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Saturday, December 1, 2012

एक अरसे से - किशोर चौधरी की कहानी – २

किशोर चौधरी की कहानी का बाकी हिस्सा -


उसने घर को कभी गौर से देखा ही नहीं था. घर में रखी हुई चीज़ें कैसी दिखती हैऐसे उनको पढ़ा नहीं था. एक रोज़ खिड़की से कोई हवा का झोंका गुज़रा. बस बित्ते भर सी ही खिड़की. इतनी कि अपना चेहरा बाहर निकल सके. उसी में एक पुरानी कीचट से भरी कंघी और मिट्टी के तेल की ढिबरी रखी थी. चीज़ें उतनी ही पुरानी थी, जितनी दूर स्मृतियां दौड़ सकती थी. माँ गारा बनाती और पिताजी उसे सांचे में डाल कर सूखने के लिए छोड़ते जाते. वे ईंटें आहिस्ता-आहिस्ता घर में बदल गई. ये खिड़की तब से ही थी लेकिन पहली बार भीतर खुली थी. इस खिड़की से कोई गुज़र गया था.

एकांत में उपजे शब्दों और कोर्स की किताबों में छपे हुए पाठों का कोई मेल नहीं था. लेकिन दोनों जगहें उसकी दुनिया के लिए जरुरी सामान थी. ये न होती तो उसके पास कोई काम बचता ही नहीं. ये काम भी थे, बेहद नीरस. इनमें कभी मन नहीं लगना था, सो नहीं लगा. मगर इसके बिना वह क्या करताउसके ख़यालों की दुनिया और उलझती ही जाती. इसलिए अच्छा था कि उसके पास एक बस्ता था.

हर इतवार की छुट्टी में घर पर बस्ता खुलता था. इस हफ़्तावार पढ़ाई में कई सारे ख़त जमा हो जाते मगर उन पर लिखने के लिए उसके पास कोई पता नहीं था. अनाम लिखे गए ख़तों के साथ एक नाउम्मीदी जुड़ी रहती कि उनके वापस लौटने का कोई पता नहीं होता. लापता ख़त आवारा बीजों के फाहे थे और अपना ठिकाना भाग्य के सहारे खोज रहे थे. जैसे कि बरसों से बनी हुई इस खिड़की पर उसका ध्यान उसी वक़्त जाना था, जब कोई गुज़रा हो. इस तरह जो छू कर चला जायेउस झोंके को ख़त लिखने की ख्वाहिश होना लाजमी था. 
यूं भी एक दिन सबको अपने ख़त कहीं न कहीं पहुँचाने होते हैं आखिर उन्हें छुपाये रखने का सब्र चुक जाया करता है. स्कूल के दिनों से जमा होते गये ख़तों का भार कॉलेज तक आते आते काफी हो चुका था. उसको भी लगा कि अब ख़तों को एक मुकम्मल पता मिल जायेगा. उसे लगाने लगा कि ये सोलह बार मोड़ कर ताबीज़ जैसे बनाये हुए ख़त, एक दिन कमल की तरह आहिस्ता-आहिस्ता खुलेंगे. खुशबू जो एक अरसे से इन ख़तों में क़ैद हैहवा में बिखर जायेगी. यह उतना ही नैसर्गिक हो सकेगा जितना कि एक बीज का फूल में ढल कर खिल उठाना.

लेकिन खिल कर मिटने के लिए ऐसा वुजूद चाहिएजिसे देखाछुआ और टटोला जा सके. रूह के लिए ये बातें नाकाम थी. इस नाकामी का हल खोजते हुए या इससे उकता कर वह दिन भर अलग-अलग दुकानों के आगे स्टूल पर बैठा रहता.  कभी खुली जगह पर खेल रहे बच्चों को देखने लगता. रात मगर उसे घर तक ले जाती. उसका किसी ने कुछ चुराया नहीं था. उसके पास से कुछ खो नहीं गया था मगर फिर भी नींद जाने किसलिए नहीं आती थी. खिड़की वाले कमरे में रखी हुई ढिबरी के बुझने के बाद रौशनी सिमट कर सो जाती और घास तेल की गंध फेरे लगाती रहती. ये किसकी खुशबू थीदीवारों से उतरती पपड़ी के ज़ख्मों की या फिर ढिबरी की तड़पती हुई रूह की?

किताबें रोकती थीं मगर कहीं कुछ और चीज़ें थीं. जो सूखी घास के आस पास चिंगारियां बनाती रहीछुपे हुए अहसासों को जगाती रहीप्यास को बढाती रही. ऐसी प्यास जो सब हदों को छू लेने को बेताब कर देती है. जहाँ एक स्पर्श आदमी को आग के गोले में बदल देजहाँ आदमी रुई का फाहा बन जायेजहाँ आदमी मिलन के इंतजार में धूप घड़ी हो जाये. जहाँ सब खुशबुएँ एक होकर नामी इत्रफरोशों को नाकाम कर दे. प्यास उसको ऐसे छोर पर पहुंचा देजहाँ से दोज़ख का रास्ता शुरू होता है.

खिड़की से गुज़री लड़कीदोपहर का भेस धर कर रोज़ आया करती. लड़की एक पारदर्शी पंखों वाली तितली की तरह थी. उसके पंखों के आर पार देखते हुए चिलमिलाती धूप आँखों को औचक छू जाती थी. जिस तरह ख़्वाब तामीर होते हैं, उसी तरह ये भी एक दिन सच हो गया कि वह लड़की वास्तव में थी. पहली छुअन के बाद वह इतना जान पाया कि वह गुनगुनी लड़की हमेशा किसी अजनबी देश के बारे में सोचती थी.

उन दोनों ने कब से इस गोदाम में आना शरू किया याद नहीं था. भय के भूत किस तरह उनसे डर कर भाग गए थे और वे किस तरह इतनी जल्दी बड़े हो गए.  ये कभी मालूम न हो सका. बड़े हाल के पीछे एक नीम का दरख़्त था. उसके नीचे पत्थर की बैंच लगी थी. बैंच पर निम्बोलियों की गुठलियाँ पड़ी होती. कुछ एक टूटी हुई पत्तियां या फिर किनारों के आस पास जमा रेत पर लहरें बनी हुई होती. उस जगह मिलन के अल्हड़ दिन बीतने के मामले में बड़े जल्दबाज़ होते थे.   

उसका प्रिय काम था कि लड़की का सर अपनी गोदी में रख का बैठा रहे. ऐसा ही हो सकता था. बीतते हुए दिनों के सिलसिले में किसी रोज़ लड़की के पेट में छिपी कस्तूरी ने करवट ली होगी कि खुशबू फूट पड़ी. धूप और पत्तों की बाज़ीगरी में उसका उसका पेटसाफ पानी की नदी के तलहट में खुले पड़े हुए चमकीले जवाहरातों से भरे चांदी के बक्से सा चमकने लगा. सब चीज़ें एक साथ नहीं मिला करती जैसे नसीब और धैर्य में करीब का रिश्ता होने के बावजूद दोनों एक साथ नहीं आते. 

उनका आने वाला कल एक नन्हीं कोंपल की तरह था जो दिखाई नहीं दिया. एक लम्बे आलाप सा वांछित धैर्य उस लड़की की मुंदती आँखों में खो गया. सांसों के ज्वार में कस्तूरी गंध हिचकोले खाती हुई खो गई. इस दिशाभ्रम में लहरों पर उछलती किस्मत कभी डूबती कभी तैरती हुई होठों को कम्पास बनाये हुए भटकती रही.
उस दिन की दोपहर के बादशाम के अँधेरे का जो विलयन बरसों से उसने देखा थाउसमें कोई नया रंग घुल आया. अब घर की मुंडेर पर बैठे हुए लगता कि वह अकेला नहीं है. कोई उसके पहलू में बैठा हुआ है. वह जानता था कि कोई नहीं है.  ये बस उसके बैठे होने की ख्वाहिश भर है लेकिन फिर भी वह आहिस्ता से देख लेता कि पास में कोई है या नहीं. सूनी मुंडेरसूनी शाम और वही सुस्त शहर की खाली गली में डूबता हुआ सूरज. 

किताबों में लिखे हर्फ़ बेजान हो गए. उनसे एक ऊब जागती रहती थी. वह आधी बुझी हुई आँखों पर किताब को रख लेता. पलकों के पास नम रोयों पर अटकी भीनी गंध उसके आस पास पसर जाती. देह में सैंकड़ों नदियाँ बहते हुए सीने के ठीक पास से फूट पड़ने को दस्तक देने लगतीं. वह आदमी होने से पहले एक ज्वालामुखी में बदलने लगता. यह एक अछूता अनुभव था. खिड़की से गुज़रा हुआ साया सचमुच उसके पहलू में आ जाता और उसके कानों में कहने लगता. “मैं अपने भीतर कुछ खिलता हुआ सा महसूस कर रही हूँ मगर ऐसा क्यों लगता है कि हज़ार तूफानों में उड़ते हुए नश्तर आते हों.

