भूपेन दा !
डा० भूपेन हजारिका नहीं रहे।
आवाज ही पहचान है
अमिट - अमर रहेगी यह पहचान...नमन!
ब्लूहिल ट्रेवेल्स के बस अड्डे की खिड़की पर लगी डा० भूपेन हजारिका की बड़ी -सी मुस्कुराती तस्वीर.. मन में गूँजने लगता है - हइया नां , हइया नां... बुकु होम -होम करे. इस इंसान की आवाज जितनी सुंदर है उससे कई गुना सुंदर इसकी मुसकान है - कुछ विशिष्ट , कु्छ बंकिम मानो कह रही हो कि मुझे सब पता है, रहस्य के हर रेशे को उधेड़कर दोबारा -तिबारा बुन सकता हूं मैं...
( 'कर्मनाशा' पर १३ नवंबर २००८ की एक पोस्ट का अंश )
