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Tuesday, July 30, 2013

प्रेमचंद की आत्मकथा’ का एक अंश-

कथासम्राट प्रेमचंद के जन्मदिवस के अवसर पर पहले पढ़िए मदन गोपाल द्वारा लिखित ‘प्रेमचंद की आत्मकथा’ का एक छोटा सा अंश-


मेरा जीवन सपाट, समतल मैदान है; जिसमें कहीं-कहीं गढ़े तो हैं, पर टीलों, पर्वतों घने जंगलों, गहरी घाटियों और खंडहरों का स्थान नहीं है. जो सज्जन पहाड़ों की सैर के शौकीन हैं, उन्हें यहाँ निराशा ही होगी.

जब मेरी उम्र कोई तेरह साल की रही होगी, मैं हिंदी न जानता था. उर्दू के उपन्यास पढ़ने का उन्माद था. मौलाना शरर, पं
. रतननाथ सरशार, मिर्जा रुसबा, मौलवी मुहम्मद अली हरदोई निवासी उस वक्त के सर्वप्रिय उपन्यासकार थे. इनकी रचनाएँ जहाँ मिल जाती थीं, स्कूल की याद भूल जाती थी और पुस्तक समाप्त करके ही दम लेता था.

मेरा विवाह करने के साल बाद ही मेरे पिता परलोक सिधारे. उस समय मैं नौवें दर्जें में पढ़ता था. घर में मेरी स्त्री थी, विमाता थीं, उसके दो बालक थे और आमदनी एक पैसे की नहीं थी. घर में जो कुछ लेई
-पूजीं थीं वह पिताजी की छह महीने की बीमारी और क्रिया-कर्म में खर्च हो चुकी थी और मुझे अरमान था वकील बनने का और एम.. पास करने का. नौकरी उस जमाने में इतनी ही दुष्प्राप्य थी जितनी अब है. दौड़-धूप करके शायद दस-बारह की कोई जगह पा जाता; पर यहाँ तो आगे पढ़ने की धुन थी. गाँव में लोहे की अष्टधातु की वहीं बेड़ियाँ थी और मैं चढ़ना चाहता था पहाड़ पर.

मेरे हर उपन्यास में एक आदर्श चरित्र है, जिसमें मानव दुर्बलताएँ भी हैं और गुण भी; परंतु वह मूलतया आदर्शवादी है.
प्रेमाश्रममें ज्ञानशंकर है, ‘रंगभूमिमें सूरदास, ‘कायाकल्पमें चक्रधर...मेरी राय है, मेरी कृतियों में सबसे अच्छी रंगभूमिहै.....अधिकांश चरित्र वास्तविक जीवन से लिए गए हैं, गो उन्हें काफी अच्छी तरह परदे में ढक दिया गया है.

सेवासदनकी फिल्म बनी. उस पर मुझे सात सौ पचास रुपये मिले. अगर इस तंगी में वह रुपए नहीं मिल जाते तो न जाने क्या दशा होती.
.....फिर बंबई की एक फिल्म कंपनी ने बुलाया. वेतन पर नहीं, कॉण्ट्रैक्ट पर आठ हजार रुपए साल. मैं उस अवस्था में पहुँच गया था जब मेरे लिए हाँकरने के सिवा और कोई उपाय नहीं रह गया था.....बंबई गया अजंता सिनेटोन में. यहाँ दुनियाँ दूसरी है; यहाँ की कसौटी दूसरी है.....मैं इस लाइन में यह सोचकर आया था कि मुझे आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र होने का मौका मिलेगा; मैं धोखे में था. 

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पुस्तक की भूमिका में मदन गोपाल लिखते हैं -

यह पुस्तक मुंशी प्रेमचंद के जीवन, उनके लेखन तथा उनके युग की कहानी है. यह कहानी उन्हीं के अपने शब्दों में है. उनकी आत्मकथा है. इसका मूल आधार तो उनका आत्मकथांक जीवन-सारहै, जो फरवरी 1932 में हंसमें प्रकाशित हुआ था. परंतु यह उनके जीवन के पचास वर्षों का विवरण था. इसके पूर्व पाँच-छह वर्षों में प्रेमचंद ने कजाकी’, ‘चोरी’, ‘रामलीला’ ‘गुल्ली-डंडा’ ‘लॉटरीइत्यादि कहानियाँ लिखी थीं; जिसके वे स्वयं नायक हैं. इस तथ्य की पुष्टि उनकी शिवरानी देवी ने अपनी पुस्तक प्रेमचंद : घर मेंकी है. 

प्रेमचंद के परम मित्र जैनेंद्र कुमार जैन ने लिखा है कि स्वयं प्रेमचंदजी ने एक बड़ी दिलचस्प आपबीती सुनाई. एक निरंकुश युवक ने किस प्रकार उन्हें ठगा और किस सहजभाव से वह उसकी ठगाई में आते रहे.....उस चालाक युवक ने प्रेमचंद जी को ऐसा मूँड़ा किकहने की बात नहीं. सीधे-सादे रहनेवाले प्रेमचंदजी के पैसे के बल पर उन्हीं की आँखों के नीचे उस जवान ने ऐसे ऐश किए कि प्रेमचंदजी आँख खुलने पर स्वयं विश्वास न कर सकते थे. प्रेमचंद जी से उसने अपना विवाह करवाया, बहू के लिए जेवर बनवाए-और प्रेमचंद जी सीधे तौर पर सबकुछ करते गए. कहते थे-भई जैनेंद्र सर्राफा को अभी पैसे देने बाकी हैं. उसने जो सोने की चूड़ियाँ बहू के लिए दिलाई थीं उनका पता तो मेरी धर्म पत्नी को भी नहीं है. अब पता देकर अपनी शामत ही बुलाना है. पर देखों न, जैनेंद्र, वह सब फरेब था. वह लड़का ठग निकला. अब ऊपर-ही-ऊपर जो एक दो कहानियों के रुपए पाता हूँ, उससे सर्राफा का देना चुकता करता जाता हूँ. देखना, कहीं घर में कह देना. मुफ्त की आफत मोल लेनी होगी. बेवकूफ बने तो बेवकूफी का दंड भी हमें भरना है.

