महाकवि काज़ी नज़रुल इस्लाम की रचना अग्निसेतु पढ़ने के बाद हिन्दी के उतने ही बड़े कवि शमशेर बहादुर सिंह ने अपनी अलग-सी शैली में नज़रुल पर यह ख़ासी लम्बी कविता लिखी थी. मैं बहुत लम्बे समय से इसे यहां लगाना चाहता था -
आकाशे दामामा बाजे ...
गर्दन झुकाए
एकटक कुछ देखते,सोचते,
निश्चय
ओ विद्रोही
--क्या देखते, जाने क्या सोचते
स्वतः अनजाने ही
तीन देशों के एक साथ नागरिक
तीन देशों की विप्लवी
एकता में
कहीं
चित्त बसाए
...हमारे लिए तीन
जो तुम्हारे लिए एक...
मौन शांत दृष्टि से
क्या अवलोकन करते
कौनसी कविता लिखते
किस नए कॉस्मिक विद्रोह और
निर्माण की !
"...आकाशे दामामा बाजे..."
विद्रोही !
क्या अब भी दामामे बज रहे हैं
--और किस आकाश में
किन-किन धरतियों के ऊपर
मानव-हृदयों में
दामामे बज रहे हैं ?!
"चल ! चल ! चल !" शुन, शुन,
शुन !
वह शोकगीत के दामामे हैं शायद :
मगर उनकी चोट कैसी कड़ी है
विद्रोही !
न, न, न,
वो शोकगीत के न होंगे,
विजय के ही होंगे निरन्तर
सदा की तरह !
क्यों तुम बोल न उठे
यकायक कभी ?
इतना कुछ हो गया
दुनिया में
हीरोशिमा नागासाकी ही नहीं
पूरा वियतनाम
पूरा चीन
पूरा अफ़्रीका
पूरी अरब दुनिया
--ये सब
मानव चेतना के इतिहास में
व्याप्त हो गया :
हम अपनी साँस में
इन सबको जीते हैं
...और तुम ?!
युद्ध समाप्त हुआ
जिसमें से और
भीषणतर युद्ध
आरम्भ हुए;
पश्चिम का दानवी रूप
प्रकट हुआ;
तीसरी दुनिया ने जन्म लिया
और आँखें खोलीं...!
यहूदियों अरबों ईसाइयों
की आने वाली क़यामत
अभी फट तो नहीं पड़ी है
इस धरती के सर पर,
मगर इसी विस्फोट के लिए
प्राण-पन से
अमरीका
निरंतर अहर्निश
घोर अभ्यास कर रहा है !
तुम्हें ख़बर नहीं ?
तुम अपने...
अपने सुदूर
विद्रोही अवचेतन में
कौन से महाकाव्य की
मूक सर्जना करते रहे
नज़रुल,
जो तीन दुनियाओं के
उत्तंगतम थपेड़े तुम्हें
उठा नहीं पाए
तुम्हारी सहज समाधि से?
अब तुम उसी
मूक महाकाव्य के साथ
हमारी सबकी
प्यारी धरती में
सहज ही समाधिस्थ
हो गए हो
धरती को अपनी
चेतना से
अधिक उर्वरा
करने.
नहीं जानता अभी
इतिहास में क्या
गुल खिलेंगे
दाईं ओर से, बाईं ओर से
कि और उनके बीच से ...!
गुल
तूफ़ानों से भीगे
और बड़े गुठ्ठल और कड़े
जैसे मध्य अमरीका
के बयाबानों में होते हैं
कैक्टाई
कड़े नसों वाले कैक्टस
रंग बिरंगी
कठोर कांटेदार
सुर्ख़ और हरे और सफ़ेद
और हरे-नीलम से
निर्गंध चमत्कार-से.
और ... गुल
देशों-देशों के
आक्षांशों को
अपनी सुगंध से मस्त बनाते हुए
सुर्ख़ ग़ुलाबों का
एक उभरता दरिया
सुर्ख़ ग़ुलाबों के शिशु मुख
उल्लास से तमतमाए हुए
आनंद में नहाए हुए
अनेक ऊर्जाओं की
हारमनी से संगीतमय,
मानो
अपने नृत्य-दोल से
प्यारी मासूम
धरती को
उद्वेलित किए हुए.
दूर तक ग़ुलाबों का
एक ओर-छोरहीन दरिया
अरे नज़रुल!
... तुम हमारे बीच में
थे न अब तक
... मगर हमें तो
अब पता चला
कि तुम हमारे ही बीच में
थे अब तक:
तुम्हारी अतिशय-अतिशय
मध्यम-गुमसुम
तुम्हारा शान्त महाकाव्य
हमें बेमालूम तौर से
-- अपना सांस जैसे
सहज संगीत में
लिए हुए था
अब तक
और अब भी ...
क्या कोई अंतर आ गया है?
ग़ौर से देखो
अनुभव करो
क्या कोई अंतर
आ गया है?
जहां तुम थे
अब भी वहां हो
इस मौन में
अजब धूमधाम है
-- हां यह पहले नहीं
थी:
इस मूकता में
एक अजब बहार-सी है
तुम्हारे युगयुगीन
विद्रोही तराने की
--जो अभी सेपहले
इतनी आबोताब
लिए हुए नहीं था!
याद है, याद है
याद है,
गुरुदेव ने कहा था?
"भाई नज़रुल!
तुम्हारी विद्रोही संग्रह की;
पहली ही
कविता को
मैं लगातार तीन दिन तक
पढ़ता रहा
और उसी से
मेरे जिन गीतों ने
जन्म लिया है
उन्हें मैं तुम्हें
इस कारागृह में भेंट देने के लिए
स्वयं तुम्हारे सम्मुख
आ खड़ा हुआ हूं
इन्हें स्वीकार कर
मुझे धन्य करो!
तुम एशिया की महान शक्ति हो, भाई!"
और तुमने क्या कहा था
याद है?
"गुरुदेव,
तुम सचमुच गुरुदेव हो!"
एक महाकवि
कारा के बाहर
और एक कारा के भीतर:
तुम्हारी वाणी ने
दोनों के संगीतों को
--एक कारा के भीतर के
--एक बाहर के
--दोनों संगीतों के
स्वरों को
कहां केन्द्रीभूत कर दिया था!?
तुम्हारा मौन मुझे बहुत अखरता है!
बहुत भारी व्यंजना लगता है
बहुत स्थाई
... और फिर भी इतिहास
की धड़कन में चुपचाप
निरंतर बजता हुआ
मैं तुम्हें सुनता हूं
और देखता हूं
सरों की नोकीली काली हरी क़तारों में--
जहां भी धान का कोई
एक दाना है, वहां--
जहां भी कोई बात
"शोनार" और "शोणित" से
शुरू होगी
वहां तुम ही
अचल
सर झुकाए
एकटक सामने से
देखते
न देखते हुए
मूक
मौन
मुखर
तीनों भौतिक देशों
की आंतरिक एकता में
मुखर
अचल
मूक
लंबवत
आशीषवत
तीनों देशों के युद्ध
वैमनस्य
नाना योजनाओं के
परे
दृढ़, अचल,
एक-रूप जैसे कि ...
... हां अल्लाह एक है
जैसे कि
उसकी मख़लूक
यह प्यारी दुनिया
हम-तुम
एक हैं!
इस एकता को
अपनी भवों में उठाए
अपनी आंखों में
एक पवित्र सपने की तरह आंजे
बैठे हो
अब भी बैठे हो
हमारी आंखों के सामने
हमारे हृदय आज
ढाका की उस
पावन धरती पर
श्रद्धा और प्रेम के
फूल बन कर
अर्पित हो रहे हैं
चारों ओर से
ओ
कविर्मनीषी!
ओ हमारी
सोने की मिट्टी के प्राण!
ओ हमारे प्राणों के
अमर विद्रोही!
और हमारी विश्व-शंति के
अमर समायोजक!
--जो मौन मूक और
भुलाया हुआ-सा है
वही
हमारे साथ
सांस लेता भी रहा है
हम भी उसके साथ
बराबर निरन्तर
सांस लेते रहे हैं
और अब भी
उसकी सांस
हमारी सांस में
इतिहास बनती हुई
चल रही है!
Sunday, May 22, 2011
शिव कैलाशों के वासी
पिछले कुछ दिनों से मेरे रूममेट ने सुबह सुबह एक भजन चला कर बोर किया हुआ है | वैसे बाद में जब मैंने आवाज और बोल पर ध्यान दिया तो मुझे यह बेहद पसंद आया | "शेफेर्ड'स सोंग्स" नाम की यह एल्बम राजिंदर सिंह एंड पार्टी ग्रुप की प्रस्तुति है | वैसे यह गीत यू ट्यूब पर उपलब्ध है किन्तु दूसरे गायकों की आवाज में | इसके बारे में नेट पर काफी ढूँढा तो सिर्फ थोड़ी देर की क्लिप ही मुफ्त है | इसे खरीदने के लिए मैं कुछ वेबसाइट पर भी गया | लेकिन इसका भुगतान कैसे होगा और वो कैसे यह भजन पहुंचाएंगे , यह पूरी तरह अस्पष्ट था | अत एव, मैं यह छोटी सी फ्री क्लिप आप लोगों को सुना रहा हूँ | इसे सुनिए , बेहद खूबसूरत हिमाचली भजन है |
Saturday, May 21, 2011
यान पोल्कोव्स्की के लिए नहीं - मार्सिन स्विएतलिकी की कविता
(पिछली कविता से आगे)
यान पोल्कोव्स्की के लिए नहीं
तमाम दिक्कतें उस कविता के साथ.
