Showing posts with label युवाल नोह हरारी. Show all posts
Showing posts with label युवाल नोह हरारी. Show all posts

Monday, July 24, 2017

मकसद काम से नहीं बल्कि कल्पनाओं से पैदा होता है


बे-काम दुनिया में जीवन का अर्थ
- युवाल नोह हरारी
(अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)

जिस तरह टेक्नोलॉजी नौकरियों को निगल रही है, उसे देखते हुए भविष्य में हमारे पास करने को क्या रह जाएगा? चर्चित पुस्तक 'सेपियंस' के लेखक युवाल नोह हरारी इस तरह उपजे 'बे-काम वर्ग' और जीवन के मकसद की नई खोज का जायजा ले रहे हैं.

आज दिखाई पड़ने वाली ज्यादातर नौकरियां आगामी चंद दशकों में नहीं रहेंगी. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) तमाम किस्म के कामों में जिस तरह इंसानों को पीछे छोड़ रही है, उसे देखते हुए लगता है कि अधिकांश पेशों में यह उन्हें बेदखल कर डालेगी. संभव है कई नए पेशे उभर के आएं - जैसे आभासी दुनिया के डिजाइनर. लेकिन इन पेशों के लिए ऊंचे स्तर की रचनात्मकता व बौद्धिक लचीलेपन की ज़रूरत होगी. यह अभी साफ़ नहीं है कि 40 साल का बेरोजगार टैक्सी ड्राइवर या बीमा एजेंट खुद को इस किस्म के पेशों के लिए दोबारा तैयार कर पाएगा या नहीं. (किसी बीमा एजेंट द्वारा डिजाइन किए गए आभासी संसार की कल्पना कीजिए!). मान लीजिए एक पूर्व-बीमा एजेंट किसी तरह खुद को आभासी दुनिया के डिजायनर के रूप में ढाल लेता है. मगर प्रगति की रफ़्तार इतनी तेज़ होगी कि एक दशक के भीतर उसके सामने खुद को फिर किसी नयी भूमिका के लिए तैयार करने की चुनौती खड़ी हो जाएगी.
मूल समस्या नई नौकरियों को पैदा करने की नहीं है. मूल समस्या ऐसी नौकरियों के सृजन की है जिसमें इंसान मशीनी अल्गोरिदम पर भारी पड़ते हों. परिणामस्वरूप, सन 2050 तक ऐसे लोगों का नया वर्ग पैदा हो जाएगा जो बेकाम (अनुपयोगी) होंगे. ऐसे लोग जो न केवल बेरोजगार होंगे बल्कि किसी रोजगार लायक भी नहीं होंगे.
जो टेक्नोलॉजी इंसानों को बे-काम बनाती है, संभव है वही न्यूनतम आय की किसी वैश्विक योजना के तहत उन्हें खिलाने और जिंदा रखने में काम आए. मगर उसके बाद असल समस्या ऐसे लोगों को व्यस्त और संतुष्ट रखने की होगी. लोगों को उद्देश्यपूर्ण गतिविधियों में लगाए रखना पड़ता है. वर्ना खाली दिमाग शैतान का घर समझिए. बेकाम लोगों का समूचा वर्ग दिन-भर करेगा क्या?
इस सवाल का एक जवाब हो सकता है कंप्यूटर गेम्स. आर्थिक तौर पर अनुपयोगी हो चुके लोग ज्यादातर समय 3 डी वर्चुअल रियलिटी गेम्स खेलते हुए बिता सकते हैं. इसमें उन्हें बाहर की "वास्तविक दुनिया" के मुकाबले ज्यादा रोमांच व भावनात्मक संतुष्टि मिलेगी. सच कहें तो यह एक बहुत पुरानी आजमाई हुई तरकीब है. पहले भी हम ऐसे वर्चुअल रियलिटी गेम्स की खोज कर चुके हैं. इन्हें हम "मजहब" या "धर्म" के नाम से जानते हैं.
मजहब अगर करोड़ों लोगों द्वारा एक साथ खेला जाने वाले बहुत बड़ा वर्चुअल रियलिटी गेम नहीं है तो फिर क्या है? इस्लाम और ईसाईयत जैसे मजहबों ने काल्पनिक नियम बनाए- जैसे "सूअर का मांस मत खाओ", "हर दिन एक ख़ास बार एक ही प्रार्थना दोहराओ", "अपने ही लिंग के किसी सदस्य के साथ सम्बन्ध मत बनाओ", आदि-इत्यादि. सिर्फ इंसानी कल्पनाओं में ही इस तरह के नियमों का अस्तित्व है. प्राकृतिक व्यवस्थाओं में कहीं भी किसी जादुई फार्मूले को दोहराने की ज़रूरत नहीं पड़ती. किसी भी प्राकृतिक नियम के तहत समलैंगिकता या सूअर का मांस खाने पर प्रतिबंध नहीं है. मुसलमान और ईसाई ज़िन्दगी भर अपने मनपसंद वर्चुअल रियलिटी गेम में पॉइंट कमाने का जतन करते रहते हैं. अगर आप दिन भर प्रार्थना करते हैं तो आपको पॉइंट मिलेंगे. अगर आप प्रार्थना करना भूल गए तो आप पॉइंट खोएंगे. अगर जीवन के अंत तक अच्छे पॉइंट बन जाते हैं तो मरने के बाद आप खेल के अगले लेवल (यानी जन्नत) तक पहुंच जाएंगे.
