Saturday, August 28, 2010

पीपली लाइव की एक बेबाक समीक्षा

स्वीकार करना चाहूंगा कि मैंने यह फ़िल्म नहीं देखी है. पर कुछ मित्रों ने इसे देखा है और अलग अलग तरीके से इस पर प्रतिक्रियाएं दी हैं. अग्रज समान कवि श्री रामकुमार तिवारी ने यह समीक्षा रविवार के लिए लिखी थी. उन्हीं की सहमति से इसे यहां रविवार से साभार आपके विचार के लिए प्रस्तुत कर रहा हूं:



इधर कुछ महीनों से मीडिया में पीपली लाईव ने अपनी ऐसी धमक बनाई है कि देश का एक बड़ा वर्ग इस फ़िल्म पर न्यौछावर हुआ जा रहा है. आश्चर्य नहीं कि फिल्म समीक्षक जय प्रकाश चौकसे इस फिल्म की स्तुति में यह कह रहे हैं कि " किसी भी नेता के भाषण या हमारे महाविद्यालयों के शोध पत्र से ज्यादा सारगर्भित और महत्वपूर्ण है यह फिल्म. इसके लिए अनुषा रिजवी को डॉक्टरेट की उपाधि दी जानी चाहिये."

‘पीपली लाइव’ पर जय प्रकाश चौकसे की यह टिप्पणी चौकस लगी कि इसमें किसी नेता के भाषण से ज्यादा सार है. बस ! इससे ज्यादा नहीं.

देखते-देखते यह कैसा दौर आ गया कि एक सनसनी का तुमार कुछ इस तरह ताना जा सकता है कि वह महानता की जगह घेर ले और समाज बौरा जाये. लगभग दो लाख किसानों की आत्महत्याओं को इस तरह तयशुदा मजाक बना दिया जाये कि वे सोच-समझकर परिवार, समाज में लंबे समय तक बातचीत करके बेहद व्यवसायिक रूप से मुआवजा के लिए ही की गई है. जीवन का कैसा अवमूल्यन है और मृत्यु का कैसा अपमान. आत्महत्या की त्रासदी को एक आर्थिक विकल्प के रूप में किस तरह घटा दिया गया है.

फिल्म निर्माण रचनात्मक अवदान है न कि एक सनसनी मात्र कि देखो! हमने किस तरह मीडिया, व्यवस्था और राजनीति को उघाड़ दिया है. बस हो गया हमारे कर्तव्य का निर्वहन. क्या एक कला माध्यम को देय सिर्फ इतना ही हो सकता है ?

हम आमिर खान या आमिर खान जैसे फिल्मकारों से ईरान के महान फिल्मकार अब्बास कियारोस्तामी की तरह किसी ऐसी फिल्म की उम्मीद नहीं कर सकते जो अपने मुल्क और उसकी जनता से बेपनाह मुहब्बत करते हुए एक-एक शॉट्स और एक-एक फिल्म इस तरह रचता हो, जिसमें उनके देश ईरान और उनके जन-जन की आत्मा का सौंदर्य अपनी मानवीय गरिमा के साथ प्रकट होते हैं. कुछ यूं कि दूर देशों के दर्शक भी उनके देश ईरान और उसकी जनता से प्रेम करने लगते हैं और उनके अंदर भी ईरान को देखने और उसकी जनता से मिलने की इच्छा जन्म लेने लगती है.

इस समय ईरान के हालात बेहद खराब है. जाफ़र पनाही जैसे फ़िल्मकार को गिरफ़्तार कर लिया गया है. राजनीति के हुक्मरानों ने अब्बास कियारोस्तामी साहब पर फिल्म न बनाने की पाबंदी भी लगा दी गई है. अमरीका सहित पूरे दुनिया के दरवाजे उनके लिए खुले हैं, फिर भी अब्बास साहब अपना घर और मुल्क छोड़कर नहीं जाना चाहते. क्या करें ? उन्हें नींद अपने मुल्क और अपने घर में ही आती है. अपने देश और अपनी जनता से ऐसी मुहब्बत का जज्बा ही ऐसी रचनात्मकता को जन्म दे सकता है.....खैर छोडिये. फिलहाल तो हम अपने ही देश की फिल्मों और फिल्म निर्माताओं की बात करें.