उसी सरकारी बाड़े के बड़े हाल के पीछे वाले नीम की छाँव में सुकून क़ैद था. वहीं  मिलते थे. जिस तरह लोग प्यार के ख़्वाब देखा करते हैं, लड़कियां छोटी छोटी बातों पर रूठने मनाने का खेल खेला करती है,वैसी उन्होंने कभी कोई बात नहीं की थी. वे देर तक चुप बैठे रहते या फिर एक दूसरे के पास सरकते रहते थे. देह की पहचान जिस सिरे पर ख़त्म होती वहीँ पर सब नसें एक साथ फूट पड़ने जैसा कोहराम मचाती रहती. उनको कभी समझ नहीं आया कि वे सिमट रहे होते थे या बिखर रहे. लेकिन यह अद्भुत और अतुलनीय था.

एक दिनवे दिन चले गए. एक दिन सबके दिन चले जाते हैं. अब दिन के हिस्से सुबहदोपहर और शाम में अलग अलग बांटे नहीं जा सकते थे. जाने कितना ही वक़्त हो गया था. अब जीया नहीं जाता था. किताबें फिर भी साथ थी.  उनको पढ़ते हुए अपनी आदत के मुताबिक अपने मुंह पर खोल कर बिछा लेता था. रात के घने अँधेरे में तन्हा लेटे हुएअचानक वह किताब को अपने चहरे से उठा लेता. स्मृतियां जवाब देने लगती. जो याद आ सकता थावह नाकाफ़ी था कि उस किताब के पीले पन्नों पर कई गुलाबी फूल थे. और वे सब कागजी फूल थे. ढिबरी के धुंए की गंधधतूरे के जलने जैसी होने लगती. कुछ भीतर ही भीतर बुझता जाता.

इस सारी बात का इतना सा सच था कि बाँहों से फिसली लड़की उन कुछ एक दिनों के बाद ही सपनों के ससुराल वाले देश की दिशा का अंदाज़ा करते हुए न लौटने के लिए दूर खो थी.

लड़के के पास अब जो बचा थावह थाटूटे ज़र्द पत्तेहर जगहहर पल सांस घुटती हुई और केसरिया झोली वाले बाबा के अनचीन्हे शब्द. वह सोचता रहता था कि कुदरत में ऐसा किस तरह हो सकता है कि भरे हुए कुएं अपने आप छलकने लगते हों.

उसके लिए रात और दिन एक जैसे हो गए थे. सूखे पत्ते उड़े जाते थेशोर था मगर शहर में बसे हुए लोगों की ज़िन्दगी के कारोबार का शोर...  

* * *
बाद बरसों के उसने एक सपना देखा. कोई आवाज़ लगा रहा था कि आज घनी अँधेरी रात है. हाकिमों के हरकारों का कहना है कि सब आदमी बुत की तरह जम जाएंगे. ख़ानाबदोशों को अभी सही जगहों पर इमदाद के लिए पहुँच जाना चाहिए. सब अपनी-अपनी आग को चूल्हों में सहेज लें. कल दुनिया बरफ हो जाएगी.
हर कोई बढ़ते आ रहे घने कोहरे में सीढियों तक पहुँचने में कामयाब हो जाना चाह रहा था. इन सब हाँफते दौड़ते हुये लोगों के बीच अंग्रेजी के माड़साब उसी जगह बैठे शाम का इंतज़ार कर रहे थे. शायद उनके इंतज़ार को मिटाने वाली शाम आने को थी. तीसरे घर वाली औरत ने सिसकियाँ उतार कर एक तरफ रख दी थीं और फटी फटी आँखों से हंस रही थी. मगर दुनिया हांफती हुई भाग रही थी.

वह भी एक अरसे से मुक्त होने के लिए चढ़ता जा रहा था. उसे मालूम था कि सीढियों पार वाले इस घर में एक औरत अपने बाजूबंद से आग को बाँध कर रखती है. नीम की सूखी हुई गुठलियाँटूटे हुए पत्तेकोलतार की गंधऔर सूनी दोपहरें उसी आग में कैद थी.

आवाज़ों की सिम्फनी में यही सुनाई पड़ता था. अग्नि... अग्नि... मदद करो.

सुखा दो इस छलकते हुए कुंए कोसोख लो इस नाभि का अमृततोड़ दो ये पानी का आईना कि इस आईने से टकरा कर सवाल असंख्य हो जाते हैं. वायु तुम थाम लो मुझको अपनी बाहों में कि एक लम्हें में टूट कर ज़मीन पर गिर जाने भय घेरे जा रहा है. जल उठो अमावस के दीयोंजाने क्यों ये अँधेरा घिरा चला आता है. पर्वतों लुढका दो सब पत्थरों को कि उनके शोर में खो जाये सब आवाज़ें कि अब सवाल सुने नहीं जाते... उस फूल की उम्र क्या होगी ? वो रास्ता किस देश को जाता था.

सुबह देर तक सपने की मारफीन में खोये हुए उसे दिखाई देता रहा कि एक अरसे से ढिबरी बुझी पड़ी है. 

Friday, November 30, 2012

एक अरसे से - किशोर चौधरी की कहानी – १



किशोर चौधरी के सद्यःप्रकाशित संग्रह 'चौराहे पर सीढियां' से एक कहानी. इस कहानी की प्रस्तावना के बतौर किशोर चौधरी ने कबाड़खाने के लिए यह एक्सक्लूसिव टिप्पणी भेजी है –

जीवन एक दीर्ध स्वप्न है. अनिश्चित आवृति में टकराती हुई स्मृतियों से बना हुआ स्वप्न. एक बड़े वाला गोल कंचा है, इसके साथ वाले खो गए कंचों की छुअन से भरा हुआ. इसके भीतर भरे हुये पानी की जटिल संरचना के पार देखते हुये रंगों के बिम्ब से सजे अनगढ़ दृश्यों की कामना सरीखा जीवन साथ चलता रहता है. अंधेरे और उजाले के बीच का समय चीज़ों को जिस नए अर्थ से परिभाषित करता है, उसी के सम्मोहन में खोया हुआ. एक बचपन है, जो अपने ही कक्षा के घूर्णन में लगा है. वह समय की छीजत से उम्र को बुन रहा है लेकिन प्रेम के गोदनों का रंग और चुभन गहरी है. एक अबोलापन है, उसी से बनी हुई उदास तस्वीर के व्यापक वितान पर आर्द्र और हठी स्मृतियों का समुच्चय है. यहाँ प्रेम, अभिमन्यु के विपरीत घेरे के भीतर ही लड़ते जाने वाले योद्धा के रूप में है जो कभी बाहर नहीं आना चाहता है. अनेक कुंडलियों के फरेब में एक आदमी है, आग जैसी एक उम्मीद है. जीवन, एक स्त्री के बाजूबंद में बंधी हुई आग है. इसी में प्रेम की पूर्णता है कि वह खोकर और अधिक हृदयस्पर्शी होता जाता है.

कहानी प्रस्तुत है-

एक अरसे से -

जहाँ भी जाताउसे लगता कि मैं यहाँ पहले भी आया हूँ. वह चंद किताबें पढ़ कर पगला गया था. वह सारे दोष किताबों के सर मढ़ कर सो जाना चाहता. किताबों में लिखा था कि पहलू बदल बदल कर सोनामोर पंखों को चुनते हुए उदास रहनामुसाफ़िरखानों में बेवजह बैठनानए दरख्तों की भीनी छाँव को ओढ़नापराई औरतों को एकटुक देखना और ओक से पानी पीते हुए गुलाबी गर्दनों में नीली नसों को चूम लेने की ख्वाहिश रखना अपराध है. तुझे दोज़ख मिलेगा.

उसे एक सुस्त ठहरा हुआ शहर याद आता. पेंटिंग के लिए टंगे हुए केनवास पर जैसे बहुत सारा खाली छूटा हुआ हो. एक लंबा रास्ता जो कहीं खत्म होता हुआ दिखने की जगह विलोप होता हुआ जान पड़े.  एक - दो मुसाफ़िरकोई भूल से गुज़रा तिपहिये वाला या फिर किसी सूखे हुए से दरख़्त की छाँव में बैठा हुआ कोई साया. वह अक्सर छत की मुंडेर पर बैठे हुए पश्चिम को तकते हुए शाम बुझा देता था. कभी तय करता कि आज वह डूबते हुए सूरज को आँखों से ओझल होने तक देखेगा मगर कोई ख़याल आता और उसे अपने साथ लेकर चला जाता था.

माँ कहती थी. ऐसे शाम होने के वक़्त अकेले चुपचाप नहीं बैठना चाहिए. वह प्यार से बुला कर ले जाती. माँ की आँखों में एक डर करवट लेने लगता था. ऐसे अकेले बैठा रहना उदास करता होगा नया उदास होने की वजह से वह अकेला बैठा रहता है. ये दोनों बातें बिलकुल गलत थी. वह किसी सूरत उदास न था.  बस उसे अच्छा लगता था इस तरह सूरज को डूबते हुए देखना और साँझ के झुटपुटे का इंतज़ार करना.

चलते-चलते जिस वक्त रास्ता मुड़ जाता है. अपना ही अक्स कहीं खो जाता हैवही  दोज़ख है. उसी पल बीते लम्हे का वुजूद खोने लगता है. विस्मृत होती गंध हवाओं में बिखर जाती है. स्पर्श के छींटें आहिस्ता से छूटते जाते हैं. सुबहखिली नई कोंपलों को बेसबब देखते हुए किसी को सोचते हैं मगर कोई सूरत ओस के मोतियों से बन कर नहीं खिलती. याद के धुंधले चश्मों पर आलिंगनों की केंचुलियाँसमय की कतरनों को चूमती हुई चमकती रहती है.