जैसा कि तमाम मजहब हमें बताते हैं, वर्चुअल रियलिटी को किसी अलग-थलग बक्से में बंद नहीं किया जा सकता. बल्कि भौतिक वास्तविकता के ऊपर इसका मुलम्मा चढ़ाया जा सकता है. अतीत में भी इंसानी कल्पनाओं व पवित्र पुस्तकों के जरिए ऐसा किया जा चुका है.
कुछ समय पहले मैं अपने छः वर्षीय भतीजे मतान के साथ पोकेमोन के शिकार पर निकला. हम सड़क पर नीचे उतर रहे थे, मतान अपने स्मार्टफोन पर नज़रें गड़ाए हुए था, जिस कारण वह हमारे आसपास मौजूद पोकेमोनों को देख पा रहा था. मुझे कहीं कोई पोकेमोन नज़र नहीं आया क्योंकि मेरे पास स्मार्टफोन नहीं था. तभी हमें सड़क पर दो और बच्चे दिखाई दिए. वे दोनों भी उसी पोकेमोन के पीछे पड़े थे और हम उनसे लगभग उलझ पड़े. इस बात ने मुझे अहसास कराया कि ठीक ऐसी ही परिस्थितियों में यहूदी और मुसलमान पवित्र शहर यरुसलम के लिए आपस में लड़ते हैं. जब आप यरुसलम की वस्तुगत सच्चाई पर गौर करते हैं, तो आपको सिर्फ पत्थर और इमारतें ही नज़र आती हैं. पवित्रता का कहीं कोई निशान नहीं है. लेकिन जैसे ही आप इस शहर को स्मार्टबुक्स (जैसे बाइबल और कुरआन) के नज़रिए से देखते हैं तो आपको हर जगह पवित्र स्थान और देवदूत ही देवदूत नज़र आने लगते हैं.
वर्चुअल रियलिटी गेम्स खेलते हुए जीवन में अर्थ की तलाश का मामला सिर्फ मजहबों तक सीमित नहीं है. यह तलब धर्मनिरपेक्ष विचारधाराओं और जीवन शैलियों में भी देखी जा सकती है. उपभोक्तावाद भी एक वर्चुअल रियलिटी गेम है. आप नई कार, महंगे ब्रांड्स खरीदकर और विदेशों में छुट्टियां बिताकर पॉइंट कमा सकते हैं. और अगर आपके बाकी लोगों से ज्यादा पॉइंट्स हैं तो आप कह सकते हैं कि आप गेम जीत गए हैं.
आप ऐतराज कर सकते हैं कि लोग वास्तव में अपनी कार या छुट्टियों का आनंद लेते हैं. यह वस्तुतः सच भी है. लेकिन धार्मिक लोगों को भी पूजा व कर्मकांड करने में सचमुच आनंद आता है और मेरा भतीजा भी पोकेमोन के शिकार में खूब आनंदित होता है. अंततः असली कार्रवाई हमेशा इंसानी दिमाग के भीतर ही होती है. क्या इस बात से कोई फर्क पड़ता है कि तंत्रिकाएं कंप्यूटर स्क्रीन पर आने वाले चित्रों को देखकर उत्तेजित होती हैं, या किसी कैरेबियाई रिजोर्ट की खिड़की से बाहर झाँकने पर या फिर मन की आँखों से दिखने वाले स्वर्ग को देखकर? सभी मामलों के मद्देनज़र जीवन का जो भी अर्थ हम निकालते हैं वह हमारे दिमाग का पैदा किया हुआ ही होता है. वास्तव में "वहां बाहर" कुछ नहीं होता. अब तक की ताज़ातरीन वैज्ञानिक जानकारी के मुताबिक़ इंसानी जीवन का कोई मकसद नहीं है. जीवन के बताए गए तमाम मकसद इंसानों द्वारा गढ़ी गई कोरी कल्पना मात्र हैं.
अपने अभूतपूर्व निबंध - डीप प्ले: बालीनीज कॉक फाइट (1973) में मानवशास्त्री क्लिप्फोर्ड गीर्त्ज़ बताते हैं कि किस तरह बाली द्वीप के लोग अपना ज्यादातर वक़्त और पैसा कॉकफाइट यानी मुर्गों की लड़ाइयों पर दांव लगाने में खर्च कर डालते हैं. दांव और लड़ाइयों का आयोजन भरपूर कर्मकाण्डों के साथ होता है. इनके नतीजों का भारी असर खेलने वालों व दर्शकों दोनों की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक हैसियत पर पड़ता है.
कॉकफाइट की लड़ाई बालीवासियों के लिए इतनी अहम है कि इंडोनेशिया की सरकार ने जब इस परम्परा को अवैध घोषित किया तो लोगों ने क़ानून को ठेंगा दिखाते हुए इसे खेला और गिरफ्तारी व भारी जुर्माना देना मंज़ूर किया. बालीवासियों के लिए कॉकफाइट्स "डीप प्ले" थीं- रचा गया ऐसा खेल जिसे इतने अर्थ प्रदान किए गए कि वह वास्तविकता में बदल गया. बाली का कोई मानवशास्त्री इसी तरह के तर्कों के साथ अर्जेंटीना के फुटबॉल या इजराइल के यहूदी धर्म के बारे में भी ऐसा ही निबंध लिख सकता है.