श्श्श! मत जगाओ प्रेतों को. सात साल बीत चुके ह.
साहित्य का इतिहास डकार जाता है सब कु़छ. श्श्श.
ज़्यादा विवेक होता है आसमान के इतिहास के पास.
नया क्या है? ज़्यादा कुछ नहीं. हम साधे जाते हैं
अपनी असामान्य वाक्पटुता और अपने सस्ते
खेलों को मन्दबुद्धि पाठकों के साथ (प्रिय पाठक,
जनाब क्रिस कोहलर यही समझते हैं आपको)
नया क्या है? ज़्यादा कुछ नहीं. इतने सारे कैद किए जा चुके.
लेकिन फ़ैज़ का क्या हुआ? मैंने किन्डरगार्टन में ही खो दी थीं
नेतृत्व की अपनी सारी योग्यताएं. मैं अपने हथियार नीचे रख देता हूं.
मैं बैठता हूं और कविता बेचता हूं (अलबत्ता जनाब एम. बैरन
ने मुझे सलाह दी है, सन्जीदगी से सलाह दी है कि मैं ऐसा न करूं.)
मैं सांस लेता हूं. और दग़ा देता हूं. मैं बेचता हूं. मैं असहज हूं.
नियन्त्रण में. बढ़िया. मुझे पुलिस
और यातना दो. मैं आज़ादाना कविता लिखूंगा
और ईश्वर को उसमें उलझा दूंगा, चेचन्या, बाल्कन
और तुम्हें भी. जैसे भी हो सके. सब कुछ किया जा सकता है.
साहित्य का इतिहास डकार जाता है सब कु़छ. यह सच है.
ज़्यादा विवेक होता है आसमान के इतिहास के पास.
यान पोल्कोव्स्की के लिए - मार्सिन स्विएतलिकी की कविता
यान पोल्कोव्स्की के लिए
वक्त हुआ कार्डबोर्ड के नन्हे दरवाज़ों को बन्द किया जाए और एक खिड़की खोली जाए,
एक खिड़की खोली जाए और थोड़ी हवा को आने दिया जाए इस कमरे में.
पहले किस्मत हमेशा साथ होती थी जिस पर निर्भर रहा जा सकता था
अब वह खत्म हो चुकी. सिवा एक अपवाद के -
जब कविताएं जाती हैं और पीछे छोड़ जाती हैं अपनी दुर्गन्ध.
ग़ुलामों की कविता जीवित रहती है विचारों पर,
और विचार होते हैं रक्त का पानीदार विकल्प.
कारागार में रहते हैं नायक,
और कामगार बदसूरत होता है अलबत्ता ज़रा सा
मददगार - ग़ुलामों की कविता में.
गुलामों की कविता में पेड़ों के भीतर सलीबें
होती हैं - उनकी छाल के नीचे - कांटेदार तार की बनीं.
तो कितना आसान होता है ग़ुलाम के लिए
वर्णमाला से ईश्वर तक की विकट लम्बी
और असल में असम्भव सड़क पर चलना, वह बनी रहती है बस एक पल को
जैसे थूकना - ग़ुलामों की कविता में.
बजाए कहने के - मुझे दांतदर्द है, मैं
भूखा हूं, मैं अकेला हूं, हम दोनों, हम
चारों, हमारी पूरी गली - वे ख़ामोशी से कहते हैं: वान्डा
वासीलेव्स्का, सिप्रियन कामिल नोर्विड,
जोसेफ़ पिल्सुद्स्की, युक्रेन, लिथुआनिया,
थॉमस मान, बाइबिल, और अन्त में
यिदिश भाषा में एकाध शब्द.
अगर ड्रैगन अब भी रह रहा था इस शहर में
तो वे अपनी खुशामदों से ड्रैगन को मार डालेंगे - या सिमट
जाएंगे किसी कोने में ताकि कविताएं लिख सके-
ड्रैगन को डराने के लिए नन्ही मुठ्ठियां
(हरेक प्रेम कविता लिखी जाएगी
एक ड्रैगन वर्णमाला में ...)
मैं सीधा देखता हूं ड्रैगन की आंखों में
और अपने कन्धे उचकाता हूं. जून का महीना है. साफ़ दिख रहा है.
इस दोपहर यहां आया था एक तूफ़ान. गोधूलि उतरेगी
सबसे पहले शहर के बिल्कुल चौकोर चौक पर.
(यान पोल्कोव्स्की: मार्सिन स्विएतलिकी के समकालीन पोलिश कवि; वान्डा वासीलेव्स्का, सिप्रियन कामिल नोर्विड और जोसेफ़ पिल्सुद्स्की: क्रमशः विख्यात पोलिश साहित्यकार, कवि और सेनानायक; थॉमस मान: १९२९ के नोबेल पुरुस्कार विजेता जर्मन मूल के उपन्यासकार, सामाजिक आलोचक और निबन्धकार)
---
(इस कविता का एक अगला भाग भी है जिसमें दर असल यह कविता पूरी होती है - कल पढ़िये वो वाला हिस्सा)
पन्नालाल घोष की बांसुरी
उस्ताद अलाउद्दीन ख़ान के शिष्य अमल ज्योति घोष उर्फ़ पन्नालाल घोष (३१ जुलाई १९११ - २० अप्रैल १९६०) की यह उपलब्धि थी कि उन्होंने बांसुरी को संगीत में उसका वह दर्ज़ा दिलवाया जहां वह आज है. उनसे सुनिये राग चन्द्रमौलि - पहले विलम्बित में फिर द्रुत -
Friday, May 20, 2011
रहना नहिं देस बिराना है
पंडित जितेंद्र अभिषेकी(21 सितम्बर 1929 – 7 नवम्बर 1998) हिन्दुस्तानी संगीत में अपनी विशिष्ट गायन शैली के लिए जाने जाते हैं. इसके अलावा १९६० के दशक में मराठी रंगमंचीय संगीत के पुनरुत्थान का कार्य अकेले कर दिखाने का श्रेय भी उनको जाता है.
अभिषेकी मंगेशी, गोआ के एक पुजारी ब्राह्मण नवाते परिवार में जन्मे थे. परम्परा से उनका परिवार गोआ में भगवान शिव के मंगेशी तीर्थ से जुड़ा हुआ था. मास्टर दीनानाथ मंगेशकर के भतीजे और शिष्य उनके पिता बलवन्तराव, मन्दिर में पुजारी और कीर्तनकार थे. उन्होंने ही अपने पुत्र को भारतीय शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सिखाईं. बाद में वे बम्बई आ गए जहां जितेंद्र अभिषेकी ने पंडित जगन्नाथबा पुरोहित, जयपुर घराने की गुलाबबाई जसदानवाला और आगरा घराने के उस्ताद अज़मत हुसैन ख़ान से विधिवत शिक्षा पाई. अपनी ख़ास गायनशैली में पंडित जी ने मराठी नाट्यसंगीत और भजनों के क्षेत्र में खासा नाम कमाया.
आज सुनिए उनसे राग भैरवी में कबीरदास जी का एक भजन:
मैं उड़ना चाहता हूं तुम्हारे साथ
सुन्दर चन्द ठाक्र बहुत दिनों बाद अपनी नई कविताओं के साथ नमूदार हुए हैं. उन्होंने मुझे आज ही मेल से अपनी कुछ ताज़ा अप्रकाशित रचनाएं भेजी हैं. उन में से सबसे पहले पढ़िये छोटी-छोटी पांच प्रेम कविताओं की यह सीरीज़. बाकी कविताएं भी जल्द ही.-
प्यारी
१.
धीरे से उंगलियां छुड़ाकर
अब तुम हंसकर कहोगी कि क्या हुआ
कल फिर मिलेंगे न
कल?
ख़ुशियों का कल कहां होता है
कल क्या चांद इतना ही वहशी होगा
हवा ऐसी पुरज़ोर
और तुम्हारी आंखों में उफनता ऐसा ही सैलाब
कल तक तो जासूसी नज़रें हमें खोज ले सकती हैं!
२.
अब सिर्फ़ तुम हो
पहले मां भी थी
जो देख लेती थी मेरी रुंआसी आत्मा
और बिना मांगे दे देती थी प्यार
तुम्हारे बाद
नहीं है
कोई
३.
समंदर से पहले तुम हो
भरी हुई नदियों और हरे पहाड़ों से पहले भी
बर्फ़, बारिश और तारों जड़ी रात
चिड़ियों के जादुई कंठ
पंखुरियां फैलाते फूलों और उम्मीदों से भरी
एक नई सुबह
ख़ुश ख़बर एक
पकी हुई फ़सल से भी पहले तुम हो
जीवन में कुछ न पाने के शोक
और सब कुछ पा लेने की ख़ुशी से भी पहले
मेरी अंतस से लगी देहरी
पहला पायदान
मुझ से पहले
मेरे लिए
तुम्हीं हो.