ज़िन्दगी की बसावट की भूल भुलैया में रची बसी चीज़ें क्षण भर के लिए सामने होती हैं लेकिन फिर खो जाती हैं. उसके यादखाने में कुछ बहुत साफ़ साफ बसा था. मोहल्ले की तीसरी गली के आखिरी घर में रहने वाले अंग्रेजी के माड़साब भी.  उनके घर के आगे शहर खत्म हो जाता था. एक खुला मैदान शुरू होता और फिर दूर दूर बने हुए कुछ घर थे. उन घरों को देख कर आभास होता था कि यहाँ से कोई गाँव शुरू होता है. अंग्रेजी के माड़साब लंबे और दुबले थे. वे घर के बाहर सिर्फ शाम को ही दिखाई देते थे. उनके बारे में मोहल्ले की औरतों का कहना था कि वे दुपहरी के बाद और शाम होने के बीच वाले वक़्त में खाना बना लिया करते थे.
कुछ ज्यादा सिकी हुई रोटियों की गंध ही उनके खाना बना लिए जाने का संकेत था. यह गंध एक तरह से माड़साब की उपस्थिति को भी बुना करती थी. बंद कमरे पर पड़ा हुआ एक काले रंग का ताला या फिर दरवाज़े के आगे बिखरे हुए एक चुल्लू भर पानी के सिवा माड़साब के पास क्या थाये किसी को मालूम न था. उनके जीवन के बारे में कोई एक राय न थी. कुछ का कहना था कि उन्हें एक लड़की से प्रेम हो गया था और उससे शादी न हो सकी इसलिए अकेले रहते हैं. कई लोगों का ख़याल था कि पत्नी है लेकिन गांव में रहती है. जिस बात पर लोगों को सबसे अधिक यकीन थावो यह बात थी कि बहुत अधिक शराब पीने के कारण पत्नी छोड़ कर चली गयी थी.

लेकिन इन सब बातों के बीच उसे लगता था कि अंग्रेजी के माड़साब को शाम से प्रेम हो गया था. दुनिया में शाम से अधिक सम्मोहक चीज़ कोई नहीं है. दर्द और प्रेम से भीगी हुईबिछड़ने का गाढा रंग लिएइंतज़ार की पोटली जैसा कुछ सर पर उठाये हुएआती हुई शाम.

पिताजी ने जो घर बनाया वह हमेशा चुप्पियों से गूंजता रहता था. इस घर में जाते हुए मौसम कुछ करवटें छोड़ गए थे.  वे करवटें दीवारों से टकराती हुई आँगन में फिरती रहती थी. लोग कहते थे कि बड़ी गलती कीदरवाज़े के ठीक सामने दरवाज़ा बनाया. भागघर के पार हो जायेगा. सौभाग्य को क़ैद करने के लिए जरुरी था कि आर पार दरवाज़े न हों. इस घर में खिड़कियों के सामने खिड़कियाँ थीदरवाज़ों के सामने दरवाज़े थे. कई बार लगता था कि घर बनाने वाला ख़ुद को मुसाफ़िर ही समझता रहा होगा. उसने घड़ी भर की छांव के लिए इस घर को बनाया होगा. आँगन में चिड़ियाएँ उडती ही आती और उड़ती चली जाया करती थी.  जाने किसके भाग का चुग्गा होता था और जाने कौन चुगता फिरता था. सब तरह से अपशकुनी निर्माण के बाद भी इस घर में आशाएं नर्म फरों सी नाज़ुक और आसमान से अधिक चौड़ी थी कि जिस सुबह घर की नीव में पहले पत्थर के नीचे दूब रखी थी तब सही सलामत रही थीजनेऊ.

घड़ी की सुइयां घूमती रही और उसकी शक्ल बदलती गई लेकिन स्मृतियों का लोप नहीं हुआ था. इन स्मृतियों से बाहर आने की छटपटाहट से जो छींटे उछलते उनमे कुछ एक घरकुछ गलियां और रहस्य भरी उदास शामों की धड़कनें बसी हुई थी.

उन सालों में खपरैलों के उड़ जाने जितनी आंधियां नहीं आया करती थी. जितने भी साल बीत गए थेवे सब बेहतर थे. उन सालों की फितरत में सुकून थाअपनापन था और एक ख़ामोशी थी. आज कल जाने क्यों लगता है कि कुदरत बेचैन है.  आंधियां चलने लगती हैतो डर लगने लगता है. आहटें हमेशा खौफ़ का ही साया बुनती हैं. हर पल लगता है कि निकट ही कुछ अनिष्ट मंडरा रहा है. आज बड़ा अबूझ है. अगले पल जाने क्या हो?

जाने कितने ही साल पुरानी पुरानी बात है मगर हर चौमासे के आस पास के दिनों में एक केसरिया झोली वाला फ़कीर आया करता था. एक कटोरी आटे के बदले बसे रहने की दुआ देता. बरसात से पहले के एक छोटे से दिन ड्योढ़ी के आगे छीण पत्थरों से बनी हथाई पर बैठे हुये, उस छोटी काठी वाले बाबा ने ज़रा सी देर के लिए आँखें बंद की. अपने झोले से गिल्टी का एक कटोरा निकाल कर आगे बढाया. "बेटा पानी..." मंगते आते थे लेकिन कोई इतने अधिकार से नहीं बैठता था. उसके माथे के तेज़ से सब खिंचे चले आते.

मोहल्ले की औरतों को यकीन था कि ये बाबा सच्चा है. इसे जरूर दुनिया-जहान की बातें पता हैं. सिर के पल्लू को आहिस्ता सरकाते हुए भविष्य के गर्भ में छुपे हुए सुखों की टोह मेंवे गोल घेरे में चुप खड़ी हो गयी. किनारों पर सलवटों से सजी आँखों से देखते हुए सफ़ेद दाढ़ी वाले बाबा ने कहा- "बेटाकैसे भी कटो ज़िन्दगी कट ही जाएगी." औरतों ने सुख की सांस ली. अपने हाथों के बीच सर पर रखे ओढने के पल्लू को पकड़ा और उन्हें आपस में जोड़ कर अभिवादन किया.

उन औरतों ने घर के कोनों में जाने कितने अहसासों को दबा छुपा रखा था. वे ऐसी धरोहर थी जिनको किसी खास समय, खास व्यक्ति के सामने नितांत गहरे एकांत में ही बांटा जा सकता होगा. जैसे किसी लम्हे में तन्हाई से उपजी कोई पीड़ाकिसी चाहना को मार दिए जाने का दुःख या फिर पहाड़ जैसी लंबी चौड़ी काली रातों का डर. लेकिन वास्तव में ये किसी को मालूम न था कि वे दबी छुपी हुई चीज़ें क्या हैं. हर औरत एक दूसरे को खोल कर पढ़ लेना चाहती थी. उन सबकी एकलौती ख्वाहिश थी कि घर के भीतरखाने में दबी हुई बातों को पढ़ लिया जाये. लेकिन सब औरतें आपस में आँख के इशारे या हल्की मुस्कान से सारे सवालों को चित्त कर दिया करती.

केसरिया झोली वाला बाबा जब आया तब तक झाड़ू बुहारी के साथ सुबह चली गई थी. एक अलसाई हुए दोपहर छपरे के नीचे सो जाने को बाट जोह रही थी. बाबा ने कटोरे में बचे पानी को सर पर बंधी पगड़ी पर डाला और उठते हुए चार घरों से आई पांच औरतों को कहा "मेरे बच्चों जब भी दुःख आयेमन उदास हो और पंछी समय से पहले लौटने लगे तो अपनी रसोई की आग के पास बैठना. उसे तवे से ढकना और गहरे मन से इस आँगन के पंछियों को बुलाना. सब सही सलामत लौट आयेंगे, कुदरत कृपा करेगी..." आशीष सुन कर औरतें कर्ज़दार हो गई थी. वे झुक कर अभिवादन करते हुए कुछ उपकार इसी समय चुका देना चाहती थी.
चाची हाथ पकड़ कर उसको खींच लाई. "इसको कुछ कहो बाबा..."

बाबा ने उसके सर पर हाथ फेरा. बाबा का हाथ एक दम लड्डू जैसा गोल मटोल था.

चाची ने बोलने में जल्दबाज़ औरत की तरह अपनी सारी बातें इस तरह फैंकनी शुरू की जैसे ज़रा सी देर में बाबा देवलोक होने वाले हैं और इससे पहले सही रास्ता पूछ लिया जाये. “बाबा ये किसी से बोलता नहीं है. शाम भर छत की मुंडेर पर बैठा हुआ पश्चिम की ओर देखता रहता है.” चाची ने हड़बड़ी में कहती गयी. "बाबा कुछ बताओ इसके बारे मेंकुछ इसको अपना आशीर्वाद दो...

