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Monday, February 16, 2015

जेएनयू में प्रोफेसर तुलसीराम की याद

प्रोफेसर तुलसीराम की स्मृति में जेएनयू में हुए एक कार्यक्रम में लगाए गए  पोस्टर. उनकी श्रद्धांजलि के तौर पर यहाँ लगाई गयी एक पोस्ट से कबाड़ी अनिल यादव के शब्द एक पोस्टर पर देखे जा सकते हैं. फ़ोटो के लिए कबाड़ी दिलीप मंडल का आभार.  
(बड़ा करके देखने के लिए फ़ोटो पर क्लिक करें)
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प्रोफ़ेसर तुलसी राम 
वर्ष 1949 में उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ ज़िले के चिरैयाकोट में एक दलित परिवार में पैदा हुए तुलसी राम ने आगे की पढ़ाई के लिए पहले गांव छोड़ा और आज़मगढ़ पहुंचे. उसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वो वाराणसी पहुंचे और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में दाखिला लिया. यहीं पर वो कम्युनिस्ट राजनीति के सम्पर्क में आए और कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़कर काम करने लगे. घर से बीएचयू तक का सफ़र तय करने में उन्हें कई कई दिनों तक भूखे रहना पड़ा और भयंकर अभावों से गुजरना पड़ा और सामाजिक अपमान का दंश झेलना पड़ा. उन्होंने दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पीएचडी की डिग्री हासिल की थी. बाद में यहीं स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में प्रोफ़ेसर हो गए.

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संबंध पर 'आइडियॉलॉजी इन सोवियत-ईरान रिलेशन्स: लेनिन टू स्टालिन' नाम की किताब लिखी थी. इसके अलावा उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर कई पुस्तकें लिखीं लेकिन उनकी आत्मकथा सबसे अधिक चर्चित रही. आत्मकथा के दो खंडों 'मणिकर्णिका' और 'मुर्दहिया' में उन्होंने हिंदी पट्टी में दलित समाज के हालात का जिस बारीक़ी से वर्णन किया है वो हिंदी और ख़ासकर दलित साहित्य की अमूल्य निधि है.


Thursday, August 22, 2013

ऊपर से नीचे तक ‘यस सर’ हो गया – परसाई जी की स्मृति – ३


दरअसल आज परसाई जी की जन्मतिथि पड़ती है. सो ऐसे ही उनकी दो-तीन रचनाएं लगा दीं यहाँ. जस्ट फ़ॉर द रेकॉर्ड. और उनकी रचना और उसकी महानता को लेकर कुछ कह सकने की मेरी औकात नहीं.

उन्हें नमन!  

यस सर

-हरिशंकर परसाई

एक काफी अच्छे लेखक थे. वे राजधानी गए. एक समारोह में उनकी मुख्यमंत्री से भेंट हो गयी. मुख्यमंत्री से उनका परिचय पहले से था. मुख्यमंत्री ने उनसे कहा- आप मजे में तो हैं. कोई कष्ट तो नहीं है? लेखक ने कह दिया- कष्ट बहुत मामूली है. मकान का कष्ट. अच्छा सा मकान मिल जाए, तो कुछ ढंग से लिखना-पढ़ना हो. मुख्यमंत्री ने कहा- मैं चीफ सेक्रेटरी से कह देता हूं. मकान आपका ‘एलाट’ हो जाएगा.

मुख्यमंत्री ने चीफ सेक्रेटरी से कह दिया कि अमुक लेखक को मकान ‘एलाट’ करा दो.

चीफ सेक्रेटरी ने कहा- यस सर.

चीफ सेक्रेटरी ने कमिश्नर से कह दिया. कमिश्नर ने कहा- यस सर.

कमिश्नर ने कलेक्टर से कहा- अमुक लेखक को मकान ‘एलाट’ कर दो. कलेक्टर ने कहा- यस सर.

कलेक्टर ने रेंट कंट्रोलर से कह दिया. उसने कहा- यस सर.

रेंट कंट्रोलर ने रेंट इंस्पेक्टर से कह दिया. उसने भी कहा- यस सर.

सब बाजाब्ता हुआ. पूरा प्रशासन मकान देने के काम में लग गया. साल डेढ़ साल बाद फिर मुख्यमंत्री से लेखक की भेंट हो गई. मुख्यमंत्री को याद आया कि इनका कोई काम होना था. मकान ‘एलाट’ होना था.

उन्होंने पूछा- कहिए, अब तो अच्छा मकान मिल गया होगा?

लेखक ने कहा- नहीं मिला.

मुख्यमंत्री ने कहा- अरे, मैंने तो दूसरे ही दिन कह दिया था.

लेखक ने कहा- जी हां, ऊपर से नीचे तक ‘यस सर’ हो गया.


तुम एक बुर्जुआ बौड़म हो. पर मैं तुम्हें प्यार करती हूँ – परसाई जी की स्मृति – २



क्रांतिकारी’ की कथा

-हरिशंकर परसाई

क्रांतिकारी’ उसने उपनाम रखा था. खूब पढ़ा-लिखा युवक. स्वस्थ, सुंदर. नौकरी भी अच्छी. विद्रोही. मार्क्स-लेनिन के उद्धरण देता, चे-ग्वेवारा का खास भक्त.

कॉफी हाउस में काफी देर तक बैठता. खूब बातें करता. हमेशा क्रांतिकारिता के तनाव में रहता. सब उलट-पुलट देना है. सब बदल देना है. बाल बड़े, दाड़ी करीने से बढ़ाई हुई.

विद्रोह की घोषणा करता. कुछ करने का मौका ढूंढ़ता. कहता- “मेरे पिता की पीढ़ी को जल्दी मरना चाहिए. मेरे पिता घोर दकियानूस, जातिवादी, प्रतिक्रियावादी हैं. ठेठ बुर्जुआ. जब वे मरेंगे तब मैं न मुंडन कराऊंगा, न उनका श्राद्ध करूंगा. मैं सब परंपराओं का नाश कर दूंगा. चे-ग्वेवारा जिंदाबाद.”

