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Friday, June 8, 2012

पहाड़, गर्मी, मच्छर और सुबह के नौ बजे जमी हुई रेड वाइन

इस साल पड़ी ऐतिहासिक गर्मी ने जब खाल में पर्याप्त भूसा भर दिया तब जाकर दिल्ली से मित्र आशुतोष बरनवाल ने रानीखेत जाकर दो-एक दिन ठण्ड में काटने का कार्यक्रम तय किया. एक और शानदार मित्र बंटी बख्शी ने रानीखेत से कोई पन्द्रह किलोमीटर दूर मजखाली में अपनी कॉटेज में रहने का निमंत्रण पहले से दिया हुआ था.

इस दफा एक नई बात यह हुई है कि पहाड़ों की हवा में धूल, धुएँ और धुंध का एक स्थाई परदा पड़ा रहता है और हिमालय तो क्या सामने की पहाड़ी तक ठीक से नज़र नहीं आती. रात को सुदूर पहाड़ियों पर जलती हुई लाल बल्बों की माला दरअसल चीड़ के जंगलों में धधकती हुई आग होती है जो उक्त परदे के पीछे एक बड़ी वजह मानी जा सकती है. इस वजह से हमारे इलाके के सारे ग्रीष्मकालीन पर्यटन स्थल अब “तथाकथित” रह गए हैं.

पंखे वगैरह लगाने की बात पहाड़ों पर ज़्यादातर लोगों ने सोची भी नहीं थी सो कॉटेज में पहुँचते ही हम जान गए कि आधी रात तक तो गर्मी से छुटकारा मिलने से रहा. ये अलग बात थी कि यहाँ की गर्मी मैदानों की गर्मी से कहीं फर्क और झेली जाने लायक थी. ऊपर से हम दोनों के कमरों में एक-एक संगीतकार मच्छर भी था. गुडनाईट के असर को पूरी तरह नकारते हुए ये दोनों सज्जन हमारा खून चूसते रहे और भोर होने पर ही चैन आया. कुछेक घंटे सोने के बाद हल्की हल्की गर्मी लगना शुरू हो गयी सो पतली जयपुरी रजाई ओढ़े सोना नामुमकिन था. रसोई में नाश्ते की जुगत चल रही थी और आशुतोष मेरी ही बाट देख रहे थे. दिल्ली से लाई गयी नफीस फ्रेंच रेड वाइन को रास्ते की धूप में गर्म हो जाने की वजह  से पिछली रात से फ्रीजर में रखा दिया गया था. इस बात का विशेष ध्यान धरा जाना था कि उसे सोने से पहले फ्रीज़र से निकाल लिया जाए. पता नहीं थकान थी या जापानी व्हिस्की सुन्तोरी का असर कि मैं इस काम को करना भूल गया. मैं बालकनी में आकर पहली सिगरेट सुलगा ही रहा था कि अपनी मुक्त हंसी हँसते हुए आशुतोष नमूदार हुए.

फ्रीजर में धरी वाइन जम चुकी थी और उसका कॉर्क बिलकुल सटीक अनुशासन के साथ बाकायदा बाहर आ चुका था. अगर कोई पूरे होश में भी उस बोतल को ज़रूरी उपकरणों की मदद से भी खोलता तो इतनी सफाई से इस काम को अंजाम नहीं दे सकता था. लगता था जैसे किसी ने बोतल के भीतर घुसकर पिस्तौल से कॉर्क की कनपटी पर घोड़ा लगाकर “ढिचक्याऊं” कर दिया हो. यह खुला निमंत्रण था. धूप में धरकर वाइन को बाकायदा पिघलाया गया और फिर अंडे परांठे के नाश्ते के साथ एक शर्मीली गौरैया की उत्सुकताभरी उपस्थिति में उसका भोग.

इस दरम्यान भोपाल पहुंचे ज्ञानरंजन जी का फोन आया बरास्ते जनाब राजकुमार केसवानी. और बरेली फोन करके वीरेन डंगवाल साहेब को थोडा जलाया गया. उन्होंने आदतन हमारी वाइन में मक्खियों द्वारा एक नंबर कर देने की बद् दुआ दी.

