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Friday, October 10, 2014
Tuesday, October 8, 2013
वे इंडस्ट्री के तमाम संगीत निर्देशकों से कहीं ज़्यादा बड़े थे - सज्जाद हुसैन - ३
(पिछली क़िस्त से आगे अंतिम हिस्सा)
सज्जाद की प्रतिभा को उसका तोड़ उन्हीं की तकरीबन कम्पल्सिव
परफेक्शनिज्म में था. सम्भवतः वे इकलौते संगीतकार थे जिन्होंने कोई असिस्टेंट्स नहीं
रखे और सारा काम ख़ुद ही किया - शुरुआती धुन के निर्माण से ऑर्केस्ट्रेशन तक. “यहाँ
तक कि वे तबलावादक के लिए बोल लिखने का काम भी करते थे.” उनके सुपुत्र नासिर अहमद
बताते हैं “ऐसा नहीं था कि वे गाना शुरू करें और तबलची अपने मन मुताबिक़ कोई भी
ठेका बजाने लगे. हरेक चीज़ उन्हीं के हिसाब से होना होती थी.”
“वे बहुत सटीक हुआ करते थे” सज्जाद हुसैन की रेकॉर्डिंग
मात्र के ख़याल से आक्रान्त हो जाया करने वाली लता मंगेशकर याद करती हैं “अगर कोई
छोटा सा साज़ तक ज़रा सा सुर से बाहर चला जाता तो वे सब कुछ रुकवा कर सारी
रेकॉर्डिंग दुबारा करते थे. “ये हवा ये रात ये चांदनी” के लिए इसी परफेक्शन की वजह
से १७ री-टेक कराने पड़े थे. लेकिन सज्जाद इस गाने के एक सितार इंटरल्यूड को लेकर
असंतुष्ट ही रहे अलबत्ता सितार उस ज़माने के एक मशहूर सितार-सारंगी वादक ने बजाया
था. तनिक प्रसन्न होते हुए उनके बेटे कहते हैं “अपनी मृत्यु के दिन तक जब जब
उन्होंने यह गीत सुना तो सितार के इंटरल्यूड को सुनते ही वे आह भरते हुए कहते थे ‘उसने
वैसे नहीं बजाय जैसा मैंने कहा था’.”
“मेरी जानकारी में सज्जाद इकलौते कम्पोज़र थे जो अपने काम को
लेकर पुनर्विचार किया करते थे.” भारतन कहते हैं “और यह आपकी ग्रोथ का पैमाना होता है.
वे कहते थे ‘हलचल’ में लता का गया ‘आज मेरे नसीब में’ उनका सर्वश्रेष्ठ काम था
लेकिन बाद में उन्हें लगने लगा था कि गीत कहीं बेहतर हो सकता था. उन्होंने बाद में
‘फिर तुम्हारी याद आई ऐ सनम’ और ‘दिल में समा गए सजन’ को सीधे सीधे डिसमिस कर दिया
था. ‘वे निहायत साधारण चीज़ें हैं’ उन्होंने मुझसे कहा था. ‘तब आप लोग उन्हें इतना
तूल काहे दे रहे हैं?’”
अगर सज्जाद को उनकी फ़िल्मी कम्पोज़ीशन्स के लिए जाना जाता है
तो बताना ज़रूरी है कि उनकी कला का एक आयाम और था – वे एक स्वशिक्षित मैन्डोलिन
वादक थे और इस यूरोपीय वाद्य पर ठेठ हिन्दुस्तानी क्लासिकी संगीत बजाकर
शुद्धतावादियों को हैरान कर दिया करते थे. १९८२ में मद्रास में हुई एक कंसर्ट के
बाद छपे एक रिव्यू में लिखा गया था “उस्ताद सज्जाद हुसैन के हाथों में मैन्डोलिन ठीक वैसी
ही शोभा पाता है जैसे रविशंकर के हाथों में सितार या अली अकबर खान के हाथों में
सरोद. उनका वादन श्रेष्ठतम कोटि का था.”
लेकिन इस आदमी का जीनियस अप्रशंसित ही रहा. समझौता न करने
की उनकी प्रवृत्ति और सांसारिक चीज़ों प्रति उनका विराग उन्हें संसार से दूर करता
गया. अपने अंतिम वर्षों तक उनका शहंशाही आत्मगौरव बना रहा. लता मंगेशकर ने, जो
उनके काफ़ी करीब थीं, प्रस्ताव दिया कि वे उनकी मैन्डोलिन कंसर्ट की व्यवस्था करना
चाहेंगी. उस्ताद का जवाब था “अगर तुम्हें मेरा मैन्डोलिन सुनना है तो मैं तुम्हारे
घर आकर बजा दूंगा पर खुदा के लिए मेरे लिए कोई कंसर्ट वगैरह की व्यवस्था करने की
ज़रुरत नहीं.”