४.
मेरे शब्दों में मिठास भर आई है
मेरी आंखों में ख़्वाब घुस गए हैं
तितलियां हैं
कि बेधड़क बैठ जाती हैं मुझ पे
मैं एक मासूम-सी हंसी में बदल गया हूं
मैं तपती हुई रेत पर हंसते हुए चलता हूं
खुले ख़ंजरों के बीच बेसाख़्ता गुज़रता हूं
कहीं हो तुम
आसपास या दूर कहीं
मुझे तुम्हारी आवाज़ सुनाई देती है.
५.
कुछ था तुम्हारे भीतर
जिस तक पहुंचना चाहता रहा मैं
सिर्फ़ एक परदा थीं तुम्हारी आंखें
तुम्हारी हंसी एक धोख़ा
वह बिन्दु जहां से रिसता है जीवन
सुराख़ वह छिपा हुआ अंतस में कहीं
तुम्हारी बेबसी का राज़ छिपा था जहां
मुझे पहुंचना था वहां
मैं तुम्हारे सारे पोर खोल देना चाहता हूं
हवा की तरह भर जाना चाहता हूं तुम में
समुद्री हवा की तरह
उड़ा देना चाहता हूं उनमें जमा हुआ दुःख
मैं उड़ना चाहता हूं तुम्हारे साथ
नदी के पानी से प्यास बुझाकर
उड़ जाते हैं जैसे दो पक्षी
हवा में कुलांचें भरते.
(चित्र: समकालीन अमेरिकी कलाकर जेसिका टॉरेन्ट की कृति "बिलवेड")
प्यारी
१.
धीरे से उंगलियां छुड़ाकर
अब तुम हंसकर कहोगी कि क्या हुआ
कल फिर मिलेंगे न
कल?
ख़ुशियों का कल कहां होता है
कल क्या चांद इतना ही वहशी होगा
हवा ऐसी पुरज़ोर
और तुम्हारी आंखों में उफनता ऐसा ही सैलाब
कल तक तो जासूसी नज़रें हमें खोज ले सकती हैं!
२.
अब सिर्फ़ तुम हो
पहले मां भी थी
जो देख लेती थी मेरी रुंआसी आत्मा
और बिना मांगे दे देती थी प्यार
तुम्हारे बाद
नहीं है
कोई
३.
समंदर से पहले तुम हो
भरी हुई नदियों और हरे पहाड़ों से पहले भी
बर्फ़, बारिश और तारों जड़ी रात
चिड़ियों के जादुई कंठ
पंखुरियां फैलाते फूलों और उम्मीदों से भरी
एक नई सुबह
ख़ुश ख़बर एक
पकी हुई फ़सल से भी पहले तुम हो
जीवन में कुछ न पाने के शोक
और सब कुछ पा लेने की ख़ुशी से भी पहले
मेरी अंतस से लगी देहरी
पहला पायदान
मुझ से पहले
मेरे लिए
तुम्हीं हो.
४.
मेरे शब्दों में मिठास भर आई है
मेरी आंखों में ख़्वाब घुस गए हैं
तितलियां हैं
कि बेधड़क बैठ जाती हैं मुझ पे
मैं एक मासूम-सी हंसी में बदल गया हूं
मैं तपती हुई रेत पर हंसते हुए चलता हूं
खुले ख़ंजरों के बीच बेसाख़्ता गुज़रता हूं
कहीं हो तुम
आसपास या दूर कहीं
मुझे तुम्हारी आवाज़ सुनाई देती है.
५.
कुछ था तुम्हारे भीतर
जिस तक पहुंचना चाहता रहा मैं
सिर्फ़ एक परदा थीं तुम्हारी आंखें
तुम्हारी हंसी एक धोख़ा
वह बिन्दु जहां से रिसता है जीवन
सुराख़ वह छिपा हुआ अंतस में कहीं
तुम्हारी बेबसी का राज़ छिपा था जहां
मुझे पहुंचना था वहां
मैं तुम्हारे सारे पोर खोल देना चाहता हूं
हवा की तरह भर जाना चाहता हूं तुम में
समुद्री हवा की तरह
उड़ा देना चाहता हूं उनमें जमा हुआ दुःख
मैं उड़ना चाहता हूं तुम्हारे साथ
नदी के पानी से प्यास बुझाकर
उड़ जाते हैं जैसे दो पक्षी
हवा में कुलांचें भरते.
(चित्र: समकालीन अमेरिकी कलाकर जेसिका टॉरेन्ट की कृति "बिलवेड")
ठुमक चलत रामचन्द्र
पंडित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर से सुनिए यह विख्यात भजन. १९२१ में जन्मे, पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के पुत्र डी. वी. बचपन से काफ़ी प्रतिभाशाली थे. दस वर्ष के थे जब पिता का देहान्त हो गया. उनके संगीत-प्रशिक्षण का ज़िम्मा पंडित विनायकराव पटवर्धन और पंडित नारायणराव व्यास ने सम्हाला. १४ वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी पहली परफ़ॉर्मेन्स दी. ग्वालियर घराना और गन्धर्व महाविद्यालय की परम्पराएं उन्हें विरासत में मिली थीं पर उन्हें दूसरे घरानों और शैलियों से कभी कोई गुरेज़ न था. यह भारतीय संगीत का दुर्भाग्य रहा कि सिर्फ़ ३४ की आयु में इन्सेफ़ेलाइटिस के कारण उनकी जीवनलीला समाप्त हो गई.
Thursday, May 19, 2011
द नेम इज़ बॉन्ड, रस्किन बॉन्ड - रीपोस्ट
आज रस्किन बॉन्ड का ७७वां जन्मदिन है. इस अवसर पर प्रस्तुत है पिछले साल पूर्व पत्रकार शालिनी जोशी द्वारा लिया गया बॉन्ड का इन्टरव्यू एक बार पुनः

जनाब रस्किन बॉन्ड का यह साक्षात्कार देहरादून में रहनेवाली पत्रकार शालिनी जोशी द्वारा लिया गया है. इसे उपलब्ध कराया है उनके हमसफ़र श्री शिवप्रसाद जोशी ने. शिवप्रसाद जोशी हाल तक जर्मन रेडियो डॉयचे वैले से सम्बद्ध थे. वापस आकर फ़िलहाल देहरादून में हैं. इधर उन्होंने हिलवाणी के नाम से एक वैबसाइट शुरू की है जिसका लिंक पिछले कुछ दिनों से आपको कबाड़ख़ाना में सबसे नीचे बमय मास्ट के नज़र आ रहा होगा. शिवप्रसाद जी कबाड़ख़ाने से जुड़े नवीनतम कबाड़ी हैं. देहरादून पर उनकी एक पोस्ट यहां पहले लगाई जा चुकी है. उनकी दिलचस्पियों का दायरा विस्तृत है और एक अच्छे गद्यकार के तौर पर वे अपने को बाक़ायदा स्थापित कर चुके हैं. फ़िलहाल इस पोस्ट को हमें यहां लगाने का मौक़ा देने के लिए उनका आभार.
भूतों के पास चला जाता हूं
जो भी मसूरी आता है, उनके बारे में पूछता है, कहां रहते हैं, कैसे दिखते हैं और यहां तक कि लोग सीधे उनके घर तक चले आते हैं.
76 साल की उम्र में भी रस्किन बॉन्ड को लेकर एक दीवानगी सी है. उनकी शख्सियत सांताक्लॉज की तरह है. सरल, रोचक, हंसमुख और बच्चों पर न्यौछावर. मसूरी के निवासियों में वो बॉन्ड साहब के नाम से जाने जाते हैं. 500 से ज्यादा रोचक कहानियों, उपन्यासों, संस्मरणों और अनगिनत लेखों के साथ एक लंबे समय से बच्चों और बड़ों सबका मनोरंजन करनेवाले मशहूर लेखक रस्किन बॉन्ड आज अंतरराष्ट्रीय ख्याति के रचनाकार हैं. उनकी कुछ चर्चित किताबें हैं – ए फ्लाइट ऑफ पिजन्स, घोस्ट स्टोरीज फ्रॉम द राज, डेल्ही इज नॉट फ़ार, इंडिया आई लव, पैंथर्स मून ऐंड अदर स्टोरीज़ औऱ रस्टी के नाम से उनकी आत्मकथा की श्रृंखला.
रस्किन का जन्म 1934 में हिमाचल प्रदेश में कसौली में हुआ था मगर कुछ ही समय बाद उनका परिवार देहरादून आ गया और तब से रस्किन देहरादून और मसूरी के होकर रह गये. मसूरी में उनके घर , आई वी कॉटेज में 12 जून को जिस दिन ये इंटरव्यू लिया ,उस दिन बारिश हो रही थी और हल्की सर्दी भी थी. लंढौर में बस अड्डे पर लगे जाम के कारण उनके घर पंहुचने में कुछ देर हो गई तो हिचक हो रही थी कि एक बुजुर्ग लेखक को इस तरह से इंतजार कराना गलत होगा .लेकिन जब उनके घर पंहुची तो वो इंतजार ही कर रहे थे .उन्हें ये भी याद था कि आज से 15 साल पहले जब मैं जी न्यूज की संवाददाता थी तो उनसे बिना अप्वाइंटमेंट लिये इंटरव्यू लेने चली आई थी.उन्होंने छूटते ही कहा कि चलिये इस बार आपने पहले से बता तो दिया कि आपको मुझसे बातचीत करनी है . औऱ फिर जब बातो का सिलसिला शुरू हुआ तो रस्किन खुलकर मिले और खुशमिजाज ढंग से .