प्रेमचंद की यह आत्मकथासाहित्य में एक नए प्रकार का प्रयास है. इसकी पृष्ठभूमि के संबंध में कुछ निवेदन आवश्यक है. 

छप्पन वर्ष पूर्व प्रेमचंद के जीवन तथा लेखन पर अंग्रेजी में मेरी एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी. यह किसी भी भाषा में इस विषय पर सर्वप्रथम पुस्तक थी. एक सौ बीस पन्ने की यह पुस्तक प्रेमचंद के निधन के सात साल बाद छपी थी. पुस्तक किसी भी भारतीय भाषाई साहित्यकार पर किसी भारतीय द्वारा अंग्रेजी में लिखी सर्वप्रथम थी. इस पुस्तक की बड़ी चर्चा हुई. अहिंदी क्षेत्रों में ही नहीं, विदेशों में भी साहित्यकार प्रेमचंद को मान्यता मिलने में सहायता मिली. 


जब प्रेमचंद के प्रिय शिष्य जनार्दन प्रसाद झा द्विजने अपनी प्रेमचंद की उपन्यास कलानामक पुस्तक की पहली प्रति उन्हें भेंट की तो वे प्रसन्न हुए और कहा कि मेरे इस संसार से चले जाने के बाद तुम मुझ पर पाँच सौ पृष्ठों की किताब लिखना.’ ‘द्विजके बारे में मुझे अधिक जानकारी नहीं है; परंतु बीस-पच्चीस वर्ष बाद यह काम मैंने और अमृतराय ने किया हमारी प्रेमचंद : कलम का मजदूरऔर कलम का सिपाहीदोनों को ही प्रामाणित जीवनी की मान्यता प्राप्त है. 

मेरी कलम का मजदूरए लिटरेरी बायग्राफीऔर अमृतराय की कलम का सिपाही’-इन तीनों पुस्तकों में प्रेमचंद के उन पत्रों का भरपूर प्रयोग किया गया है, जो मैंने बीस-पच्चीस वर्षों में इकट्ठे किए थे. इन पात्रों में प्रेमचंद के जीवन पर बहुत अच्छा प्रकाश पड़ता है; क्योंकि प्रेमचंद के बारे में, अपने ही शब्दों में (उत्तम पुरुष में) हैं. इनके उद्धरणों का मैंने प्रेमचंद के जीवन से संबंधित कहानियों को जोड़ने के लिए प्रयोग किया है. 

प्रेमचंद की जन्मी-शती के अवसर पर मुझे ध्यान आया था, क्यों न प्रेमचंद के जीवन, लेखन, आदर्शों तथा युग पर एक ऐसा ही प्रयास किया जाए. प्रस्तुत पुस्तक में प्रेमचंद की पंद्रह-सोलह कहानियाँ और उनके पत्रों के विभिन्न उद्धरणों का चयन कर उन्हें एक लड़ी के रूप में प्रस्तुत किया गया है. उद्धरणों के चयन के अलावा मेरा योगदान केवल वे थोड़ी सी पंक्तियाँ हैं, जिन्हें भिन्न टाइप (इटेलिक्स) में दिया गया है. वास्तव मेरा काम मालाकार का है, इससे अधिक कुछ नहीं. बाकी सब प्रेमचंद हैं. 
आशा करता हूँ कि पाठकों को इस पुस्तक पढ़ने में प्रेमचंद की आत्मकथा का रस मिलेगा.

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पुस्तक के शुरुआती अंश ये रहे -

एक

मेरा जन्म संवत 1937 में हुआ. नाम दिया गया धनपत राय. बाप का नाम था मुंशी अजायब लाल. काशी के उत्तर की ओर पांडेपुर के निकट लमही ग्राम का निवासी हूँ. पिता डाकखाने में क्लर्क थे. तबादला भी होता रहता था. बचपन की याद नहीं भूलती. वह कच्चा-टूटा घर, वह पुआल का बिछौना; वह नंगे बदन, नंगे पाँव खेतों में घूमना, आम, के पेड़ों पर चढ़ना-सारी बातें आँखों के सामने फिर रही हैं. चमरौधे जूते पहन कर उस वक्त कितनी खुशी होती थी, ‘फ्लेक्सके बूटों में भी नहीं होती. गरम पनुए रस में जो मजा था वह अब अंगूर, खीर और सोहन हलुआ में भी नहीं मिलता.

मेरी बाल-स्मृतियों में कजाकीएक न मिटने वाला व्यक्ति है. आज चालीस साल गुजर गए, कजाकी की मूर्ति अभी तक आँखों के सामने नाच रही है. मैं उन दिनों अपने पिता के साथ आजमगढ़ की एक तहसील में था. कजाकी जाति का पासी था; बड़ा ही हँसमुख, बड़ा ही साहसी, बड़ा ही जिंदादिल ! वह रोज शाम को डाक का थैला लेकर आता, रात भर रहता और सबेरे डाक लेकर चला जाता. शाम को फिर उधर से डाक लेकर आ जाता. मैं दिन भर एक उद्विग्न दशा में उसकी राह देखा करता ज्यों ही चार बजते, व्याकुल सड़क पर आकर खड़ा हो जाता और थोड़ी देर में कजाकी कंधे पर बल्लम रखे, उसकी झुनझुनी बजाता, दूर से दौड़ता हुआ आता दिखलाई देता. वह साँवले रंग का गठीला, लंबा जवान था.

शरीर साँचे में ऐसा ढला हुआ कि चतुर मूर्तिकार भी उसमें कोई कोई दोष न निकाल सकता. उसकी छोटी-छोटी मूँछें उसके सुडोल चेहरे पर बहुत ही अच्छी मालूम होती थीं. मुझे देखकर वह और तेज दौड़ने लगता. उसकी झुनझुनी और तेजी से बजने लगती और मेरे हृदय में और जोर से खुशी की धड़कन होने लगती. हर्षातिरेक में मैं भी दौड़ पड़ता और एक क्षण में कजाकी का कंधा मेरा सिंहासन बन जाता. वह स्थान मेरी अभिलाषाओं का स्वर्ग था.