कोई साथी कहता, “पर तुम्हारे पिता तुम्हें बहुत प्यार करते हैं.”

क्रांतिकारी कहता, “प्यार? हॉं, हर बुर्जुआ क्रांतिकारिता को मारने के लिए प्यार करता है. यह प्यार षणयंत्र है. तुम लोग नहीं समझते. इस समय मेरा बाप किसी ब्राह्मण की तलाश में है जिससे बीस-पच्चीस हजार रुपये लेकर उसकी लड़की से मेरी शादी कर देगा. पर मैं नहीं होने दूंगा. मैं जाति में शादी करूंगा ही नहीं. मैं दूसरी जाति की, किसी नीच जाति की लड़की से शादी करूंगा. मेरा बाप सिर धुनता बैठा रहेगा.”

साथी ने कहा, “अगर तुम्हारा प्यार किसी लड़की से हो जाए और संयोग से वह ब्राह्मण हो तो तुम शादी करोगे न?

उसने कहा, “हरगिज नहीं. मैं उसे छोड़ दूंगा. कोई क्रांतिकारी अपनी जाति की लड़की से न प्यार करता है, न शादी. मेरा प्यार है एक कायस्थ लड़की से. मैं उससे शादी करूंगा.”

एक दिन उसने कायस्थ लड़की से कोर्ट में शादी कर ली. उसे लेकर अपने शहर आया और दोस्त के घर पर ठहर गया.
बड़े शहीदाना मूड में था. कह रहा था, “आई ब्रोक देअर नेक. मेरा बाप इस समय सिर धुन रहा होगा, मां रो रही होगी. मुहल्ले-पड़ोस के लोगों को इकट्ठा करके मेरा बाप कह रहा होगा ‘हमारे लिए लड़का मर चुका’. वह मुझे त्याग देगा. मुझे प्रापर्टी से वंचित कर देगा. आई डोंट केअर. मैं कोई भी बलिदान करने को तैयार हूं. वह घर मेरे लिए दुश्मन का घर हो गया. बट आई विल फाइट टू दी एंड-टू दी एंड.”

वह बरामदे में तना हुआ घूमता. फिर बैठ जाता, कहता, “बस संघर्ष आ ही रहा है.”

उसका एक दोस्त आया. बोला, “तुम्हारे फादर कह रहे थे कि तुम पत्नी को लेकर सीधे घर क्यों नहीं आए. वे तो काफी शांत थे. कह रहे थे, लड़के और बहू को घर ले आओ.”

वह उत्तेजित हो गया, “हूँ, बुर्जुआ हिपोक्रेसी. यह एक षणयंत्र है. वे मुझे घर बुलाकर फिर अपमान करके, हल्ला करके, निकालेंगे. उन्होंने मुझे त्याग दिया है तो मैं क्यों समझौता करूं. मैं दो कमरे किराए पर लेकर रहूंगा.”

दोस्त ने कहा, “पर तुम्हें त्यागा कहां है?

उसने कहा, “मैं सब जानता हूं- आई विल फाइट.”

दोस्त ने कहा, “जब लड़ाई है ही नहीं तो फाइट क्या करोगे?

क्रांतिकारी कल्पनाओं में था. हथियार पैने कर रहा था. बारूद सुखा रहा था. क्रांति का निर्णायक क्षण आने वाला है. मैं वीरता से लडूंगा. बलिदान हो जाऊंगा.

तीसरे दिन उसका एक खास दोस्त आया. उसने कहा, “तुम्हारे माता-पिता टैक्सी लेकर तुम्हें लेने आ रहे हैं. इतवार को तुम्हारी शादी के उपलक्ष्य में भोज है. यह निमंत्रण-पत्र बांटा जा रहा है.”

क्रांतिकारी ने सर ठोंक लिया. पसीना बहने लगा. पीला हो गया. बोला, “हाय, सब खत्म हो गया. जिंदगी भर की संघर्ष-साधना खत्म हो गयी. नो स्ट्रगल. नो रेवोल्यूशन. मैं हार गया. वे मुझे लेने आ रहे है. मैं लड़ना चाहता था. मेरी क्रांतिकारिता! मेरी क्रांतिकारिता! देवी, तू मेरे बाप से मेरा तिरस्कार करवा. चे-ग्वेवारा! डियर चे!”

उसकी पत्नी चतुर थी. वह दो-तीन दिनों से क्रांतिकारिता देख रही थी और हंस रही थी. उसने कहा, “डियर एक बात कहूं. तुम क्रांतिकारी नहीं हो.”

उसने पूछा, “नहीं हूं. फिर क्या हूं?

पत्नी ने कहा, “तुम एक बुर्जुआ बौड़म हो. पर मैं तुम्हें प्यार करती हूँ.”


तुमने ‘इंडिया’ खा लिया, बाकी बचा ‘भारत’ हमें खाने दो – परसाई जी की स्मृति - १


वह जो आदमी है न

-हरिशंकर परसाई

निंदा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं. निंदा खून साफ करती है, पाचन-क्रिया ठीक करती है, बल और स्फूर्ति देती है. निंदा से मांसपेशियां पुष्ट होती हैं. निंदा पायरिया का तो शर्तिया इलाज है. संतों को परनिंदा की मनाही होती है, इसलिए वे स्वनिंदा करके स्वास्थ्य अच्छा रखते हैं. ‘मो सम कौन कुटिल खल कामी’- यह संत की विनय और आत्मग्लानि नहीं है, टॉनिक है. संत बड़ा कांइयां होता है. हम समझते हैं, वह आत्मस्वीकृति कर रहा है, पर वास्तव में वह विटामिन और प्रोटीन खा रहा है.