बाबा ने फिर सर पर हाथ फेरा. "एक जगह छलकता हुआ कुआं देखा थाबेटी उसमें से पानी आप बाहर को उछलता था... कुदरत... कुदरत"

इसके बाद बाबा के जाते कदमों की आवाज़ नहीं सुनाई दी. औरतें अपने-अपने रहस्य का भविष्य बूझे बिना ही वापस लौटने लगी. गली में एक सन्नाटा फिर से गहराने लगा. उसने अंदाज़ लगाया कि घर पहुँचते ही सब औरतें बरसों से छिपा कर रखे हुए अहसासों के सबसे करीब होंगी. वे उन अहसासों से बहुत सारी बातें करेंगी. बाबा चला गया और समय की एक फांक नियम से कट कर एक तरफ गिर गई.

एक ज़िद में सब छूटता गया.

ज़िन्दगी को उसी के सलीके पर छोड़ देने का विचार उसका नहीं था लेकिन हर बार उसके चाहे से कुछ हुआ नहीं. उसने सींची हुई सिसकियों के साथ सब कुछ अपना लिया था. वह कभी अकेला घूमता हुआ दूर निकल जाता था. सूने रस्तों के पार दूर कहीं गाते हुए लोग खेती काटते थे. उन बीजों की ढेरियाँ बनतीगाड़ियों में लादे जाते फिर बोलियाँ लगती और वे एक दिन काम आ जाते. उसने खुद को परिवार का बीज माना और मुलाजिम हो गया. वह एक घर बना लेना चाहता था.  लेकिन घर के नक़्शे में कुछ एक पुराने घर आकर बैठ जाते.

अंग्रेजी वाले माड़साब के घर से तीन घर इधर एक और घर था. बाहर छोटी सी कच्ची दीवार. तन्हा बनी हुई रसोई और उसके आगे थोड़ा दूर बने हुए दो कमरे.  उस घर में एक औरत रात भर सिसकियाँ भरा करती थी. इस आदत के कारण मोहल्ला उससे खफ़ा रहता था. साल भर में एक बार आने वाली उस औरत के आने और जाने का समय तय रहता था. गर्मियों की छुट्टियों के शुरू होने के तीसरे दिन आती और छुट्टियों के खत्म होने के ठीक सात दिन पहले किसी तिपहिया में अपनी दो लड़कियों के साथ वापस जाती हुई दिख जाया करती थी.
साल भर सूना पड़ा रहने वाला घर एक महीने के लिए खुलता और वह भी लोगों की आशंकाओं के साथ कि कुछ बहुत अशुभ होने वाला है. जैसे चाची और माँ डरती थी कि ये लड़का शाम को डूबते हुए देखता है. वैसे ही उस औरत के साल डूबते जा रहे थे. हर शामएक साल जितनी लम्बी आती और सिसकियों के साथ डूब जाती. यह समय की एक बड़ी इकाई थी. इसलिए संभव है कि उसका दुःख भी बहुत बड़ा रहा होगा.
कई सालों बाद भी ऐसे बहुत सारे घरउसके घर बनाने की समझ के आड़े आते रहे.

ऐसे घर जिनके गुसलखानों के छत नहीं हुआ करती थी. वे उन दिनों बने थे जब बच्चों को घरों और पानी के कुओं में झांकना मना था. पल्लू से हाथ मुंह पौंछ कर माएं उनको बाहर धकेल देती थी. घर से बाहर धकेल दिए गए बच्चों के लिए कई नीम के पेड़ थे. वे हमेशा बुलाते रहते. पेड़ों से थोड़ा आगे सरकारी गोदाम का बाड़ा उदास खड़ा रहता था. वहां रात को भूत बीड़ी पिया करते और सुबह होने से पहले बड़े हाल के अँधेरे कोने में छत पर चमगादड़ बन कर उलटे लटक जाया करते थे.  

उस बाड़े में रखे हुये कोलतार के डिब्बों से आने वाली जादुई गंध बच्चो को और अंदर खींचती जाती फिर एकाएक शोर करते हुए बच्चे अपने घरों को भाग जाते.  अकेले किसी के लौटने की हिम्मत नहीं होती थी लेकिन मन होता था. मन मुड़-मुड़ कर देखता. उस बाड़े के सूनेपन को दुआएं देता. बंद मुट्ठी को उल्टा कर के एक फूंक से कोई नाज़ुक बाल उड़ाते हुए कुछ अर्ज़ियाँ आसमान की ओर जाती थीं कि ऐसी सूनी जगहें हमेशा बची रहें.
ये रेगिस्तान सूना ही था. यहाँ हज़ार लोग एक रास्ता बनाते और एक धूल भरी आंधी उस रास्ते को मिटा देती थी.

ऐसी पल भर में खो जाने वाली जगह पर वह होकर भी कहीं नहीं होता था.

(कहानी का टंकित संस्करण और टिप्पणी उपलब्ध कराने के लिए भाई संजय व्यास का हार्दिक धन्यवाद. बाकी का हिस्सा कल)

Friday, December 30, 2011

एक कहानी जो मैं कहना नहीं चाहता

जापान में जन्मे अकिरा कुरोसावा (१९१०-१९९८  दुनिया के  बेहतरीन फिल्मकारों में से एक हैं | सेवेन समुराई, योजिम्बो, कगेमुषा, ड्रीम्स, राशोमोन, रैन उनकी कुछ ऐसी फिल्मों में से हैं जो आज भी देखने वालों पर न खत्म होने वाला प्रभाव छोड़ जाते हैं | हेइगो उनके बड़े भाई और मार्गदर्शक थे | १९३३ में हेइगो ने ख़ुदकुशी कर ली | पचास साल बाद अपनी आत्मकथा 'समथिंग लाइक एन आटोबायोग्राफी' में अकिरा ने इस घटना का जिक्र किया है |


Photo: Akira's persona and Van Gogh in Akira Kurosawa's Dreams

ऐसी कहानी सुनाने के बाद जो मुझे बुरा महसूस कराती हो, मुझे जारी रहना चाहिए और उस बारे में लिखना चाहिए जो मैं दुबारा नहीं देखना चाहूँगा | यह मेरे भाई की मृत्यु से सम्बंधित है | इसके बारे में लिखना मेरे लिए बेहद पीड़ादायी है , लेकिन अगर मैं इस बारे में चर्चा नहीं करूँगा, तो मैं आगे जारी नहीं  रख पाऊंगा | जिंदगी के स्याह पहलुओं की एक झलक देखने के बाद, मुझे अचानक अपने माता-पिता के घर जाने की जरूरत महसूस होने लगी | अब यह साफ़ हो गया था कि आगे से अब सारी विदेशी फ़िल्में बोलने वाली फिल्में होंगी , और उन्हें दिखाने वाले सिनेमाघरों ने एक सार्वभौमिक सा नियम बनाया कि उन्हें अब दृश्य का वर्णन करने वालों की कोई जरुरत नहीं रही | बड़ी संख्या में वर्णनकर्ता निकाले जाने लगे, और, इसे सुनकर, वे लोग हड़ताल पर चले गए | मेरा भाई, जो हड़तालियों का अगुआ बना था, काफी बुरे दौर से गुजर रहा था | मेरे लिए यह सही नहीं था कि लगातार अपने आप को उस पर थोपता रहूँ | मैं घर चला गया | मेरे माता-पिता , जो मेरी पिछली कुछ सालों की मेरी जिंदगी के बारे में कुछ नहीं जानते थे , उन्होंने मेरा स्वागत किया ऐसा जैसे मैं रेखाचित्रों के अध्ययन के लिए दूर गया था | मेरे पिता जैसे सब कुछ जानना चाहते थे कि मैं किस तरह की चित्रकला का अध्ययन कर रहा था , तो मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचा था इसके अलावा कि मैं सच के बारे में चुप ही रहूँ और जहाँ तक हो सके झूठ बोलूं | मेरे पिता की उम्मीदें मुझे एक कलाकार के रूप में देखना, यह देखकर मैंने दुबारा चित्रकार बनने की सोची | मैं दुबारा से रेखाचित्र बनाने लगा, मैं तैलचित्र बनाना चाहता था | लेकिन घर का खर्चा मेरी बड़ी बहन उठा रही थी, जिसने मोरिमुरा गकुएँ के एक अध्यापक से विवाह किया था | मैं उनसे रंग और कैनवस नहीं मांग सकता था | इसलिए मैंने रेखाचित्र बनाये |

