हिन्दी(साहित्यिक) ब्लॉग्स पर आज कल शुरुआती दिनों जैसा उत्साह नही दिख रहा. इस का दोष प्रायः फेस बूक को दिया जा रहा है. एक हद तक यह सही भी लगता है . लेकिन ज़रूरी नहीं कि फेस बुक ने ब्लॉग्गिंग को नुकसान ही पहुँचाया हो. फेस बुक के माध्यम से इधर कुछ सशक्त ब्लॉग्गर्ज़ से मेरी मुलाक़ात हुई है . उन मे से एक हैं लीना मल्होत्रा राओ http://lee-mainekaha.blogspot.com/ ब्लॉग का नाम है अस्मिता . इस मे मुझे एक नई ताज़गी लिए हुए कुछ प्रेम कविताए मिली . एक आप के लिए:
प्यार.. बिना शर्तों के.
मै एक पारदर्शी अँधेरा हूँ
इंतज़ार कर रहा हूँ अपनी बारी का
रात होते ही उतरूंगा तुम्हारे कंधो पर
तुम्हारे बालो के वलय की घुप्प सुरंगे रार करती हैं मुझसे
तुम एक ही बाली क्यों पहनती हो प्रिये
आमंत्रण देती है मुझे ये
एक झूला झूल लेने का
और यह पिरामिड जहाँ से
समय भी गुज़रते हुए अपनी चाल धीमी कर लेता है
हवाओ को अनुशासित करते हैं
और हवाए एक संगीत की तरह आती जाती रहती हैं
जिसमे एक शरद ऋतु चुपचाप पिघल के बहती रहती है.
तुम्हारी थकी मुंदती आँखों में तुम्हारे ठीक सोने से पहले
मै चमकते हुए सपने रख देता हूँ
और अपनी सारी सघनता झटककर पारदर्शी बन जाता हूँ
ताकि मेरी सघनता तुम्हारे सपनो में व्यवधान न प्रस्तुत कर दे.
क्या तुमने सोते हुए खुद को कभी देखा है ?
निश्चिन्त ..अँधेरे को समर्पित,
असहाय ..पस्त ..नींद के आगोश में गुम
सपने भी वही देखती हो जो मै तुम्हे परोसता हूँ
और तुम्हारी देह के वाद्यों से निकली अनुगूंज को नापते हुए मेरी रात गुज़र जाती है
और मै तुम्हारा ही एक उपनिवेश बनकर गर्क हो जाना चाहता हूँ तुम्हारे पलंग के नीचे
.
तुम्हे उठना है सूरज के स्वागत के लिए तरो ताज़ा
भागती रहोगी तुम शापित हाय
सूरज के पीछे
और मै सजाता रहूँगा पूरा दिन वो सपने जो दे सकें तुम्हे ऊर्जा
देखा कितना सार्थक है मेरा होना तुम्हारे और सूरज के बीच में धरा
क्या तुम मुझे पहचानती हो
मै हर बार उतरा हूँ तुम्हारे क़दमों में और पी गया हूँ तुम्हारी सारी थकान
और अनंतकाल से मै सोया नहीं हूँ.
जबकि तुम अनंतकाल से भाग रही हो सूरज के पीछे
और तब जब भूल जाती हो मुझे एक स्वप्न की तरह
मै लैम्पपोस्ट के नीचे खड़ा होकर प्रतीक्षा करता हूँ तुम्हारी
प्यार करता हूँ बिना शर्तो के.
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Friday, July 1, 2011
Tuesday, September 23, 2008
'त्रिशूल', कंप्यूटर और हिन्दी ब्लाग

स्कूल की पढाई के दिनों में लगभग हम सभी ने 'विज्ञानः वरदान या अभिशाप' एवं 'विज्ञान के चमत्कार' जैसे विषयों पर निबंध अवश्य लिखा होगा।इसके प्रस्तावना,विषय-प्रवेश,लाभ-हानि, उपसंहार-निष्कर्ष जैसे शीर्षक-उपशीर्षकों पर अपनी कलम अवश्य चलाई होगी। रोज विज्ञान के नये चमत्कार होते रहते हैं. दुनिया में रोज नई-नई चीजें आती रहती हैं जो एक दिन स्वयं पुरानी पड़ जाती हैं-हमको अपना अभ्यस्त और आदी बनाकर एक और 'नये' के आगमन का रास्ता तैयार करती हुई. कंप्यूटर भी इन्हीं में से एक चीज हुआ करती 'थी'।
प्रश्नः क्या कंप्यूटर आपके लिए अथवा किसी और के लिए एक नया,अनजाना या अपरिचित शब्द है? एक ऐसा शब्द जिसे आप पहली बार सुन रहे हों,सुनकर चौंके हों या फिर सुनकर भी ध्यान देने योग्य न समझा हो?