स्वास्थ्य विज्ञान की एक मूल स्थापना तो मैंने कर दी. अब डॉक्टरों का कुल इतना काम बचा कि वे शोध करें कि किस तरह की निंदा में कौन से और कितने विटामिन होते हैं, कितना प्रोटीन होता है. मेरा अंदाज है, स्त्री संबंधी निंदा में प्रोटीन बड़ी मात्रा में होता है और शराब संबंधी निंदा में विटामिन बहुत होते हैं.

मेरे सामने जो स्वस्थ सज्जन बैठे थे, वे कह रहे थे- आपको मालूम है, वह आदमी शराब पीता है?

मैंने ध्यान नहीं दिया. उन्होंने फिर कहा- वह शराब पीता है.

निंदा में अगर उत्साह न दिखाओ तो करने वालों को जूता-सा लगता है. वे तीन बार बात कह चुके और मैं चुप रहा, तीन जूते उन्हें लग गए. अब मुझे दया आ गई. उनका चेहरा उतर गया था.

मैंने कहा- पीने दो.

वे चकित हुए. बोले- पीने दो, आप कहते हैं पीने दो?

मैंने कहा- हां, हम लोग न उसके बाप हैं, न शुभचिंतक. उसके पीने से अपना कोई नुकसान भी नहीं है.

उन्हें संतोष नहीं हुआ. वे उस बात को फिर-फिर रेतते रहे.

तब मैंने लगातार उनसे कुछ सवाल कर डाले- आप चावल ज्यादा खाते हैं या रोटी? किस करवट सोते हैं? जूते में पहले दाहिना पांव डालते हैं या बायां? स्त्री के साथ रोज संभोग करते हैं या कुछ अंतर देकर?

अब वे ‘हीं-हीं’ पर उतर आए. कहने लगे- ये तो प्राईवेट बातें हैं, इनसे क्या मतलब.

मैंने कहा- वह क्या खाता-पीता है, यह उसकी प्राईवेट बात है. मगर इससे आपको जरूर मतलब है. किसी दिन आप उसके रसोईघर में घुसकर पता लगा लेंगे कि कौन-सी दाल बनी है और सड़क पर खड़े होकर चिल्लाएंगे- वह बड़ा दुराचारी है. वह उड़द की दाल खाता है.

तनाव आ गया. मैं पोलाइट हो गया- छोड़ो यार, इस बात को. वेद में सोमरस की स्तुति में ६०-६२ मंत्र हैं. सोमरस को पिता और ईश्वर तक कहा गया है. कहते हैं- तुमने मुझे अमर बना दिया. यहां तक कहा है कि अब मैं पृथ्वी को अपनी हथेलियों में लेकर मसल सकता हूं.(ऋषि को ज्यादा चढ़ गई होगी.) चेतन को दबाकर राहत पाने या चेतना का विस्तार करने के लिए सब जातियों के ऋषि किसी मादक द्रव्य का उपयोग करते थे.

चेतना का विस्तार. हां, कई की चेतना का विस्तार देख चुका हूं. एक संपन्न सज्जन की चेतना का इतना विस्तार हो जाता है कि वे रिक्शेवाले को रास्ते में पान खिलाते हैं, सिगरेट पिलाते हैं, और फिर दुगने पैसे देते हैं. पीने के बाद वे ‘प्रोलेतारियत’ हो जाते हैं. कभी-कभी रिक्शेवाले को बिठाकर खुद रिक्शा चलाने लगते हैं. वे यों भी भले आदमी हैं. पर कुछ मैंने ऐसे देखे हैं, जो होश में मानवीय हो ही नहीं सकते. मानवीयता उन पर रम के ‘किक’ की तरह चढ़ती-उतरती है. इन्हें मानवीयता के ‘फिट’ आते हैं- मिरगी की तरह. सुना है मिरगी जूता सुंघाने से उतर जाती है. इसका उल्टा भी होता है. किसी-किसी को जूता सुंघाने से मानवीयता का फिट भी आ जाता है. यह नुस्खा भी आजमाया हुआ है.

एक और चेतना का विस्तार मैंने देखा था. एक शाम रामविलास शर्मा के घर हम लोग बैठे थे (आगरा वाले रामविलास शर्मा नहीं. वे तो दुग्धपान करते हैं और प्रात: समय की वायु को ‘सेवन करता सुजान’ होते हैं). यह रोडवेज के अपने कवि रामविलास शर्मा हैं. उनके एक सहयोगी की चेतना का विस्तार कुल डेढ़ पेग में हो गया और वे अंग्रेजी बोलने लगे. कबीर ने कहा है- ‘मन मस्त हुआ तब क्यों बोले’. यह क्यों नहीं कहा कि मन मस्त हुआ तब अंग्रेजी बोले. नीचे होटल से खाना उन्हीं को खाना था. हमने कहा- अब इन्हें मत भेजो. ये अंग्रेजी बोलने लगे. पर उनकी चेतना का विस्तार जरा ज्यादा ही हो गया था. कहने कहने लगे- नो सर, नो सर, आई शैल ब्रिंग ब्यूटीफुल मुर्गा. ‘अंग्रेजी’ भाषा का कमाल देखिए. थोड़ी ही पढ़ी है, मगर खाने की चीज को खूबसूरत कह रहे हैं. जो भी खूबसूरत दिखा, उसे खा गए. यह भाषा रूप में भी स्वाद देखती है. रूप देखकर उल्लास नहीं होता, जीभ में पानी आने लगता है. ऐसी भाषा साम्राज्यवाद के बड़े काम की होती है. कहा- इंडिया इज ए ब्यूटीफुल कंट्री. और छुरी-कांटे से इंडिया को खाने लगे. जब आधा खा चुके, तब देशी खाने वालों ने कहा, अगर इंडिया इतना खूबसूरत है, तो बाकी हमें खा लेने दो. तुमने ‘इंडिया’ खा लिया. बाकी बचा ‘भारत’ हमें खाने दो. अंग्रेज ने कहा- अच्छा, हमें दस्त लगने लगे हैं. हम तो जाते हैं. तुम खाते रहना. यह बातचीत 1947 में हुई थी. हम लोगों ने कहा- अहिंसक क्रांति हो गई. बाहर वालों ने कहा- यह ट्रांसफर ऑफ पॉवर है- सत्ता का हस्तांतरण. मगर सच पूछो तो यह ‘ट्रांसफर ऑफ डिश’ हुआ- थाली उनके सामने से इनके सामने आ गई. वे देश को पश्चिमी सभ्यता के सलाद के साथ खाते थे. ये जनतंत्र के अचार के साथ खाते हैं.