किसानों की पृष्ठभूमि पर बनी महबूब खान की फिल्म ‘मदर इंडिया’ को तो कम से कम हमारी दृष्टि चेतना का हिस्सा होना ही चाहिये. बैंक ऋण की जगह पुरातन महाजनी पंजे में फंसे किसान परिवार की गाथा का कैसा फिल्मांकन था ? ‘‘पीपली लाइव’’ के नत्था की परिस्थिति मदर इंडिया की अबला नारी से ज्यादा बद्दतर तो नहीं थी. लेकिन उसमें जीवन कैसे संभव हुआ, हर सर्वहारा को थामता हुआ हिम्मत देता हुआ. वह फिल्म के माध्यम से हमारा जागरण काल था. जिजीविषा, संघर्ष, आम गौरव की फिल्मी गाथा ने किस तरह मूल्यों का सृजन किया था. इतनी फिल्मी लंबी यात्रा के बाद उसी परिस्थिति पर बनी फिल्म ‘‘पीपली लाइव’’ का ट्रीटमेंट हमें सोचने पर विवश करता है. हम कब कहां से कहां आ गये और ऊपर से सफलता, महानता का इतना शोर ?
'पीपली लाइव' में न तो आत्यहत्या के मनोविज्ञान की समझ है और न ही समाज के बहुआयामों की.

कला में सिर्फ भौडा कटु यथार्थ ही सब कुछ नहीं होता, रचना अपने होने में जो अतिरिक्त, जो नहीं है, उसे सृजित करती है, जोड़ती, अलगाती है. तभी तो वह रचना है, कला है, फिल्म है.

आइडिया में कभी संवेदना नहीं होती. सिर्फ एक होशियारी होती है. जो अपनी सामाजिक भूमिका के लिए एक पेशेवर संवेदना का स्वांग रचकर समाज की भावनाओं की मार्केटिंग करती है. वह समाज को झकझोरने की जगह एक क्षणिक उत्तेजना पैदा करके एक अभ्यस्ती बनाने लगती है.

‘‘पीपली लाइव’’ में न तो आत्यहत्या के मनोविज्ञान की समझ है और न ही समाज के बहुआयामों की. फिल्म के लिहाज से भी यह आमिर खान की सबसे कमजोर फिल्म है. फिल्म की लय जगह-जगह टूटी हुई है. कहीं-कहीं तो वह फिल्म का कोलॉज लगती है.

देश में फिल्मी जगत की जो दुर्दशा है, उसमें निश्चित तौर पर आमिर खान इस दशक के सबसे सफल निर्माता है, लेकिन बड़े नहीं है. बड़ा होना और सफल होना दो अलग-अलग बातें है. उतनी ही जितनी कि आमिर खान का कोकोकोला का विज्ञापन करना और मेधा पाटकर के साथ धरने पर बैठना.

आमिर खान का भारतीय फिल्मों के विज्ञापन में बहुत बड़ा योगदान है. यहां उनकी मेधा चरम पर है. उन्होंने विज्ञापन की लाइने ही बदल दी हैं. हाल ही में ‘‘पीपली लाइव’’ के रिलीज होने के पहले ही टाइमिंग सेंस से भरे उनके गाने और नत्था का स्टारडम लोगों की जुबान पर छा गया. ‘पीपली लाइव’ की जगह नत्था और ‘महंगाई डायन खाय जात है’ लोगों के सिर चढ़कर बोल रहे हैं. जो अंतत: ओंकारदास मानिकपुरी का अभिनय या महंगाई का प्रतिरोध न होकर सिर्फ और सिर्फ ‘‘पीपली लाइव’’ का ही विज्ञापन है.