दिन को मित्र प्रभात मेहरा के घर ठेठ कुमाऊंनी खाने की व्यवस्था पहले ही बनाई जा चुकी थी. एक बोतल बीयर सूतने के उपरान्त कोई तीन बजे खाने का लुत्फ़ उठाया गया. अजगरावस्था पहुँच चुकी थी सो एक लंबा वॉक ज़रूरी था. रानीखेत की लोअर मॉल रोड में टहलना आज भी मेरी निगाह में महानतम कार्यों में से एक है. घने और विविधता भरे जंगल से लबालब इस रास्ते पर कोई डेढ़ सौ साल पुराने यूकेलिप्टस के शानदार पेड़ हैं. नीचे एक तस्वीर में आपको आशुतोष उस से लिपटे नज़र आ रहे हैं और आखिरी फोटू उनके अतिप्रमुदित हो चुकने का सबूत है.

फोटू देखी जाएँ और जो जैसा महसूस करना चाहें करें.






 








Tuesday, June 9, 2009

चोप्ता का मौसम, बंबई का फैशन



एक चिड़िया है, जिसे मैं नहीं देख पाया। सुबह से शाम तक लगातार कोमल सुर में मुझी से कहती है- तुई...तुइतुइ...तुई....तुइतुइ। इतना अंतरंग बोलती थी कि किसी अपरिचित से नाम पूछने का मन नहीं हुआ।

फिर ठिठुरती चांदनी में केदार के ऊपर सूनी सफेदी याद आती है और अदहन के उबाल खाने के पहले की सनसनाहट जो हर दोपहर ढलने के साथ कनपटी पर महसूस होती थी....यानि अब बारिश होने वाली है। ...और जंगल जहां अब भी तनों पर लाइकेन का मखमल बचा हुआ है। हरा अंधेरा है जिसके निर्जनपन में भय और शांति एक दूसरे के कंधों पर हाथ डाले हर दिन लकड़ी बीनने या घास काटने के लिए जाते हैं।

सेत्ताराम...अगड़धत्त भोले ने बुलाया है। ढेरों साधु थे, किसिम-किसिम के जो बताते थे बेरोजगारी और पारिवारिक कलह समकालीन अध्यात्म की दो सबसे बड़ी मल्टीनेशनल फैक्ट्रियां है। किसी वरदान की आशा में उन्हें बूटी का पता बताते इंटर पास नौजवान थे जो एक सिगरेट की साझेदारी के तुरंत बाद यह पूछ कर असहाय कर देते थे कि सर उधर नीचे मुझे कोई जॉब मिल सकता है क्या?

उनकी ज्यादातर बातें भैणचो के कसैलेपन या अविश्वास के खूंट में बंधी मां कसम से शुरू या खत्म होती थीं...वे बुग्यालों में कुदरत के नखरों पर ध्यान दिए बगैर अपनी गाय, भैंसों के पीछे कोई पचास मीटर ऊपर चढ़ते थे और सुस्ताने के लिए लद्द से ढह पड़ते थे। नीचे सड़क पर दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, जयपुर, अहमदाबाद के नंबर प्लेटों वाली प्राइवेट गाड़ियां थीं जिनसे निकले देसी टूरिस्ट बाबू अपने अकड़े पैरों को सीधा करते हुए कांखते थे- वाऊ यहां क्या लाइफ है।

मैं पिछले दस दिन वहीं था। चोप्ता घाटी के दुगलभिट्टा की एक कोठरी में। लिमड़े की सब्जी जिंदगी में पहली बार खाई। देखने में चौलाई और भिंडी जैसा स्वाद। चूल्हे की राख का भभूत पोते मड़ुए की रोटी कोई पंद्रह साल बाद।

मैं अब भी वहीं हूं। जहां मक्कू और ताला के लड़के लड़कियां हाइस्कूल में थर्ड डिवीजन पास होने की खुशी में बधाई देने पर थैंक खू कह कर शरमाए जा रहे हैं। कुछ और देर वहीं रहना चाहता था लेकिन कबाड़खाने के संचालक अशोक ने आज शाम काफी खतरनाक अंदाज में धमकाया इसलिए यह सब लिखना पड़ रहा है।

हां, पूरे दिन में एक बार धारी माता की विनती करती एक बस आती जिस पर लिखा होता था न्यूनतम किराया- पांच रूपए और आपका व्यवहार ही आपका परिचय है। उसमें एक गाना बजता था जिसमें दिल्ली में नई सरकार के गठन का रहस्य छिपा हुआ था-

हाथ न पिलाइ हुसुकि, फूल न पिलाइ रम।
हाथ प्याग निर्दली दिदौन, कच्ची में टरकाया हम।