फिर राजनीति आ गई. छोड़िए. बात शराब की हो रही थी. इस संबंध में जो शिक्षाप्रद बातें ऊपर कहीं हैं, उन पर कोई अमल करेगा, तो अपनी ‘रिस्क’ पर. नुकसान की जिम्मेदारी कंपनी की नहीं होगी. मगर बात शराब की भी नहीं, उस पवित्र आदमी की हो रही थी, जो मेरे सामने बैठा किसी के दुराचार पर चिंतित था.

मैं चिंतित नहीं था, इसलिए वह नाराज और दुखी था.

मुझे शामिल किए बिना वह मानेगा नहीं. वह शराब से स्त्री पर आ गया- और वह जो है न, अमुक स्त्री से उसके अनैतिक संबंध हैं.

मैंने कहा- हां, यह बड़ी खराब बात है.

उसका चेहरा अब खिल गया. बोला- है न?

मैंने कहा- हां खराब बात यह है कि उस स्त्री से अपना संबंध नहीं है.

वह मुझसे बिल्कुल निराश हो गया. सोचता होगा, कैसा पत्थर आदमी है यह कि इतने ऊंचे दर्जे के ‘स्कैंडल’ में भी दिलचस्पी नहीं ले रहा. वह उठ गया. और मैं सोचता रहा कि लोग समझते हैं कि हम खिड़की हवा और रोशनी के लिए बनवाते हैं, मगर वास्तव में खिड़की अंदर झांकने के लिए होती है.

कितने लोग हैं जो ‘चरित्रहीन’ होने की इच्छा मन में पाले रहते हैं, मगर हो नहीं सकते और निरे ‘चरित्रवान’ होकर मर जाते हैं. आत्मा को परलोक में भी चैन नहीं मिलता होगा और वह पृथ्वी पर लोगों के घरों में झांककर देखती होगी कि किसका संबंध किससे चल रहा है.

किसी स्त्री और पुरुष के संबंध में जो बात अखरती है, वह अनैतिकता नहीं है, बल्कि यह है कि हाय उसकी जगह हम नहीं हुए. ऐसे लोग मुझे चुंगी के दरोगा मालूम होते हैं. हर आते-जाते ठेले को रोककर झांककर पूछते हैं- तेरे भीतर क्या छिपा है?

एक स्त्री के पिता के पास हितकारी लोग जाकर सलाह देते हैं- उस आदमी को घर में मत आने दिया करिए. वह चरित्रहीन है.

वे बेचारे वास्तव में शिकायत करते हैं कि पिताजी, आपकी बेटी हमें ‘चरित्रहीन’ होने का चांस नहीं दे रही है. उसे डांटिए न कि हमें भी थोड़ा चरित्रहीन हो लेने दे.

जिस आदमी की स्त्री-संबंधी कलंक कथा वह कह रहा था, वह भला आदमी है- ईमानदार, सच्चा, दयालु, त्यागी. वह धोखा नहीं करता, कालाबाजारी नहीं करता, किसी को ठगता नहीं है, घूस नहीं खाता, किसी का बुरा नहीं करता.

एक स्त्री से उसकी मित्रता है. इससे वह आदमी बुरा और अनैतिक हो गया.

बड़ा सरल हिसाब है अपने यहां आदमी के बारे में निर्णय लेने का. कभी सवाल उठा होगा समाज के नीतिवानों के बीच के नैतिक-अनैतिक, अच्छे-बुरे आदमी का निर्णय कैसे किया जाए. वे परेशान होंगे. बहुत सी बातों पर आदमी के बारे में विचार करना पड़ता है, तब निर्णय होता है. तब उन्होंने कहा होगा- ज्यादा झंझट में मत पड़ो. मामला सरल कर लो. सारी नैतिकता को समेटकर टांगों के बीच में रख लो.


Wednesday, August 21, 2013

आजाद हिन्दुस्तान के शहीदों में गिने जाएंगे डा. दाभोलकर


आजाद हिन्दुस्तान के शहीदों में गिने जाएंगे डा. दाभोलकर

जन संस्कृति मंच

कल 20 अगस्त, मंगलवार के दिन पुणे में मार्निंग वाक पर निकले मशहूर अंधविश्वास-विरोधी, तर्कनिष्ठा और विवेकवादी आन्दोलनकर्ता डा. नरेन्द्र दाभोलकर की अज्ञात अपराधियों ने नृशंस ह्त्या कर दी . डा. दाभोलकर लम्बे समय से समाज में अंध-आस्था की तिजारत और राजनीति करनेवालों के निशाने पर रहे। डा. दाभोलकर की जिस दिन ह्त्या हुई , उसी दिन वे पर्यावरण की दृष्टि से हानिरहित गणेश प्रतिमाओं के आगामी त्योहारों के समय प्रयोग के लिए प्रेसवार्ता करनेवाले थे. दाभोलकर लम्बे समय से महाराष्ट्र विधानसभा में अंधविश्वास और काला-जादू विरोधी विधेयक को पास करके क़ानून बनवाने के लिए प्रयासरत थे, जिसका भारी विरोध कई तरह के साम्प्रदायिक संगठन कर रहे थे, हालांकि शिवसेना और भाजपा को छोड़कर सभी राजनीतिक दल इस विधेयक के पक्ष में थे. उनकी ह्त्या के बाद अचानक जागी पुलिस हाल के दिनों में उन्हें 'सनातन प्रभात' और 'हिन्दू जन जागृति समिति' जैसे संगठनों से मिल रही धमकियों के आरोपों की जांच कर रही है. उनकी ह्त्या काफी सुनियोजित थी क्योंकि हत्यारों को पता था कि पुणे में वे प्रायः सप्ताह के दो दिन यानी सोमवार और मंगलवार को ही रहते हैं .

