचंद्र ने लिखी थी|" भागवत ने बात आगे बढ़ाई, तो रामचरण के आगे रामचंद्र तिवारी का चेहरा घूम गया| 
"रामचंद्र वही जो लाल साफा पहनते थे हमेशा, सिन्दूर का ही टीका करते थे| हनुमान जी के परम भक्त थे |" 
"हाँ वही वही, आजकल तबियत खराब है उनकी, आखिरी वक़्त है शायद, उम्र भी हो ही गयी है | तो याद कर रहे थे कि कैसे तुमने उन्हें एक दिन शिव पंचाक्षरी सिखाया था | उनके बाद के जीवन में ये बहुत काम आया | लिखा था कि मन ही मन उन्होंने तुमको गुरु मान लिया था |" 
रामचरण के होंठों पर हलकी सी मुस्कराहट आ गयी, जिसे वो भागवत से छिपा नहीं पाए| मन ही मन बुदबुदाये- "गुरु!" 
भागवत भी मुस्कुरा पड़ा- "हाँ, सही में, कई चीज़ों में तो मैं भी तुमको गुरु मानता हूँ | जैसे तुम भागते तो क्या भागते थे, जैसे गोली छूटती हो | किसी के पकड़ में ही नहीं आते थे |"
रामचरण प्यार से बोले- "नहीं छोटे, तब तू मुझे इसलिए नहीं पकड़ पाता था, क्यूंकि तू छोटा था |" 
भागवत ने नजरें झुका लीं- "आज भी कहाँ बड़ा हुआ हूँ भैजी |" 

स्यूरा पहुँचने पर रामचरण ने एकदम से कुछ पूछ लेना उचित न समझा, इसलिए चुपचाप बैठ  गए | स्यूरा वालों के समधी आये हुए थे, तो भागदौड़ शुरू होने लगी | जल्दी जल्दी बच्चों को दूकान पर भेजकर बिस्कुट नमकीन मंगाए गए | इधर दूसरी तरफ, घर के कुछ बुजुर्गो को ताश खेलने से लिवा लाने के लिए बच्चों की दौड़ आयोजित हुई | विजयी बच्चे को पुरस्कार स्वरुप कोफ़ी की टॉफी और दूसरे बच्चों की ईर्ष्या मिलनी थी | रामचरण बैठे बैठे बोर हो रहे थे तो समय बिताने के लिए उन्होंने पास ही में रखा अखबार उठा लिया | अखबार देखते ही उनके पैरों तले जमीन खिसक गयी, टाँगे भारी मालूम होने लगी, और सांस लेना तो जैसे भूल ही गए | मुख्य शीर्षक 'होटल ताज पर आतंकी हमला' बस इससे आगे वो कुछ नहीं पढ़ पाए | आँखों के आगे अँधेरा छा गया, कल सुबह का अपशकुन फिर से कानों में सांय सांय करने लगा | कुछ नहीं कहा, किसी से कुछ नहीं पूछा | चुपचाप बुत की तरह वहां पर बैठे रहे | बहू ने चरणों की धूल माथे लगायी लेकिन उसकी तरफ देखा तक नहीं | ६ साल के सुधीर को बस देख कर घूरते रहे | मासूम सुधीर दादा की जेब चेक कर रहा था कि दादा उसके लिए कुछ लाये होंगे | वो हर एक जेब चेक कर रहा था और गुस्सा होता जा रहा था, आखिर में रो ही पड़ा | 

किसी तरह से बेसुध से घर आये | भागवत को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था, आखिर भैजी ने वहां जाकर कुछ पूछा क्यूँ नहीं | घर आये तो रमेश, सुमनी भी चौके में ही बैठे थे | जमुना एक कोने में रुआंसी हो रही थी | रामचरण ने एक नज़र जमुना की तरफ देखा, जमुना ने कुछ डरते हुए एक कागज़ उनकी तरफ बढ़ा दिया |
आदरणीय पिताजी अवं माताजी,
सर झुका कर दंडवत प्रणाम, सर्वप्रथम शरीर स्वस्थ तदनंतर अन्य कारज होंगे जी | मैं यहाँ पर आपकी कृपा से और चौरंगी देवता के आशीर्वाद से कुशल हूँ, और सदा आपकी कुशलता की कामना करता हूँ |
पिताजी, मैंने एक नए होटल में जॉब चेंज कर ली है | अब मैं होटल वसंत में आ गया हूँ | मुझे पूरे पन्दरह हजार रूपये मिलते हैं | पिताजी मैं चाहता हूँ कि आपकी जमीन में जो मेरा हिस्सा हो वो आप बेच दें और उतने हिस्से के रूपये मुझे दे दे, फिर मैं सुनीता और सुधीर को भी यही मुंबई ले आऊंगा | मैं आपको पहले की तरह ही मनी औडर भेजता रहूँगा |
आपका आज्ञाकारी पुत्र,
कमल सकलानी
रामचरण ने राहत की सांस ली | "कहाँ से आया ये पत्र" रामचरण ने पूछा|
"जी, मैं डाकघर गयी थी| वहां पता चला कि आजकल पिन कोड बदल रहे हैं, इसलिए चिट्ठियां भेजने में थोड़ा दिक्कत आ रही है" सुमनी बोली|
रामचरण ने सुमनी की बुद्धिमता को मन ही मन सराहा| जमुना हैरान सी आई- "अब क्या करें, लड़के ने तो बंटवारे की बात लिखी है| अर तब पता नहीं भेजता है मनी औडर कि नहीं| क्या करना है अब ?"
"करना क्या है, शाम को परकास को स्यूरा भेज के बहू को बोलना कि सामन वामन रेडी रखे और यहाँ आ जाये, कमल आके उसको ले जाएगा |" रामचरण के आंसू छलकने को होने ही आये थे, "अर भागवत!"
बंटवारे की बात आते ही भागवत एक कोने में सर झुकाए गुनाहगार से खड़े हो गए, "जी!"
"उस जमीन की लिखत पडत करा देना अच्छे से | जरा सही दाम मिल जाएँ तो कमल को घर खरीदने में मुश्कल न होगी |" और रामचरण देवता के कमरे में जाकर चौरंगी की तस्वीर के आगे गिर गए|