नत्था से खास मुलाकात सारे चैनलों से प्रसारित हो रही है. नत्था कैटरीना कैफ, दीपिका पादुकोण से मिलना चाहता है, यह भी एक खबर है. दीपिका नत्था से मिलने आती है, यह भी एक खबर है. नत्था सचमुच सोच रहा है कि दीपिका उससे मिलने आयी है क्योंकि वह एक बहुत बड़ा स्टार बन गया है. यह एक ऐसा भ्रम है जो ओंकारदास मानिकपुरी के शेष जीवन को कहीं त्रासद न बना दे. और भविष्य में ईश्वर न करे कि ओंकारदास मानिकपुरी खुद एक खबर बनें और एक दिन छत्तीसगढ़ के स्थानीय अखबार में छपे- एक था नत्था जिसने सन् 2010 में बहुत कम बजट की फिल्म ‘पीपली लाइव’ में आमिर खान की जगह केंद्रीय भूमिका निभाई थी और उस फिल्म ने रिकार्ड बिजनेस किया था और अखबारों की खबर पर ओंकारदास मानिकपुरी की आर्थिक बदहाली पर छत्तीसगढ़ सरकार 25-50 हजार की राशि देने की घोषणा कर दे.

आमिर खान के पास भारतीय समाज की कमजोरियों का अच्छा अध्ययन है. वे जानते हैं कि इस विस्मृति के दौर में चेतना से कटे-पिटे समाज में क्या और किस तरह परोसा और बेचा जा सकता है. इस संदर्भ में उनकी पिछली फिल्में भी गौरतलब हैं.

आमिर की एक बहुचर्चित फिल्म है ‘तारे जमीं पर’. इस फिल्म का हाल और भी भयानक है. जिसमें शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए कहीं कोई जगह नहीं है, जब तक वह पेंटिंग प्रतियोगिता में प्रथम स्थान न पा जाये. आमिर के यहां सिर्फ और सिर्फ श्रेष्ठ के लिए जगह है. सामान्य, सहज जीवन के लिए नहीं. प्रथम स्थान तो कोई एक ही पा सकता है. सभी नहीं. पूरा समाज तो सहज प्रेममय होकर ही रह सकता है. ईश्वर का शुक्र है कि ‘तारे जमीं पर’ में सिर्फ एक ही बच्चा था वरना उसी तरह के दूसरे बच्चों का क्या होता?
वे लड़के जो मेहनत से मुंह चुराते, दूर भागते अराजक और उद्दंड हैं, जिनकी तादात बहुत ज्यादा है, उनके लिए थ्री इडियट्स राहत पैकेज की तरह है, जिसमें उनकी हरकतें जीवंत और भविष्यमयी दिखायी गई है.

अरे भाई! जब प्रथम ही आना है, वहीं ही पहुंचना है जो समाज में पहले से मान्य है तो तब इतनी भावुकता क्यों? यह सब अलग और मानवीय होने का ड्रामा क्यों? सामान्य, सहज जीवन की चाह का क्या होगा? उसे कहां जगह होगी? किस रचाव में? कम से कम आमिर खान के यहां तो नहीं ही.

आमिर खान की एक और सफलतम फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ का हीरो रैंचो कैसे डिग्री किसी दूसरे के नाम करके भी किस तरह सबसे बड़ा वैज्ञानिक, सबसे बड़ी कंपनी का मालिक और सबसे दूर-दराज के प्रायोगिक स्कूल का निर्देशक एक साथ, यकायक बन जाता है.

देखा जाये तो यह एक तरह का ईश्वरीय प्रगटन है, जो भारतीय जनमानस की कमजोरी है. वे लड़के जो मेहनत से मुंह चुराते, दूर भागते अराजक और उद्दंड हैं, जिनकी तादात बहुत ज्यादा है, उनके लिए यह फिल्म राहत पैकेज की तरह है, जिसमें उनकी हरकतें जीवंत और भविष्यमयी दिखायी गई है. यह अलग और कठोर बात है कि पढ़ाई छोड़ कर या पूरी करके वे न तो सबसे बड़े वैज्ञानिक बनेंगे और न ही सबसे बड़ी कंपनी के मालिक और न ही कहीं स्कूल में नन्हों को देने के लिए उनके पास कुछ ऐसा होगा कि वे उन्हें दे सकें. वे अवारा बदहाली में भटकेंगे और उस समय उन्हें यह गाना भी याद नहीं आयेगा- ‘आल इज वेल.’

