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Tuesday, December 15, 2009

जब शुक्रवार की रात को तितलियाँ छोड़ देती हैं इस घर का बसेरा

'कबाड़ख़ाना' पर आप विश्व कविता के कोष से रू-ब-रू होते रहे हैं और कोशिश रहती है कि यह क्रम बीच-बीच में अपनी शक्ल दिखाता रहे और कविता प्रेमियों को पढ़ने के लिए कुछ बढ़िया मिलता रहे।अब तक आप बहुत - सी कविताओं के अनुवाद यहाँ देख-पढ़ चुके हैं , इसी कड़ी में आज अरबी की एक मशहूर युवा कवि ( कवयित्री कहना कहना जरूरी तो नहीं ?) फ़ातिमा नावूत की एक कविता 'स्केचबुक' प्रस्तुत है। हिन्दी में कविता का स्त्री स्वर या स्त्री कविता पर खूब लिखा गया और खास स्त्री कविताओं के संग्रह भी बहुत से आए हैं। उन सब कविताओं के समानान्तर इसे रख कर देखना एक जरूरी बात हो सकती है।
१९६४ में जन्मीं फातिमा जी कवि हैं , गद्य लिखती हैं, अनुवादक हैं , नील नदी के देश मिस्र में रहती हैं और कविता में प्रबल स्त्री पक्ष की हिमायती हैं। उनकी कुछ और कविताओं के अनुवाद जल्द ही ...


स्केचबुक

चालीस की उम्र में
औरतों के बैग थोड़े बड़े हो जाते हैं
ताकि उनमें अँट सकें
ब्लड प्रेशर की गोलियाँ और मिठास के डल्ले ।
नजर को ठीक करने के वास्ते
चश्मे भी
ताकि चालाक अक्षरों को पढ़ा जा सके इत्मिनान से ।

बैग की चोर जेब में
वे रखती हैं जरूरी टिकटें तथा कागजात
और ग्रहण के दौरान
हिचकी की रोकथाम करने का नुस्खा भी।
वे रखती हैं एक अदद मोमबत्ती
क्योंकि आग से दूर भागते हैं पिशाच
जो रात में चुपके से आकर
रेत देते है औरतों की गर्दनें ।
वे बैग में रखती हैं वसीयतनामा :
मेरे पास हैं 'रंगों के निशान'
( जो हाथों में आकर अटक जाते हैं
जब कोई तितली इन पर बैठ जाती है )
मेरे पास है एक स्केचबुक
और एक ब्रश
- एक अकेली औरत की तरह -
जिसे सौंपती हूँ मैं अपने मुल्क को ।

चालीस की उम्र में
मोजों से झाँकने लगते हैं घठ्ठे
और जब शुक्रवार की रात को
तितलियाँ छोड़ देती हैं इस घर का बसेरा
तब हृदय हो जाता है किसी खाली बरतन की मानिन्द
वे कहाँ जाती होंगी भला ?
शायद राजधानी के पूरबी छोर पर रहने वाली
किसी अच्छी मामी, चाची, फूफी, मौसी के कंधों पर
जमाती होंगीं अपना डेरा ।
एक ..दो ..तीन ..चार ..पाँच ..छह..
छह रातें..
एक चुप , उदास औरत
अपनी बालकनी में बैठकर
तितलियों की वापसी का करती है इंतजार ।

चालीस की उम्र में
एक औरत बताती है अपनी पड़ोसन को
कि मेरा एक बेटा है
जिसे नापसंद है बोलना - बतियाना ।

इससे पहले कि वह कहे -
अम्मी , तुम जाओ
अब मैं ठीक हूँ
अब मैं बड़ा हो गया हूँ..
हे ईश्वर ! मुझे थोड़ा वक्त तो दो खुद के वास्ते ।

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फ़ातिमा नावूत की और एक कविता का अनुवाद यह भी है।