स्वर्ग के निवासियों को भी शायद वह आंदोलित आनंद न मिलता होगा जो मुझे कजाकी के विशाल कंधों पर मिलता था. संसार मेरी आँखों में तुच्छ हो जाता और जब कजाकी मुझे कंधे पर लिए हुए दौड़ने लगता तब तो ऐसा मालूम होता मैं हवा के घोड़े पर उड़ा जा रहा हूँ. 

कजाकी डाकखाने में पहुँचता तो पसीने से तर रहता; लेकिन आराम करने की आदत न थी. थैला रखते ही वह हम लोगों को लेकर किसी मैदान में निकल जाता. कभी हमारे साथ खेलता, कभी बिरहे, गाकर सुनाता और कभी कहानियाँ सुनाता. उसे चोरी और डाके, मारपीट, भूत-प्रेत की सैकड़ों कहानियाँ याद थीं. मैं वे कहानियाँ सुनकर विस्मय आनंद मे मग्न हो जाता. उसकी कहानियों के चोर और डाकू सच्चे योद्धा होते थे, जो अमीरों को लूटकर दीन-दुखियों का पालन करते थे. मुझे उनपर घृणा के बदले श्रद्धा होती थी.

एक दिन कजाकी को डाक का थैला लेकर आने में देर हो गई. सूर्यास्त हो गया और वह दिखलाई न दिया. मैं खोया हुआ सा सड़क पर दूर तक आँखें फाड़-फाड़कर देखता था; पर वह परिचित रेखा न दिखलाई पड़ती थी. कान लगाकर सुनता था, ‘झुनझुनकी वह आमोदमय ध्वनि न सुनाई देती थी. प्रकाश के साथ मेरी आशा भी मलिन होती जा रही थी. उधर से किसी को आते देखता तो पूछता-कजाकी आता है ? पर या तो कोई सुनता ही न था या केवल सिर हिला देता था.

सहसा झुनझुन की आवाज कानों में आई. मुझे अँधेरे में चारों ओर भूत ही दिखलाई देते थे; यहाँ तक कि माताजी के कमरे में ताक पर रखी हुई मिठाई भी अँधेरा हो जाने के बाद मेरे लिए त्याज्य हो जाती थी. लेकिन वह आवाज सुनते ही मैं उसकी तरफ जोर से दौड़ा. हाँ, वह कजाकी ही था. उसे देखते ही मेरी विकलता क्रोध में बदल गई. मैं उसे मारने लगा, फिर रूठकर अलग खड़ा हो गया.

कजाकी ने हँसकर कहा, ‘‘मारोगे तो मैं एक चीज लाया हूँ, वह नहीं दूँगा.’’

मैंने साहस करके कहा, ‘‘जाओ, मत देना. मैं लूँगा ही नहीं.’’ 

कजाकी-‘‘अभी दिखा दूँ तो दौड़कर गोद में उठा लोगे.’’ 

मैंने पिघलकर कहा, ‘‘अच्छा, दिखा दो.’’ 

कजाकी-‘‘तो आकर मेरे कंधे पर बैठ जाओ, भाग चलूँ. आज बहुत देर हो गई है बाबूजी बिगड़ रहे होंगे.”

मैंने अकड़ कर कहा, ‘‘पहले दिखा.’’

मेरी विजय हुई. अगर कजाकी को देर का डर न होता और वह एक मिनट भी रुक सकता तो मेरा पासा पलट जाता. उसने कोई चीज दिखलाई जिसे वह एक हाथ से छाती से चिपटाए हुए था. लंबा मुँह था दो आँखें चमक रही थीं. 

मैंने उसे दौड़कर कजाकी की गोद से ले लिया वह हिरन का बच्चा था.

आह ! मेरी उस खुशी का कौन अनुमान करेगा ? तब से कठिन परीक्षाएँ पास कीं, अच्छा पद भी पाया; वह खुशी फिर न हासिल हुई. मैं उसे गोद में लिये, उसके कोमल स्पर्श का आनंद उठाता घर की ओर दौड़ा. कजाकी को आने में क्यों इतनी देर हुई, इसका खयाल ही न रहा. 

मैंने पूछा, ‘‘यह कहाँ मिला कजाकी ?’’

कजाकी-‘‘भैया, यहाँ से थोड़ी दूर पर एक जंगल है. उसमे बहुत से हिरन हैं. मेरा बहुत जी चाहता था कोई बच्चा मिल जाय तो तुम्हें दूँ. आज यह बच्चा हिरनों के झुंड के साथ दिखलाई दिया मैं झुंड की ओर दौड़ा तो सबके सब भागे. यह बच्चा भी भागा. लेकिन मैंने पीछा न छोड़ा. और हिरन तो बहुत दूर निकल गए, यही पीछे रह गया. मैंने इसे पक़ड़ लिया. इसी से इतनी देर हुई.’’ 

यों बाते करते हम दोनों डाकखाने पहुँचे. 

बाबूजी ने मुझे न देखा, हिरन के बच्चे को भी न देखा, कजाकी पर ही उसकी निगाह पड़ी. बिगड़कर बोले, ‘‘आज इतनी देर कहाँ लगाई ? अब थैला लेकर आया है, उसे क्या करूँ ? डाक तो चली गई. बता तूने इतनी देर कहाँ लगाई ?’’ 

कजाकी के मुँह से आवाज निकली. 

बाबूजी ने कहा, ‘‘तुझे शायद अब नौकरी नहीं करनी है. नीच है न, पेट भरा तो मोटा हो गया. जब भूखों मरने लगेगा तो आँखें खुलेंगी.’’ 

कजाकी चुपचाप खड़ा हो रहा. 

बाबूजी का क्रोध और बढ़ा. बोले, ‘‘अच्छा, थैला दे और अपने घर की राह ले. सूअर, अब डाक लेके आया है तेरा क्या बिगड़ेगा ! जहाँ चाहेगा, मजदूरी कर लेगा. माथे तो मेरे जाएगी, जवाब तो मुझसे तलब होगा.’’ 

कजाकी ने रुआसे होकर कहा, ‘‘सरकार अब कभी देर न होगी.’’ 

बाबूजी- ‘‘आज क्यों देर की, इसका जवाब दे ?’’

