
कितनी अकेली है
लगा गया
सिर के बल डुबकी
किनारे खड़ा पहाड़
यह झील कितनी गहरी है
उड़ रही चिड़िया
आकाश है अंदर
जिसने भी झांका
अपने को देखा
है तो बात
पर कितनी अकेली है
इतना नशा तो चाहिये
शाम के धुंधलके में
पुल पर खड़ा देखता हूं
उस पार से दारू पीकर लौटते
कुली, कबाड़ी, ड्राइवर खलासियों को
नशे में धुत्त
न जाने क्या-क्या बकते हैं
किसी को नहीं छोड़ते
वो साला!सूदख़ोर
मेरी घरवाली की हंसुली पचा गया
खाने दो सालों को
कुत्ते की मौत मरेगा
वह दरोगा
नकली मूंछों वाला
जब देखो तब घर में घुस आता है
लम्बी पूंछ वाला
कहता है दारू बनाते हो
सौ का महीना दो
वह बांधकर ओसियर
साला! बीस में ठप्पा लगवा कर दस देता है
उसकी बातें सुनकर
मुझे डर होता है
अगर किसी ने सुन लिया
तो क्या होगा इनका
खाल खींच ली जाएगी
लेकिन तभी डर में से
आवाज़ आई, नहीं
इतना नशा तो हर आदमी में
हर समय होनी चाहिये.
हमारे शिखर
स्खलित हुआ पहाड़
अवरुद्ध हो गया रास्ता
हमारे सामने जो पड़ा है
मलबा नहीं
ढहे हुए हमारे शिखर हैं.
जल्दी-जल्दी रास्ता
रास्ते में पेड़ मिला
देखते ही पहचान गया
पुरखों की बात करते समय
उसकी आंखें चमक रही थीं
मेरे पुरखों के बारे में
बहुत कुछ बताना चाहता था
मुझे पहुंचने की जल्दी थी
आजकल जल्दी पहुंचने के लिए
जल्दी-जल्दी रास्ता बदल रहा हूं
(इसी संग्रह के लोकार्पण के अवसर पर खींची गई रामकुमार जी की तस्वीर अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़ से श्री महेश वर्मा द्वारा भेजी गई है. उनका आभार)