रस्किन का घर भी उनकी किसी कहानी की तरह ही दिलचस्प है. लकड़ी की छत और लकड़ी का फ़र्श. एक कमरा, उस कमरे में एक मेज़, एक कुर्सी और एक पलंग. रस्किन यहीं पर लिखते पढ़ते और सोते हैं. एक और कमरा जहां वो आने वालों से मिलते हैं. और वहीं पर किताबें हैं पुरानी शेल्फ़ और कुछ पुरानी तस्वीरें.
आपने अभी हाल ही में अपना 76वां जन्मदिन मनाया.इस उम्र में भी आप बच्चों के लिये कैसे लिख लेते हैं?
इस उम्र में शायद ज्यादा लिखता हूं बच्चों के लिये. इस बुढ़ापे में मुझे खुद अपने बचपन की भी ज्यादा याद आती है.अब जब इतना लंबा समय बीत गया है.
कहा भी जाता है कि बच्चे और बूढ़े समान होते हैं
हां ये सच है जैसे-जैसे हम बूढ़े होते जाते हैं एक तरह से बच्चों की तरह बनते जाते हैं और उनमें अपना बचपन ढूंढते हैं. यही कारण है कि बच्चे अपने माता-पिता की बजाय दादा-दादी और नाना-नानी से अधिक घुल-मिल जाते है. ये जरूर है कि आज बड़े-बुजुर्गों से कहानी सुनने की परंपरा खोती जा रही है क्योंकि परिवार ढीले होते जा रहे हैं और बच्चे कंप्यूटर,टीवी औऱ सीडी से चिपके हैं.
क्या बच्चों के लिये लिखना आसान है?
नहीं, ये ज्यादा कठिन है.बच्चों को आप शब्दजाल में नहीं बांध सकते .बड़े तो शायद आपको एक –दो पन्ने तक मौका दे दें लेकिन बच्चों को अगर कोई रचना शुरू से ही रोचक औऱ सरस नहीं लगी तो वो दूसरे पन्ने को हाथ भी नहीं लगाएंगे.इसलिये बच्चों के लिये लिखते हुए कड़ा अनुशासन और मेहनत करनी होती है. मुझे बच्चों के लिये लिखना इसलिये भी अच्छा लगता है क्योंकि उनके विचारों में ताजगी और सवालों में ईमानदारी होती है. इसी बात पर रस्किन एक किस्सा सुनाते हैं “मैं किसी स्कूल में गया था वहां टीचर ने एक बच्ची से पूछा कि तुम्हें रस्किन कैसे लेखक लगते हैं तो उसने अन्यमनस्कता से कहा कि हां ठीक ही हैं. ही इज़ नॉट बैड राइटर. इस टिप्पणी को मैं अपने लिये एक तारीफ मानता हूं.”
आपने पहली बार कब और क्या लिखा?
उस समय मैं स्कूल में ही था. मैंने अपने स्कूल, टीचर और हेडमास्टर के बारे में कुछ मजाक बनाकर लिख दिया था. मेरे डेस्क से दोस्तों ने निकाल कर पढ़ लिया.टीचर से शिकायत हो गई .मेरे लिखे को फाड़कर फेंक दिया गया और मुझे उसकी सजा भी मिली. लेकिन मैंने स्कूल में ही तय कर लिया था कि मुझे लेखक बनना है और स्कूल से पास आउट होते ही मेरी पहली रचना रूम ऑन द रूफ प्रकाशित हुई.
आप अपनी कहानियों के पात्र कहां से लाते हैं? कैसे योजना बनाते है?
लोगों में मेरी दिलचस्पी रहती है.उनका चरित्र मुझे आकर्षित करता है.ज्यादातर मेरे दोस्त,रिश्तेदार और रोजाना मिलनेवाले लोगों से ही मैं प्रेरणा लेता हूं.कभी हूबहू कभी उन्हें औऱ निखारकर गढ़ता हूं.मेरे दिमाग में एक खाका बन जाता है.मैं बहुत ज्यादा तैयारी या कोई साल भर की योजना भी नहीं बनाता.
आपने तो भूत-प्रेतों की कहानियां भी लिखी है. ये तो असल जिंदगी के नहीं होंगे!
जब-जब मैं लोगों से परेशान और बोर हो जाता हूं भूतों के पास चला जाता हूं.हालांकि मैं बताना चाहूगा कि मैं निजी तौर पर किसी भूत को नहीं जानता हूं लेकिन मैं उन्हें अक्सर महसूस करता हूं .कभी सिनेमाघर में,कभी किसी बार में ,रेस्तरां में या दरख्तों के आसपास और जंगल में.फिर मैं अपनी कल्पना से उन्हें पैदा करता हूं एक जादुई संसार बनाता हूं .
आप क्या कंप्यूटर पर लिखते हैं?
नहीं मैं कंप्यूटर चलाना जानता ही नहीं. पहले टाइपराइटर पर लिखता था लेकिन कंधे में दर्द हो गया तो अब हाथ से ही लिखता हूं .यहीं इस कमरे में मेज –कुर्सी पर और जब थक जाता हूं तो दोपहर को एक झपकी जरूर ले लेता हूं. (रस्किन का घर औऱ उनका कमरा भी उनकी किसी कहानी की तरह ही दिलचस्प है. लकड़ी की छत और लकड़ी का फ़र्श. एक कमरा, उस कमरे में एक मेज़, एक कुर्सी और एक पलंग. रस्किन यहीं पर लिखते पढ़ते और सोते हैं. एक और कमरा जहां वो आने वालों से मिलते हैं. और वहीं पर किताबें हैं पुरानी शेल्फ़ और कुछ पुरानी तस्वीरें.)
आपकी रचनाओं पर फिल्म बनी और अभी भी एक थ्रिलर बन रही है.
जुनून बनी फ्लाइट ऑफ पिजन पर फिर विशाल भारद्वाज ने नीली छतरी बनाई.अब वो मेरी एक भुतहा कहानी सुजैनाज़ सेवन हसबैंड पर फिल्म बना रहे हैं लेकिन फिल्म का टाइटल कुछ ज्यादा ही खतरनाक रख दिया है सात खून माफ. ये एक ऐसी औऱत की कहानी है जो एक के बाद एक 7 शादियां करती है और हर पति की मौत रहस्यमयी स्थितियों में हो जाती है. इसमें प्रियंका चोपड़ा हैं और उसके पतियों की भूमिका में नसीरूद्दीन शाह औऱ जॉन अब्राहम आदि है.
सुनने में आया है इस फिल्म में आप खुद भी अदाकारी कर रहे हैं.
मुझे बूढा बिशप बनना है.आमतौर पर बिशप के पास एक रम की बोतल होती है.लेकिन मुझे नहीं लगता कि मुझे ऐसी कोई बोतल मिलनेवाली है. (रस्किन मजाक करते हैं और खुलकर हंसते हैं)
अगर आपके बीते दिनों की बात करें तो आप ब्रिटेन भी गये थे.
उस समय मैं 17 साल का था.मुझे जबरन लंदन भेज दिया गया था.लेकिन मैं भागकर चला आया.मैंने अपने आपको वहां फिट नहीं पाया.मेरा बचपन और जवानी यहां बीती थी .वापस लौटने की कसक इतनी ज्यादा थी कि मैं वहां रुक ही नहीं पाया.
कभी इस फैसले का मलाल हुआ?
नहीं कभी नहीं .
मैं भारतीय हूं ठीक वैसे ही जैसे कोई गुजराती या मराठी होगा . मेरी जड़ें यहीं है .
आपने रहने के लिये मसूरी को चुना.पहाड़ों में रहना कैसा है?
आज 40 सालों से यहां रहते हुए कह सकता हूं कि मैं पहाड़ों में रहा इसलिये ही आज तक जिंदा हूं.यहां रहना सुंदर है और यहां की शांति का कोई मुकाबला नहीं है.
आपने विवाह नहीं किया. ऐसा क्यों?
नहीं नहीं ऐसा नहीं था मैंने दो-तीन बार कोशिश की लेकिन दूसरी तरफ से कोई उत्साहजनक जवाब नहीं मिला .उस समय मैं बहुत कम कमाता था.लोग मानते थे कि अरे ये तो ऐसे ही है कुछ लिखता-विखता है. आज कमाता तो हूं लेकिन अब मुझ बुढ्ढे से कौन शादी करेगा .(रस्किन एक औऱ मजाक करते हैं ) लेकिन मैंने शादी भले नहीं की मगर आज अकेला नहीं हूं .मेरा परिवार है.मेरे पोते हैं .मेरी अच्छी देखभाल होती है.(रस्किन ने काफी पहले एक बच्चे को गोद लिया था औऱ आज वो बच्चा बड़ा हो गया है और उसका भरा-पूरा परिवार है जो रस्किन के साथ ही रहता है)
लेकिन आपके लेखन में अकेलापन दिखता है .एक तरह की एकांतिकता. कैसे?