कजाकी के पास इसका कोई जवाब न था. आश्चर्य तो यह था कि मेरी जवान बंद हो गई. बाबूजी बड़े गुस्सावर थे. उन्हें काम करना पड़ता था, इसी से बात-बात पर झुँझला पड़ते थे. मैं तो उनके सामने कभी जाता ही न था. वह भी मुझे कभी प्यार न करते थे. घर में केवल दो बार घंटे-घंटे भर के लिए भोजन करने आते थे, बाकी सारे दिन दफ्तर में लिखा-पढ़ी करते थे. उन्होंने बार-बार एक सहकारी को लिए अफसरों से विनय की थी; कुछ असर न हुआ था.

यहाँ तक कि तातील (अवकाश) के दिन भी बाबूजी दफ्तर में ही रहते थे. केवल माताजी उनका क्रोध शान्त करना जानती थीं; पर वह दफ्तर में कैसे आतीं. बेचारा कजाकी उसी वक्त मेरे देखते-देखते निकाल दिया गया. उसका बल्लम, चपरास व साफा छीन लिया गया और उसे डाकखाने से निकल जाने की नादिरी हुक्म सुना दिया गया. आह ! उस वक्त मेरा ऐसा जी चाहता था कि मेरे पास सोने की लंका होती तो कजाकी को दे देता और बाबूजी को दिखा देता कि आपके निकाल देने से कजाकी का बाल भी बाँका नहीं हुआ. किसी योद्धा को अपनी तलवार पर जितना घमंड होता है

उतना ही घंमड कजाकी को अपनी चपरास पर था. जब वह चपरास खोलने लगा तो उसके हाथ काँप रहे थे और आँखों से आँसू बह रहे थे. और इस सारे उपद्रव की जड़ वह कोमल वस्तु थी, जो मेरी गोद में मुँह छिपाए ऐसे चैन से बैठी थी कि मानो माता की गोद में हो. 

जब कजाकी चला गया तो मैं धीरे-धीरे उसके पीछे चला.

मेरे घर के द्वार पर आकर कजाकी ने कहा, ‘‘भैया, अब घर जाओ; साँझ हो गई.’’ मैं चुपचाप खड़ा अपने आँसुओं के वेग को सारी शक्ति से दबा रहा था. कजाकी फिर बोला, ‘‘भैया, मैं कहीं बाहर थोड़े ही जा रहा हूँ फिर आऊँगा. फिर और तुम्हें कंधे पर बैठाकर कुदाऊँगा. बाबूजी ने नौकरी ले ली है तो क्या इतना न करने देगे. तुमको छोड़कर मैं कहीं न जाऊँगा, भैया ! जाकर अम्मा से कह दो, कजाकी जाता है. इसका कहा-सुना माफ करें.’’ 


मैं दौड़ा-दौ़ड़ा घर गया; लेकिन अम्माँजी से कुछ कहने के बदले बिलख-बिलखकर रोने लगा.
अम्माँजी रसोई से बाहर निकल कर पूछने लगीं, ‘‘क्या हुआ बेटा ? किसने मारा ? बाबूजी ने कुछ कहा है ? अच्छा, रह तो जाओ. आज घर आते हैं, पूछती हूँ. जब देखो, मेरे लड़के को मारा करते हैं. चुप रहो, बेटा, अब तुम उनके पास कभी मत जाना.’’ 

मैंने बड़ी मुश्किल से आवाज सँभालकर कहा, ‘‘कजाकी...’’ 

अम्मा ने समझा कजाकी ने मारा है. बोली, ‘‘अच्छा आने दो कजाकी को. देखो, खड़े-ख़ड़े निकलवा देती हूँ. हरकारा होकर मेरे राजा बेटा को मारे ! आज ही तो साफा, बल्लम-सब छिनवा लेती हूँ. वाह !’’
मैंने जल्दी से कहा, ‘‘नहीं, कजाकी ने नहीं मारा. बाबूजी ने उसे निकाल दिया उसका साफा, बल्लम छीन लिया; चपरास भी ले ली.’’ 

अम्माँ-‘‘यह तुम्हारे बाबूजी ने बहुत बुरा किया. वह बेचारा अपने काम में इतना चौकस रहता है. फिर भी उसे निकाला ?’’

मैंने कहा, ‘‘आज उसे देर हो गई थी.’’ 

यह कहकर मैंने हिरन के बच्चे को गोद से उतार दिया. घर में उसके भाग जाने का भय नहीं था. अब तक अम्माँजी की निगाह उस पर न पड़ी थी. उसे फुदकते देखकर वह सहसा चौंक पड़ीं और लपककर मेरा हाथ पकड़ लिया कि कहीं यह भयंकर जीव मुझे काट न खाए. मैं कहाँ तो फूटफूटकर रो रहा था और कहाँ अम्माँ की घबराहट देखकर खिलखिलाकर हँस पड़ा.

अम्माँ- ‘‘अरे, यह तो हिरन का बच्चा है. कहाँ मिला ?’’ 

मैंने हिरन के बच्चे का सारा इतिहास और उसका परिणाम आदि से अंत तक कह सुनाया-‘‘अम्माँ, यह इतना तेज भागता था कि दूसरा होता तो पकड़ ही न सकता. सन-सन हवा की तरह उड़ता चला जाता था. कजाकी पाँच-छह घंटे तक इसके पीछे दौड़ता रहा, तब कहीं जाकर यह बच्चा मिला. अम्माजी कजाकी की तरह कोई दुनियाँ भर में नहीं दौड़ सकता. इसीसे तो देर हो गई. इसलिए बाबूजी ने बेचारे को निकाल दिया. चपरास, साफा, बल्लम-सब छीन लिया. अब बेचारा क्या करेगा ? भूखों मर जाएगा.’’

अम्माँ ने पूछा, ‘‘कहाँ है कजाकी ? जरा उसे बुला तो लाओ.’’ 

मैंने कहा, ‘‘बाहर तो खड़ा है. कहता था, अम्माँजी से मेरा कहा-सुना माफ करवा देना.’’ 

