नोट : किसी को बुरा लगे तो उसके लिए मैं नहीं, मैं जिम्मेदार है|
मैं चाहता हूँ कि इस देश में सांप्रदायिक सौहार्द बना रहे| साल में एक-दो दिन दंगो के लिए मुक़र्रर किया जाए| इस दिन सारे स्त्री पुरुष बिना भेदभाव खून की होली खेलें|
अगले दिन मौलाना हबीबुर्रहमान पंडित रामनाम के घर चाय पीने आयें - "कहो मियां! कल कितने लोगों का क़त्ल किया|"
पंडितजी शरमायें - "अजी, आप भी मजाक करते है| अब कहाँ रही वो जवानी की ताक़त, याद है आपके चचेरे भाई को क्या काटा था हमने|"
मौलाना जोर का ठहाका लगायें - "अजी कैसे भूल सकते हैं", अचानक घर में इधर उधर देखें और पूछे - "अरे कोमल बेटी कहीं नज़र नहीं आ रही|"
पंडित जी पंडिताइन से पूछे - "कोमल की माँ| कोमल नहीं दिखायी दे रही कल से|"
पंडिताइन रसोई से सब्जी काटने वाले चाक़ू से खून साफ़ करते हुए बोले - "भूल गए आप भी| कल जब्बार, सलीम नाई, यासिर कबाड़ी लेके नहीं गए थे उसको, बचाओ बचाओ भी तो चिल्लाई थी वो|"
काटे गए सेब बाहर लाये गए "लीजिये भाई साहब! आप खाएं|"
मियां हबीब खून सने सेब खाके वाह कहें|
"अभी थोड़ी देर में आ जाएगी वो| मैंने पुलिस और हॉस्पिटल को इन्फोर्म किया हुआ है|" पंडिताइन मुस्कुरा के पंडित जी की और प्यार छलकाती नजरों से देखती है|
"अमां, आपने बयान तो लिखा हुआ है न परजाई जी|" सरदार हरविंदर सिंह घर में बेतकल्लुफ घुसते हुए बोलें - "सिख दंगों में तो हबीब साहब ने ही मेरा बयान लिखा था| माशाल्लाह, क्या खालिस उर्दू लिखते हैं|"
पंडित जी मौलाना हबीब के क़दमों तले बिछ जाते हैं -"ऐसा बयान लिखें मौलाना साहब कि बस थाने में हर कोई रो पड़े| वैसे भी इस देश की पुलिस बहुत इमोशनल है|"
मौलाना साहब पुराने दिनों में खो जाते हैं - "ये आजकल के लौंडों को जरा सा शऊर भी ना आया| हम जब वहीदा को उठाके ले गए थे तो उसके बाप को पूरा इकरारनामा लिख के दिया था|"
हरविंदर जी भी सेब खाते हैं- जेब से स्पेशल खून की शीशी निकालते हैं, लगाते हैं सेब पर - "ये ४७ में हमारे परदादा तारा सिंह जी ने पाकिस्तान से हैंडपंप उखाड़ के इकठ्ठा किया|"
फिर रोनी सूरत बनाते हैं -"एक हमारा घरघुस्सू निहाल सिंह है, पता नहीं क्या शान्ति , अहिंसा करता है|"
पंडिताइन के दर्द को जैसे किसी ने फिर ठेस लगा दी हो - "सही कहते हो , ऐसी ही हमारी बेटी कोमल भी है| क्या बचाओ बचाओ चिल्ला रही थी| अरे हमारे जमाने में मुझे ही पता नहीं कितनी बार उठा के ले गए, मैंने तो कभी नहीं कहा|"
मौलाना बन्द लफ़्ज़ों में कुछ बुदबुदाये - "क्या कहूँ! हमारे खानदान की नाक भी हमारी औलाद इक्लाख़ के वजह से नीची हो गयी है| न कहीं क़त्ल करता है, न किसी को करने देता है|"
पंडित जी ने इति सिद्धम किया- "नयी पीढी, पुरानी पीढ़ियों से आये संस्कार भूलती जा रही है|"
