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Wednesday, July 3, 2013

मालवा - एक पुरानी डॉक्यूमेंट्री


फ़िल्म्स डिवीज़न के लिए १९६३ में एस. एन. एस. शास्त्री द्वारा बनाई गयी डॉक्यूमेंट्री ‘मालवा’ पेश है. उम्मीद करता हूँ मालवा के इतिहास, कला और वास्तुशिल्प पर की गयी यह काव्यात्मक यात्रा आपको अवश्य पसंद आएगी.

Wednesday, January 26, 2011

कबीर-गायन के शिखर टिपानियाजी को पद्मश्री




आज पूरा मालवा का मन-मयूर आनंद से थिरक रहा है ! हाँ हुज़ूर ये पल और समाचार ही कुछ ऐसा है जिस पर मन का तंबूरा ख़ुशी से झनझना गया है.हमारे अपने लोकगीत गायक प्रहलादसिंह टिपानिया का नाम नागरिक अलंकरणों की उस सूची में शुमार है जो आज गणतंत्र-दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति भवन से जारी हुई है. उज्जैन ज़िले के ग्राम लूनियाखेड़ी का लाल प्रहलादसिंह टिपानिया जिसने पिछले पच्चीस बरस में कबीरी पदों का जादू पूरी दुनिया में जगाया है अब पद्मश्री प्रहलादसिंह टिपानिया कहलाएंगे.म.प्र.के शिखर सम्मान और संगीत नाटक अकादमी के सम्मान से नवाज़े जाने के बाद प्रहलादसिंहजी ज़िन्दगी का यह अनमोल अलंकरण है. यूँ वे जिस कबीरी तबियत और फ़क्कड़पन में जीते हैं;उन्हें इन सम्मानों से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. जब उनसे मैंने बात की तो बोले दादा यो म्हारो नीं आखा माळवा को सम्मान हे. और साँची कूँ म्हारे कबीर नी मिलता तो म्हने कूँण पूछतो....तो यो कबीरदासजी को सम्मान पेलाँ हे,म्हारों बाद में. (ये मेरा नहीं पूरे मालवा का सम्मान है.और सच कहूँ ? मुझे कबीर नहीं मिलते तो मुझे कौन पूछता,ये सम्मान कबीर के नाम पहले है,मेरे नाम बाद में) मैंने जब पूछा कि आपने गाने की तरबियत किससे पाई तो पहलादसिंह जी ने विनम्रता से कहा कि “सब काहू से लीजिये;साँचा शब्द निहार” मैंने हर अच्छी शैली से कुछ न कुछ पाया है और उसमें सचाई के शब्दों की थाह पाने की कोशिश की है. पूरी दुनिया जानती है कि प्रहलादसिंह टिपानिया नाम के गुदड़ी के लाल और कबीर पर स्टेनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की शोधार्थी लिंडा हैस लगातार काम कर रही है और इस मालवी पूत को अमेरिका भी आमंत्रित कर चुकीं है. बैंगलोर की शबनम विरमणी का कबीर फ़ाउण्डेशन प्रहलादसिंह टिपानिया के काम का दस्तावेज़ीकरण कर उसे विस्तार देने में ख़ासी मशक़्कत कर रहा है. प्रहलादसिंहजी की इस क़ामयाबी में मालवा हाउस (आकाशवाणी इन्दौर ) का भी बहुत बड़ा योगदान है क्योंकि ग्रामीण परिवेश के इस खाँटी गायक की रचनाओं को सबसे पहले पूरे मध्यप्रदेश की गाँव-गलियों में प्रचारित करने का काम उसी ने किया है. राग-रागिनियों की तालीम और शास्त्र से परे प्रहलाद दादा का काम ख़ालिस रूप से रूहानी है और उसमें मालवा के गाड़ी-गड़ारों से उड़ती धूल की आत्मीय ख़ुशबू आन समाई है. वे कहते हैं कबीर का राग तो बेराग है उसमें उन सारी कुरीतियों पर कुठाराघात है जो बुराई से अच्छाई की ओर ले जाती है. कबीरी गायन का मतलब ही है हद के बाहर जाकर गाना...हद में बंधा वह कबीरी छाप वाला नहीं.बनारस के कबीरचौरा से मालवा के ओटलों पर कबीरी जाजम बिछाने वाले प्रहलादसिंह टिपानिया ने मालवी लोक-संगीत की धजा को आज वाक़ई जगमग दे दी है.

हाँ ये भी बताना मुनासिब होगा कि इस आलेख के साथ जारी तस्वीर जानेमाने छायाकार तनवीर फ़ारूक़ी की खींची हुई है. कबाड़ख़ाना पर जारी करने की इजाज़त देने के लिये तनवीर भाई का शुक्रिया.