22 comments:

राजेश उत्‍साही said...

माफ करें, रामकुमार तिवारी जी को अपनी कही हुई बातों पर फिर से सोचना चाहिए। खासकर तारे जंमी पर तथा थ्री इडियट पर।

DEEPAK BABA said...

आज की युवा पीडी का बिलकुल सटीक वर्णन किया है आपने ..........

" अवारा बदहाली में भटकेंगे और उस समय उन्हें यह गाना भी याद नहीं आयेगा- ‘आल इज वेल.’ """"

नीरज गोस्वामी said...

बेबाक समीक्षा में अच्छे और बुरे दोनों पहलू उजागर होने चाहियें सिर्फ बुरे पहलू ही नहीं...हर चीज़ में अच्छाई और बुराई दोनों होती हैं...कितनी क्या होती है ये देखने वाले पर निर्भर करता है...

नीरज

अशोक कुमार पाण्डेय said...

अपने अग्रज कवि की दृष्टि से पूरी तरह सहमत हूं…सहमतियों की विभ्रमकारी हुंआ-हुंआ में प्रतिपक्ष की एक सटीक आवाज़। आमिर ख़ुद सफल व्यक्ति हैं और उनकी फिल्में मी अंततः सफलता का उत्सव मनाती हैं…यहां कमज़ोर और हारे हुए लोगों के लिये कोई जगह नहीं है…

गुर्रमकोंडा नीरजा said...

''आमिर खान के पास भारतीय समाज की कमजोरियों का अच्छा अध्ययन है. वे जानते हैं कि इस विस्मृति के दौर में चेतना से कटे-पिटे समाज में क्या और किस तरह परोसा और बेचा जा सकता है. इस संदर्भ में उनकी पिछली फिल्में भी गौरतलब हैं''.
.........सत्य है.
जय हो!

varsha said...

peepli live ek achchi film hai fir agar iraan ke nirdeshak behtar rach rahe hain to iraan ke halat unhen prerit kar rahe hain...haan kahin lay-taal tootti si lagti hai aur jab kuch alag aur naya hota hai to shor to machta hi hai.

chutka jagrati manch narayanganj said...

-pipli live dekhne layak to hai .
-pipli live me media aur politice ka sunder cum kuroop chehra dikhaya gaya hai, par maje ki bat hai media ne ise swekar kar pipli ki khoob publicity ki hai ,congratulation.
-kahani garib parivar ki hai jo apni thodi si jamin bachane ke liye suicide ka man bana leta hai , par maje ki bat hai ki india me garib ki jamin jo jyda se jyda 1-2 acres kki bank nilami kabhi karta hi nahi, jabki pipli fil isi bat ko aadhar lekar banyi gai hai.
-- jai prakash pandey

unkavi said...

ab anushaa rizvi kaa kehnaa hai ki unke paatra premchand ke 'godaan' se prerit hain.film aapki darshai kamzoriyo ke bawazood ekbaargi sthitiyo kee ore nigaah daalane par majboor to kartee hi hai.

अजेय said...

अशोक भाई, हारे हुए पिटे हुए के लिए *राहत का पेकेज * जो है. हिन्दी मुख्यधारा की सिनेमा के लिए कितनी सटीक उपमा है यह! आखिर हमारी नई पीढ़ी 7वे-8वें दशक के समानंतर सिनेमा आन्दोलन को कब तक नज़रन्दाज़ करती रहेगी? मुद्दे हाईजेक कर लेने से बदनीयत की चुगलियाँ ढँकी नही जा सकती. मुख्य धारा की कला ने आज तक मुद्दों का *सेल* ही किया है.

डॉ .अनुराग said...