इन सबके बीच, एक दिन हमने मेरे भाई के आत्महत्या की कोशिश के बारे में सुना | मुझे यकीन था कि इसकी वजह उसकी हडताली वर्णनकर्ताओं के मुखिया बनने की दर्दनाक स्थिति थी, जो असफल रही थी | मेरे भाई ने यह सोचकर इस्तीफा दे दिया था कि जब फिल्म तकनीक इतनी विकसित हो चुकी है कि अब फिल्मों में आवाज भी शामिल की जाने लगी है, तो वर्णनकर्ताओं की जरूरत नहीं रह जायेगी | जबकि वह जानता था कि वह हारी हुई लड़ाई लड़ रहा है, उसके लिए उनका अगुआ बनना बयान करने की हद से भी तकलीफदेह रहा होगा | मेरे भाई की अपनी जिंदगी की पीड़ा को एक बार में खत्म कर देने की कोशिश ने पूरे घर पर फिर से दुःख का ग्रहण ला दिया | मैं किसी भी तरह से कोई खुशी का बहाना ढूँढना चाहता था जिससे एकबारगी सबका ध्यान कहीं और जाए | तो मुझे एक विचार आया कि अपने भाई की शादी उस औरत से करवा दूँ जिसके साथ वह रह रहा था | मैं लगभग एक साल तक उसके जासूसी सा करता रहा, और उसके चरित्र में कुछ संदेहास्पद मुझे नहीं मिला , बल्कि मैं उससे ऐसे व्यवहार करने लगा जैसे वह वास्तव में मेरी भाभी ही हो | मुझे लगने लगा जैसे उनके रिश्ते को एक औपचारिक जामा पहनाने का काम मेरा नैसर्गिक भूमिका हो जो मुझे अदा करनी ही है | माँ, पिता तथा बड़ी बहन को इसमें कोई ऐतराज नहीं था | लेकिन अजीब बात यह थी कि मुझे अपने भाई से कोई सीधा सीधा जवाब नहीं मिला | मैंने उसके मौन को यह सोचकर स्वीकार कर लिया कि वह आजकल बेरोजगार है | तब एक दिन माँ ने मुझसे पूछा, "क्या हेइगो पूरी तरह से ठीक है |" "आपका क्या मतलब है ?" मैंने पूछा | तब उन्होंने अपना डर  बताया "क्या हेइगो हमेशा नहीं कहता था कि वह तीस साल पूरे करने से पहले ही मर जाएगा ?" जो भी उन्होंने कहा वह सच था | भाई हमेशा कहता था | वह दृढतापूर्वक कहता था कि जब लोग तीस साल पार कर लेते हैं , वे जो भी करते है वह बदसूरत और मतलबी होता है, इसलिए उसका वो सब करने का कोई इरादा नहीं है | वह रशियन साहित्य का बड़ा उपासक था, और मिखाइल आर्त्सीबशेव के दी लास्ट लाइन को दुनिया की सबसे बेहतरीन किताब का दर्जा देता था , और उसकी एक प्रति हमेशा अपने हाथो में रखता था | लेकिन नायक नौमोव के अजीब मृत्यु के धर्म के प्रति मेरे भाई का लगाव  मुझे हमेशा भावनाओं के अतिरेकता से ज्यादा कुछ नहीं लगता था | और यह बेशक उसकी अपनी मौत की इच्छा नहीं है | इसलिए जब मेरी माँ ने अपनी चिंता व्यक्त की तो मैंने इसे हंसकर उड़ा दिया, यह कहकर, "जो लोग मरने के बारे में बात करते है , नहीं मरते |" मैंने अपने भाई के शब्दों को हल्का कर दिया , लेकिन कुछ ही महीने बाद , मैंने माँ की आशंका को अपनी आखों के सामने घटते हुए देखा, मेरा भाई मर चुका था | और जैसा उसने वादा किया था , वह तीस साल पूरे होने से पहले ही मर गया था | सताईस साल की उम्र में उसने ख़ुदकुशी कर ली | ख़ुदकुशी से तीन दिन पहले उसने मुझे अपने साथ रात्रिभोज करने के लिए बुलाया था | लेकिन, काफी अजीब, मैं कितनी भी कोशिश करूँ, मुझे याद नहीं कहाँ | शायद उसकी मौत ने मुझपर गहरा सदमा छोड़ा था , हालाँकि मैं हमारे आखिरी बातचीत के एक एक वाक्य को पूरी स्पष्टता से याद करता हूँ , मुझे बिलकुल याद नहीं आता कि उसके पहले और उसके बाद क्या हुआ | हमने शिन ओकुबो स्टेशन पर एक दुसरे से विदा ली | हम एक टेक्सी में थे | जैसे मेरा भाई उतरा और ट्रेन स्टेशन की सीढियां चढ़ने लगा , उसने मुझसे कहा कि मैं घर तक के लिए गाडी ले लूँ | लेकिन जैसे ही गाडी दुबारा शुरू हुई, वह सीढ़ियों से वापस आया और उसने ड्राईवर को रुकने का इशारा किया | मैं गाडी से उतरा , उसकी तरफ बढ़ा  और , कहा , "क्या बात है ?" उसने  एक पल के लिए बहुत मुश्किल से मुझे देखा और तब कहा , "कुछ नहीं, तुम अब जाओ |" वह मुड़ा और सीढ़ियों से फिर ऊपर चढ़ने लगा | अगली बार जब मैंने उसे देखा तो वह खून सनी चादर से ढका हुआ था | इजू प्रायद्वीप के एक गर्म पानी के झरने के पास एक सराय के तनहा कमरे में उसने अपनी जान ले ली | कमरे के दरवाजे पर खड़ा मैंने अपने आप को हिलने में असमर्थ पाया | एक रिश्तेदार, जो शव की सुपुर्दगी के लिए मेरे और पिता के साथ आया था , ने मुझे गुस्से से घूरा और पूछा , "अकिरा, तुम  वहाँ  क्या कर रहे हो ?" मैं क्या कर रहा था ? मैं अपने मृत भाई को देख रहा था | मैं अपने मृत भाई के शव को देख रहा था , जिसके रगों में भी वही खून था जो मेरी रगों में है , और जिसने उसे अपने शरीर से बाहर बह जाने दिया था , और जिसे मैं सबसे ज्यादा मान देता था , और जिसकी जगह मेरी दुनिया में कोई नहीं ले सकता था | वह मर चुका था | मैं क्या कर रहा था ? लानत है मेरे ऊपर !
"अकिरा, जरा मेरी मदद करो ," मेरे पिता ने बहुत कोमलता से कहा | और तब, काफी मशक्कत के साथ, वह मेरे भाई के शव को एक चादर में लपेटने लगे | मेरे पिता के सांस फूलने और तनाव के दृश्य ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया , और किसी तरह से मैं कमरे में प्रवेश करने का हौसला जुटा सका | जब हमने मेरे भाई के शव को कार में रखा जिसे हम टोक्यो से हमारे साथ लाये थे , शव ने एक गहरी कराह ली | उसके पैर जो उसकी छाती से सट गए थे , जिसकी वजह से हवा उसके मुंह के रास्ते बाहर निकल आई थी | कार के ड्राईवर की कंपकंपी छूट गयी थी, लेकिन किसी तरह से वह शव को शमशान ले जा सका और उसे राख में बदल सका | वह पागलों की तरह वापस टोक्यो के लिए गाडी चलाता रहा , और बहुत सारे अजीब रास्तों से ले गया | मेरी बहादुर माँ ने मेरे भाई की ख़ुदकुशी के पूरे घटना को पूरे मौन के साथ, बिना एक आंसू बहाए सहन किया | जबकि मैं जानता था कि उसके दिल में मेरे लिए बिलकुल भी द्वेष नहीं है , मैं अपने आप को उसकी मौन यातना का जिम्मेदार मानने लगा | जब वह मेरे पास आई तो मैंने उससे अपने भाई के शब्दों को काफी हलके में लेने के लिए माफ़ी मांगनी चाही | लेकिन उसने इतना ही कहा , "अकिरा, तुम क्या कहना चाहते हो ?"  वह रिश्तेदार जिसने मुझसे पूछा था , "अकिरा, तुम वहाँ क्या कर रहे हो?" जब मैं अपने भाई के शव को देखकर स्तब्ध हो गया था, भी मुझे उतना नहीं डरा सका था, लेकिन मैं अपने आप को कभी माफ नहीं कर पाया जो कुछ भी मैंने अपनी माँ से कहा था | और इसका अंजाम मेरे भाई के लिए कितना खतरनाक हुआ था | मैं कितना बेवकूफ हूँ !