बेशक, इजरायली समाज का एक ख़ास दिलचस्प हिस्सा यह दिखाता है कि कार्य-विहीन दुनिया में संतोष के साथ कैसे रहा जाय. इजरायल में अति-रूढ़िवादी यहूदी पुरुष कभी काम नहीं करते. वे अपना पूरा जीवन पवित्र पुस्तकों को पढ़ने और धार्मिक कर्मकाण्डों में बिता देते हैं. वे और उनके परिवार कभी भूखे नहीं मरते हैं क्योंकि उनकी पत्नियां अक्सर घर चलाने के लिए काम करती हैं. इसके अलावा सरकार से भी उन्हें थोड़ी-बहुत इमदाद मिल जाती है. हालांकि उनका जीवन अमूमन ग़ुरबत में ही बीतता है, मगर सरकारी मदद मिल जाने से जीवन की बुनियादी ज़रूरतें तो पूरी हो ही जाती हैं.
इसे आप कामकाजी वैश्विक बुनियादी आय कह सकते हैं. हालांकि वे गरीब हैं और कभी काम नहीं करते, लेकिन तमाम सर्वेक्षणों में ये अति-रूढ़िवादी यहूदी पुरुष अपने जीवन में इजरायली समाज के अन्य हिस्सों की तुलना में ज्यादा संतुष्ट होने का दावा करते हैं. जीवन संतुष्टि के वैश्विक सर्वेक्षणों में इजरायल यदि शीर्ष देशों में गिना जाता है, तो इसके लिए इन बेरोजगार डीप प्लेयरों के योगदान को धन्यवाद कहना होगा.
कार्य-विहीन दुनिया का नक्शा कैसा होगा इसे जानने के लिए आपको इजरायल जाने की कतई ज़रूरत नहीं. अगर आपके घर में कोई किशोर वय का बेटा है जिसे कंप्यूटर गेम्स का चस्का है तो आप खुद ही अपना प्रयोग कर सकते हैं. उसे कोक व पिज्ज़ा का उसका न्यूनतम कोटा मुहैया करा दें और काम करने व पितृवत देखरेख से जुड़े अपने तमाम आदेशों को स्थगित कर दें. आप देखेंगे कि वह कई-कई दिनों तक अपने कमरे से बाहर नहीं निकलेगा और कंप्यूटर स्क्रीन से चिपका रहेगा. न तो वह स्कूल का होमवर्क करेगा और न ही घर का काम. स्कूल से बंक मारेगा, लंच-डिनर नहीं करेगा और हो सकता है नहाना और सोना भी छोड़ दे. इसके बावजूद वह बोर नहीं होगा और न ही उसे जीवन बेमतलब लगेगा. कम से कम कुछ समय के लिए तो आप यह मान ही सकते हैं.
इसलिए कार्य-विहीन दुनिया के बेकाम हो चुके वर्ग को जीवन के मकसद का अहसास कराने में वर्चुअल रियलिटी एक महत्वपूर्ण उपकरण बनने जा रही है. संभव है ये वर्चुअल रियलिटी कंप्यूटर के भीतर पैदा हो. यह भी हो सकता है कि यह किसी नए धर्म और विचारधारा की शक्ल में कंप्यूटर के बाहर पैदा हो. यह भी संभव है इन दोनों के संगम से कोई चीज़ तैयार हो. संभावनाएं असीमित हैं और पक्के तौर पर कोई नहीं जानता कि 2050 में हमें किस किस्म के डीप प्ले व्यस्त रखेंगे.
किसी भी हाल में, कार्य की समाप्ति का यह कतई मतलब नहीं कि मकसद का भी अंत हो जाएगा. क्योंकि मकसद काम से नहीं बल्कि कल्पनाओं से पैदा होता है. काम मकसद के लिए ज़रूरी है यह सिर्फ कुछ विचारधाराओं और जीवनशैलियों का ही दावा है. अठारहवीं सदी के ग्रामीण अंग्रेज जमींदार, आज के अति-रूढ़िवादी यहूदी और सभी युगों व संस्कृतियों के बच्चे बिना काम किये जीवन में ढेर सारा मकसद और मज़ा पाते रहे हैं. 2050 के लोग शायद ज्यादा गहरे डीप गेम्स को खेलने और इतिहास के किसी भी दौर से ज्यादा जटिल आभासी दुनिया को गढ़ पाने में कामयाब होंगे.
लेकिन सत्य का क्या होगा? वास्तविकता का क्या होगा? क्या हम ऐसी दुनिया में रहना चाहेंगे जहां अरबों लोग कल्पना लोक में डूबे हों, खुद के गढ़े उद्देश्यों में विश्वास रखते हों और काल्पनिक नियम-कानूनों का पालन करते हों? आप इसे पसंद करें या न करें, हम हजारों सालों से ऐसी ही दुनिया में रहते आ रहे हैं.