अब तक अम्माँजी मेरे वृत्तांत को दिल्लगी समझ रही थीं. शायद वह समझती थीं कि बाबूजी ने कजाकी को डाँटा होगा; लेकिन मेरा अंतिम वाक्य सुनकर संशय हुआ कि सचमुच तो कजाकी बरखास्त नहीं कर दिया गया. बाहर आकर कजाकीपुकारने लगीं. कजाकी का कही पता न था. मैंने बार-बार पुकारा लेकिन कजाकी वहाँ न था.

खाना तो मैंने खा लिया-बच्चे शोक में खाना नहीं छोड़ते, खासकर जब रबड़ी भी सामने हो-मगर बड़ी रात तक पड़े-पड़े सोचता रहा, मेरे पास रुपये होते तो एक लाख कजाकी को देता और कहता बाबूजी से कभी मत बोलना. बेचारा भूखों मर जाएगा. देखूँ, कल आता है कि नहीं. अब क्या करेगा आकर ? मगर आने को तो कह गया है. मैं उसे कल अपने साथ खाना खिलाऊँगा. 

यही हवाई किले बनाते-बनाते मुझे नींद आ गई.

(http://pustak.org से साभार)



Thursday, January 13, 2011

गुरु मन्त्र

कविताओं की काफी बात होती है, लेकिन कहानियों की नहीं | कभी कभी तो मुझे लगता है कि कहानी लिखने वाला रोज़ अपना आधा दिन अपने पात्रों के साथ बिताता होगा, जबकि कविता लिखने वाला पांच मिनट में कुछ चमत्कार सा लिखकर ख़त्म कर देता होगा | कविता के साथ मजेदार बात यह है कि समझ न आने पर वो और महान हो जाती है | इसी से मिलती जुलती बात कहानी के साथ यह है कि पात्रों की ऐसी तैसी कर दो, कहानी बढ़िया हो जायेगी | लेकिन इन सब के बीच हम यह भूल जाते हैं कि जिन लोगों का नाम आज अमर है, उन्होंने बहुत ही साधारण ढंग से लिखा है | प्रेमचंद उसी कड़ी के हैं, उन्हें देख के एक बार आपको भी लगेगा कि अरे , इसमें क्या बात है ये तो मैं भी लिख सकता हूँ | लेकिन वो कहानियां जनमानस की कहानियां हैं, साहित्य का चमत्कार करने की उसमे अपनी तरफ से कोई कोशिश नहीं है | पाठक को अपने साथ बहा ले चलना ही उनका चमत्कार है |





घर के कलह और निमंत्रणों की कमी से पंडित चिंतामणि जी के चित्त में वैराग्य पैदा हुआ और उन्होंने सन्यास ले लिया तो उनके परम मित्र पंडित मोटेराम शास्त्रीजी ने उपदेश दिया - दोस्त, हमारा अच्छे-अच्छे साधू-महात्माओं से सत्संग रहा है | यह जब किसी भलेमानस के दरवाजे पर जाते हैं, तो गिड़गिड़ाकर हाथ नहीं फैलाते और झूठे आशीर्वाद नहीं देने लगते कि 'नारायण तुम्हारा चोला मस्त रखे, तुम हमेशा सुखी रहो |' यह तो भिखारियों का दस्तूर है | संत लोग दरवाजे पर जाते ही कड़क कर हांक लगते हैं, जिससे घर के लोग चौंक पड़ें और उत्सुक होकर द्वार की तरफ दौड़ें | मुझे दो-चार वाणियां मालूम हैं, जो चाहे ग्रहण कर लो | गुदड़ी बाबा कहते थे-'मरें, तो पाँचों मरें |' यह ललकार सुनते ही लोग उनके चरणों पर गिर पड़ते थे | सिद्ध बाबा की हांक बहुत श्रेष्ठ थी- 'खाओ, पियो, चैन करो, पहनो गहना, पर बाबा जी के सोटे से डरते रहना |' नंगा बाबा कहते थे- 'दे तो दे, नहीं दिला दे, खिला दे, पिला दे, सुला दे |' यह जान लो कि तुम्हारा आदर सत्कार बहुत कुछ तुम्हारी हांक के ऊपर है | और क्या कहूँ | भूलना मत | हम और तुम काफी दिनों साथ रहे, अनेकों भोज साथ खाए | जिस नेवते में हम और तुम दोनों पहुंचते थे, लाग-डाट से एक-दो पत्तल और उड़ा ले जाते थे | तुम्हारे बिना अब मेरा रंग नहीं जमेगा, ईश्वर तुम्हें हमेशा सुगन्धित वस्तु दिखाए |
          चिंतामणि को इन वाणियों में एक भी पसंद नहीं आई | बोले- मेरे लिए कोई वाणी सोचो |
          मोटेराम- अच्छा यह बोली कैसी है कि, 'न दोगे तो हम चढ़ बैठेंगे' ?
          चिंतामणि- हाँ , यह मुझे पसंद है | तुम्हारी इजाजत हो तो इसमें काट-छांट करूँ |
          मोटेराम- हाँ, हाँ करो |
          चिंतामणि- अच्छा, तो इस प्रकार रखो- न देगा तो हम चढ़ बैठेंगे |
          मोटेराम- (उछलकर) नारायण जानता है, यह बोली अपने रंग में निराली है | भक्ति ने तुम्हारी अकल को चमका दिया है | भला एक बार ललकार कर कहो तो देखें किस तरह कहते हो |

          चिंतामणि ने दोनों कान उँगलियों से बन्द कर लिए और अपनी ताकत से चिल्लाकर बोले- न देगा तो चढ़ बैठूंगा | यह नाद ऐसा आकाशभेदी था कि मोटेराम भी अचानक चौंक पड़े | चमगादड़ घबराकर पेड़ों पर से उड़ गए, कुत्ते भूंकने लगे |

          मोटेराम- दोस्त, तुम्हारी वाणी सुन कर मेरा तो कलेजा कांप उठा | ऐसी ललकार कहीं सुनने में नहीं आई, तुम सिंह की भांति गरजते हो | वाणी तो निश्चित हो गयी अब कुछ दूसरी बातें बताता हूँ, कान लाकर सुनो | साधुओं की भाषा हमारी बोलचाल से अलग होती है | हम किसी को आप कहते हैं और किसी को तुम | साधु लोग छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, बूढ़े-जवान, सबको तू कह कर बुलाते हैं | माई और बाबा का हमेशा उचित व्यवहार करते रहना | यह भी याद रखो कि सादी हिंदी कभी मत बोलना; नहीं तो मरम खुल जाएगा | टेड़ी हिंदी बोलना; यह कहना कि, 'माई मुझको कुछ खिला दे' साधुजनों की भाषा में ठीक नहीं है | पक्का साधु इसी बात को यों कहेगा- माई मेरे को भोजन करा दे, तेरे को बड़ा धर्म होगा |
          चिंतामणि- दोस्त, हम तेरे को कहां तक जस गावें | तेरे ने मेरे साथ बड़ा उपकार किया है |