डा. दाभोलकर (65) सतारा जिले में एक ऐसे परिवार में पैदा हुए थे जो समाजवादी आन्दोलन से जुड़ा हुआ था. पेशे से वे डाक्टर थे और लगभग 10 साल डाक्टरी पेशे में काम करने के बाद उन्होंने अपना जीवन सामाजिक चेतना निर्माण और परिवर्तन के लक्ष्य को समर्पित कर दिया. समाजवादी नेता बाबा अढाव के साथ 'एक गाँव, एक कुंआ' आन्दोलन में उन्होंने 1983 से काम करना शुरू किया और 1989 में उन्होंने महाराष्ट्र अंध-श्रद्धा निर्मूलन समिति का निर्माण किया. दाभोलकर तांत्रिकों, बाबाओं, चमत्कार से रोग दूर करने का दावा करनेवाले धोखेबाजों और तमाम पिछड़ी हुई धर्मानुमोदित प्रथाओं के खिलाफ आन्दोलन को स्कूलों, कालेजों और गाँव-गाँव तक ले गए. पिछले 30 वर्षों से वे लगातार ऐसे तत्वों से जूझते तथा तर्क और विवेकशीलता की चेतना निर्मित करते हुए सक्रिय रहे. इस दरमियान उन्होंने 30 से अधिक किताबें लिखीं, मराठी साप्ताहिक 'साधना' का सम्पादन किया और सतारा नशा-मुक्ति केंद्र की स्थापना भी की . सन 2000 में उन्होंने अहमदनगर के शनि शिन्गनापुर मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश के लिए ज़बरदस्त आन्दोलन चलाया. उन्होंने निर्मला देवी और नरेन्द्र महाराज जैसे बेहद ताकतवर धर्मगुरुओं को खुली चुनौती दी. इस साल होली के ठीक पहले भयानक सूखे का सामना कर रहे महाराष्ट्र में आसाराम बापू द्वारा हजारों लीटर पेयजल से होली खेले जाने को डा. दाभोलकर ने चुनौती दी और अंततः सरकार को इस पर प्रतिबन्ध लगाना पडा. 

हमारे देश में पिछडापन और सामंती अवशेष तो अंधविश्वासों के लिए ज़िम्मेदार हैं ही, भ्रष्टाचार, सट्टे और दलाल पूंजी की मार्फ़त अमीर और ताकतवर बने मुट्ठी भर लोग अपनी चंचला पूंजी की हिफाजत की दुश्चिन्ता से घिर कर ढोंगियों और आपराधिक धर्मगुरुओं के संरक्षक बने हुए हैं . इनमें राजनेता, नौकरशाह और थैलीशाह बड़े पैमाने पर शामिल हैं जिनकी सहायता के बगैर अंधश्रद्धा का अरबों-खरबों का कारोबार एक दिन नहीं चल सकता. बौद्धिक- वर्ग का भी अच्छा- खासा हिस्सा न केवल संस्कारतः अंध-श्रद्धा की चपेट में है, बल्कि कुछ लोगों ने तो इसको पालने-पोसने में निहित स्वार्थ तक विक्सित कर लिए हैं . दूसरी ओर, बड़े पैमाने पर गरीबी और बेरोज़गारी से बदहाल देश की जनता का एक बड़ा हिस्सा मानसिक राहत के लिए 'हारे को हरिनाम' की मनोदशा में ढोंगी धर्मगुरुओं, तांत्रिकों और चमत्कार से इलाज करनेवालों के चंगुल में फंसता रहता है. मीडिया बड़े पैमाने पर अंधविश्वास हर दिन परोसता है. जिस देश में आज भी अनेक स्थानों पर निर्दोष स्त्रियाँ डायन कह कर मार दी जाती हों, जहां नर-बलि तक के समाचार अखबारों की सुर्खियाँ बनते हों, जहां मनोचिकित्सा अभी भी बड़े पैमाने पर ओझा-सोखा के हवाले हो, वहां डा. दाभोलकर का काम कितना सुस्साध्य रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है. सबसे बढकर अंध-आस्था का उपयोग राजनीति और तिजारत के लिए, जनता की चेतना को दिग्भ्रमित करने के लिए ताकि वह अपनी वंचना के कारणों को जान न सके ,अपने वास्तविक हक़-हुकूक के लिए लड़ न सके, किया जाता है. ऐसे में डा. दाभोलकर पूंजी की सत्ता की आँखों में भी किरकिरी बने हुए थे. उन पर हमले पहले भी होते रहे, धमकियां पहले भी मिलती रहीं, उनकी प्रेस-वार्ताओं में पहले भी उपद्रव किया जाता रहा, लेकिन विनम्रता के साथ सादगी भरा जीवन जीते हुए वे अपने काम में अडिग बने रहे.