शायद इसलिये कि मेरा बचपन बहुत अकेला था.10 साल का था जब मेरे पिता गुजर गये.फिर मां ने दूसरी शादी कर ली. मैं बहुत मुश्किल से परिवार में ऐडजस्ट हो पाता था. अकेला मीलों तक चलता था. गुमसुम बैठा रहता था. ये बात वी एस नायपॉल ने भी कही है कि मैं उन कुछ लेखकों में हूं जिनके लेखन में एकांतिकता का भाव है.
लेकिन आज तो सिर्फ आपकी किताबें ही नहीं आप खुद भी बहुत लोकप्रिय है
शायद मेरी थुलथल देह और तोंद की वजह से ... असल में इधर 5-6 सालों से ऐसा हुआ है कि लोकप्रियता बढ़ती हुई दिख रही है .वरना मैं तो संकोची स्वभाव का हूं .पहले मैं सिर्फ एक नाम था लेकिन अब टेलीविजन और मीडिया का बढ़ता प्रसार है.मुझे प्रकाशक इधर-उधर ले जाते है.कभी बुक रीडिंग सेशन है,कभी स्कूल है तो कभी ऑटोग्राफ कैंपेन है.
आप एक तरह से आज के स्टार लेखक हैं .और आपके बेशुमार फैन हैं .कैसे सामना करते हैं आप उनका?
पागल हो जाता हूं .कई बार टूरिस्ट सीधे घर चले आते हैं. उन्हें भगाना पड़ता है.मुझे इसका दुख भी होता है लेकिन क्या करूं एक लेखक की भी तो मजबूरी होती है. कभी दिल्ली से स्कूल का ग्रुप आ जाता है जिन्हें रस्किन पर प्रोजेक्ट बनाने का एसाइनमेंट ही दिया जाता है.किसी को फोटो खींचनी है किसी को इंटरव्यू करना है. मुझ पर ये एक तरह की बमबारी है. अन्याय ही है. उन्हें समझना चाहिये कि एक लेखक को भी अपना काम करना होता है.उसमें बाधा नहीं पड़नी चाहिये .
आप किस तरह से याद किया जाना चाहेंगे?
एक तोंदियल बूढ़ा जिसकी दोहरी ठुड्डी थी. (हंसते हैं..). मैं चाहूंगा कि लोग मेरी किताबें पढ़ते रहें .कई बार लोग जल्द ही भुला दिये जाते हैं. हालांकि कई बार ऐसा होता है कि मौत के बाद कुछ लोग और प्रसिद्ध हो जाते हैं. मुझे अच्छा लगेगा कि लोग मेरे लेखन का आनन्द उठाते रहें.
मैं रस्किन की कुछ फोटो लेती हूं.उनके घर के कमरे से एक खिड़की खुलती है जहां से मसूरी की पहाड़ियां नजर आती हैं. रस्किन उस खिड़की को खोलते हैं ठंडी हवा का झोंका भीतर आता है और वो खुद अपनी पूरी जिंदगी और रचना कर्म की यादों में डूब जाते हैं उन्होंने सचिन तेंदुलकर पर एक कविता लिखी है. मुझे देते हैं - 'इसे पढ़ियेगा'. साथ ही अपनी एक किताब पर शुभकामना लिखकर वो मेरे बेटे के लिये देते हैं. मैं उनसे विदा लेती हूं और एक बार फिर सोचती हूं कि सादगी और सरलता से रहना भी शायद एक रचना की तरह है.
-शालिनी जोशी
(यह इंटरव्यू कादम्बिनी के अगस्त अंक में प्रकाशित हुआ है, वहां से साभार)

जनाब रस्किन बॉन्ड का यह साक्षात्कार देहरादून में रहनेवाली पत्रकार शालिनी जोशी द्वारा लिया गया है. इसे उपलब्ध कराया है उनके हमसफ़र श्री शिवप्रसाद जोशी ने. शिवप्रसाद जोशी हाल तक जर्मन रेडियो डॉयचे वैले से सम्बद्ध थे. वापस आकर फ़िलहाल देहरादून में हैं. इधर उन्होंने हिलवाणी के नाम से एक वैबसाइट शुरू की है जिसका लिंक पिछले कुछ दिनों से आपको कबाड़ख़ाना में सबसे नीचे बमय मास्ट के नज़र आ रहा होगा. शिवप्रसाद जी कबाड़ख़ाने से जुड़े नवीनतम कबाड़ी हैं. देहरादून पर उनकी एक पोस्ट यहां पहले लगाई जा चुकी है. उनकी दिलचस्पियों का दायरा विस्तृत है और एक अच्छे गद्यकार के तौर पर वे अपने को बाक़ायदा स्थापित कर चुके हैं. फ़िलहाल इस पोस्ट को हमें यहां लगाने का मौक़ा देने के लिए उनका आभार.
भूतों के पास चला जाता हूं
जो भी मसूरी आता है, उनके बारे में पूछता है, कहां रहते हैं, कैसे दिखते हैं और यहां तक कि लोग सीधे उनके घर तक चले आते हैं.
76 साल की उम्र में भी रस्किन बॉन्ड को लेकर एक दीवानगी सी है. उनकी शख्सियत सांताक्लॉज की तरह है. सरल, रोचक, हंसमुख और बच्चों पर न्यौछावर. मसूरी के निवासियों में वो बॉन्ड साहब के नाम से जाने जाते हैं. 500 से ज्यादा रोचक कहानियों, उपन्यासों, संस्मरणों और अनगिनत लेखों के साथ एक लंबे समय से बच्चों और बड़ों सबका मनोरंजन करनेवाले मशहूर लेखक रस्किन बॉन्ड आज अंतरराष्ट्रीय ख्याति के रचनाकार हैं. उनकी कुछ चर्चित किताबें हैं – ए फ्लाइट ऑफ पिजन्स, घोस्ट स्टोरीज फ्रॉम द राज, डेल्ही इज नॉट फ़ार, इंडिया आई लव, पैंथर्स मून ऐंड अदर स्टोरीज़ औऱ रस्टी के नाम से उनकी आत्मकथा की श्रृंखला.
रस्किन का जन्म 1934 में हिमाचल प्रदेश में कसौली में हुआ था मगर कुछ ही समय बाद उनका परिवार देहरादून आ गया और तब से रस्किन देहरादून और मसूरी के होकर रह गये. मसूरी में उनके घर , आई वी कॉटेज में 12 जून को जिस दिन ये इंटरव्यू लिया ,उस दिन बारिश हो रही थी और हल्की सर्दी भी थी. लंढौर में बस अड्डे पर लगे जाम के कारण उनके घर पंहुचने में कुछ देर हो गई तो हिचक हो रही थी कि एक बुजुर्ग लेखक को इस तरह से इंतजार कराना गलत होगा .लेकिन जब उनके घर पंहुची तो वो इंतजार ही कर रहे थे .उन्हें ये भी याद था कि आज से 15 साल पहले जब मैं जी न्यूज की संवाददाता थी तो उनसे बिना अप्वाइंटमेंट लिये इंटरव्यू लेने चली आई थी.उन्होंने छूटते ही कहा कि चलिये इस बार आपने पहले से बता तो दिया कि आपको मुझसे बातचीत करनी है . औऱ फिर जब बातो का सिलसिला शुरू हुआ तो रस्किन खुलकर मिले और खुशमिजाज ढंग से .
रस्किन का घर भी उनकी किसी कहानी की तरह ही दिलचस्प है. लकड़ी की छत और लकड़ी का फ़र्श. एक कमरा, उस कमरे में एक मेज़, एक कुर्सी और एक पलंग. रस्किन यहीं पर लिखते पढ़ते और सोते हैं. एक और कमरा जहां वो आने वालों से मिलते हैं. और वहीं पर किताबें हैं पुरानी शेल्फ़ और कुछ पुरानी तस्वीरें.
आपने अभी हाल ही में अपना 76वां जन्मदिन मनाया.इस उम्र में भी आप बच्चों के लिये कैसे लिख लेते हैं?
इस उम्र में शायद ज्यादा लिखता हूं बच्चों के लिये. इस बुढ़ापे में मुझे खुद अपने बचपन की भी ज्यादा याद आती है.अब जब इतना लंबा समय बीत गया है.
कहा भी जाता है कि बच्चे और बूढ़े समान होते हैं
हां ये सच है जैसे-जैसे हम बूढ़े होते जाते हैं एक तरह से बच्चों की तरह बनते जाते हैं और उनमें अपना बचपन ढूंढते हैं. यही कारण है कि बच्चे अपने माता-पिता की बजाय दादा-दादी और नाना-नानी से अधिक घुल-मिल जाते है. ये जरूर है कि आज बड़े-बुजुर्गों से कहानी सुनने की परंपरा खोती जा रही है क्योंकि परिवार ढीले होते जा रहे हैं और बच्चे कंप्यूटर,टीवी औऱ सीडी से चिपके हैं.
क्या बच्चों के लिये लिखना आसान है?