Monday, January 17, 2011

पंचतंत्र से एक कहानी - चतुर खरगोश


एक वन में हाथियों का एक झुंड रहता था | झुंड के सरदार को गजराज कहते थे | वो विशालकाय, लम्बी सूंड तथा लम्बे मोटे दाँतों वाला था | खंभे के समान उसके मोटे मोटे पैर थे | जब वो चिंघाड़ता था तो सारा वन गूँज उठता था |
गजराज अपने झुंड के हाथियों से बड़ा प्यार करता था | स्वयं कष्ट उठा लेता था, पर झुंड के किसी भी हाथी को कष्ट में नहीं पड़ने देता था | और सारे के सारे हाथी भी गजराज के प्रति बड़ी श्रद्धा रखते थे |
एक बार जलवृष्टि न होने के कारण वन में जोरों का अकाल पड़ा | नदियां, सरोवर सूख गए | वृक्ष और लताएँ भी सूख गयी | पानी और भोजन के अभाव में पशु-पक्षी वन को छोड़कर भाग खड़े हुए | वन में चीख-पुकार होने लगी, हाय-हाय होने लगी |
गजराज के झुंड के हाथी भी अकाल के शिकार होने लगे | वे भी भोजन और पानी न मिलने से तड़प-तड़पकर मरने लगे | झुंड के हाथियों का बुरा हाल देखकर गजराज बड़ा दुखी हुआ | वह सोचने लगा, कौन सा उपाय किया जाए, जिससे हाथियों के प्राण बचें |
एक दिन गजराज ने तमाम हाथियों को बुलाकर उनसे कहा, "इस वन में न तो भोजन है, न पानी है ! तुम सब भिन्न-भिन्न दिशाओं में जाओ, भोजन और पानी की खोज करो |"
हाथियों ने गजराज की आज्ञा का पालन किया | हाथी भिन्न-भिन्न दिशाओं में छिटक गए |
एक हाथी ने लौटकर गजराज को सूचना दी, "यहाँ से कुछ दूर पर एक दूसरा वन है | वहाँ पानी की बहुत बड़ी झील है | वन के वृक्ष फूलों और फलों से लदे हुए हैं |"
गजराज बड़ा प्रसन्न हुआ | उसने हाथियों से कहा, "अब हमें देर न करके तुरंत उसी वन में पहुँच जाना चाहिए, क्योंकि वहां भोजन और पानी दोनों हैं |"
गजराज अन्य हाथियों के साथ दुसरे वन में चला गया | हाथी वहां भोजन और पानी पाकर बड़े प्रसन्न हुए |
उस वन में खरगोशों की एक बस्ती थी | बस्ती में बहुत से खरगोश रहते थे | हाथी खरगोशों की बस्ती से ही होकर झील में पानी पीने के लिए जाया करते थे |
हाथी जब खरगोशों की बस्ती से निकलने लगते थे, तो छोटे-छोटे खरगोश उनके पैरों के नीचे आ जाते थे | कुछ खरगोश मर जाते थे, कुछ घायल हो जाते थे |
रोज-रोज खरगोशों के मरते और घायल होते देखकर खरगोशों की बस्ती में हलचल मच गयी | खरगोश सोचने लगे, यदि हाथियों के पैरों से वे इसी तरह कुचले जाते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब उनका खात्मा हो जायेगा |
अपनी रक्षा का उपाय सोचने के लिए खरगोशों ने एक सभा बुलाई | सभा में बहुत से खरगोश इकट्ठे हुए | खरगोशों के सरदार ने हाथियों के अत्याचारों का वर्णन करते हुए कहा, "क्या हममें से कोई ऐसा है, जो अपनी जान पर खेलकर हाथियों का अत्याचार बंद करा सके ?"
सरदार की बात सुनकर एक खरगोश बोल उठा, "यदि मुझे खरगोशों का दूत बनाकर गजराज के पास भेजा जाये, तो मैं हाथियों के अत्याचार को बंद करा सकता हूँ |"
सरदार ने खरगोश की बात मान ली और खरगोशों का दूत बनाकर गजराज के पास भेज दिया |
खरगोश गजराज के पास जा पहुंचा | वह हाथियों के बीच में खड़ा था | खरगोश ने सोचा, वह गजराज के पास पहुंचे तो किस तरह पहुंचे | अगर वह हाथियों के बीच में घुसता है, तो हो सकता है, हाथी उसे पैरों से कुचल दें |
यह सोचकर वह पास ही की एक ऊँची चट्टान पर चढ़ गया | चट्टान पर खड़ा होकर उसने गजराज को पुकारकर कहा, "गजराज, मैं चंद्रमा का दूत हूं | चंद्रमा के पास से तुम्हारे लिए एक संदेश लाया हूं |"
चद्रमा का नाम सुनकर, गजराज खरगोश की ओर आकर्षित हुआ | उसने खरगोश की ओर देखते हुए कहा, "क्या कहा तुमने ? तुम चद्रमा के दूत हो ? तुम चंद्रमा के पास से मेरे लिए क्या संदेश लाये हो ?"
खरगोश बोला, "हां गजराज, मैं चंद्रमा का दूत हूं | चद्रमा ने तुम्हारे लिए संदेश भेजा है | सुनो, तुमने चंद्रमा की झील का पानी गंदा कर दिया है | तुम्हारे झुंड के हाथी खरगोशों को पैरों से कुचल-कुचलकर मार डालते हैं | चंद्रमा खरगोशों को बहुत प्यार करते हैं, उन्हें अपनी गोद में रखते हैं | चंद्रमा तुमसे बहुत नाराज हैं | तुम सावधान हो जाओ | नहीं तो चंद्रमा तुम्हारे सारे हाथियों को मार डालेंगे |"
खरगोश की बात सुनकर गजराज भयभीत हो उठा | उसने खरगोश को सचमुच चंद्रमा का दूत और उसकी बात को सचमुच चंद्रमा का संदेश समझ लिया | उसने डर कर कहा, "यह तो बड़ा बुरा संदेश है | तुम मुझे फ़ौरन चंद्रमा के पास ले चलो | मैं उनसे अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करूँगा |"
खरगोश गजराज को चंद्रमा के पास ले जाने के लिए तैयार हो गया | उसने कहा, "मैं तुम्हें चंद्रमा के पास ले चल सकता हूं, पर शर्त यह है कि तुम अकेले ही चलोगे |"
गजराज ने खरगोश की बात मान ली |
पूर्णिमा की रात थी | आकाश में चंद्रमा हँस रहा था | खरगोश गजराज को लेकर झील के किनारे गया | उसने गजराज से कहा, "गजराज, मिलो चंद्रमा से |"
खरगोश ने झील के पानी की ओर संकेत किया | पानी में पूर्णिमा के चंद्रमा की परछाईं को ही चंद्रमा मान लिया |
गजराज ने चंद्रमा से क्षमा मांगने के लिए अपनी सूंड पानी में डाल दी | पानी में लहरें पैदा हो उठीं, परछाईं अदृश्य हो गई |
गजराज बोल उठा, "दूत, चंद्रमा कहां चले गए ?"
खरगोश ने उत्तर दिया, "चंद्रमा तुमसे नाराज हैं | तुमने झील के पानी को अपवित्र कर दिया है | तुमने खरगोशों की जान लेकर पाप किया है इसलिए चंद्रमा तुमसे मिलना नहीं चाहते |"
गजराज ने खरगोश की बात सच मान ली | उसने डर कर कहा, "क्या ऐसा कोई उपाय है, जिससे चंद्रमा मुझसे प्रसन्न हो सकते हैं ?"
खरगोश बोला "हां, है | तुम्हें प्रायश्चित करना होगा | तुम कल सवेरे ही अपने झुंड के हाथियों को लेकर यहाँ से दूर चले जाओ | चंद्रमा तुम पर प्रसन्न हो जायेंगे |"
गजराज प्रायश्चित करने के लिए तैयार हो गया | वह दूसरे दिन हाथियों के झुंड सहित वहां से चला गया |
इस तरह खरगोश की चालाकी ने बलवान गजराज को धोखे में डाल दिया | और उसने अपनी बुद्धिमानी के बल से ही खरगोशों को मृत्यु के मुख में जाने से बचा लिया |

Thursday, January 13, 2011

गुरु मन्त्र

कविताओं की काफी बात होती है, लेकिन कहानियों की नहीं | कभी कभी तो मुझे लगता है कि कहानी लिखने वाला रोज़ अपना आधा दिन अपने पात्रों के साथ बिताता होगा, जबकि कविता लिखने वाला पांच मिनट में कुछ चमत्कार सा लिखकर ख़त्म कर देता होगा | कविता के साथ मजेदार बात यह है कि समझ न आने पर वो और महान हो जाती है | इसी से मिलती जुलती बात कहानी के साथ यह है कि पात्रों की ऐसी तैसी कर दो, कहानी बढ़िया हो जायेगी | लेकिन इन सब के बीच हम यह भूल जाते हैं कि जिन लोगों का नाम आज अमर है, उन्होंने बहुत ही साधारण ढंग से लिखा है | प्रेमचंद उसी कड़ी के हैं, उन्हें देख के एक बार आपको भी लगेगा कि अरे , इसमें क्या बात है ये तो मैं भी लिख सकता हूँ | लेकिन वो कहानियां जनमानस की कहानियां हैं, साहित्य का चमत्कार करने की उसमे अपनी तरफ से कोई कोशिश नहीं है | पाठक को अपने साथ बहा ले चलना ही उनका चमत्कार है |





घर के कलह और निमंत्रणों की कमी से पंडित चिंतामणि जी के चित्त में वैराग्य पैदा हुआ और उन्होंने सन्यास ले लिया तो उनके परम मित्र पंडित मोटेराम शास्त्रीजी ने उपदेश दिया - दोस्त, हमारा अच्छे-अच्छे साधू-महात्माओं से सत्संग रहा है | यह जब किसी भलेमानस के दरवाजे पर जाते हैं, तो गिड़गिड़ाकर हाथ नहीं फैलाते और झूठे आशीर्वाद नहीं देने लगते कि 'नारायण तुम्हारा चोला मस्त रखे, तुम हमेशा सुखी रहो |' यह तो भिखारियों का दस्तूर है | संत लोग दरवाजे पर जाते ही कड़क कर हांक लगते हैं, जिससे घर के लोग चौंक पड़ें और उत्सुक होकर द्वार की तरफ दौड़ें | मुझे दो-चार वाणियां मालूम हैं, जो चाहे ग्रहण कर लो | गुदड़ी बाबा कहते थे-'मरें, तो पाँचों मरें |' यह ललकार सुनते ही लोग उनके चरणों पर गिर पड़ते थे | सिद्ध बाबा की हांक बहुत श्रेष्ठ थी- 'खाओ, पियो, चैन करो, पहनो गहना, पर बाबा जी के सोटे से डरते रहना |' नंगा बाबा कहते थे- 'दे तो दे, नहीं दिला दे, खिला दे, पिला दे, सुला दे |' यह जान लो कि तुम्हारा आदर सत्कार बहुत कुछ तुम्हारी हांक के ऊपर है | और क्या कहूँ | भूलना मत | हम और तुम काफी दिनों साथ रहे, अनेकों भोज साथ खाए | जिस नेवते में हम और तुम दोनों पहुंचते थे, लाग-डाट से एक-दो पत्तल और उड़ा ले जाते थे | तुम्हारे बिना अब मेरा रंग नहीं जमेगा, ईश्वर तुम्हें हमेशा सुगन्धित वस्तु दिखाए |
          चिंतामणि को इन वाणियों में एक भी पसंद नहीं आई | बोले- मेरे लिए कोई वाणी सोचो |
          मोटेराम- अच्छा यह बोली कैसी है कि, 'न दोगे तो हम चढ़ बैठेंगे' ?
          चिंतामणि- हाँ , यह मुझे पसंद है | तुम्हारी इजाजत हो तो इसमें काट-छांट करूँ |
          मोटेराम- हाँ, हाँ करो |
          चिंतामणि- अच्छा, तो इस प्रकार रखो- न देगा तो हम चढ़ बैठेंगे |
          मोटेराम- (उछलकर) नारायण जानता है, यह बोली अपने रंग में निराली है | भक्ति ने तुम्हारी अकल को चमका दिया है | भला एक बार ललकार कर कहो तो देखें किस तरह कहते हो |