सन 2011 में केरल युक्ति संघम के अध्यक्ष यू. कलानाथन पर टी वी शो के दौरान तब हमला किया गया जब वे तिरुवअनंतपुरम के पद्मनाभ स्वामी मंदिर की अकूत धन संपदा के सार्थक उपयोग पर बहस कर रहे थे. इसी तरह सन 2012 में मुंबई के एक चर्च में जीजस की प्रतिमा की आँखों से आंसू निकलने को चमत्कार कहे जाने के खिलाफ जब विवेकवादी चिन्तक सनल एडामरुकु ने वैज्ञानिक कारण प्रस्तुत किए तो उन पर धार्मिक विद्वेष फैलाने का मुकदमा ठोंक दिया गया. और अब तो डा. दाभोलकर की ह्त्या ही कर दी गई है. जिन दक्षिणपंथी ताकतों ने यह घृणित कारनामा अंजाम दिया है, वे यह न भूलें कि भारत में विवेकवाद और तर्क-प्रमाणवाद की भी एक परम्परा है जो हजारों साल पुरानी है. लोकायत की हजारों साल पुरानी परम्परा को बदनाम और विरूप करने, उसके ग्रंथों को नष्ट कर डालने के बाद भी वह लोक- मनीषा में नए-नए ढंग से आकार ग्रहण करती रही. डा. नरेन्द्र दाभोलकर इसी महान परम्परा की अद्यतन कड़ी हैं. वे तर्क-प्रमाणवाद, विवेकवाद के जुझारू योद्धा के बतौर आज़ाद हिन्दुस्तान में मानसिक गुलामी के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हुए.

जन संस्कृति मंच उनकी प्रेरणादाई स्मृति को तहे-दिल से सलाम करता है. 

( सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सह-सचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी )


Monday, December 24, 2007

हैप्पी बर्थडे रफ़ी साहब




बहुत बचपन की देखी एक फ़िल्म याद आती है 'दोस्ती'. मेरी उम्र तब शायद सात आठ साल की थी, कस्बा था रामनगर. फ़िल्म देख चुकने के बाद मैं कई कई दिनों तक उसी के गीतों की लाइनें यहां वहां जोड़ कर गुनगुनाता रहता था. एक दूसरे को इतनी शिद्दत से चाहने वाले दो दोस्त - एक नेत्रहीन और एक विकलांग - और एक नन्हीं सी गुड़िया जैसी बच्ची, और एक बैसाखी और एक माउथआर्गन - यही छवियां तब भी दिमाग में तैरा करती थीं, 'दोस्ती' के किसी भी गाने को सुनकर आज भी यही छवियां आती हैं - और इन सब को सहलाती हुई सी रफ़ी साहब की धूप-छांव-धूप-छांव आवाज़: "दुख हो या सुख, जब सदा संग रहे ना कोय, फ़िर दुख को अपनाइए, कि जाए तो दुख न होय."
जब सन १९८० में रफ़ी साहब की अचानक मौत हुई, मेरे बड़े भाई ने खाने को हाथ नहीं लगाया - पूरे दो दिन तक. न मेरे भाई ने, न उस के एक दोस्त ने. दूसरे दिन पिताजी को भाईसाहब के उपवास की सूचना मिली. उन्होंने उसे झिड़कते हुए इस आकस्मिक भूख हड़ताल का सबब पूछा तो मेरा शेरदिल, बाडीबिल्डर भाई आंखों में इतने बड़े बड़े आंसू लाकर बोला: "मोहम्मद रफ़ी साब की डैथ हो गई! अब गाने कौन गाएगा!! ..." और उस के बाद उसने ज़ोरों से रोना शुरू किया. भाई का वह अविस्मरणीय रुदन शायद मेरे लड़कपन की एक निर्णायक घटना था.
मेरे बचपन और लड़कपन और जवानी और पहली मोहब्बत और पहले विरह और पहले प्रवास और जाने कितने कितने मरहलों पर मुझे अहसास हुआ है कि मोहम्मद रफ़ी साहब को याददाश्त से हटा दूं तो मेरे जीवन का बड़ा हिस्सा भूसे का ढेर बन जाएगा.

आज मोहम्मद रफ़ी साहब की ८३वीं सालगिरह है.

उनके चाहने वालों और खुद स्वर्गीय रफ़ी साहब के लिए उन्हीं का गाया : 'बूंदें नहीं सितारे, टपके हैं कहकशां से. सदक़े उतर रहे हैं तुम पर ये आस्मां से"



*रफ़ी साहब को इन जगहों पर भी सुनें:

http://kabaadkhaana.blogspot.com/2007/12/blog-post_13.html
http://kabaadkhaana.blogspot.com/2007/12/blog-post_1848.html
http://sukhansaaz.blogspot.com/2007/12/blog-post_4012.html
http://sukhansaaz.blogspot.com/2007/12/blog-post_09.html

Friday, December 21, 2007

स्मृतियों के एकांत संगीत में गोविन्द बल्लभ पंत की स्मृति और शमशेर की एक कविता

गोविन्द बल्लभ पंत का निधन ९८ वर्ष की अवस्था में २६ अगस्त १९९६ को हुआ था। अगर वे दो साल और जीवित रहते तो 'जीवेम शरदः शतम' की उक्ति को चरितार्थ करते। आश्चर्य है कि तत्कालीन संचार माध्यमों के लिए उनकी मौत कोई खबर नहीं बन सकी थी। वैसे देखा जाय तो इसमें आश्चर्य ही क्या है क्योंकि पंत जी उस युग के साहित्यकार थे जब साहित्य का मतलब सिर्फ साहित्य होता था ,साहित्यबाजी नहीं। यह भी कोई आश्चर्य की बात नहीं कि बहुधा लोग नाम की समानता के कारण उनमें और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री पं० गोविन्द बल्लभ पंत में भ्रमित हो जाया करते थे। इस बारे में कुमांऊंनी समाज में कई तरह के किस्से कहे-सुने-सुनाये जाते रहे हैं।'हिन्दी साहित्य कोश' में भी गोविन्द बल्लभ पंत-१ और गोविन्द बल्लभ पंत-२ लिखा गया है। इसमें साहित्यकार पंत पहले स्थान पर हैं और राजनेता पंत दूसरे स्थान पर।