नहीं, ये ज्यादा कठिन है.बच्चों को आप शब्दजाल में नहीं बांध सकते .बड़े तो शायद आपको एक –दो पन्ने तक मौका दे दें लेकिन बच्चों को अगर कोई रचना शुरू से ही रोचक औऱ सरस नहीं लगी तो वो दूसरे पन्ने को हाथ भी नहीं लगाएंगे.इसलिये बच्चों के लिये लिखते हुए कड़ा अनुशासन और मेहनत करनी होती है. मुझे बच्चों के लिये लिखना इसलिये भी अच्छा लगता है क्योंकि उनके विचारों में ताजगी और सवालों में ईमानदारी होती है. इसी बात पर रस्किन एक किस्सा सुनाते हैं “मैं किसी स्कूल में गया था वहां टीचर ने एक बच्ची से पूछा कि तुम्हें रस्किन कैसे लेखक लगते हैं तो उसने अन्यमनस्कता से कहा कि हां ठीक ही हैं. ही इज़ नॉट बैड राइटर. इस टिप्पणी को मैं अपने लिये एक तारीफ मानता हूं.”
आपने पहली बार कब और क्या लिखा?
उस समय मैं स्कूल में ही था. मैंने अपने स्कूल, टीचर और हेडमास्टर के बारे में कुछ मजाक बनाकर लिख दिया था. मेरे डेस्क से दोस्तों ने निकाल कर पढ़ लिया.टीचर से शिकायत हो गई .मेरे लिखे को फाड़कर फेंक दिया गया और मुझे उसकी सजा भी मिली. लेकिन मैंने स्कूल में ही तय कर लिया था कि मुझे लेखक बनना है और स्कूल से पास आउट होते ही मेरी पहली रचना रूम ऑन द रूफ प्रकाशित हुई.
आप अपनी कहानियों के पात्र कहां से लाते हैं? कैसे योजना बनाते है?
लोगों में मेरी दिलचस्पी रहती है.उनका चरित्र मुझे आकर्षित करता है.ज्यादातर मेरे दोस्त,रिश्तेदार और रोजाना मिलनेवाले लोगों से ही मैं प्रेरणा लेता हूं.कभी हूबहू कभी उन्हें औऱ निखारकर गढ़ता हूं.मेरे दिमाग में एक खाका बन जाता है.मैं बहुत ज्यादा तैयारी या कोई साल भर की योजना भी नहीं बनाता.
आपने तो भूत-प्रेतों की कहानियां भी लिखी है. ये तो असल जिंदगी के नहीं होंगे!
जब-जब मैं लोगों से परेशान और बोर हो जाता हूं भूतों के पास चला जाता हूं.हालांकि मैं बताना चाहूगा कि मैं निजी तौर पर किसी भूत को नहीं जानता हूं लेकिन मैं उन्हें अक्सर महसूस करता हूं .कभी सिनेमाघर में,कभी किसी बार में ,रेस्तरां में या दरख्तों के आसपास और जंगल में.फिर मैं अपनी कल्पना से उन्हें पैदा करता हूं एक जादुई संसार बनाता हूं .
आप क्या कंप्यूटर पर लिखते हैं?
नहीं मैं कंप्यूटर चलाना जानता ही नहीं. पहले टाइपराइटर पर लिखता था लेकिन कंधे में दर्द हो गया तो अब हाथ से ही लिखता हूं .यहीं इस कमरे में मेज –कुर्सी पर और जब थक जाता हूं तो दोपहर को एक झपकी जरूर ले लेता हूं. (रस्किन का घर औऱ उनका कमरा भी उनकी किसी कहानी की तरह ही दिलचस्प है. लकड़ी की छत और लकड़ी का फ़र्श. एक कमरा, उस कमरे में एक मेज़, एक कुर्सी और एक पलंग. रस्किन यहीं पर लिखते पढ़ते और सोते हैं. एक और कमरा जहां वो आने वालों से मिलते हैं. और वहीं पर किताबें हैं पुरानी शेल्फ़ और कुछ पुरानी तस्वीरें.)
आपकी रचनाओं पर फिल्म बनी और अभी भी एक थ्रिलर बन रही है.
जुनून बनी फ्लाइट ऑफ पिजन पर फिर विशाल भारद्वाज ने नीली छतरी बनाई.अब वो मेरी एक भुतहा कहानी सुजैनाज़ सेवन हसबैंड पर फिल्म बना रहे हैं लेकिन फिल्म का टाइटल कुछ ज्यादा ही खतरनाक रख दिया है सात खून माफ. ये एक ऐसी औऱत की कहानी है जो एक के बाद एक 7 शादियां करती है और हर पति की मौत रहस्यमयी स्थितियों में हो जाती है. इसमें प्रियंका चोपड़ा हैं और उसके पतियों की भूमिका में नसीरूद्दीन शाह औऱ जॉन अब्राहम आदि है.
सुनने में आया है इस फिल्म में आप खुद भी अदाकारी कर रहे हैं.
मुझे बूढा बिशप बनना है.आमतौर पर बिशप के पास एक रम की बोतल होती है.लेकिन मुझे नहीं लगता कि मुझे ऐसी कोई बोतल मिलनेवाली है. (रस्किन मजाक करते हैं और खुलकर हंसते हैं)
अगर आपके बीते दिनों की बात करें तो आप ब्रिटेन भी गये थे.
उस समय मैं 17 साल का था.मुझे जबरन लंदन भेज दिया गया था.लेकिन मैं भागकर चला आया.मैंने अपने आपको वहां फिट नहीं पाया.मेरा बचपन और जवानी यहां बीती थी .वापस लौटने की कसक इतनी ज्यादा थी कि मैं वहां रुक ही नहीं पाया.
कभी इस फैसले का मलाल हुआ?
नहीं कभी नहीं .
मैं भारतीय हूं ठीक वैसे ही जैसे कोई गुजराती या मराठी होगा . मेरी जड़ें यहीं है .
आपने रहने के लिये मसूरी को चुना.पहाड़ों में रहना कैसा है?
आज 40 सालों से यहां रहते हुए कह सकता हूं कि मैं पहाड़ों में रहा इसलिये ही आज तक जिंदा हूं.यहां रहना सुंदर है और यहां की शांति का कोई मुकाबला नहीं है.
आपने विवाह नहीं किया. ऐसा क्यों?
नहीं नहीं ऐसा नहीं था मैंने दो-तीन बार कोशिश की लेकिन दूसरी तरफ से कोई उत्साहजनक जवाब नहीं मिला .उस समय मैं बहुत कम कमाता था.लोग मानते थे कि अरे ये तो ऐसे ही है कुछ लिखता-विखता है. आज कमाता तो हूं लेकिन अब मुझ बुढ्ढे से कौन शादी करेगा .(रस्किन एक औऱ मजाक करते हैं ) लेकिन मैंने शादी भले नहीं की मगर आज अकेला नहीं हूं .मेरा परिवार है.मेरे पोते हैं .मेरी अच्छी देखभाल होती है.(रस्किन ने काफी पहले एक बच्चे को गोद लिया था औऱ आज वो बच्चा बड़ा हो गया है और उसका भरा-पूरा परिवार है जो रस्किन के साथ ही रहता है)
लेकिन आपके लेखन में अकेलापन दिखता है .एक तरह की एकांतिकता. कैसे?
शायद इसलिये कि मेरा बचपन बहुत अकेला था.10 साल का था जब मेरे पिता गुजर गये.फिर मां ने दूसरी शादी कर ली. मैं बहुत मुश्किल से परिवार में ऐडजस्ट हो पाता था. अकेला मीलों तक चलता था. गुमसुम बैठा रहता था. ये बात वी एस नायपॉल ने भी कही है कि मैं उन कुछ लेखकों में हूं जिनके लेखन में एकांतिकता का भाव है.
लेकिन आज तो सिर्फ आपकी किताबें ही नहीं आप खुद भी बहुत लोकप्रिय है
शायद मेरी थुलथल देह और तोंद की वजह से ... असल में इधर 5-6 सालों से ऐसा हुआ है कि लोकप्रियता बढ़ती हुई दिख रही है .वरना मैं तो संकोची स्वभाव का हूं .पहले मैं सिर्फ एक नाम था लेकिन अब टेलीविजन और मीडिया का बढ़ता प्रसार है.मुझे प्रकाशक इधर-उधर ले जाते है.कभी बुक रीडिंग सेशन है,कभी स्कूल है तो कभी ऑटोग्राफ कैंपेन है.
आप एक तरह से आज के स्टार लेखक हैं .और आपके बेशुमार फैन हैं .कैसे सामना करते हैं आप उनका?
पागल हो जाता हूं .कई बार टूरिस्ट सीधे घर चले आते हैं. उन्हें भगाना पड़ता है.मुझे इसका दुख भी होता है लेकिन क्या करूं एक लेखक की भी तो मजबूरी होती है. कभी दिल्ली से स्कूल का ग्रुप आ जाता है जिन्हें रस्किन पर प्रोजेक्ट बनाने का एसाइनमेंट ही दिया जाता है.किसी को फोटो खींचनी है किसी को इंटरव्यू करना है. मुझ पर ये एक तरह की बमबारी है. अन्याय ही है. उन्हें समझना चाहिये कि एक लेखक को भी अपना काम करना होता है.उसमें बाधा नहीं पड़नी चाहिये .
आप किस तरह से याद किया जाना चाहेंगे?