युवाल नोह हरारी यरूसलम स्थित हिब्रू यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं. उनकी दो किताबें- सेपियंस: अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ़ ह्यूमनकाइंड और होमो डयूस: अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ़ टुमारो काफी चर्चित रही हैं.
(अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)


Wednesday, September 2, 2015

अनुपयोगी लोगों के वर्ग के पैदा हो जाने की संभावना - युवाल नोह हरारी


युवाल नोह हरारी का एक संक्षिप्त इंटरव्यू

----------

ब्रूनो जिउसानी: युवाल आपकी नई किताब आई है. सेपियंस के बाद यह आपकी दूसरी किताब है. फिलहाल यह हिब्रू में है और अभी तक इसका अनुवाद ... 
युवाल नोह हरारी: मैं इसके अनुवाद पर काम कर रहा हूं.
बीजी:    इस किताब में, अगर मैंने ठीक-ठीक समझा है, आप कहते हैं कि इस वक्त जो हैरतंगेज खोजें हो रही हैं उनसे न सिर्फ हमारी ज़िन्दगी बेहतर होगी बल्कि ये, आपके मुताबिक, "नए वर्गों और वर्ग संघर्षों को भी जन्म देंगी." क्या आप इस पर थोड़ा और प्रकाश डालेंगे.
युवाल:   ज़रूर. औद्योगिक क्रांति में हमने शहरी सर्वहारा के रूप में नए वर्ग को जन्मते हुए देखा था. पिछले 200 वर्षों का राजनीतिक और सामाजिक इतिहास इस वर्ग की समस्याओं और सम्भावनाओं के इर्द-गिर्द घूमता रहा है. आज हम अनुपयोगी हो चुके लोगों के एक और बड़े वर्ग को जन्म लेते हुए देख रहे हैं. जैसे-जैसे कंप्यूटर अधिकांश क्षेत्रों में बेहतर से बेहतर होते जाएंगे, एक दूरगामी संभावना बनती है कि ज्यादातर कामों में कंप्यूटर हमें पीछे छोड़ दें और मनुष्यों को अनावश्यक बना दें. तब 21वीं सदी का सबसे बड़ा राजनीतिक और आर्थिक सवाल होगा, "इंसानों की क्या सचमुच ज़रूरत है?" या कम से कम, "क्या हमें इतने ज्यादा इंसानों की ज़रूरत है?"
बीजी:    क्या इस किताब में आपने कोई हल सुझाया है?
युवाल:   फिलहाल सबसे अच्छा अंदाजा हम यही लगा सकते हैं कि अनुपयोगी हो चुके इंसानों की इस विशाल आबादी को दवाओं और कंप्यूटर गेम्स की मदद से खुश रखा जाय. लेकिन भविष्य की यह तस्वीर बहुत अच्छी नहीं जान पड़ती.
बीजी:    तो कुल मिलाकर इस किताब में और अभी आप बहुत ज्यादा आर्थिक असमानता के प्रमाणों के बारे में बताना चाहते हैं, जैसा कि इस प्रक्रिया की शुरुआत में था?
युवाल:   मैं फिर दोहराना चाहूंगा कि इसे भविष्यवाणी न समझा जाय. हमारे सामने कई सारी संभावनाएं मौजूद हैं. एक संभावना एक बहुत बड़े अनुपयोगी लोगों के वर्ग के पैदा हो जाने की है. दूसरी संभावना है कि मनुष्य जाति दो अलग-अलग जैविक उपजातियों में बंट जाय- पैसे वाले खुद को आभासी देवताओं में अपग्रेड कर लें और गरीब लोग अनुपयोगी हो चुके मनुष्यों के स्तर पर आ जाएं.
[अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय]

Tuesday, September 1, 2015

क्यों करते हैं इंसान धरती पर राज

[प्रो. युवाल नोह हरारी यरुशलम विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाते हैं. उनके लिए इतिहास संस्कृति के जन्म के साथ शुरू नहीं होता बल्कि वह उसे बहुत-बहुत पीछे ब्रहमांड के उद्भव तक ले जाते हैं. इतिहास को जैविक उद्विकास के नज़रिए (ईवोल्युशनरी पर्सपेक्टिव) से देखने का उनका तरीका उन्हें ख़ास बनाता है. पढ़िए TED TALKS में दिया उनका हालिया भाषण. - आशुतोष उपाध्याय]