गोविन्द बल्लभ पंत ने अठारह-उन्नीस उम्र से काव्य रचना आरंभ की। उनकी ख्याति मुख्यत: नाटककार और कथाकार के रूप में रही है। उनके नाटकों में 'कंजूस की खोपडी','राजमुकुट','वरमाला','अंत:पुर का छिद्र','अंगूर की बेटी','सुहाग बिन्दी','ययाति' आदि प्रमुख हैं। उन्होंने कई नाटक कंपनियों -व्याकुल भारत, राम विजय, न्यू एल्फ्रेड,पृथ्वी थिएटर्स आदि के लिए नाटक लिखे और अभिनय भी किया। ऐसे नाटकों में 'अहंकार','प्रेमयोगी','मातृभूमि','द्रौपदी स्वयंवर'प्रमुख हैं। पंत जी ने जीवन और जगत के विविध अनुभवों पर कई उपन्यासों की रचना की है जिनमें 'प्रतिमा','मदारी','तारिका','अमिताभ','नूरजहां','मुक्ति के बंधन','फॉरगेट मी नाट','मैत्रेय','यामिनी'आदि चर्चित रहे हैं। उनकी अन्य प्रसिद्ध रचनाओं में'विषकन्या'( एकांकी संग्रह) तथा 'एकादशी' और 'प्रदीप'(दोनों कहानी संग्रह) शामिल हैं। उन्होंने लगभग ७५ वर्षों तक लेखन किया लेकिन १९६० के बाद से वे एक रचनाकार के रूप में चुप ही रहे। अगर उनकी यह चुप्पी टूटती तो संभवत: पुस्तकों की संख्या की दृष्टि से वे महापंडित राहुल सांकृत्यायन के निकट पहुंच जाते।

मई-जून १९८८ में मैने पहली बार पंत जी को देखा-पहचाना जबकि कफी लंबे समय से नगर की साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहते हुए भी यह सुनता भर था कि प्रख्यात साहित्यकार गोविन्द बल्लभ पंत मेरे छात्रावास ब्रुकहिल के आसपास ही कहीं रहते हैं लेकिन उनसे मिलने का प्रयास कभी नहीं किया था पता नहीं वह कौन सी हिचक थी जो रोके रखती थी जबकि अन्य नये-पुराने साहित्यकारों के नैनीताल में होने की खबर मेरे जैसे नौसिखिये कलमघिस्सुओं में जोश भर देती थी और हम उनसे मिलते भी थे १९८८ की गर्मियों में शमशेर बहादुर सिंह् नैनीताल में थेइस मौके पर 'पहाड़' और 'नैनीताल समाचार ने 'एक शाम शमशेर के नाम' काव्य गोष्ठी का आयोजन कियाप्रोफेसर शेखर पाठक ने मुझे यह काम सौंपा कि कार्यक्रम की अध्यक्षता के लिये गोविन्द बल्लभ पंत जी से बात हो गई है और मैं उन्हें आयोजन स्थल सी.आर.एस.टी.इंटर कालेज तक लिवा लाऊंतब मैनें पहली बार जाना कि पंत जी के पुत्र कृषि या ऐसे ही किसी विभाग में बड़े अफसर हैं और पंत जी उन्हीं के साथ ओक पार्क में रहते हैं

खैर, नियत तारीख और समय पर मैं पंत जी के निवास पर पहुंचादरवाजा उनकी पुत्रवधु ने खोला ,मैंने अप्ना मंतव्य बताया तो उन्होने बैठने के लिये कहामैंने ध्यान दिया एक सुरुचि संपन्न बैठक,सोफे पर बैठा एक वृद्ध व्यक्ति-भूरे रंग की लंबी कमीज और सफेद पायजामा पहनेऐसा लगा इनको कहीं देखा है.. प्रणाम किया तो उन्होंने हाथ जोड़कर उत्तर दिया वे साहित्यकार गोविन्द बल्लभ पंत थे'ऐसा क्या खास है इस मनुष्य में...'मैंने गौर करना चाहाअरे! इन्हें तो अक्सर अपने छात्रावास के सामने वाली सड़क पर घूमते-टहलते देखा हैक़्या यह वही मनुष्य है जो अपने युग का चमकता हुआ सितारा था;अपने जमाने का मशहूर कथाकार और नाटककार क़्या यह वही मनुष्य है जो पं.राधेश्याम कथावाचक और पृथ्वीराज कपूर जैसी महान हस्तियों के साथ काम कर चुका है इतना ही नहीं असहयोग आंदोलन का दमदार सिपाही और एक लोकप्रिय शिक्षक भी रहा है...मुझे शर्म आई कि तब तक एकाध छिटपुट कहानियों के अतिरिक्त मैंने उनकी कोई भी किताब नहीं पढी थी,यहां तक कि बी.ए.के कोर्स में उनका नाटक 'पन्ना'शामिल था परंतु हमने उसका विकल्प 'लहरों के राजहंस'(मोहन राकेश)ही पढा था
पंत जी कार्यक्रम में आएशायद कई दशकों बाद उनकी और शमशेर जी की यह प्रत्यक्ष मुलाकात थीशमशेर जी कुछ-कुछ पूछते रहे और पंत जी चुपशमशेर जी ने अपनी दो-तीन कविताओं का पाठ किया और थक गयेडा.रंजना अरगड़े ने उनकी कुछ कवितायें पढीं, कुछ और लोगों ने भी कविता पाठ किया त्रिनेत्र जोशी अपने कैमरे से सचल और अचल तस्वीरें उतारते रहेपंत जी चुप मुस्कुराते रहेशमशेर जी का भी यही हाल थाहम सबके लिए यह एक साथ एक मंच पर 'दो सितारों के मिलन' का एक ऐसा अद्भुत क्षण था जो दोबारा लौटकर नहीं आने वाला थाकार्यक्रम सफल रहा इसके बाद लगभग दो साल तक मैं प्रायः रोज ही पंत जी को छड़ी थामे सड़क पर टहलते हुये देखता रहाकभी सामने पड़ जाने पर प्रणाम भी करता और वह कुछ पहचानने की कोशिश करते हुए आगे बढ जातेमन करता था कि उनके साथ चलूं,ढेर सारी बातें पूछूं,ढेर सारी बातें सुनूं लेकिन वे इतने चुप-चुप रहते थे कि उनके एकांत संगीत की लय में खलल डालने की हिम्मत नहीं होती थीवक्त गुजरता रहा और मैं पंत जी को दूर से देखते हुए उनके साहित्य के निकट आता रहा