एक तोंदियल बूढ़ा जिसकी दोहरी ठुड्डी थी. (हंसते हैं..). मैं चाहूंगा कि लोग मेरी किताबें पढ़ते रहें .कई बार लोग जल्द ही भुला दिये जाते हैं. हालांकि कई बार ऐसा होता है कि मौत के बाद कुछ लोग और प्रसिद्ध हो जाते हैं. मुझे अच्छा लगेगा कि लोग मेरे लेखन का आनन्द उठाते रहें.
मैं रस्किन की कुछ फोटो लेती हूं.उनके घर के कमरे से एक खिड़की खुलती है जहां से मसूरी की पहाड़ियां नजर आती हैं. रस्किन उस खिड़की को खोलते हैं ठंडी हवा का झोंका भीतर आता है और वो खुद अपनी पूरी जिंदगी और रचना कर्म की यादों में डूब जाते हैं उन्होंने सचिन तेंदुलकर पर एक कविता लिखी है. मुझे देते हैं - 'इसे पढ़ियेगा'. साथ ही अपनी एक किताब पर शुभकामना लिखकर वो मेरे बेटे के लिये देते हैं. मैं उनसे विदा लेती हूं और एक बार फिर सोचती हूं कि सादगी और सरलता से रहना भी शायद एक रचना की तरह है.
-शालिनी जोशी
(यह इंटरव्यू कादम्बिनी के अगस्त अंक में प्रकाशित हुआ है, वहां से साभार)
इतना मत रोना मेरी राधे!
नरेन्द्र कोहली हिंदी गद्य लेखन में पहचाना नाम है | पौराणिक पात्रों और चरित्रों को उन्होंने मानवीय आधार देकर वैज्ञानिक धरातल पर खड़ा किया | बहुत सारे लोग उन्हें अभ्युदय, महासमर, अभिज्ञान जैसी रचनाओं से जानते हैं | एक व्यंग्यकार के रूप में भी वे काफी ख्याति बटोर चुके हैं | एब्सर्ड उपन्यास हिंदी में उनका अनूठा प्रयोग रहा | वैसे उन्होंने अपनी शुरुआत हास्य कविताओं से की थी, आज उनकी एक शुरूआती कविता मुझे पाथेय के अक्टूबर-दिसंबर 2009 अंक में मिली, सो साझा करने का मन हो आया |
इतना मत रोना मेरी राधे!
(1)
जाता हूं
अब विदाई दो मुझको |
प्राण! साथ ही वचन भी यह दो -
मेरी अनुपस्थिति में तुम नहीं रोओगी |
नैनों को अपने निशि-दिन अश्रु-कणों से नहीं धोओगे |
(2)
कहते हैं -
ब्रज की गोपिकाओं में राधा थी कोई |
श्रीकृष्ण के मथुरा जाने पर वह बहुत थी रोई |
तुम,
इतना मत रोना मेरी राधे!
रो-रोकर नयन-ज्योति मत खोना मेरी राधे!
आंखें अपनी मूल्यवान हैं,
आंखों वाले भाग्यवान हैं,
रो-रोकर इन आंखों से हाथ न धोना मेरी राधे!
सच है, आंखें धुंधली होने पर
बाजार से चश्मा मिल सकता है |
हम यदि अपना जोर लगा दें
नेत्र-पुष्प फिर खिल सकता है |
पर मेरी राधा
यह तो मानोगी तुम भी-
हैं मूर्ख, व्यर्थ जो पैसे खोते हैं |
सच जानो तुम
चश्मे के फ्रेम बड़े महंगे होते हैं |
(3)
इतना मत रोना मेरी राधे!
अश्रु बाढ़ में
भूमि को अपनी न डुबोना मेरी राधे!
में गोकुल का ग्वाला कृष्ण नहीं कि
नगरी को अपनी बचा लूंगा |
न ही विष्णु का अवतार कृष्ण हूं
कि गोवर्धन को मैं उठा लूंगा |
(औ' यह यमुना का ब्रज नहीं
लौह नगरी टाटा की है |)
यदि बाढ़ में डूबी नगरी यह
तो अनर्थ महा इक हो जाएगा |
कारखाने को
बाढ़ का पानी धो जाएगा |
कार्य ठप होगा सारा
इस्पात का उत्पादन भी बंद हो जायेगा |
इस्पात नहीं होने से
योजना पर क्या आघात न होगा?
दौड़ में उन्नति की
देश हमारा मात न होगा?
सोचो तुम ही
देश से अपने क्या विश्वासघात न होगा?
फिर सारे देश में चंदा होगा |
नया- नया पर धंधा होगा |
जाने कितने लोग
इस धंधे में अपनी जेब भरेंगे |
देंगे भाषण, चित्र खिचाएंगे |
नेता बनकर नाम करेंगे |
कह सकती हो
ऐसे में बेकारों को कुछ काम मिलेंगे |
नेता भी कुछ
शायद जनता में जाकर हिले-मिलेंगे |
पर भूलती हो-
तुम प्रेयसी हो मेरी,
सरकार का इम्प्लाइमेंट एक्सचेंज नहीं,
कहते हो जो उम्मीदवारों से,
खड़े रहो तुम धूप में जाकर
तुम्हारे लिए कुरसी-मेज नहीं |'
(4)
इतना मत रोना मेरी राधे!
कि अश्रु-धार को बांधने को
सरकार हमारी डैम बना दे |
कहीं अफसर कोई
रिश्तेदारों को अपने ठेका न दिला दे |
ठेकेदार ऐसा होगा कहां,
जो सीमेंट के बदले बालू न मिला दे |
इस भारत में
बांध नहीं कोई बना है ऐसा
जिसमें न कोई छिद्र हुआ हो |
ऐसा कोई माँ का लाल नहीं
जिसने देश के धन से
न खिलवाड़ किया हो |
सच जानों तुम,
टंगा नहीं फांसी पर कोई,
जिसने ऐसा व्यापार किया हो |
(5)
औ' यदि बांध ही ली
सरकार ने अश्रुधार तुम्हारी |
होगी क्या न हार तुम्हारी ?
शायद फिर तेरी आंखों के खारे पानी से
सरकार हमारी नमक निकाले |
कह सकता है कौन, कहीं वह
नमक बनाने को नव धंधा न चला दे |
मैं नहीं चाहता मेरी राधे
कि नमक तुम्हारी आंखों का
बाजार में बारह नए पैसों में इक सेर बिके |
बहुतों ने बेचा हैं पानी अपनी आखों का
पर नहीं चाहता मैं कि -
तुम्हारी भी आंखों के पानी का मोल लगे |
इतना मत रोना मेरी राधे!
:नरेन्द्र कोहली
इतना मत रोना मेरी राधे!
(1)
जाता हूं
अब विदाई दो मुझको |
प्राण! साथ ही वचन भी यह दो -
मेरी अनुपस्थिति में तुम नहीं रोओगी |
नैनों को अपने निशि-दिन अश्रु-कणों से नहीं धोओगे |
(2)
कहते हैं -
ब्रज की गोपिकाओं में राधा थी कोई |
श्रीकृष्ण के मथुरा जाने पर वह बहुत थी रोई |
तुम,
इतना मत रोना मेरी राधे!
रो-रोकर नयन-ज्योति मत खोना मेरी राधे!
आंखें अपनी मूल्यवान हैं,
आंखों वाले भाग्यवान हैं,
रो-रोकर इन आंखों से हाथ न धोना मेरी राधे!
सच है, आंखें धुंधली होने पर
बाजार से चश्मा मिल सकता है |
हम यदि अपना जोर लगा दें
नेत्र-पुष्प फिर खिल सकता है |
पर मेरी राधा
यह तो मानोगी तुम भी-
हैं मूर्ख, व्यर्थ जो पैसे खोते हैं |
सच जानो तुम
चश्मे के फ्रेम बड़े महंगे होते हैं |
(3)
इतना मत रोना मेरी राधे!
अश्रु बाढ़ में
भूमि को अपनी न डुबोना मेरी राधे!
में गोकुल का ग्वाला कृष्ण नहीं कि
नगरी को अपनी बचा लूंगा |
न ही विष्णु का अवतार कृष्ण हूं
कि गोवर्धन को मैं उठा लूंगा |
(औ' यह यमुना का ब्रज नहीं
लौह नगरी टाटा की है |)
यदि बाढ़ में डूबी नगरी यह
तो अनर्थ महा इक हो जाएगा |
कारखाने को
बाढ़ का पानी धो जाएगा |
कार्य ठप होगा सारा
इस्पात का उत्पादन भी बंद हो जायेगा |
इस्पात नहीं होने से
योजना पर क्या आघात न होगा?
दौड़ में उन्नति की
देश हमारा मात न होगा?
सोचो तुम ही
देश से अपने क्या विश्वासघात न होगा?
फिर सारे देश में चंदा होगा |
नया- नया पर धंधा होगा |
जाने कितने लोग
इस धंधे में अपनी जेब भरेंगे |
देंगे भाषण, चित्र खिचाएंगे |
नेता बनकर नाम करेंगे |
कह सकती हो
ऐसे में बेकारों को कुछ काम मिलेंगे |
नेता भी कुछ
शायद जनता में जाकर हिले-मिलेंगे |
पर भूलती हो-
तुम प्रेयसी हो मेरी,
सरकार का इम्प्लाइमेंट एक्सचेंज नहीं,
कहते हो जो उम्मीदवारों से,
खड़े रहो तुम धूप में जाकर
तुम्हारे लिए कुरसी-मेज नहीं |'
(4)
इतना मत रोना मेरी राधे!