उत्तरः नहीं।
* अमिताभ बच्चन से आज लगभग सभी परिचित हैं।यह कोई नया या अपरिचित नाम नहीं रह गया है।वह व्यक्ति भी, जो किसी भी रूप में साहित्य-संगीत-कला-सिनेमा से कोई वास्ता नहीं रखता उसके लिये भी यह नाम बहुपरिचित-सुपरिचित है.भला हो राजनीति की टीवी और टीवी की राजनीति का! आज अमिताभ बच्चन को मैं निजी तौर पर दो विशेष वजहों से याद कर रहा हूं-
१- आज से लगभग बीस-बाइस बरस पहले रिलीज हुई 'बच्चन रिसाइट्स बच्चन' नामक आडियो कैसेट के कारण,जो मुझे बहुत पसंद थी किंतु बाद में किसी 'कलाप्रेमी' ने पार कर दी।
२-त्रिमूर्ति फिल्म्स प्रा०लि० की फिल्म 'त्रिशूल' के कारण। ४ मई १९७८ को रिलीज हुई इस फिल्म के निर्देशक यश चोपड़ा थे और लेखक जावेद अख्तर। १६७ मिनट की इस फिल्म का अधिकांश हिस्सा अमिताभ अभिनीत एंग्री यंग मैन 'विजय' नामक चरित्र के इर्द-गिर्द घूमता है.फिल्म मे अमिताभ के अतिरिक्त संजीव कुमार,शशि कपूर,वहीदा रहमान,हेमा मालिनी, राखी गुलजार,प्रेम चोपड़ा,पूनम ढिल्लों,मनमोहन कृष्ण,सचिन, इफ्तेखार,यूनुस परवेज,गीता सिद्धार्थ आदि कलाकारों ने भी काम किया है....लेकिन मेरी निजी राय में इस फिल्म में एक कलाकार और है जिसका क्रेडिट्स में कहीं उल्लेख नहीं हुआ है.वह महत्वपूर्ण कलाकार है कंप्यूटर! जी हां, 'कौन बनेगा करोड़पति' के अमिताभ जी के वही 'कंप्यूटर जी' और बाद में अपने शाहरुख भाई के 'कंप्यूटर साईं' आदि-इत्यादि.आज यत्र-तत्र-सर्वत्र विद्यमान वही कंप्यूटर जो मेरे लिये ,आपके लिये ,किसी के लिये भी अनजाना, अनचीन्हा, अपरिचित नहीं रह रह गया है. लेखन और पत्रकारिता का अभिनव अवतार यह ब्लाग भी तो इसी कंप्यूटर का तिलस्म है, माया है,मोह है ,मोक्ष है!
* मेरी अभी तक की जानकारी के अनुसार,हिन्दी सिनेमा में पहली बार कंप्यूटर शब्द का उल्लेख फिल्म त्रिशूल में हुआ था। विदेश से पढ़कर लौटा युवा उद्यमी शेखर गुप्ता(शशि कपूर)अपने दफ्तर में काम करने वाली युवती गीता(राखी) को जब कई दफा कंप्यूटर और मिस कंप्यूटर कहकर संबोधित करता है तो वह एक दिन कुछ खीझकर पछती है कि तुम मुझे बार-बार कंप्यूटर-कंप्यूटर क्यों कहते हो? उत्तर में नायक बड़े उत्साह से बताता है कि विदेशों में एक ऐसी मशीन आई है जो बेहद जल्दी और फुर्ती से बिना कोई गलती किये जोड़-घटाव-टाइपिंग जैसे काम चुटकियों में निपटा देती है,वह भी बिना थके.मेरी अभी तक की जानकारी में यह हिन्दी सिनेमा के कथ्य में कंप्यूटर के उल्लेख की पहली आहट या धमक थी.यह १९७८ और उसके आसपास के समय की बात है .याद करने की कोशिश करें कि उस वक्त हमारे आसपास कितना और किस तरह का कंप्यूटर था तथा उससे हमारी कितनी और किस तरह की जान-पहचान थी? वह हमारे लिये कितना नया-पुराना ,परिचित-अपरिचित था? आज जो परिदृश्य है वह सामने है ,कंप्यूटर की ताकत और तिलस्म को बच्चा-बच्चा जानता है।
* काफी लंबे समय से हिन्दी सिनेमा को देखने-परखने-पढ़ने के अपने अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकने की स्थिति में हूं कि हिन्दी सिनेमा की कथा-पटकथा-संवाद-गीत में तकनीक के उल्लेख के सिलसिले पर गंभीरता से पड़ताल किया जाना चाहिए। मैं सिनेमा के तकनीकी पक्ष की नहीं बल्कि लेखकीय पक्ष की बात कर रहा हूं।ऐसी पड़ताल का अर्थ केवल 'मेरे पिया गए रंगून,किया है वहां से टेलीफून' की अनुक्रमणिका निर्माण मात्र नहीं बल्कि तकनीक के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक रिश्ते के उत्स और उल्लेख का उत्खनन जरूरी नुक्ता नजर आता है.यदि इस तरह का काम हुआ है या हो रहा है तो यह मेरी अनभिज्ञता है कि मुझे उसकी जानकारी नहीं है और यदि नहीं हुआ है तो होना जरूरी है.जैसा कि ऊपर कहा गया है कि तकनीक की ताकत और तिलस्म को आज बच्चा-बच्चा जानता है।
* हिन्दी ब्लाग के उद्भव,विकास,परंपरा,प्रयोग और प्रासंगिकता के सवाल पर ब्लाग-संसार में बहुत कुछ लिखा गया है और निरंतर लिखा जा रहा है।अभी कुछ समय पहले तक इससे हमारी पहचान भी लगभग वैसी ही थी जैसी कि १९७८ कुछ-कुछ त्रिशूल में दिखाई देती है.हिन्दी ब्लाग से जुड़े हम लोगों को एक बड़ी हिन्दी भाषी जमात को ब्लाग के बारे में वैसे ही बताना है जैसे शशि कपूर ने राखी को बताया था,संभवतः उससे कुछ आगे बढ़कर भी।
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