अंततः एक दिन मेरी पढाई पूरी हुई और सरोवर नगरी से प्रत्यक्ष नाता टूटाइस बीच देश-दुनिया में बहुत कुछ बना,बिगड़ा,बदलाइस बीच कई साहित्यकरों क निधन हुआ और पत्र-पत्रिकाओं ,रेडियो- टी.वी.पर उनको खूब याद किया गया यह जरूरी भी था और जायज भी लेकिन उस वक्त जब गोविन्द बल्लभ पंत का निधन हुआ था तब उनके स्मरण को लेकर जो ठंडापन व्याप्त हुआ था वह आज तक दिखाई देता है-अनुभव होता हैऐसा ठंडापन क्या यह प्रदर्शित-प्रकट नहीं करता है कि आज की दुनिया में आप तभी तक महान हैं जब तक कि मंच पर हैं और मुखर हैं

शमशेरबहादुर सिंह की कविताः महुवा

यह अजब पेड़ है जिसमें कि जनाब
इस कदर जल्द कली फूटती है
कि अभी कल देखो
मार पतझड़ ही पतझड़ था इसके नीचे
और अब
सुर्ख दिये,सुर्ख दियों का झुरमुट
नन्हें-नन्हें,कोमल
नीचे से ऊपर तक -
झिलमिलाहट का तनोबा मानो-
छाया हुआ हैयह अजब पेड़ है
पत्ते कलियां
कत्थई पान का चटक रंग लिये -
इक हंसी की तस्वीर -
(खिलखिलाहट से मगर कम- दर्जे)
मेरी आंखों में थिरक उठती है

मुझको मालूम है ,ये रंग अभी छूटेंगे
गुच्छे के गुच्छे मेरे सर पै हरी
छतरियां तानेंगेः गुच्छे के गुच्छे ये
फिर भी,फिर भी, फिर भी
एक बार और भी फिर भी शाम की घनघोर घटायें
-आग-सी लगी हो जैसे हर -सू-
सर पै छा जाएँगी :
कोई चिल्ला के पुकारेगा ,कि देखो,देखो
यही महुवे का महावन है !

Wednesday, December 12, 2007

कामरेड शिव कुमार मिश्र जी का निधन

दुख के साथ सूचित करना पड रहा है कि कानपुर में रहने वाले कामरेड शिव कुमार मिश्र का आज कानपुर में निधन हो गया. 'काकोरी से नक्सलबाडी तक' जैसी एतिहासिक मह्त्व की किताब लिख लिख चुके और भारत के तमाम आन्दोलनों में हिस्सा ले चुके मिश्र जी के जाने के साथ ही एक युग अपने अवसान पर पहुंच गया. अपनी सतत सचेत, सतत कार्यवान मेधा और बुलन्द जीवनशक्ति के बूते पर हज़ारों लोगों को प्रेरित करने वाले शिव कुमार मिश्र जी को हम सब बहुत इज़्ज़त से याद करते हुए उनके चले जाने पर दुखी हैं और उनके परिजनों व मित्रों के प्रति सम्वेदना व्यक्त करते हैं.

*अभी यह सिर्फ़ सूचना भर है. एकाध दिनों में उन पर विस्तार से कुछ लिख भेजने का एक साथी (बरेली से प्रोफ़ेसर जावेद साहब) ने वायदा किया है.

Monday, December 10, 2007

बाबा त्रिलोचन:धरती का कवि अनंत में


बाबा नहीं रहे।

हम सबके बाबा त्रिलोचन २० अगस्त १९१७ को चिरानी पट्टी, सुल्तानपुर में जन्मे और ९ दिसम्बर २००७ को दिल्ली में अनंत यात्रा पर चले गए। इस कवि, लेखक, कोष निर्माता और संपादक का जीवन और साहित्य विविध और विपुल है। अपने अन्तिम वर्षों वे लगभग भुला से दिए गए थे।हिन्दी साहित्य और हिन्दी भाषी समाज का यह कमीनापन , यह क्रूरता नयी बात नहीं है।


'कबाड़खाना ' बाबा त्रिलोचन को याद करते हुए कृतज्ञता पूर्वक यह भी याद कर रह है कि १९९२ में अशोक पांडे के कविता संग्रह 'देखता हूँ सपने' का विमोचन उन्होंने ही किया था। शमशेर, नागार्जुन,केदार के बाद हिन्दी का यह बड़ा स्तंभ ढहा है। नमन।

बाबा की एक कविता:

परिचय की गाँठ


यूं ही कुछ मुस्काकर तुमने
परिचय की वो गांठ लगा दी!

था पथ पर मैं भूला भूला
फूल उपेक्षित कोई फूला

जाने कौन लहर ती उस दिन

तुमने अपनी याद जगा दी।


कभी कभी यूं हो जाता है
गीत कहीं कोई गाता है

गूंज किसी उर में उठती है

तुमने वही धार उमगा दी।


जड़ता है जीवन की पीड़ा
निस्-तरंग पाषाणी क्रीड़ा
तुमने अन्जाने वह पीड़ा
छवि के शर से दूर भगा दी।

(बाबा का फोटो इरफान कबाड़ी के संग्रह से साभार)