२१ जुलाई १९९५ को ७९ साल की आयु में इस अद्भुत कम्पोज़र ने
अपनी अंतिम साँसें लीं. उनके सुदूर एकाकी जीवन की छाया उनकी मृत्यु तक में नज़र आई
जब सिवाय खैय्याम और पंकज उधास के कोई नामचीन्ह हस्ती फ़िल्म संसार से शोक प्रकट
करने नहीं आई. “ऐसा देखना तकलीफदेह होता है” उनके सुपुत्र नासिर अहमद कहते हैं “लेकिन
ज़्यादा अहम् बात यह है कि अपने जीवन के अंतिम दिन भी मेरे पिता प्रसन्न थे. किसी
को लेकर कोई कडवाहट नहीं, न कोई पछतावा. वे बेहद सफल हो सकते थे, ढेरों रुपये कमा
सकते थे, लेकिन उन्हें सिर्फ़ इतना चाहिए था कि उन्हें एक बड़ा संगीतकार माना जाय और
मैं समझता हूँ वे ऐसा कर पाने में कामयाब हुए.”
Monday, October 7, 2013
वे इंडस्ट्री के तमाम संगीत निर्देशकों से कहीं ज़्यादा बड़े थे - सज्जाद हुसैन - 2
सज्जाद के काम की बुनियाद यानी उनकी इस विद्वत्ता को नौशाद
बहुत अपनापे से याद करते हैं “उन्हें अपनी उस्तादी पर गर्व था. वे निर्माता से
कहते थे ‘मैंने ऐसी धुन बनाई है जिसे लता भी नहीं गा सकती’ तो निर्माता कहता ‘अगर
लता नहीं गा सकती तो फिर कौन गाएगा?’ लेकिन सज्जाद ने सादगीपूर्ण और असाधारण धुनें
भी तैयार कीं – मिसाल के तौर पर ‘रुस्तम सोहराब’ का गाना “ ये कैसी अजब दास्तान हो
गयी है.”
वास्तव में जहाँ तक सज्जाद की विराट प्रतिभा की बात है, उसे
लेकर कोई दो राय नहीं हैं. कहते हैं कि मदनमोहन ने, जिन पर सज्जाद ने अपनी धुन
चुराने का आरोप लगाया था, ख़ुद उनसे कहा था “मुझे इस बात का फ़ख्र है कि मैंने आपकी
धुन उठाई न कि किसी दोयम या घटिया दर्ज़े के संगीतकार की.” बड़े रचनाशील जीनियस अनिल
बिस्वास ने एक इंटरव्यू में घोषणा की थी कि हिन्दी फ़िल्मी संगीत के इकलौते ओरिजिनल
कम्पोज़र सिर्फ़ और सिर्फ़ सज्जाद हुसैन थे. “मुझे
मिला कर हम सारे प्रेरणा के लिए किसी स्रोत की तलाश में रहते थे जबकि ... सज्जाद
को ऐसी कोई ज़रुरत नहीं होती थी. उनके रचे संगीत का एक एक स्वर उनका अपना है.”
सज्जाद का करियर शौकत हुसैन रिजवी की फ़िल्म ‘दोस्त’ से १९४४
में शुरू हुआ. उस वकत वे मास्टर अली बख्श के असिस्टेंट हुआ करते थे पर उनकी धुनों
को मास्टर अली बख्श की धुनों पर तरजीह डी गयी. उस फ़िल्म में उनकी धुन पर बना नूरजहाँ
का गाया “बदनाम मोहब्बत कौन करे, दिल को रुसवा कौन करे” आज भी संगीत जानने-समझने
वालों के लिए बेमिसाल है. सज्जाद की रेन्ज उल्लेखनीय थी – अगर रिज़वी की ‘डिमांड’
के हिसाब से ‘दोस्त’ का संगीत एक ख़ास किस्म की पंजाबियत लिए हुआ था तो ‘रुस्तम
सोहराब’ के संगीत में हिन्दुस्तानी संगीत के साथ साथ अरबी धुनों के लिए भी जगह
बनाई गयी. और यह सब एक ऐसा शख्स कर रहा था संगीत की जिसकी औपचारिक शिक्षा अपने
पिता के साथ कुछ समय सीखे सितार तक सीमित थी.