          यों उपदेश दे कर मोटेराम चले गए | चिंतामणि जी आगे बढे तो क्या देखते है कि गांजे-भांजे की दूकान के सम्मुख कई जटाधारी महात्मा बैठे हुए गांजे के दम लगा रहे हैं | चिंतामणि को देखते ही एक महात्मा ने अपनी जयकार सुनायी- चल-चल, जल्दी लेके चल नहीं तो अभी करता हूं बेचैन |
          एक दूसरा साधु कड़क कर बोला - अ-रा-रा-रा-धम, आये पहुंचे हम, अब क्या है गम |
          अभी यह कड़ाका आसमान में गूँज ही रहा था कि तीसरे महात्मा ने गरज कर अपनी बोली सुनायी- देस बंगाला, जिसको देखा न भाला, चटपट भर दे प्याला |
         चिंतामणि से अब न रहा गया | उन्होंने भी कड़क कर कहा- नहीं देगा तो चढ़ बैठूंगा |

          इतना सुनते ही साधुजन ने चिंतामणि का सादर अभिवादन किया | तत्क्षण गांजे की चिलम भरी गयी और उसे सुलगाने का काम पंडित जी पर पड़ा | बेचारे बड़े मुसीबत में पड़े | सोचा, अगर चिलम नहीं लेता तो अभी सारी कलई खुल जायेगी | मजबूर होकर चिलम ले ली; किन्तु जिसने कभी गांजा न पिया हो, वह बहुत कोशिश करने पर भी दम नहीं लगा सकता | उन्होंने आंखें बन्द करके अपनी समझ में तो बड़े जोरों से दम मारा | चिलम हाथ से छूटकर गिर पड़ी, आंखें निकल आयीं, मुँह से फिचकुर निकल आया, लेकिन न तो मुँह से धुंए के बादल निकले, न चिलम ही सुलगी | उनका यह कच्चापन उन्हें साधु-समाज से च्युत करने के लिए बहुत था | दो-तीन साधु झल्ला कर आगे बढे और बड़ी बेरहमी से उनका हाथ पकड़ कर उठा लिया |

          एक महात्मा- तेरे को धिक्कार है |
          दूसरे महात्मा- तेरे को लाज नहीं आती ? साधु बना है, मूर्ख ?
          पंडितजी शर्मिंदा होकर समीप के एक हलवाई की दूकान के सामने जा बैठे और साधु समाज ने खंजड़ी बजा-बजा कर यह भजन गाना आरम्भ किया :
          माया है संसार संवलिया, माया है संसार;
          धर्माधर्म सभी कुछ मिथ्या, यही ज्ञान व्यवहार;
                                        संवलिया, माया है संसार |
          गांजे, भंग को वर्जित करते, है उन पर धिक्कार;
                                        संवलिया, माया है संसार |

: प्रेमचंद

Friday, July 31, 2009

हम और हमारे आसपास प्रेमचंद की मौजूदगी

हम लोग उत्सव - धर्मी लोग हैं हर अवसर को उत्सव और समारोह में बदल देने के अभ्यस्त।

आज प्रेमचन्द जयंती है। आप सुविधा के लिए चाहें तो मुंशी प्रेमचंद ,उपन्यास सम्राट प्रेमचंद या कहानी सम्राट प्रेमचंद भी कह सकते हैं और अपने उत्सव- धर्मी मन को बहलाने के लिए आज के दिन कोई गोष्ठी, कोई मीटिंग , कोई रचना पाठ आदि - इत्यादि का आयोजन कर सकते हैं और जैसी की परंपरा है 'उनके बताए रास्ते पर चलने का संकल्प' लेने की बात कर सकते हैं. जयन्तियों पर शायद / अक्सर ऐसा ही होता है. रास्ते बताए जाते हैं और उन पर चलने के संकल्प लिए जाते हैं. चलना तो अगला कदम है क्या हमें सचमुच पता होता है कि 'उनका ' बताया रास्ता क्या है ? कौन - सा है??

प्रेमचंद का बताया रास्ता क्या है ? कौन - सा है??

आज प्रेमचन्द जयंती है। कल शाम को ऐसा लगा कि कुछ लिखना चाहिए और लिखने के वास्ते जरूरी है कि कुछ पढ़ना चाहिए या पुराने पढ़े को गुनना - बुनना चाहिए. बहुत देर तक अपने निजी कबाड़खाने में किताबें ,पत्रिकायें, फाइलें पलटता रहा. 'कबाड़खाना' पर पिछले साल 'इसी अवसर पर लगाई अपनी पोस्ट का अवलोकन भी किया किया और समझ न सका कि ' प्रेमचन्द जयंती के अवसर पर' क्या लिखा जाय! पहले तो सोचा कि किसी किताब का कोई अंश ब्लाग पर लगा ( चेप !) दिया जाय या ' कहानी / उपन्यास कला के तत्वों के आधार पर' उनकी किसी कहानी / उपन्यास का जिक्र कर दिया जाय. अपन भी तो कुछ लिखते -पढ़ते हैं सो 'इस अवसर पर' अपना ही पहले का लिखा और हिन्दी की 'एक महत्वपूर्ण पत्रिका में प्रकाशित' आलेख / निंबंध / शोधालेख / समीक्षा / टिप्पणी को पुन:प्रकाशित कर दिया जाय ताकि सहृदय पाठकों के लाभ हेतु प्रेमचंद के 'व्यक्तित्व और कृतित्व ' पर कुछ प्रकाश पड़ सके ! 'शतरंज के खिलाड़ी' और 'सदगति' कहानियों पर सत्यजित राय द्वारा बनाई गई दो फिल्मों को याद किया और उनके बारे में लिखने की सोची परन्तु सोचता ही रह गया और खाया - पिया , टीवी देखा और सो गया . अपने तईं प्रेमचंद जयन्ती की पूर्वसंध्या पर अपना निजी समारोह ऐसे ही हो गया !