पीपली लाइव की मदर इण्डिया से तुलना .समझ से परे है .दोनों अपने काल की अपने समय की फिल्मे है ..ओर हर निर्देशक की एक अपनी सोच होती है ...इसे एक कहानी के तौर पे देखिये ...रेदर एक सटायर के तौर पर ..ये किसी ..किसान की कहानी नहीं है .वर्तमान समय के उस गठजोड़ की कहानी है ..जिसमे जिंदगी खबरिया चैनल सी ओर आदमी विज्ञापन सा है .....हर समाज में हर वर्ग में कई चरीत्र होते है .किसान अब प्रेमचंद के होरी सा नहीं रहा है .....पट्टे पे दी गयी अपनी जमीन पर हस्ताक्षर कर किसी मोड़ पर ज्यादा पैसा मिलने की उम्मीद में वो बदल भी जाता है .... आखिर वो भी तो इसी समाज का हिस्सा है .हम क्यों उसे दुःख से पीड़ित सीधा साधा मजबूर ही देखना चाहते है .....ठीक वैसे ही जैसे आर्मी में शाहेद हुए किसी जवान की बेवा को मिले पैसे को अपने पास रखने के लिए उसकी शादी देवर से करा दी जाती है .....ये सब ग्रायुंड रियल्टी है .....जिन्हें हमें स्वीकारना चाहिए ...... हाँ यदि आप कहे के इसे मीडिया का अधिक दुलार मिला है तो मानता हूँ ....क्यूंकि ऐसी ही एक बेहतरीन फिल्म" तेरे बिन लादेन' या" आमिर "पर मीडिया का उतना प्यार नहीं उमड़ा .....पर मीडिया समझदार है ..यथार्थ पर रीझता है.....फेस बुक पर वह वह करता है .ओर अगले दिन सुबह अपने चैनल पर प्रेमी को पाने के लिए क्या मोती धारण करे कैसे करे बताने वाले एक एक आदमी या औरत को बैठा देता है ......ठीक उसी तरह जैसे हिन्दुस्तान टाइम्स का फ्रंट पेज सड़क पर मरी औरत ओर उसके नवजात शिशु को थामे परोपकार करती एक महिला की फोटो अपने फ्रंट पेज पर चाप कर दिल्ली की निर्ममता पर व्यग्य कसता है ...पढने वाले कोफ़ी पीते हुए उफ़ कहकर अगला पेज पलटते है ....दरअसल परोपकार भी एक थ्रिल है दुखो के सामूहिक झुंडो को ढूंढकर किया जाने वाला .......
फिर भी इस फिल्म से जुडी कई चीज़े अच्छी है ...मसलन मेन स्ट्रीम सिनेमा से जुड़े एक स्टार का ऐसी फिल्मो से जुड़ना.....ठीक वैसे ही जैसे बरसो पहले शशि कपूर ने श्याम बेनेगल के साथ मिलकर कई सार्थक फिल्मे बनायीं थी .......जिससे दूसरे निर्मातायो में इस तरह की फिल्मे बनाने का एक हौसला बनेगा ....फिल्म की सफलता मेन स्ट्रीम के कलाकारों में भी ये विश्वास दिलाएगी के गंभीर सिनेमा का भी एक विशाल दर्शक वर्ग है ओर वे भी इस तरह के सिनेमा से जुडेगे ......आखिर में एक बात ओर तारे ज़मीन पर एक सार्थक प्रयास है .उसमे आपकी राय से मै सहमत नहीं हूँ....कोई भी निर्माता फिल्म बनाने के साथ उससे मुनाफा भी कमाना चाहता है .क्या लेखक अपनी किताबो की पबिलिसिटी नहीं करते .....

jitendra said...

Every one have their own view depend on how he take things.

abcd said...

इत्ने सारे टुटे-फ़ुटे खयाल आ रहे है कि सोच रहा हू कही लम्बा न लिख दू !
भहरहाल,
बहुत पेह्ले धुन्द्ला सा याद है महेश भट्ट साब ने
कहा था-"फ़िल्मे कोई बुद्ध विधि या पुजा पाट य़ा विग्यान जैसा गम्भीर विशय नही है अपितु ’मनोरन्जन’ है विशुद्ध मनोरन्जन"/