          चिंतामणि ने दोनों कान उँगलियों से बन्द कर लिए और अपनी ताकत से चिल्लाकर बोले- न देगा तो चढ़ बैठूंगा | यह नाद ऐसा आकाशभेदी था कि मोटेराम भी अचानक चौंक पड़े | चमगादड़ घबराकर पेड़ों पर से उड़ गए, कुत्ते भूंकने लगे |

          मोटेराम- दोस्त, तुम्हारी वाणी सुन कर मेरा तो कलेजा कांप उठा | ऐसी ललकार कहीं सुनने में नहीं आई, तुम सिंह की भांति गरजते हो | वाणी तो निश्चित हो गयी अब कुछ दूसरी बातें बताता हूँ, कान लाकर सुनो | साधुओं की भाषा हमारी बोलचाल से अलग होती है | हम किसी को आप कहते हैं और किसी को तुम | साधु लोग छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, बूढ़े-जवान, सबको तू कह कर बुलाते हैं | माई और बाबा का हमेशा उचित व्यवहार करते रहना | यह भी याद रखो कि सादी हिंदी कभी मत बोलना; नहीं तो मरम खुल जाएगा | टेड़ी हिंदी बोलना; यह कहना कि, 'माई मुझको कुछ खिला दे' साधुजनों की भाषा में ठीक नहीं है | पक्का साधु इसी बात को यों कहेगा- माई मेरे को भोजन करा दे, तेरे को बड़ा धर्म होगा |
          चिंतामणि- दोस्त, हम तेरे को कहां तक जस गावें | तेरे ने मेरे साथ बड़ा उपकार किया है |

          यों उपदेश दे कर मोटेराम चले गए | चिंतामणि जी आगे बढे तो क्या देखते है कि गांजे-भांजे की दूकान के सम्मुख कई जटाधारी महात्मा बैठे हुए गांजे के दम लगा रहे हैं | चिंतामणि को देखते ही एक महात्मा ने अपनी जयकार सुनायी- चल-चल, जल्दी लेके चल नहीं तो अभी करता हूं बेचैन |
          एक दूसरा साधु कड़क कर बोला - अ-रा-रा-रा-धम, आये पहुंचे हम, अब क्या है गम |
          अभी यह कड़ाका आसमान में गूँज ही रहा था कि तीसरे महात्मा ने गरज कर अपनी बोली सुनायी- देस बंगाला, जिसको देखा न भाला, चटपट भर दे प्याला |
         चिंतामणि से अब न रहा गया | उन्होंने भी कड़क कर कहा- नहीं देगा तो चढ़ बैठूंगा |

          इतना सुनते ही साधुजन ने चिंतामणि का सादर अभिवादन किया | तत्क्षण गांजे की चिलम भरी गयी और उसे सुलगाने का काम पंडित जी पर पड़ा | बेचारे बड़े मुसीबत में पड़े | सोचा, अगर चिलम नहीं लेता तो अभी सारी कलई खुल जायेगी | मजबूर होकर चिलम ले ली; किन्तु जिसने कभी गांजा न पिया हो, वह बहुत कोशिश करने पर भी दम नहीं लगा सकता | उन्होंने आंखें बन्द करके अपनी समझ में तो बड़े जोरों से दम मारा | चिलम हाथ से छूटकर गिर पड़ी, आंखें निकल आयीं, मुँह से फिचकुर निकल आया, लेकिन न तो मुँह से धुंए के बादल निकले, न चिलम ही सुलगी | उनका यह कच्चापन उन्हें साधु-समाज से च्युत करने के लिए बहुत था | दो-तीन साधु झल्ला कर आगे बढे और बड़ी बेरहमी से उनका हाथ पकड़ कर उठा लिया |

          एक महात्मा- तेरे को धिक्कार है |
          दूसरे महात्मा- तेरे को लाज नहीं आती ? साधु बना है, मूर्ख ?
          पंडितजी शर्मिंदा होकर समीप के एक हलवाई की दूकान के सामने जा बैठे और साधु समाज ने खंजड़ी बजा-बजा कर यह भजन गाना आरम्भ किया :
          माया है संसार संवलिया, माया है संसार;
          धर्माधर्म सभी कुछ मिथ्या, यही ज्ञान व्यवहार;
                                        संवलिया, माया है संसार |
          गांजे, भंग को वर्जित करते, है उन पर धिक्कार;
                                        संवलिया, माया है संसार |

: प्रेमचंद

Friday, January 7, 2011

परिंदे - अंतिम भाग

[पिछली किश्त से जारी]

अगले दिन मिस अर्चना, मीरा कुछ खाना लेकर आये | सुधीर रात भर अस्पताल में ही रहे | प्रोफ़ेसर उप्रेती के साथ वाले बिस्तर पर लेटे रहे | "अब कैसी तबियत है प्रोफ़ेसर उप्रेती की ?" मीरा ने पूछा | "अभी सो रहे हैं | रात भर कुछ -कुछ बोलते ही रहे | अभी जाकर सोये हैं |" सुधीर ने जवाब दिया | "डॉक्टर ने क्या कहा है ?" मिस अर्चना ने बैठते हुए कहा | "ठीक हैं | बस थोड़ा तनाव की वजह से | काफी कमज़ोर भी हो चले हैं, वजन सामान्य से काफी गिर गया है |" सुधीर ग्लूकोज़ की बोतल को खाली होते हुए देखता रहा | "तुम खाना खा लो" मीरा ने सुधीर की ओर खाने का डब्बा बढ़ा दिया | "कुछ रिपोर्ट्स आनी बाकी हैं , उसके बाद ही सही सही कुछ कहा जा सकता है |" सुधीर ने डब्बा मेज़ के ऊपर रखते हुए कहा | "ठीक है, अभी थोड़ी देर में स्वामी सर आयेंगे | वे रहेंगे प्रोफ़ेसर के पास | तुम खाना खा लो" अर्चना ने कहा | "यहाँ पौड़ी में धूप अच्छी आती है | थोड़ी चहल पहल रहती है तो महसूस होता है कि दुनिया में और लोग भी रहते हैं | मैं थोड़ा बाहर हो आती हूँ |" कहते हुए मीरा बाहर चली गयी |

"तुमने खाना खाया " सुधीर ने अर्चना की ओर देखकर पूछा | एक पल के लिए तुम कहना थोड़ा अजीब लगा, लेकिन अधूरी बात अधूरी नहीं रख पाया | अर्चना को अच्छा लगा, "नहीं, अभी नहीं |"
"तो आप भी अभी खा लो, काफी खाना रखा है मीरा जी ने |"
"तुम ही सही रहेगा |" मिस अर्चना मुस्कुराई |
सुधीर ने खाने के डब्बे को खोला | एक ख़ाली डिब्बे में आधी सब्जी डालकर अर्चना ने अपने पास ले लिया |
"क्या हम डॉली को खबर करें ?" अर्चना ने पूछा |
"मैंने पूछा था प्रोफ़ेसर से, उन्होंने मना किया |" खाने का कौर मुँह में डालते हुए सुधीर ने कहा |
"लेकिन...प्रोफ़ेसर की हालत...डॉली को पता तो होना ही चाहिए |" मिस अर्चना ने सुधीर को समझते हुए कहा, "क्या प्रोफ़ेसर ने साफ़ साफ़ मना किया ? तुमने पूछा या उन्होंने खुद कहा ?"
सुधीर खाना हाथ में लेकर रुक गए, "प्रोफ़ेसर रात भर डॉली के बारे में बात करते रहे | डॉक्टर बीच बीच में आके उन्हें चुप होने के लिए कह रहे थे | जब मैंने उनसे पूछा कि प्रोफ़ेसर क्या डॉली को यहीं बुला लें, तो उन्होंने मना कर दिया | इससे ज्यादा मैं पूछ नहीं सका |" धूप दरवाजे तक आ गयी थी | सुधीर ने दरवाजे की ओर देखा | अर्चना ने पीछे मुड़कर दरवाजे की तरफ देखा, कोई नहीं था | "क्या बात है ?" अर्चना ने सुधीर की ओर देखकर पूछा |
"नहीं, कुछ नहीं | क्या तुम पूरी सर्दियाँ यहीं रहोगी ? अभी तुम्हें कोई क्लास नहीं मिली है | छुट्टियों के बाद ही वो सब होगा... एक -डेढ़ महीने बाद |"
"हाँ ... तुम लोग भी तो यहीं हो |"