(जारी, अगले अंक में समाप्य)
Sunday, October 6, 2013
वे इंडस्ट्री के तमाम संगीत निर्देशकों से कहीं ज़्यादा बड़े थे - सज्जाद हुसैन - १
हो सकता है ये अप्रामाणिक हों या शायद सच भी हों पर महान फ़िल्म
संगीतकार सज्जाद हुसैन से समबन्धित ये दो क़िस्से अब हिन्दी फ़िल्म संगीत की किम्वदंतियों
का हिस्सा बन चुके हैं. पहला यूं है कि सज्जाद की बनाई धुन पर बने एक गाने की
रेकॉर्डिंग चल रही थी और लता मंगेशकर को उस जटिल धुन को गाने में ख़ासा संघर्ष करना
पड़ रहा था. तनिक तीखी आवाज़ में सज्जाद हुसैन चिल्लाए – “ये नौशाद मियाँ का गाना नहीं
है, आप को मेहनत करनी पड़ेगी.”
दूसरा क़िस्सा संगीत निर्देशकों की एक मुलाक़ात का है जब उस
ज़माने की पारम्परिक डिप्लोमेसी को दूर हटाकर सज्जाद साहब मदन मोहन के पास गए और
कहने लगे “मेरा गीत चुराने के पीछे आपका क्या मक़सद है?” (फ़िल्म ‘संगदिल’ के गीत “ये
हवा ये रात ये चांदनी” को मदनमोहन ने हाल ही में फ़िल्म ‘आख़िरी दांव’ के गीत ‘तुझे
क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा’ में बाकायदा अपनी धुन बनाकर पेश किया था.)
सज्जाद के व्यक्तित्व की ये दो पहचानें – जटिल और कई स्तरों
वाली धुनें बनाना और उनका बेबाक अंदाज़ – उनसे उनकी दूसरी त्वचा की तरह ताउम्र
चिपकी रहीं. और ये पहचानें बेहद दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से मिलजुलकर एक महान करियर
को धुंधला देने की वजहें बनीं.
यह सिर्फ़ उनकी कम्पोज़ीशन्स की जटिलता ही नहीं थी जिसने
उन्हें नुकसान पहुंचाया – आख़िर वे एक ऐसे कालखंड में काम कर रहे थे जब संगीत
निर्देशकों के पास बाकायदा क्लासिकल संगीत की लम्बी परम्परा की बुनियाद हुआ करती
थी. उनकी पराजय के बीज निर्माताओं और निर्देशकों को ठीक से हैंडल न कर पाने में
छुपे हुए थे. ये लोग कभी कभी तो संगीत के मामले में जाहिल तक हुआ करते थे और
उन्हें सिर्फ़ सज्जाद की आसान और सपाट धुनें चाहिए होती थीं. सज्जाद के समकालीनों
को चतुराई के साथ ऐसी स्थितियों से निबटना आता था जबकि सज्जाद ऐसी कोई भी बात होने
पर सीधे सीधे फ़िल्म से बाहर चले जाते थे. “वे बहुत प्रतिभावान आदमी थे और संगीत का
उनका ज्ञान विशद था, लेकिन उनका टेम्परामेंट उनकी असफलता का कारण बना.” नौशाद कहते
हैं “अगर कोई आदमी छोटी सी सलाह भी उन्हें देता था तो वे पलटकर कहा करते थे ‘तुम
संगीत के बारे में जानते ही क्या हो?’ वे करीब हर किसी से लड़ाई कर बैठते थे. इस वजह
से उन्हें अपनी ज़्यादातर ज़िन्दगी घर में बैठना पड़ा उनकी प्रतिभा व्यर्थ गयी. लेकिन
उनका काम चाहे वह कितना ही कम क्यों न हो, भारतीय फ़िल्म संगीत के सर्वश्रेष्ठ में
गिना जाता है.”
संगीत के इतिहासकार राजू भारतन जिनका सज्जाद के के साथ
लम्बा साथ रहा, इस महान संगीतकार के बारे में कुछ अलग खयालात रखते हैं “यह सच है
कि वे संगीत के मामले में अनाड़ी लोगों को अपने काम में दखल नहीं देने देते थे
लेकिन उनके अड़ियल होने की बात सही नहीं है.” वे कहते हैं “सज्जाद के अपने हर काम
को लेकर एक लॉजिक और रेशनेल होता था. उनकी विद्वत्ता से परिचित होने के लिए आपको
उन्हें जानना होता था. सच यह है कि वे इंडस्ट्री के तमाम संगीत निर्देशकों से कहीं
ज़्यादा बड़े थे."
(जारी)
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सज्जाद हुसैन (१५ जुलाई १९१७ – २१ जुलाई १९९५)
फिल्मोग्राफ़ी –
गाली – १९४४
दोस्त – १९४४
धर्म – १९४५
१८९७ – १९४६
तिलिस्मी दुनिया
- १९४६
कसम- १९४७
मेरे भगवान – १९४७
रूपलेखा – १९४९
खेल – १९५०
मगरूर – १९५०
हलचल – १९५१
सैय्याँ – १९५१
संगदिल -१९५२
रुख़साना – १९५५
रुस्तम सोहराब
- १९६३
मेरा शिकार – १९७३
आख़िरी सौदा – १९७७
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