यार , मन्मोहन देसाई ने lost and found को चलाया,
रम्गोपाल वेर्मा ने underworld को चलाया,
सन्जय लीला भन्सालि ने hadicap को चलाया
राज कपूर ने lead heoines को exposure के लिये convince किया,
मै सोच्ता हू और कोन से grounds है जो break किये जा सक्ते है,और नही किये गये है ??!
इस बीच,अमोल जी विजय दान देथा को ले आये...इस से बडी और क्या बात मगर नतिजा...??तब मै mumbai मे ही था और ह्मारे दोस्त-महाराज-पहेली के production मे थे बताते थे की विजय दान देथा कोने मे चुप चाप अकेले बैथे रेह्ते थे इस्लिये सेट पर famous हो गया था-न लेता न देता विजय दान देथा--
बताइये!!
और अब है -पीप्लि लाइव- सब बाते थीक होन्गी पर यार ये स्पश्ट है कि हबीब तन्वीर का नाम लिया गया है फ़िल्म के साथ..आमिर खान के साथ उन्हे भी थोडा याद रखेन्गे तो थीक नही रहेगा बात पुरे कर्ने के लिये??

दीपा पाठक said...

बहुत दिनों बाद कबाड़खाना पर एक अच्छी विचारोत्तेजक पोस्ट। हालांकि न तो अब तक मैंने यह फिल्म देखी है और न ही रामकुमार तिवारी जी के सारे तर्कों से मैं सहमत हूं। लेकिन उन्होंने अपना नज़रिया तर्कों के साथ बखूबी रखा है।

cmpershad said...

"स्वीकार करना चाहूंगा कि मैंने यह फ़िल्म नहीं देखी है."

हां जी, मैंने भी नहीं देखी, हेंस नो कमेन्ट प्लीज़ :)

Raag Viraag said...

पीपली लाइव फिल्म पर तिवारी जी की समीक्षा प्रतिक्रियात्मक लगी, जिसमें संदर्भों को भी सही तरह से नहीं जोड़ पाए। आमीर खान की आलोचना समकालीन निर्देशकों, कलाकारों व बाज़ारू कला के संदर्भ में कीजिए न कि श्याम बेनेगल या विमल राय से तुलना करके। खैर...
पीपली की कथा में व्यंग्यात्मक यथार्थ है न कि नग्न यथार्थ या सतही हास्य। फिल्म की कथा ही फिल्म का नायक है, कोई चरित्र नहीं। किसी चरित्र में किसी तरह का आदर्श नहीं है, न ही कथानक का अंत वैकल्पिक आदर्श से होता है। एेसे में सतही समीक्षा ठीक नहीं है। ज्यादा न कर पाएं तो भी कोई बात नहीं लेकिन थोड़ी गंभीरता की जरूरत है।
पीपली लाइव बहुत समय बाद एक एेसी फिल्म देखने को मिली जिसमें कोई खोट नहीं। इसके लिए अनुषा रिज़वी का श्रम सराहनीय है। समीक्षा के केन्द्र में निर्देशक के कार्य को रखिए न कि निर्माता के "वेल्थ गेम्स" को।

विजय गौड़ said...

तीनों ही फ़िल्मों पर बड़ी गम्मभीरता से और तर्क पूर्ण राय रखी है। पहली दोनों फ़िल्मों- तारे जमीं पर’ और थ्री इडियट्स को देखने के बाद, खासतौर पर थ्री इडियट्स से जिसका कि काफी हल्ला था, निराशा ही हुई थी और अभी पीपली लाइव भी वैसी ही चलताऊ मुहावरे वाली फ़िल्म लगी है। पिछले दिनों यहां देहरादून में एक फ़िल्म फ़ेस्टिवल हुआ जिसमें बारहा आना फ़िल्म में काम कर चुके कलाकार विजय राज की एक लघु फ़िल्म देखने का मौका मिला, छतीसगढ में महिलाओं को डायन के रूप में दिखाने के पीछे वो मूल कारण जो अकेली स्त्री की जमीन पर कब्जा करने वाली मानसिकता है, उसे निदेशक ने बखूबी पकड़ा है। यहां तुलना के तौर पर दो व्यवसायिक निदेशको की तुलना है।

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

विनम्रतापूर्वक आपसे बिलकुल सहमत नही हूँ. आपने कई चीजों को असंयत ढंग से लिया है. शुक्र है अनुराग आर्या जी ने दुरुस्त ढंग से विस्तार से बातें रख दी हैं, वरना इन्हीं बातों को मुझे भी दोहराना होता..!