शाम को वापस ट्रांसिट आकर सुधीर अपने कमरे में लेट गए | चाय पीने का मूड हुआ, उठकर बोयज़ हॉस्टल की ओर जाने लगे | होस्टल की ओर जाने वाली पगडण्डी से एक पल रूककर मेंढक पहाड़ी की ओर देखा, हम शापित लोग हैं , मन ही मन सोचा और फिर आगे बढ़ गए | बोयज़ हॉस्टल में फिफ्थ सेमेस्टर के ही कुछ स्टुडेंट रह गए थे | कुछ स्टुडेंट सुधीर के पास आये, वे प्रोफ़ेसर उप्रेती की तबियत के बारे में जानना चाहते थे | सुधीर का ध्यान बार बार भटक कर प्रोफ़ेसर के कहे वाक्य पर अटक रहा था कि हम शापित लोग हैं | डॉक्टर तुम यहाँ से कहीं और चले जाओ, और अर्चना को भी ..."वे ठीक हैं , कुछ ही दिनों में वापस आ जायेंगे |" सुधीर ने जल्दी से कहा | सुधीर को ऐसा लगा कि जाने से पहले उन्होंने उसे अविश्वास से देखा हो | रमेश को चाय बनाने को कहकर सुधीर एक खाली टेबल पर बैठ गए | हॉस्टल मेस पूरी तरह खाली थी | आज आखिरी पेपर ख़त्म होने के साथ आधे से ज्यादा हॉस्टल खाली हो चुका था | कल सारे लड़के चले जायेंगे | फिर हॉस्टल मेस बन्द हो जायेगी , सुधीर को अपने खाने का इंतजाम बाहर कहीं किसी होटल में करना होगा | सारे टीचर्स भी कल चले जायेंगे | दासगुप्ता सर ने भी सामान पैक कर लिया था, इंदिरा के विरोध के बावजूद | हम शापित लोग हैं ... स्माल सेल लंग कार्सिनोमा ... उफ़ |

तीन साल तक लंग कैंसर से लड़ने के बाद आखिर प्रोफ़ेसर ने अपनी लड़ाई रोक दी | डॉली से लड़ाई भी प्रोफ़ेसर जारी नहीं रख सके, उन्हें बुला लिया गया | प्रोफ़ेसर ने शोभा से दूसरी शादी की थी | डॉली , प्रोफ़ेसर की पहली पत्नी से हुई बेटी थी | अनुपमा, जिसे प्रोफ़ेसर ने तलाक़ दिया था | कुछ दिनों बाद, अनुपमा का शव पंखे से लटकता हुआ पाया गया | डॉली को प्रोफ़ेसर अपने पास लेकर आ गए | जिंदगी भर इस अपराधबोध से प्रोफ़ेसर मुक्त नहीं हो सके | शोभा ने बाद में डॉली को सब कुछ बता दिया था , जिसके बाद डॉली ने कभी प्रोफ़ेसर को माफ़ नहीं किया | अपनी माँ के नाम पर ही अनुपमा नाम डॉली ने अपना लिया |

देहरादून में ही प्रोफ़ेसर का अंतिम संस्कार करना निश्चित हुआ | मुखाग्नि देने के लिए सुधीर से कहा गया | सुधीर की यादों में अभी प्रोफ़ेसर की बातें चल रही थी | स्वामी को ये सब मत बताना, अर्चना और तुम भी कहीं और चले जाना | अर्चना का हाथ थामकर प्रोफ़ेसर बच्चों की तरह रोये थे, "मुझे माफ़ कर देना अनुपमा |"
शव आधा जल गया था | दहक वातावरण में अभी थी | सुधीर बोझिल क़दमों से पीछे पीछे हटे |
तीन दिन बाद राख ली जाती है | सुधीर ने अस्थियों को एक घड़े में भरा, और अनुपमा को दे दिया | राख के एक एक टुकड़े में प्रोफ़ेसर के होने का अहसास था | यार डॉक्टर, यहाँ पहाड़ों में अपनी जिंदगी खराब मत करो | हम लोग तो दुनिया से भागे हुए लोग हैं, तुम क्यूँ भाग रहे हो | राख जैसे पूरे शरीर में चढ़ती जा रही हो |

"पौड़ी!!! पौड़ी!!! " ऋषिकेश बस अड्डे पर पौड़ी की बस तैयार खड़ी थी , कंडक्टर हर आने जाने वाले से पूछ रहा था | सुबह के चार बजे थे | "भेजी, कहाँ जाना है ?" कंडक्टर ने सुधीर को हिलाकर पूछा | "पौड़ी" सुधीर की आँखें कहीं और देख रही थी | "वो वाली में बैठ जाओ |" कंडक्टर ने कहा | सुधीर जाने लगे तो कंडक्टर फिर से चिल्लाया - "अरे भैजी! इधर इधर |" जब ध्यान देने के बाद भी उसने देखा कि सुधीर के कदम कहीं के कहीं जा रहे हैं | उसने मन ही मन कुछ अंदाजा लगाया, भागकर आया | "भेजी ?" सुधीर की अधमुंदी आँखों में देखने लगा | हाथ पकड़ने की कोशिश की तो सुधीर ने हाथ में रखी प्लास्टिक की थैली अपने से सिमटा ली, जैसे कंडक्टर उससे वो थैली छीनना चाहता हो | उसने हाथ पकड़कर सुधीर को बस के अन्दर बिठा दिया | मन्दिर वाले बाबाजी आखिरी दिनों में चल नहीं पाते थे , जमीन पर घिसट घिसट कर चलते थे | "अर बेटा! सुना दे जरा गीता सार |"
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतं |
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ||

"भाईसाहब !" कंडक्टर ने सुधीर को हिलाया, "आपकी तबियत तो ठीक है ?" सुधीर को याद आया, बाबाजी के साथ एक औरत रहती थी | माँ से उसने पूछा कि वो कौन है | वो उनकी चेरी है, माँ ने कहा | सुधीर को लगा कि पत्नी को कहते होंगे | ये तो उसे काफी दिनों बाद पता चला कि चेरी उस लड़की को कहते है, जो किसी बाबा के साथ भाग आई होती है |
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे |
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिता: ||

कंडक्टर ने सुधीर का माथा छुआ "शायद थोड़ा ज्वर है आपको, बस थोड़ी दूर और है आपका कॉलेज | कॉलेज के टीचर हैं न आप ?" सुधीर ने ठंडा हाथ अपने माथे पर महसूस करके आँखें खोली | "हाँ, हाँ कॉलेज ही जाना है | आया क्या ?" कंडक्टर ने तसल्ली जैसे देते हुए कहा , "बस थोड़ी दूर है |"

"आ गया भाई साहब ! आपका कॉलेज |" कंडक्टर ने सुधीर को जगाया, "तबियत ठीक है अब आपकी ?" "हाँ मैं ठीक हूँ |" सुधीर ने उनींदी आखों से बाहर देखा | फिर तेजी से बस से उतर गया | कॉलेज दिखायी दे रहा था, सर्द बैगनी छाँव में | कॉलेज के आसपास का पूरा गाँव धूप में नहाया हुआ था | तेज तेज क़दमों से सुधीर चलना लगा | "चलो " पीछे से कंडक्टर की आवाज आई , और बस आगे बढ़ गयी | सुधीर ने अपने को स्वस्थ महसूस किया | कदम आगे बढ़ाया ही था कि माथे में भयंकर पीड़ा शुरू हो गयी | "गुड मोर्निंग सर |" रमेश मफलर पहने हुए सामने खड़ा था | "सर , आप बड़ी जल्दी आ गए | सामान नहीं लाये |" उसने पूछा | सुधीर को याद आया कि उसके साथ कोई सामान नहीं है | "सर!" रमेश पीछे से चिल्लाता रह गया | कॉलेज के गेट के बगल से एक छोटी सी पगडण्डी थी | सुधीर उसी पगडण्डी पर चलने लगे | बस थोड़ी दूर और, सुधीर अपने आप से कहते जा रहे थे | थकान बढती जा रही थी , सुधीर को महसूस होने लगा था कि उन्हें ज्वर है | पगडण्डी मेंढक पहाड़ी के पास जाकर सर्पिलाकार तरीके से मुड़ गयी | जिससे वो रास्ता खत्म होने का आभास से रही थी | पहाड़ी के सिरे पर पहुंचकर सुधीर ने इधर उधर घूमकर देखा | फिर जल्दी से थैले को उलटकर राख हवा में उछाल दी | सुधीर को काफी हल्का महसूस हो रहा था मानों इस राख के साथ उसने अपने अस्तित्व का कुछ टुकड़ा भी हवा में बिखेर दिया हो | राख उड़ती हुई घाटी से नीचे गिर रही थी, इस उम्मीद में कि कभी हवा में उड़ते हुए वो शायद चौखम्भा पहुँच जाए | वो राख को देखता रहा, हम शापित लोग हैं |


can we do nothing for the dead ? And for a long time the answer had been - nothing! - Katherin Mansfield


: निर्मल वर्मा के लिए