किताबें कुछ कहना चाहती हैं ।क्या हम सुनने को तैयार हैं ? क्या अवकाश है हमारे पास ??

हिन्दी में प्रेमचन्द के ऊपर / बारे में ( उनके द्वारा लिखे गए साहित्य को छोड़ दें तो ) इतना - इतना लिखा गया है कि क्या बतायें कितना लिखा गया है ! इसमें से ढेर सारा सामान तो विश्वविद्यालयों की एम। फिल , पी-एच. डी. आदि उपाधियों के लिए रचित शोध प्रबंध है , विद्यार्थियोपयोगी कुंजियाँ हैं, विद्वान प्राध्यापकों द्वारा समय - समय पर लिखे गए निबन्धों के संग्रह हैं और कुछ आलोचनात्मक पुस्तकें हैं. कुल मिलाकर हमारे पास प्रेमचंद इफरात में हैं और जब से उनकी रचनायें 'फ्री' हुई हैं तब से हिन्दी का लगभग हर प्रकाशक प्रेमचंद साहित्य को छाप - बेच - वितरित कर रहा है फिर भी आइए 'इस अवसर पर' तलाश / पड़ताल करें कि हमारे पास प्रेमचंद की उपस्थिति कितनी और कैसी है?

हमारे आसपास प्रेमचंद की मौजूदगी की मात्रा और परिमाण का प्रमाण क्या है ? कैसा है ?

स्कूल -कालेज के पाठ्यक्रमों में प्रेमचंद मौजूद हैं यह दीगर बात है उन्हें निकालने - हटाने - बदलने की भी कहानियाँ बनती - बिगड़ती रही हैं और इस मुद्दे पर भी खूब विमर्श , बहस , बतकही और झाँय - झाँय हुई है लेकिन क्या ऐसा नही लगता कि पाठ्यक्रमों में प्रेमचंद की मौजूदगी के कारण ( ही !) नई पीढ़ी में प्रेमचंद की मौजूदगी दिखाई दे रही है? हो सकता है यह बात गलत हो और इस 'मौजूदगी' का बायस केवल पाठ्यक्रम मात्र न हो और उन्हें खूब पढ़ा जा रहा हो क्योंकि जब वे खूब छप रहे हैं तो खूब पढ़े भी जा रहे होंगे !!

अभी कुछ देर पहले अखबार आया है जिसमें अवसरानुकूल प्रेमचंद पर कुछ सामग्री है जिसे पढ़ना फिलहाल मुल्तवी कर यह सब ( शायद प्रलाप / एकालाप / बकवास ) लिखने बैठ गया हूँ। बरसों पहले हमारी हिन्दी की किताब में एक निबंध था 'क्या लिखूँ ?' कल शाम से और आज अभी काम पर जाने से पहले अपनी भी हालत यही है कि 'क्या लिखूँ ?' अखबारों में प्रेमचंद जयंती के अवसर पर जो कुछ छपा है उसे पढ़ना है , नहाना - धोना है , काम पर जाना है और लौटती बेर बाजार से कुछ सामान वगैरह भी लाना है और हाँ, शाम को अगर फुरसत मिली तो दो - चार लिखने- पढ़ने वालों को इकठ्ठा कर गोष्ठी आदि करके प्रेमचंद जयंती भी समारोहपूर्वक मनाना है !

बुकशेल्फ में धरीं प्रेमचंद की / प्रेमचंद पर लिखी किताबें काँच की दीवार को चीरकर कुछ कहना चाहती हैं पर अपन को अभी फुरसत नहीं है। हम लोग उत्सव - धर्मी लोग हैं हर अवसर को उत्सव और समारोह में बदल देने के अभ्यस्त !
किन्तु ? परन्तु ?? लेकिन ??? ...........

Thursday, July 31, 2008

प्रेमचंद जयन्ती के अवसर पर - 'प्रेमचंद घर में'




आज से कोई पच्चीस साल पहले जब राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रेमचंद शतवार्षिकी के आयोजन की तैयारियां चल रही थीं तब हमारे 'हिन्दी मास्स्साब' ने एक किस्सा सुनाया था कि जब किसी पत्रकार ने हिन्दी सिनेमा की एक मशहूर अदाकारा से प्रेमचंद के बाबत कुछ पूछा था तो उस स्त्री का प्रतिप्रश्न था -'हू इज प्रेमचण्ड?' पता नही इस खबर में कितनी सत्यता थी या कि यह एक चुटकुला था या फ़िर सिनेमा की दुनिया के प्रति 'हिन्दी वालों' के दुराग्रह का नमूना था लेकिन इससे सवाल तो उठता ही है कि हम अपने लेखकों, कवियों, कलाकारों को कितना जानते है?

प्रेमचंद (३१ जुलाई १८८० - ८ अक्टूबर १९३६) के लेखन विविध आयामों को समझने-बूझने के लिए ढे़र सारी किताबें मौजूद हैं और निरंतर नई छप भी रही हैं लेकिन उनके व्यक्तित्व को समझने की दो जरूरी कुंजियां हैं- एक तो 'कलम का सिपाही' जो उनके बेटे अमृत राय की लिखी हुई है और दूसरी किताब उनकी पत्नी शिवरानी देवी (१८९४ -१९७६) की लिखी 'प्रेमचंद घर में' है. पहली किताब तो आसानी से उपलब्ध है किंतु दूसरी पुस्तक १९४४ मे पहली बार छपी थी और उसका पुनर्प्रकाशन लगभग आधी सदी से अधिक समय गुजर जाने के बाद ही हुआ वह भी प्रेमचंद और शिवरानी देवी के नाती प्रबोध कुमार और संजय भारती के प्रयासों से. शिवरानी देवी अपने समय की चर्चित कहानीकार रही हैं. श्री प्रबोध कुमार अपने संस्मरणात्मक लेख 'नानी अम्मा' में यह खुलासा करते हैं कि उन्होंने अपना लेखकीय नाम 'शिवरानी देवी प्रेमचंद' माना था.