"आमिर की एक बहुचर्चित फिल्म है ‘तारे जमीं पर’. इस फिल्म का हाल और भी भयानक है. जिसमें शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए कहीं कोई जगह नहीं है, जब तक वह पेंटिंग प्रतियोगिता में प्रथम स्थान न पा जाएँ "
आपकी इन पंक्तियों के बाद तो मुझे कहना होगा कि आप फिल्म ठीक से देख ही नही रहे हैं..और यदि देख भी रहे हैं तो आग्रहों से दूर नही जा पा रहे हैं..!!!

संभव है कि मेरी ही दृष्टि में त्रुटि हो..सो ये मेरी निजी राय है.

unkavi said...

धुवाँ है तो आग होगी ही.यहाँ धुवाँ है गीत "महंगाई डायन....." और आग है "पीप्ली लाइव".कहानी ये भी है कि निर्देशिका के ज़हन में "गोदान" के पात्र घूम रहे थे,जब उन्होंने यह पटकथा रची.(फ़िल्म के एक पात्र का नाम होरी महतो है).ख़ैर, मैंने आज फ़िल्म देखी. सबसे पहले जो दिमाग़ में कौंधा, वो था कुछ समय पूर्व रिलीज़ हुई फ़िल्म "वेल डन अब्बा" का ख़याल.दोनों फ़िल्मों के विषयों में एक तरह का साम्य है,परन्तु चर्चा की बाज़ी जीती "पीप्ली लाइव" ने. मेरी निगाह में फ़र्क बैनर का है,और मार्केटिंग का,वर्ना फ़िल्म वो भी लाजवाब थी.
पीप्ली लाइव हँसाती है,गँवय्यों की चालाकियों और उनके भोलेपन पर. रुलाती है उनकी मजबूरियों और दशा पर.चोट करती है, ख़बरचियों और उनके उद्देश्यों पर, जहाँ खबर के कारण से ज़्यादा ज़रूरी ख़ुद ख़बर हो जाती है और उससे ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है खबरचियों का तथाकथित टी आर पी.फ़िल्म इशारा करती है आज की राजनीति के ख़ोख़लेपन की ओर.फ़िल्म सवाल उठाती है सरकारी योजनाओं और उनकी सार्थकता पर.
कई एक प्रसंगों ने अतिरेक को छुआ,ज़िक्र करना आवश्यक न समझते हुए कहना चाहूँगा कि एक वर्ग का दर्शक उस पर भी खुल कर हँसा.शायद यही मंशा निर्देशिका की रही हो.अनुशा की यह पहली फ़िल्म है,कुछ ख़ामियों की समीक्षा उनके जिम्मे छोड़कर हमें उम्मीद करनी चाहिये की वो आगे चलकर और भी ऐसी प्रस्तुतियाँ देंगी.

unkavi said...

धुवाँ है तो आग होगी ही.यहाँ धुवाँ है गीत "महंगाई डायन....." और आग है "पीप्ली लाइव".कहानी ये भी है कि निर्देशिका के ज़हन में "गोदान" के पात्र घूम रहे थे,जब उन्होंने यह पटकथा रची.(फ़िल्म के एक पात्र का नाम होरी महतो है).ख़ैर, मैंने आज फ़िल्म देखी. सबसे पहले जो दिमाग़ में कौंधा, वो था कुछ समय पूर्व रिलीज़ हुई फ़िल्म "वेल डन अब्बा" का ख़याल.दोनों फ़िल्मों के विषयों में एक तरह का साम्य है,परन्तु चर्चा की बाज़ी जीती "पीप्ली लाइव" ने. मेरी निगाह में फ़र्क बैनर का है,और मार्केटिंग का,वर्ना फ़िल्म वो भी लाजवाब थी.
पीप्ली लाइव हँसाती है,गँवय्यों की चालाकियों और उनके भोलेपन पर. रुलाती है उनकी मजबूरियों और दशा पर.चोट करती है, ख़बरचियों और उनके उद्देश्यों पर, जहाँ खबर के कारण से ज़्यादा ज़रूरी ख़ुद ख़बर हो जाती है और उससे ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है खबरचियों का तथाकथित टी आर पी.फ़िल्म इशारा करती है आज की राजनीति के ख़ोख़लेपन की ओर.फ़िल्म सवाल उठाती है सरकारी योजनाओं और उनकी सार्थकता पर.
कई एक प्रसंगों ने अतिरेक को छुआ,ज़िक्र करना आवश्यक न समझते हुए कहना चाहूँगा कि एक वर्ग का दर्शक उस पर भी खुल कर हँसा.शायद यही मंशा निर्देशिका की रही हो.अनुशा की यह पहली फ़िल्म है,कुछ ख़ामियों की समीक्षा उनके जिम्मे छोड़कर हमें उम्मीद करनी चाहिये की वो आगे चलकर और भी ऐसी प्रस्तुतियाँ देंगी.