प्रोफ़ेसर युवाल नोह हरारी

क्यों करते हैं इंसान धरती पर राज
युवाल नोह हरारी

पचहत्तर साल पहले हमारे पुरखे मामूली जानवर थे. प्रागैतिहासिक इंसानों के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात हम यही जानते हैं कि वे ज़रा भी महत्वपूर्ण नहीं थे. धरती में उनकी हैसियत एक जैली फिश या जुगनू या कठफोड़वे से ज्यादा नहीं थी.  इसके विपरीत, आज हम इस ग्रह पर राज करते हैं. और सवाल उठता है: वहां से यहां तक हम कैसे पहुंच गए? हमने खुद को अफ्रीका के एक कोने में अपनी ही दुनिया में खोए रहने वाले मामूली वानर से पृथ्वी के शासक में कैसे बदल डाला?
अमूमन हम अपने और अन्य सभी जानवरों के बीच व्यक्तिगत स्तर पर अंतर खोजते रहते हैं. हम यह विश्वास करना चाहते हैं- मैं यह विश्वास करना चाहता हूं- कि मुझ में कुछ तो ख़ास है, मेरे शरीर में, मेरे दिमाग़ में, जो मुझे एक कुत्ते या एक सूअर या एक चिम्पैंजी से श्रेष्ठ बनाता है.
लेकिन सच यही है कि मैं शर्मिंदगी की हद तक एक चिम्पैंजी जैसा ही हूँ. अगर आप मुझे और एक चिम्पैंजी को साथ-साथ किसी निर्जन द्वीप पर छोड़ दें, और पूछें कि खुद को जिन्दा रखने के संघर्ष में कौन बेहतर साबित होगा. तो इस सवाल पर मैं खुद अपने बजाय चिम्पैंजी पर दांव लगाना चाहूंगा. ऐसा कतई नहीं कि व्यक्तिगत रूप से मुझमें कोई गड़बड़ी है. मेरा अंदाज़ा है कि आप में से किसी को भी अगर चिम्पैंजी के साथ उस द्वीप में छोड़ दिया जाय, चिम्पैंजी हर हाल में आप पर भारी पड़ेगा.
मनुष्य और अन्य सभी जानवरों के बीच वास्तविक अंतर व्यक्तिगत स्तर पर नहीं होता; दरअसल यह अंतर सामूहिक स्तर पर होता है. इंसान पृथ्वी पर इसलिए राज कर पाते हैं, क्योंकि वे अकेले ऐसे जानवर हैं जो बड़े लचीलेपन से और बहुत बड़ी संख्या में सहयोगपूर्ण व्यवहार कर पाने में सक्षम हैं.
हां, कुछ और जीव भी हैं- जैसे सामाजिक कीट, मधुमक्खियां, चींटियां- ये भी बहुत बड़ी संख्या में सहयोगपूर्ण व्यवहार करते  हैं, लेकिन उनके सहयोग में लचीलापन नहीं होता. वे अत्यंत अनम्य तरीके से सहयोग करते  हैं. मधुमक्खियों के छत्तों का कामकाम सिर्फ एक ही तरीके से चलता है. और अगर कहीं कोई नई संभावना या कोई नया खतरा पैदा हो जाय तो मधुमक्खियां अपनी सामाजिक व्यवस्था को रातों-रात नहीं बदल सकतीं. उदाहरण के लिए, वे अपनी रानी को फांसी के तख्ते पर टांगकर मधुमक्खियों का गणतंत्र या फिर कामगार मधुमक्खियों का साम्यवादी अधिनायकत्व स्थापित नहीं कर सकतीं.
अन्य जानवर, जैसे सामाजिक स्तनधारी- भेड़िए, हाथी, डोल्फिन और चिम्पैंजी- कहीं ज्यादा लचीलेपन के साथ सहयोगपूर्ण व्यवहार करते हैं. लेकिन वे ऐसा बहुत छोटी संख्या में कर पाते हैं. क्योंकि चिम्पैंजियों के बीच यह सहयोग एक दूसरे के बारे में बेहद करीबी जानकारी के आधार पर होता है. मैं एक चिम्पैंजी हूं और आप एक चिम्पैंजी हैं और मैं आपके साथ सहयोग करना चाहता हूं. इसके लिए मुझे आपको व्यक्तिगत तौर पर जानना होगा. आप किस किस्म के चिम्पैंजी हैं? क्या आप एक नेक चिम्पैंजी हैं? क्या आप एक दुष्ट चिम्पैंजी हैं. क्या आप पर भरोसा किया जा सकता है? अगर मैं आपको नहीं पहचानता तो मैं कैसे आपके साथ सहयोग कर सकता हूं?