'प्रेमचंद घर में' अपने आप मे एक अनूठी पुस्तक है. इसमे एक पत्नी के नजरिए से उस व्यक्ति को समझने की कोशिश की गई है जो कि एक मशहूर लेखक है किंतु स्वयं को एक मजदूर मानता है- 'कलम का मजदूर'. शिवरानी जी ने बेहद छोटे-छोटे डिटेल्स के माध्यम घर-परिवार , नातेदारी-रिश्तेदारी, लेखन -प्रकाशन की दुनिया में मसरूफ़ प्रेमचंद की एक ऐसी छवि गढ़ी है जो 'देवोपम' नहीं है , न ही वह उनकी 'कहानी सम्राट' और 'उपन्यास सम्राट' की छवि को ग्लैमराइज करती है बल्कि यह तो एक ऐसा 'पति-पत्नी संवाद' है जहां दोनो बराबरी के स्तर पर सवालों से टकराते हैं और उनके जवाब तलाशने की कोशिश मे लगे रहते हैं. यह पुस्तक इसलिये भी / ही महत्वपूर्ण है कि स्त्री के प्रति एक महान लेखक के किताबी नजरिए को नहीं बल्कि उसकी जिन्दगी के 'फ़लसफ़े' को बहुत ही बारीक ,महीन और विष्लेषणात्मक तरीके से पेश करती है. स्त्री विमर्श के इतिहास और आइने में झांकने के लिये यह एक अनिवार्य संदर्भ ग्रंथ है.

आज प्रेमचंद जयन्ती के अवसर पर कोई कहानी, उपन्यास अंश, निबंध,संपादकीय आदि न देकर और न ही प्रेमचंद का जीवन परिचय अथवा उनके द्वारा लिखित तथा अनूदित पुस्तकों की सूची देकर रस्म अदायगी करने की मंशा है और न ही 'उनके बताए रास्ते पर चलने' का संदेश देने का ही मन है अपितु 'प्रेमचंद घर में' पुस्तक का अंश इस इरादे से दिया जा रहा है कि अक्सर ऐसा देखा गया है कि बाहर की दुनिया का 'महान मनुष्य' घर की चहारदीवारी में घुसते ही अपनी महानता का केंचुल उतारकर 'मर्द' के रूप में रूपांतरित हो जाता है. प्रेमचंद ने स्वयं को 'घरे-बाइरे' के इस दुचित्तेपन के खतरे से बाहर कर लिया था ; केवल शब्द में ही नहीं कर्म में भी.



मैं गाती थी, वह रोते थे / शिवरानी देवी

बंबई में एक रात बुखार चढ़ा तो दूसरे दिन भी पांच बजे तक बुखार नहीं उतरा. मैं उनके पास बैठी थी. मैंने भी रात को अकेले होने की वजह से खाना नहीं खाया था. कोई छ: बजे के करीब उनका बुखार उतरा.

आप बोले- क्या तुमने भी अभी तक खाना नहीं खाया?

मैं बोली- खाना तो कल शाम से पका ही नहीं.

आप बोले- अच्छा मेरे लिए थोड़ा दूध गरम करो और थोड़ा हलवा बनाओ. मैं हलवा और दूध तैयार करके लाई. दूध तो खुद पी लिया और बोले- यह हलवा तुम खाओ. जब हम दोनो आदमी खा चुके , मैं पास में बैठी.

आप बोले- कुछ पढ़ करके सुनाओ, वह गाने की किताब उठा लो. मैंने गाने की किताब उठाई. उसमें लड़कियों की शादी का गाना था. मैं गाती थी, वह रोते थे. उसके बाद मैं तो देखती नहीं थी, पढ़ने में लगी थी, आप मुझसे बोले- बंद कर दो, बड़ा दर्दनाक गाना है. लड़कियों का जीवन भी क्या है. कहां बेचारी पैदा हों, और कहां जायेंगी, जहां अपना कोई नहीं है. देखो, यह गाने उन औरतों ने बनाए हैं जो बिल्कुल ही पढ़ी-लिखी ना थीं. आजकल कोई एक कविता लिखता है या कवि लोगों का कवि सम्मेलन होता है, तो जैसे मालूम होता है कि जमीन-आसमान एक कर देना चाहते हैं. इन गाने के बनानेवालियों का नाम भी नहीं है.

मैंने पूछा- यह बनानेवाले थे या बनानेवालियां थीं?

आप बोले- नहीं, पुरुष इतना भावुक नहीं हो सकता कि स्त्रियों के अंदर के दर्द को महसूस कर सके. यह तो स्त्रियों ही के बनाए हुए हैं.स्त्रियों का दर्द स्त्रियां ही जान सकती हैं, और उन्हीं के बनाए यह गाने हैं.

मैं बोली- इन गानों को पढ़ते समय मैं तो ना रोई और आप क्यों रो पड़े?

आप बोले- तुम इसको सरसरी निगाह से पढ़ रही हो, उसके अंदर तक तुमने समझने की कोशिश नहीं की. मेरा खयाल है कि तुमने मेरी बीमारी की वजह से दिलेर बनने कोशिश की है.

मैं बोली- कुछ नहीं, जिन स्त्रियों को आप निरीह समझते हैं, कोई उनमें निरीह नहीं है.अगर हैं निरीह, तो स्त्री-पुरुष दोनो ही हैं.दोनो परिस्थिति के हाथ के खिलौने हैं, जैसी परिस्थिति होती है, उसी तरह दोनो रहते हैं. पुरुषों के ही पास कौन उनके भाई-बंद बैठे रहते हैं, संसार में आकर सब अपनी किस्मत का खेल खेला करते हैं.

आप बोले- जब तुम यह पहलू लेती हो, तो मैं यह कहता हूं, कि दोनो एक दूसरे के माफ़िक अपने-अपने को बनाते हैं, और उसी समय सुखी होते हैं, जब एक-दूसरे के माफ़िक होते हैं. और उसी में सुख-आनंद है.

मगर हां इसके खिलाफ़ दोनो हों, तो उसमें पुरुष की अपेक्षा स्त्री अधिक निरीह हो जाती है.