unkavi said...

धुवाँ है तो आग होगी ही.यहाँ धुवाँ है गीत "महंगाई डायन....." और आग है "पीप्ली लाइव".कहानी ये भी है कि निर्देशिका के ज़हन में "गोदान" के पात्र घूम रहे थे,जब उन्होंने यह पटकथा रची.(फ़िल्म के एक पात्र का नाम होरी महतो है).ख़ैर, मैंने आज फ़िल्म देखी. सबसे पहले जो दिमाग़ में कौंधा, वो था कुछ समय पूर्व रिलीज़ हुई फ़िल्म "वेल डन अब्बा" का ख़याल.दोनों फ़िल्मों के विषयों में एक तरह का साम्य है,परन्तु चर्चा की बाज़ी जीती "पीप्ली लाइव" ने. मेरी निगाह में फ़र्क बैनर का है,और मार्केटिंग का,वर्ना फ़िल्म वो भी लाजवाब थी.
पीप्ली लाइव हँसाती है,गँवय्यों की चालाकियों और उनके भोलेपन पर. रुलाती है उनकी मजबूरियों और दशा पर.चोट करती है, ख़बरचियों और उनके उद्देश्यों पर, जहाँ खबर के कारण से ज़्यादा ज़रूरी ख़ुद ख़बर हो जाती है और उससे ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है खबरचियों का तथाकथित टी आर पी.फ़िल्म इशारा करती है आज की राजनीति के ख़ोख़लेपन की ओर.फ़िल्म सवाल उठाती है सरकारी योजनाओं और उनकी सार्थकता पर.
कई एक प्रसंगों ने अतिरेक को छुआ,ज़िक्र करना आवश्यक न समझते हुए कहना चाहूँगा कि एक वर्ग का दर्शक उस पर भी खुल कर हँसा.शायद यही मंशा निर्देशिका की रही हो.अनुशा की यह पहली फ़िल्म है,कुछ ख़ामियों की समीक्षा उनके जिम्मे छोड़कर हमें उम्मीद करनी चाहिये की वो आगे चलकर और भी ऐसी प्रस्तुतियाँ देंगी.

Prafull Jha said...

Agar aapne movie nahi dekhi hai to jaroor dekhiye.Aur Tiwari jee se kahiye jara najariye ko dekhein.ye kahani gharib or uske atmhatya ki nahin he balki ye kahani hai ke kis tarah se hamare policymaker kisi samasya ko apne laabh k liye prayog karte he,kis tarah media Samasya ke karan or nidaan na batake apne TRP ke liye anaap shanaap dikhati hai hame, aur ant me kis tarah hum aam janta Har baat pe Dharna ya kuch Candle jala k apna kaam khatm karte he.Dekhiye or samajhiye.Dikhni wali cheejein is film ki hasati he par pehlu pe gaur karo to rona a jaayega.

Ritesh Tewari said...

Vinamaratapoorvak main aapse sahamat nahin hoon, bahut saare karan diye ja chuke hain,doharna nahin chahunga. nakaratmakata jyada lagti hai is lekh mein. Ashok jee aapko movie dekhni chahiye thi.