अकेला जीव, जिसे इन दोनों खूबियों- बहुत बड़ी संख्या में और भरपूर लचीलेपन के साथ सहयोगपूर्ण व्यवहार करने में महारत हासिल है, वह हम मनुष्य ही हैं- होमो सेपियंस. एक बनाम एक या यहां तक कि 10 बनाम 10 के लिहाज से, चिम्पैंजी हम पर भारी पड़ेंगे. लेकिन अगर आप 1000 इंसानों को 1000 चिम्पैंजियों के सामने खड़ा कर देंगे, तो इंसान आसानी से बाज़ी मार ले जाएंगे. वजह बेहद मामूली कि हजार चिम्पैंजी सहयोगपूर्ण ढंग से कतई नहीं रह सकते. और अगर आप एक लाख चिम्पैंजियों को ऑक्सफ़ोर्ड स्ट्रीट या वेम्बली स्टेडियम या तिएनमान चौक या वेटिकन में धकेल देंगे तो वहां पूरी तरह अफरा-तफरी मच जाएगी. जरा कल्पना कीजिए- एक लाख चिम्पैंजियों से भरे वेम्बली स्टेडियम की! पागलपन की हद.
इसके विपरीत, इंसान सामान्यतया हजारों-लाखों की तादाद में इकठ्ठा होते हैं और आम तौर पर जरा भी अफरा-तफरी नहीं होती. बल्कि दिखाई देता है सहयोग का अत्यंत परिष्कृत और प्रभावशाली नेटवर्क. समूचे इतिहास में दर्ज़ महान इंसानी उपलब्धियां- चाहे वह पिरामिडों का निर्माण हो या फिर चांद का सफ़र- किसी की व्यक्तिगत क्षमताओं का नतीजा नहीं बल्कि बड़ी संख्या में भरपूर लचीलेपन के साथ मिलजुलकर काम करने की हमारी क्षमता का परिणाम है.
अब इस भाषण को ही लीजिए, जो इस वक्त मैं आपके- लगभग 300 या 400 श्रोताओं- के सामने दे रहा हूं. आपमें से अधिकतर को मैं बिलकुल नहीं जानता. इसी प्रकार, मैं आज के इस आयोजन की योजना बनाने वाले और उसे अंजाम देने वाले सभी लोगों को नहीं जानता. मैं उस विमान के पायलट और उसके क्रू मेम्बर्स को नहीं जानता जो कल मुझे यहां लन्दन लेकर आया. मैं उन लोगों को नहीं जानता जिन्होंने मेरी बातों को रिकॉर्ड करने वाले इस माइक्रोफोन और इन कैमरों को खोजा और बनाया. मैं उन लोगों को नहीं जानता, जिनकी किताबों और लेखों को मैंने इस भाषण की तैयारी के लिए पढ़ा. और निश्चय ही मैं उन तमाम लोगों को भी नहीं जानता जो ब्यूनस आयर्स या नई दिल्ली में कहीं बैठे इंटरनेट पर मेरे इस भाषण को देख रहे हैं. बावजूद इसके कि हम एक-दूसरे को नहीं जानते, हम विचारों के वैश्विक आदान-प्रदान के लिए एक साथ काम कर सकते हैं .
यह एक ऐसी चीज़ है जो चिम्पैंजी नहीं कर सकते. बेशक वे आपस में संवाद कर सकते हैं, लेकिन आप ऐसे चिम्पैंजी को नहीं ढूंढ सकते जो कहीं दूर किसी और चिम्पैंजी झुण्ड को, केलों या हाथियों या उनकी दिलचस्पी के किसी अन्य विषय पर भाषण देने के लिए यात्रा कर रहा हो.
हां, सहयोग बेशक हमेशा किसी अच्छी बात के लिए ही होता हो, ऐसा नहीं है. समूचे इतिहास में इंसानों ने जितने भी वीभत्स कृत्य किए हैं- और आज भी हम कई अत्यंत वीभत्स कृत्य कर रहे हैं- ये सभी काम बड़ी संख्या में किए जाने वाले सहयोगपूर्ण व्यवहार का परिणाम हैं. जेल सहयोग से पैदा होने वाली व्यवस्था है; जनसंहार केंद्र सहयोग आधारित व्यवस्था है; यातना शिविर सहयोग आधारित व्यवस्था है. चिम्पैंजियों के पास जनसंहार केंद्र और जेल और यातनाशिविर नहीं होते.
अब मान लीजिए मैं आपको यह समझाने में सफल हो जाता हूं कि हम धरती पर इसलिए शासन कर पाते हैं क्योंकि हममें लचीलेपन सहित बड़ी संख्या में सहयोग करने की क्षमता है. एक जिज्ञासु श्रोता के मन में इस दावे से तुरंत यह सवाल पैदा हो सकता है: ऐसा हम ठीक-ठीक कैसे कर पाते हैं? तमाम जानवरों से अलग वह कौन सी बात है जो एकमात्र हमें इस तरह सहयोग कर पाने लायक बनाती है?
इसका जवाब है हमारी कल्पनाशक्ति. हम असंख्य अजनबियों के साथ लचीलेपन सहित इसलिए सहयोग कर पाते हैं, क्योंकि इस ग्रह के सभी जीवों में अकेले हम कपोल कल्पनाएं करने व कहानियां गढ़ने और उन पर विश्वास करने में सक्षम हैं. जब तक लोग इन कहानियों में विश्वास करते रहेंगे, वे इसके नियमों, उसूलों और मूल्यों का पालन करेंगे.
