
बहुत बचपन की देखी एक फ़िल्म याद आती है 'दोस्ती'. मेरी उम्र तब शायद सात आठ साल की थी, कस्बा था रामनगर. फ़िल्म देख चुकने के बाद मैं कई कई दिनों तक उसी के गीतों की लाइनें यहां वहां जोड़ कर गुनगुनाता रहता था. एक दूसरे को इतनी शिद्दत से चाहने वाले दो दोस्त - एक नेत्रहीन और एक विकलांग - और एक नन्हीं सी गुड़िया जैसी बच्ची, और एक बैसाखी और एक माउथआर्गन - यही छवियां तब भी दिमाग में तैरा करती थीं, 'दोस्ती' के किसी भी गाने को सुनकर आज भी यही छवियां आती हैं - और इन सब को सहलाती हुई सी रफ़ी साहब की धूप-छांव-धूप-छांव आवाज़: "दुख हो या सुख, जब सदा संग रहे ना कोय, फ़िर दुख को अपनाइए, कि जाए तो दुख न होय."
जब सन १९८० में रफ़ी साहब की अचानक मौत हुई, मेरे बड़े भाई ने खाने को हाथ नहीं लगाया - पूरे दो दिन तक. न मेरे भाई ने, न उस के एक दोस्त ने. दूसरे दिन पिताजी को भाईसाहब के उपवास की सूचना मिली. उन्होंने उसे झिड़कते हुए इस आकस्मिक भूख हड़ताल का सबब पूछा तो मेरा शेरदिल, बाडीबिल्डर भाई आंखों में इतने बड़े बड़े आंसू लाकर बोला: "मोहम्मद रफ़ी साब की डैथ हो गई! अब गाने कौन गाएगा!! ..." और उस के बाद उसने ज़ोरों से रोना शुरू किया. भाई का वह अविस्मरणीय रुदन शायद मेरे लड़कपन की एक निर्णायक घटना था.
मेरे बचपन और लड़कपन और जवानी और पहली मोहब्बत और पहले विरह और पहले प्रवास और जाने कितने कितने मरहलों पर मुझे अहसास हुआ है कि मोहम्मद रफ़ी साहब को याददाश्त से हटा दूं तो मेरे जीवन का बड़ा हिस्सा भूसे का ढेर बन जाएगा.आज मोहम्मद रफ़ी साहब की ८३वीं सालगिरह है.
उनके चाहने वालों और खुद स्वर्गीय रफ़ी साहब के लिए उन्हीं का गाया : 'बूंदें नहीं सितारे, टपके हैं कहकशां से. सदक़े उतर रहे हैं तुम पर ये आस्मां से"
*रफ़ी साहब को इन जगहों पर भी सुनें:
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