अगले दिन मौलाना हबीबुर्रहमान पंडित रामनाम के घर चाय पीने आयें - "कहो मियां! कल कितने लोगों का क़त्ल किया|"
पंडितजी शरमायें - "अजी, आप भी मजाक करते है| अब कहाँ रही वो जवानी की ताक़त, याद है आपके चचेरे भाई को क्या काटा था हमने|"
मौलाना जोर का ठहाका लगायें - "अजी कैसे भूल सकते हैं", अचानक घर में इधर उधर देखें और पूछे - "अरे कोमल बेटी कहीं नज़र नहीं आ रही|"
पंडित जी पंडिताइन से पूछे - "कोमल की माँ| कोमल नहीं दिखायी दे रही कल से|"
पंडिताइन रसोई से सब्जी काटने वाले चाक़ू से खून साफ़ करते हुए बोले - "भूल गए आप भी| कल जब्बार, सलीम नाई, यासिर कबाड़ी लेके नहीं गए थे उसको, बचाओ बचाओ भी तो चिल्लाई थी वो|"
काटे गए सेब बाहर लाये गए "लीजिये भाई साहब! आप खाएं|"
मियां हबीब खून सने सेब खाके वाह कहें|
"अभी थोड़ी देर में आ जाएगी वो| मैंने पुलिस और हॉस्पिटल को इन्फोर्म किया हुआ है|" पंडिताइन मुस्कुरा के पंडित जी की और प्यार छलकाती नजरों से देखती है|
"अमां, आपने बयान तो लिखा हुआ है न परजाई जी|" सरदार हरविंदर सिंह घर में बेतकल्लुफ घुसते हुए बोलें - "सिख दंगों में तो हबीब साहब ने ही मेरा बयान लिखा था| माशाल्लाह, क्या खालिस उर्दू लिखते हैं|"
पंडित जी मौलाना हबीब के क़दमों तले बिछ जाते हैं -"ऐसा बयान लिखें मौलाना साहब कि बस थाने में हर कोई रो पड़े| वैसे भी इस देश की पुलिस बहुत इमोशनल है|"
मौलाना साहब पुराने दिनों में खो जाते हैं - "ये आजकल के लौंडों को जरा सा शऊर भी ना आया| हम जब वहीदा को उठाके ले गए थे तो उसके बाप को पूरा इकरारनामा लिख के दिया था|"
हरविंदर जी भी सेब खाते हैं- जेब से स्पेशल खून की शीशी निकालते हैं, लगाते हैं सेब पर - "ये ४७ में हमारे परदादा तारा सिंह जी ने पाकिस्तान से हैंडपंप उखाड़ के इकठ्ठा किया|"
फिर रोनी सूरत बनाते हैं -"एक हमारा घरघुस्सू निहाल सिंह है, पता नहीं क्या शान्ति , अहिंसा करता है|"
पंडिताइन के दर्द को जैसे किसी ने फिर ठेस लगा दी हो - "सही कहते हो , ऐसी ही हमारी बेटी कोमल भी है| क्या बचाओ बचाओ चिल्ला रही थी| अरे हमारे जमाने में मुझे ही पता नहीं कितनी बार उठा के ले गए, मैंने तो कभी नहीं कहा|"
मौलाना बन्द लफ़्ज़ों में कुछ बुदबुदाये - "क्या कहूँ! हमारे खानदान की नाक भी हमारी औलाद इक्लाख़ के वजह से नीची हो गयी है| न कहीं क़त्ल करता है, न किसी को करने देता है|"
पंडित जी ने इति सिद्धम किया- "नयी पीढी, पुरानी पीढ़ियों से आये संस्कार भूलती जा रही है|"
पंडित जी ने हाथ जोड़े|
मौलाना सजदे में झुक गए|
हरविंदर साहब ने सत श्री अकाल का स्मरण किया|
'हे भगवान्! इस नयी पीढ़ी को सदबुद्धि दे| इस देश में साम्प्रदायिक सौहार्द बना रहे|'