बाकी सभी जीव अपने संवाद तंत्र का इस्तेमाल यथार्थ को प्रकट करने भर के लिए करते हैं. एक चिम्पैंजी कह सकता है, "देखो! वहां शेर बैठा है, चलो भाग चलें!" या, "देखो! वो वहां केले का पेड़ है! चलो चलकर केले खाएं!" इसके विपरीत, मनुष्य अपनी भाषा का इस्तेमाल यथार्थ का वर्णन करने मात्र के लिए नहीं करता, बल्कि नए यथार्थ, काल्पनिक यथार्थ गढ़ने के लिए भी करता है. एक मनुष्य कह सकता है, "देखो, वहां ऊपर आसमान में भगवान बैठे हैं! और अगर तुम मेरे कहे अनुसार आचरण नहीं करोगे तो तुम्हारी मृत्यु के बाद वह तुम्हें दंड देंगे. तुम्हें नर्क में भेज देंगे." अगर आप सब मेरी गढ़ी हुई इस कहानी पर विश्वास करेंगे तो आप उसमें सुझाए गए तौर-तरीकों, नियमों व मूल्यों का अनुसरण करने लगेंगे और उसकी मान्यताओं के आधार पर सहयोग करने लगेंगे. यह एक ऐसी चीज़ है जो सिर्फ इंसान ही कर सकते हैं.
आप किसी चिम्पैंजी को यह कहकर नहीं पटा सकते कि "अगर तुम यह केला मुझे दे दोगे तो मरने के बाद तुम्हें चिम्पैंजियों का स्वर्ग नसीब होगा..." "... और अपने अच्छे कर्मों के लिए तुम्हें वहां केले के ढेर के ढेर मिलेंगे."  कोई चिम्पैंजी इस तरह की कहानी में कभी भी विश्वास नहीं करेगा. सिर्फ इंसान ऐसी कहानियों में विश्वास करते हैं. और इसी वजह से हम इस दुनिया में राज कर पाते हैं, जबकि चिम्पैंजी चिड़ियाघरों और प्रयोगशालाओं में कैद रहते हैं. अब आपको यह मानने में कोई दिक्कत नहीं होगी कि धर्म के दायरे में समान किस्से पर विश्वास करने की वजह से मनुष्य परस्पर सहयोग करते हैं.
लाखों लोग एक गिरजाघर या मस्जिद के निर्माण के लिए एकजुट होते हैं. जिहाद या क्रूसेड के नाम पर युद्ध में उतर जाते हैं. क्योंकि वे सब ईश्वर, स्वर्ग और नर्क के बारे में एक जैसी कहानियों में यकीन करते हैं. लकिन मैं जोर देकर कहना चाहता हूं कि यह प्रक्रिया सिर्फ धर्म के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर संपन्न होने वाले मानव सहयोग के अन्य सभी कार्यक्षेत्रों पर भी लागू होती है.
उदाहरण के लिए न्यायिक क्षेत्र को ही लीजिए. आज दुनिया की अधिकतर न्याय-व्यवस्थाएं मानवाधिकारों के ऊपर आस्था पर टिकी हैं. लेकिन ये मानवाधिकार आखिर हैं क्या? मानवाधिकार, ईश्वर या स्वर्ग की तरह हमारी खुद की गढ़ी हुई एक कहानी भर है. ये वस्तुगत यथार्थ नहीं हैं. ये होमो सेपिएंस सम्बंधी ठोस जैविक प्रभाव नहीं हैं.
एक आदमी के शरीर को काट कर खोलिए, अन्दर झांकिए. वहां आपको दिल, गुर्दे, तंत्रिकाएं, हार्मोन और डीएनए आदि मिलेंगे लेकिन कोई अधिकार कहीं नहीं मिलेगा. एकमात्र जगह जहां ये अधिकार पाए जाते हैं वह है हमारी गढ़ी हुई कहानियां, जिन्हें हमने पिछली कुछ सदियों में खूब फैलाया है. ये निहायत सकारात्मक और बहुत अच्छी कहानियां हो सकती हैं, मगर फिर भी ये हमारी गढ़ी हुई निरी कपोल-कल्पनाएं ही हैं.
यही बात राजनीतिक क्षेत्र पर भी लागू होती है. आधुनिक राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण तत्व हैं राज्य और राष्ट्र. लेकिन ये राज्य और राष्ट्र हैं क्या? ये वस्तुगत यथार्थ नहीं हैं. एक पहाड़ वस्तुगत यथार्थ है. आप इसे देख सकते हैं, छू सकते हैं और यहां तक कि इसकी गंध महसूस कर सकते हैं. लेकिन एक राष्ट्र या राज्य, जैसे- इजराइल या ईरान या फ़्रांस या जर्मनी- महज एक किस्सा है, जिसे हमने गढ़ा और जिसके साथ बेइंतहा चिपक गए.
