( कुछ दिन पहले मैंने मार्क स्ट्रेंड की एक कविता का अनुवाद यहां पोस्ट किया था। अब एक और ...)
हम पढ़ रहे हैं किस्से अपनी जिंदगी के
हम पढ़ रहे हैं किस्से अपनी जिंदगी के
जो बनते हैं एक बंद कमरे में
कमरा झांकता है एक गली में
कोई नहीं है वहां
किसी चीज़ की आवाज़ नहीं
पेड़ लदे हैं पत्तों से
खडी कारें चलती ही नहीं कभी
हम कुछ होने की उम्मीद में
पलटते रहते हैं पन्ने
जैसे कि दया या परिवर्तन
एक स्याह पंक्ति जो जोड देगी हमें
या कर देगी अलग
जिस तरह है सबकुछ
लगता है
ख़ाली है हमारी ज़िंदगी कि किताब
कभी नहीं बदली गयी
घर के फर्नीचरों की जगह
और उन पर पडे बिछावन
हमारी छायाओं के गुज़रने से
हर बार हो जाते हैं और स्याह
यह वैसे ही है कमोबेश
कि जैसे कमरा ही था पूरी दुनिया
पढते हुए पलंग के बारे में
हम बैठे हैं पलंग पर अगल-बगल
हम कहते हैं - आदर्श है यह
आदर्श है यह!
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Monday, August 31, 2009
Wednesday, August 26, 2009
मार्क स्ट्रेंड की कविता
( अंग्रेजी साहित्य के अपने अत्यल्प ज्ञान को साबित कराने की मुझे कोई ज़रूरत तो नही है पर मै सचमुच नही जानता की ये स्ट्रेंड साहब कौन हैं। बस आज एक दोस्त ने यह कविता मेल की और पढ़ने में किक लगी तो अनुवाद कर डाला और अब आपके हुज़ूर में...,हमनाम बड़े भाई से क्षमा याचना सहित)
मैदान में
मैदान की अनुपस्थिति हूँ मै
ऐसा ही होता है हमेशा
मै जहाँ भी होता हूँ
वही होता हूँ
कमी ख़ल रही होती है जिसकी
जब चल रहा होता हूं मै
बांट देता हूं हवा को दो हिस्सों में
और फिर हवा भर देती है उस जगह को
जहां था मेरा शरीर
सबके पास होतीं हैं
चलने की अपनी वज़हें
मैं चलता हूं
चीज़ों को पूरा बनाये रखने के लिये
मैदान में
मैदान की अनुपस्थिति हूँ मै
ऐसा ही होता है हमेशा
मै जहाँ भी होता हूँ
वही होता हूँ
कमी ख़ल रही होती है जिसकी
जब चल रहा होता हूं मै
बांट देता हूं हवा को दो हिस्सों में
और फिर हवा भर देती है उस जगह को
जहां था मेरा शरीर
सबके पास होतीं हैं
चलने की अपनी वज़हें
मैं चलता हूं
चीज़ों को पूरा बनाये रखने के लिये
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