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Wednesday, January 9, 2013

ज़िंदा रहना है इंसान की तरह विक्षोभ भरा


सुनील गांगुली की कविता
(बांग्ला से अनुवाद - लाल्टू) 


बस कविता के लिए

बस कविता के लिए है यह जीवनबस कविता
के लिए कुछ खेलाहूँ बस कविता के लिए अकेला इस ठंडी शाम की बेला
धरती पार कर आनाबस कविता के लिए
एकटक सुंदर शक्ल की शांति एकझलक
बस कविता के लिए हो तुम स्त्रीबस
कविता के लिए यह खूनखराबाबादलों से यह गंगाधारा
बस कविता के लिएऔर भी लंबी उम्र जीने का जी करता है.
ज़िंदा रहना है इंसान की तरह विक्षोभ भराबस
कविता के लिए मैंने अमरता को तुच्छ है माना.

Tuesday, January 8, 2013

एक किशोरी के प्रेम में डूबे थे हम एकसाथ पाँच जने


सुनील गांगुली की कविता
(बांग्ला से अनुवाद - लाल्टू


चाय की दूकान पर


लंदन में है लास्ट बेंच पर होता जो डरपोक परिमल,
रथीन अब है साहित्य का मठाधीश
सुना है दीपू ने चलाई है बड़ी कागज़ की मिल
और पाँच चायबागानों में है हिस्सा प्रतिशत चालीस
फिर भी मौका मिले तो हो जाता है देशसेवक;

ढाई दर्जन तिलचट्टे छोड़ क्लास रुकवाई जिसने वह पागल अमल
वह आज बना है नामी अध्यापक!
अद्भुत उज्ज्वल था जो सत्यशरण
उसने क्यों खुद का गला काटा चला तेज खुर-
अब भी दिखता वह दृश्य तो होती सिहरन
पता था कि दूर जा रहा था, पर इतनी दूर?

नुक्कड़ की चाय की दूकान पर अब है कोई नहीं
कभी यहाँ हम सब सपनों में थे जागते
एक किशोरी के प्रेम में डूबे थे हम एकसाथ पाँच जने
आज यह कि याद न उस लड़की का नाम कर पाते.

Monday, January 7, 2013

वरुणा ने कहा था जिस दिन मुझे सचमुच प्यार करोगे



सुनील गांगुली की कविता
(बांग्ला से अनुवाद - लाल्टू

किसी ने अपनी बात न रखी

किसी ने अपनी बात न रखीतैंतीस बरस गुज़र गएकिसी ने अपनी बात न रखी

बचपन में एक जोगन अपना आगमनी गीत अचानक रोक कर कह गई थी
शुक्ल द्वादशी के दिन अंतरा सुना जाएगी
फिर कितनी चाँद निगली अमावस गुज़र गईं
पर वह जोगन कभी न लौटी
पच्चीस सालों से इंतज़ार में हूँ.

मामा के गाँव का माझी नादिर अली कहता थाबड़े हो लो भैया जी,
तुम्हें मैं तीसरे पहर का पोखर दिखलाने ले जाऊँगा
वहाँ कमल के फूल पर चढ़ साँप और भौंरे साथ खेलते हैं!
नादिर अलीमैं और कितना बड़ा होऊँगामेरा सिर इस घर की छत
फोड़ आस्मान छू ले तो तुम मुझे तीसरे पहर का पोखर दिखलाओगे?

एक भी बड़ा कंचा खरीद न पाया कभी
काठी वाला लवंचूस दिखा-दिखाकर चूसते रहे लस्करों के बेटे
मंगतों की तरह चौधरीओं के गेट पर खड़े देखा भीतर चल रहारास-उत्सव
लगातार रंगों की बौछार में सोने के कंगन पहनी
गोरी रमणियाँ
किस्म किस्म की रंगरेलियों में वे हँसती रहीं
मेरी ओर उन्होंने मुड़ कर भी नहीं देखा!
पिता ने मेरा कंधा छूकर कहा थादेखनाकिसी दिन हम लोग भी....
पिता अब दृष्टिहीन हैंहमने कुछ भी देखा नहीं
वह बड़ा कंचावह काठी वाला लवंचूसवह रास-उत्सव
मुझे कोई नहीं लौटाएगा!

सीने में सुगंधित रुमाल रख वरुणा ने कहा था
जिस दिन मुझे सचमुच प्यार करोगे
उस दिन मेरे भी सीने में ऐसी इत्र की महक होगी!
प्रेम के लिए मुट्ठियों में जान रखी
खौफनाक साँड़ की आँखों को लाल कपड़े से बाँधा
कायनात का कोना कोना ढूँढ ले आया १०८ नील कमल
फिर भी वरुणा ने बात न रखीअब उसके सीने से महज जिस्म की बू आती है
अब भी वह कोई भी औरत है.

किसी ने अपनी बात न रखीतैंतीस बरस गुज़र गएकोई अपनी बात नहीं रखता है!