यही बात आर्थिक क्षेत्र पर भी लागू होती है. वैश्विक अर्थ व्यवस्था में आज सबसे महत्वपूर्ण कर्ता हैं कम्पनियां और कॉर्पोरेशन. आप में से कई इनके लिए काम भी करते होंगे- जैसे गूगल या टोयोटा या मैकडोनाल्ड. ये चीज़ें दरअसल हैं क्या? ये वकीलों की गढ़ी हुई कहानियां हैं. ये उन शक्तिशाली जादूगरों की खोजी और संजोई हुई कहानियां हैं, जिन्हें हम कानूनविद कहते हैं. और ये कॉर्पोरेशन दिन-रात क्या करते रहते हैं? आम तौर पर वे पैसा बनाने की जुगत में लगे रहते हैं. मगर, यह पैसा क्या होता है? फिर से, पैसा भी कोई वस्तुगत यथार्थ नहीं है. इसकी कोई वस्तुगत कीमत नहीं है. आप इसे खा नहीं सकते, पी नहीं सकते और न ही पहन सकते हैं. लेकिन फिर ये महान किस्सागो आते हैं- बड़े बैंकर, वित्तमंत्री, प्रधानमंत्री- ये सब हमें बेहद भरोसे-लायक कहानी सुनाते हैं: "देखिये, आप कागज़ के इस हरे टुकड़े को देख रहे हैं? यह असल में 10 केलों के बराबर है." और अगर मैं इस बात में विश्वास करता हूं, आप इसमें विश्वास करते हैं, और हर कोई इसमें विश्वास करता है, तो यह सचमुच काम करने लगती है. मैं कागज के इस बेमोल टुकड़े को लेकर बाज़ार जा सकता हूं और इसे किसी नितांत अनजान व्यक्ति, जिससे मैं अबतक कभी मिला नहीं, को देकर बदले में खाए जाने वाले असली केले ले सकता हूं. यह बात सचमुच आश्चर्यजनक है. आप ऐसा चिम्पैंजी के साथ नहीं कर सकते. लेनदेन बेशक चिंपैंजियों में भी होता है: "हां, तुम मुझे एक नारियल दो, मैं तुम्हें एक केला दूंगा." यह काम करता है. लेकिन तुम मुझे कागज़ का एक बेकार सा टुकड़ा दो और उम्मीद करने लगो कि मैं तुम्हें एक केला दे दूं? बिलकुल नहीं! तुम क्या सोचते हो मैं कोई इंसान हूं? पैसा असल में मनुष्यों द्वारा खोजी और सुनाई गयी अब तक की सबसे सफल कहानी है. क्योंकि यही वह कहानी है जिस पर हर कोई विश्वास करता है.
हर कोई ईश्वर पर विश्वास नहीं करता. न ही हर आदमी मानवाधिकारों पर विश्वास करता है. राष्ट्रवाद पर भी हर किसी को यकीन नहीं. लेकिन नोटों की शक्ल में पैसे पर हर कोई यकीन करता है. ओसामा बिन लादेन को ही लीजिए. उसे अमेरिकी राजनीति, वहां के मजहब और संस्कृति से नफरत थी. लेकिन उसे अमेरिकी डॉलर से कोई दिक्कत नहीं थी. असल में वह उन्हें काफी चाहता था.
अंत में: हम मनुष्य धरती पर इसलिए राज कर पाते हैं क्योंकि हम दोहरी वास्तविकता में जीते हैं. शेष सभी जीव वस्तुगत यथार्थ में जीते हैं. उनके यथार्थ में वस्तुगत चीज़ें शामिल हैं, जैसे- नदी, पेड़, शेर और हाथी. हम इंसान भी वस्तुगत यथार्थ में जीते हैं. हमारी दुनिया में भी नदियां हैं, पेड़ हैं और शेर-हाथी वगैरह हैं. लेकिन सदियों से हमने अपने वस्तुगत यथार्थ के ऊपर मनोगत यथार्थ की एक और परत चढ़ा दी है. यह यथार्थ कल्पना से उपजी चीज़ों से बना है, जैसे- राष्ट्र, ईश्वर, पैसा और जैसे कॉर्पोरेशन. और हैरानी की बात यह है कि जैसे-जैसे इतिहास आगे बढ़ा, मनोगत यथार्थ और मज़बूत होता चला गया. आज दुनिया की सबसे बड़ी शक्तियों में यही काल्पनिक वस्तुएं हमारे सामने हैं. आज नदी, पेड़, शेर और हाथी जैसे वस्तुगत यथार्थ का अस्तित्व भी अमेरिका, गूगल, विश्व बैंक जैसी उन काल्पनिक शक्तियों के निर्णयों और इच्छाओं पर निर्भर है, जिनका अस्तित्व सिर्फ हमारे मनोगत संसार में है. धन्यवाद. 

[अनुवाद एवं प्रस्तुति: आशुतोष उपाध्याय]