कि अश्रु-धार को बांधने को
सरकार हमारी डैम बना दे |
कहीं अफसर कोई
रिश्तेदारों को अपने ठेका न दिला दे |
ठेकेदार ऐसा होगा कहां,
जो सीमेंट के बदले बालू न मिला दे |
इस भारत में
बांध नहीं कोई बना है ऐसा
जिसमें न कोई छिद्र हुआ हो |
ऐसा कोई माँ का लाल नहीं
जिसने देश के धन से
न खिलवाड़ किया हो |
सच जानों तुम,
टंगा नहीं फांसी पर कोई,
जिसने ऐसा व्यापार किया हो |
(5)
औ' यदि बांध ही ली
सरकार ने अश्रुधार तुम्हारी |
होगी क्या न हार तुम्हारी ?
शायद फिर तेरी आंखों के खारे पानी से
सरकार हमारी नमक निकाले |
कह सकता है कौन, कहीं वह
नमक बनाने को नव धंधा न चला दे |
मैं नहीं चाहता मेरी राधे
कि नमक तुम्हारी आंखों का
बाजार में बारह नए पैसों में इक सेर बिके |
बहुतों ने बेचा हैं पानी अपनी आखों का
पर नहीं चाहता मैं कि -
तुम्हारी भी आंखों के पानी का मोल लगे |
इतना मत रोना मेरी राधे!
:नरेन्द्र कोहली
सात सुरों में पुकारता है प्यार
एक पंजाबी लोकगीत है हीर-रांझा की प्रेमकहानी पर आधारित - नी मैं जाणा जोगी दे नाल. बाबा नुसरत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ में यह रचना मैंने कभी कबाड़ख़ाने पर पोस्ट की थी. आज इसी गीत की याद दिलाती गोरख पाण्डेय की एक कविता -
सात सुरों में पुकारता है प्यार
(रामजी राय से एक लोकगीत सुनकर)
माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी
जोगी शिरीष तले
मुझे मिला
सिर्फ एक बाँसुरी थी उसके हाथ में
आँखों में आकाश का सपना
पैरों में धूल और घाव
गाँव-गाँव वन-वन
भटकता है जोगी
जैसे ढूँढ रहा हो खोया हुआ प्यार
भूली-बिसरी सुधियों और
नामों को बाँसुरी पर टेरता
जोगी देखते ही भा गया मुझे
माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी
नहीं उसका कोई ठौर ठिकाना
नहीं ज़ात-पाँत
दर्द का एक राग
गाँवों और जंगलों को
गुंजाता भटकता है जोगी
कौन-सा दर्द है उसे माँ
क्या धरती पर उसे
कभी प्यार नहीं मिला?
माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी
ससुराल वाले आएँगे
लिए डोली-कहार बाजा-गाजा
बेशक़ीमती कपड़ों में भरे
दूल्हा राजा
हाथी-घोड़ा शान-शौकत
तुम संकोच मत करना, माँ
अगर वे गुस्सा हों मुझे न पाकर
तुमने बहुत सहा है
तुमने जाना है किस तरह
स्त्री का कलेजा पत्थर हो जाता है
स्त्री पत्थर हो जाती है
महल अटारी में सजाने के लायक
मैं एक हाड़-माँस क़ी स्त्री
नहीं हो पाऊँगी पत्थर
न ही माल-असबाब
तुम डोली सजा देना
उसमें काठ की पुतली रख देना
उसे चूनर भी ओढ़ा देना
और उनसे कहना-
लो, यह रही तुम्हारी दुलहन
मैं तो जोगी के साथ जाऊँगी, माँ
सुनो, वह फिर से बाँसुरी
बजा रहा है
सात सुरों में पुकार रहा है प्यार
भला मैं कैसे
मना कर सकती हूँ उसे ?
सात सुरों में पुकारता है प्यार
(रामजी राय से एक लोकगीत सुनकर)
माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी
जोगी शिरीष तले
मुझे मिला
सिर्फ एक बाँसुरी थी उसके हाथ में
आँखों में आकाश का सपना
पैरों में धूल और घाव
गाँव-गाँव वन-वन
भटकता है जोगी
जैसे ढूँढ रहा हो खोया हुआ प्यार
भूली-बिसरी सुधियों और
नामों को बाँसुरी पर टेरता
जोगी देखते ही भा गया मुझे
माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी
नहीं उसका कोई ठौर ठिकाना
नहीं ज़ात-पाँत
दर्द का एक राग
गाँवों और जंगलों को
गुंजाता भटकता है जोगी
कौन-सा दर्द है उसे माँ
क्या धरती पर उसे
कभी प्यार नहीं मिला?
माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी
ससुराल वाले आएँगे
लिए डोली-कहार बाजा-गाजा
बेशक़ीमती कपड़ों में भरे
दूल्हा राजा
हाथी-घोड़ा शान-शौकत
तुम संकोच मत करना, माँ
अगर वे गुस्सा हों मुझे न पाकर
तुमने बहुत सहा है
तुमने जाना है किस तरह
स्त्री का कलेजा पत्थर हो जाता है
स्त्री पत्थर हो जाती है
महल अटारी में सजाने के लायक
मैं एक हाड़-माँस क़ी स्त्री
नहीं हो पाऊँगी पत्थर
न ही माल-असबाब
तुम डोली सजा देना
उसमें काठ की पुतली रख देना
उसे चूनर भी ओढ़ा देना
और उनसे कहना-
लो, यह रही तुम्हारी दुलहन
मैं तो जोगी के साथ जाऊँगी, माँ
सुनो, वह फिर से बाँसुरी
बजा रहा है
सात सुरों में पुकार रहा है प्यार
भला मैं कैसे
मना कर सकती हूँ उसे ?
Wednesday, May 18, 2011
जौहर
थाल सजाकर किसे पूजने
चले प्रात ही मतवाले?
कहाँ चले तुम राम नाम का
पीताम्बर तन पर डाले?
कहाँ चले ले चन्दन अक्षत
बगल दबाए मृगछाला?
कहाँ चली यह सजी आरती?
कहाँ चली जूही माला?
ले मुंजी उपवीत मेखला
कहाँ चले तुम दीवाने?
जल से भरा कमंडलु लेकर
किसे चले तुम नहलाने?
मौलसिरी का यह गजरा
किसके गज से पावन होगा?
रोम कंटकित प्रेम - भरी
इन आँखों में सावन होगा?
चले झूमते मस्ती से तुम,
क्या अपना पथ आए भूल?
कहाँ तुम्हारा दीप जलेगा,
कहाँ चढ़ेगा माला - फूल?
इधर प्रयाग न गंगासागर,
इधर न रामेश्वर, काशी।
कहाँ किधर है तीर्थ तुम्हारा?
कहाँ चले तुम संन्यासी?
क्षण भर थमकर मुझे बता दो,
तुम्हें कहाँ को जाना है?
मन्त्र फूँकनेवाला जग पर
अजब तुम्हारा बाना है॥
नंगे पैर चल पड़े पागल,
काँटों की परवाह नहीं।
कितनी दूर अभी जाना है?
इधर विपिन है, राह नहीं॥
मुझे न जाना गंगासागर,
मुझे न रामेश्वर, काशी।
तीर्थराज चित्तौड़ देखने को
मेरी आँखें प्यासी॥
अपने अचल स्वतंत्र दुर्ग पर
सुनकर वैरी की बोली
निकल पड़ी लेकर तलवारें
जहाँ जवानों की टोली,
जहाँ आन पर माँ - बहनों की
जला जला पावन होली
वीर - मंडली गर्वित स्वर से
जय माँ की जय जय बोली,
सुंदरियों ने जहाँ देश - हित
जौहर - व्रत करना सीखा,
स्वतंत्रता के लिए जहाँ
बच्चों ने भी मरना सीखा,
वहीं जा रहा पूजा करने,
लेने सतियों की पद-धूल।
वहीं हमारा दीप जलेगा,
वहीं चढ़ेगा माला - फूल॥
वहीं मिलेगी शान्ति, वहीं पर
स्वस्थ हमारा मन होगा।
प्रतिमा की पूजा होगी,
तलवारों का दर्शन होगा॥
वहाँ पद्मिनी जौहर-व्रत कर
चढ़ी चिता की ज्वाला पर,
क्षण भर वहीं समाधि लगेगी,
बैठ इसी मृगछाला पर॥
नहीं रही, पर चिता - भस्म तो
होगा ही उस रानी का।
पड़ा कहीं न कहीं होगा ही,
चरण - चिह्न महरानी का॥
उस पर ही ये पूजा के सामान
सभी अर्पण होंगे।
चिता - भस्म - कण ही रानी के,
दर्शन - हित दर्पण होंगे॥
:श्यामनारायण पाण्डेय
[चित्र : The Rajput ceremony of Jauhar holocaust by Ambrose Dudley, www.wikigallery.org से साभार]
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