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Tuesday, March 1, 2011

जो गाह-गाह जुनूं इख्तियार करते रहे



हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लौह-ए-अजल में लिखा है
जब जुल्म ए सितम के कोह-ए-गरां
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमों के पाँव तले
जब धरती धड़ धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हिकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी

हम देखेंगे
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख्त गिराए जाएंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो नाज़िर भी है मन्ज़र भी
उट्ठेगा अनल - हक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो



 Iqbal Bano - Hum Dekhen Ge .mp3
Found at bee mp3 search engine
पुनश्च : माफ़ कीजिये, आप लोगों ने अगर ये कई बार सुना है | मेरे जैसों के लिए तो दुनिया अभी जादू का खिलौना ही है | आज ही सुना है और एक बार जो सुना तो पूरे दिन इसी को सुनता रहा, सो सुन लीजिये आप भी |

Monday, February 14, 2011

न गँवाओ नावके-नीमकश, दिले-रेज़ा रेज़ा गँवा दिया

तुम जो ठहर जाओ तो ये रात, महताब
ये सब्ज़ा, ये गुलाब और हम दोनों के ख़्वाब
सब के सब ऐसे मुबहम हों कि हक़ीक़त हो जायें
*
आज फरवरी माह की चौदहवीं तिथि  को जब तमाम दुनिया  प्रेम दिवस को अपने - अपने तरीके से  'सेलिब्रेट' करने में व्यस्त है तब  शायरी और मौसीकी के समुद्र में अवगाहन - स्नान करते हुए  अपने  भीतर की कोमलता को टच करने या  दुनिया के शबो - रोज में होते तमाशे  को देखते , उसका हिस्सा बनते, उससे रीझते खीझते,उस पर पड़ गई धूल को झाड़ते - पोँछते  आज  (एक बार फिर) फ़ैज़ की शायरी का आनंद लेते हैं। याद है यह वही शायर है जिसने कहा था कि 'और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा' और यह भी कि 'तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है '। कहने की बात नहीं है कि फ़ैज़ के यहाँ प्रेम दुनिया -ए- फानी से पलायन नहीं बल्कि इसी दुनिया को सुंदर दुनिया बनाने व इसकी सुंदरता को बिगड़ने से बचाने के प्रयत्न / प्रेरणा  का  सहचर है। और क्या कहा जाय .. तो आइए सुनते है फ़ैज़ की शायरी.. स्वर है उस्ताद मेंहदी हसन साहब का...




गँवाओ नावके-नीमकश, दिल-ए-रेज़ा रेज़ा गँवा दिया.          
जो बचे हैं संग समेट लो, तने-दाग़ दाग़ लुटा दिया.


मेरे चारागर को नवेद हो, सफ़े-दुश्मनाँ को ख़बर करो
जो वो क़र्ज़ रखते थे जान पर, वो हिसाब आज चुका दिया.

करो कज जबीं पे सरे-कफ़न, मेरे क़ातिलों को गुमाँ न हो
कि ग़ुरूरे-इश्क़ का बाँकपन, पसे-मर्ग हमने भुला दिया.

उधर एक हर्फ़ कि कुश्तनी, यहाँ लाख उज़्र था गुफ़्तनी .
जो कहा तो सुन के उड़ा दिया, जो लिखा तो पढ़ के मिटा दिया.

जो रुके तो कोहे-गराँ थे हम, जो चले तो जाँ से गुज़र गये
रहे-यार हमने क़दम क़दम, तुझे यादगार बना दिया.