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Sunday, January 24, 2016

सनी लियोनी के इंटरव्यू के बहाने भारतीय समाज पर दो बातें


सनी से नहीं, अपनी सोच से डरें
- सुन्दर चन्द ठाकुर

सनी लियोनी किसी न किसी वजह से चर्चा में बनी रहती हैं. वह फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी हैं, इसलिए उन्हें चर्चा में रहने से कोई गुरेज भी नहीं होगा. लेकिन एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू के दौरान अगर वह बीच में ही उठकर चली जातीं, तो उन्हें इसका अफसोस नहीं होता. पूछने वाला उन्हें बार-बार उनके अतीत की ओर ले जा रहा था. बताने की जरूरत नहीं कि लियोन का अतीत कैसा था. यह उनके अतीत को 'बेहतर' जानने की जिज्ञासा ही है कि वह हिंदुस्तान में गूगल पर प्रधानमंत्री मोदी से भी ज्यादा बार खोजी गई शख्सियत बन गईं. इस इंटरव्यू को देखकर साफ लग रहा था कि इंटरव्यूअर इस तथ्य को हजम नहीं कर पा रहा था कि उसे एक पूर्व पोर्न स्टार को अपने चैनल के इस खास इंटरव्यू के लिए बुलाना पड़ा था. संभवत: लियोन को बुलाना चैनल की टीआरपी बढ़ाने को लक्ष्य करते हुए एक कमर्शल फैसला था, जिससे इंटरव्यूअर व्यक्तिगत स्तर पर संतुष्ट न था. अपनी नाराजगी को व्यक्त करने का उसके पास एक ही तरीका था कि वह लियोनी को तकलीफ पहुंचाए, उसे छोटा दिखाए. लेकिन उसका खेल चल नहीं पा रहा था, क्योंकि सनी लियोनी बुद्ध की तरह उसके सामने बैठी मुस्कराते हुए जवाब दे रही थी. उसे अपनी जिंदगी को लेकर किसी बात का अफसोस नहीं था जबकि इंटरव्यूअर उनमें अफसोस पैदा करना चाहता था. उसे लगता रहा होगा कि लियोन को ऐसा अफसोस होना चाहिए, क्योंकि ऐसा होने पर उसकी 'संभ्रांत' दुनिया में उसका यह इंटरव्यू लेना उचित ठहराया जा सकता था. 

भारत में पोर्न को लेकर आज भी बहुत पाखंड देखने को मिलता है. आंकड़ों का सच यह है कि पोर्न देखने के मामले में हिंदुस्तान दुनिया के टॉप मुल्कों में से एक है. पोर्न देखने की लत ऐसी है कि दो दिन पहले ही भोपाल में म्युनिसिपैलिटी में जबकि मेयर सामने मीटिंग ले रहे थे, एक अधिकारी अपने मोबाइल पर पोर्न देखने में मशगूल थे. कोई दिन ऐसा नहीं होता जबकि नाबालिग लड़कियों के बलात्कार की खबर नहीं आती. एक ओर यह और दूसरी ओर स्त्रियों को नापाक बता हम उन पर मंदिरों में प्रवेश करने पर पाबंदी लगा देते हैं. उन्हें अपवित्र करार देते हैं. यह पुरुष वर्चस्व का आदिकाल से चल रहा खेल है, जो अब अपने पूर्ण नग्न स्वरूप में सामने नहीं आ पा रहा, मगर वह पुरुषों के व्यवहार में अब भी बदस्तूर दिखता है. लियोन के इंटरव्यूअर ने इन लक्षणों का मुजाहिरा करने में जरा भी कोताही नहीं बरती और एक के बाद एक उससे ऐसे सवाल पूछे कि अगर वह लियोन नहीं होती, तो संभवत: उस हॉट सीट पर बैठे हुए ग्लानि और अपराध बोध से गले तक भरी हुई वह स्त्री अपने आंसुओं की धार को नहीं रोक पाती और अपने जीवन को इस पृथ्वी पर एक अतिरिक्त बोझ समझ उससे छुटकारा पाने के बारे में सोचना शुरू कर देती. इंटरव्यूअर की ऐसी मनोकामना को साफ देखा-समझा जा सकता था. परंतु अफसोस कि ऐसा न हो सका. लियोन ने उनके इरादों पर पानी फेर दिया.

भारत में नई पीढ़ी इस बात को लेकर बहुत सजग है कि वह किसी दूसरे व्यक्ति को जज न करे. हर व्यक्ति के जीवन की अपनी कहानी होती है और कौन, किन परिस्थितियों में क्या बना, उसने क्या किया, इस पर दूसरे किसी व्यक्ति को कुछ कहने का कोई अधिकार नहीं, खासकर जबकि मसला नैतिक मूल्यांकन का हो. सनी लियोनी का जीवन किसी से छिपा नहीं है और न उन्होंने उसे छिपाने की कोशिश ही की है. उन्होंने अपने जीवन को कैसे जीना है, इस बाबत खुद ही फैसले लिए हैं और उन फैसलों का वह अपनी तरह से निर्वाह कर रही हैं, जैसा कि अन्य पेशों से जुड़े लोग कर रहे हैं. अगर उन्हें अपने मौजूदा पेशे और अपने अतीत के पेशों से कोई परेशानी नहीं, तो कोई वजह नहीं कि दूसरा व्यक्ति उन्हें इंटरव्यू के लिए बुलाकर उनमें उनके अतीत और वर्तमान को लेकर जबरन गिल्ट पैदा करवाने की कोशिश करे. यह देखकर मुझे बिलकुल हैरानी नहीं हुई कि सोशल मीडिया में लोगों ने भी इंटरव्यूअर को लताड़ने में कोताही नहीं बरती. सनी लियोनी समाज के लिए खतरनाक नहीं, क्योंकि वह जो कर रही हैं, उसे छिपा नहीं रहीं. किसी को नहीं पसंद तो न देखे उनकी फिल्में. पर वे लोग बेहद खतरनाक हैं, जो रोशनी में हमें नैतिकता का भाषण देते हैं और परदे के पीछे अपनी काली करतूतों में डूबे रहते हैं. दुर्भाग्य से भारतीय समाज ऐसे लोगों से भरा पड़ा है. यही तथ्य असल में खासा डरावना है, इसलिए जरूरी यह है कि लियोनी  से नहीं, अपनी सोच से डरें. 

Sunday, July 3, 2011

मैं एक हंसती हुई लड़की को एक हंसती हुई लड़की की तरह देखता हूं

सुन्दर चन्द ठाकुर की ताज़ा कविता-सीरीज़ का अन्तिम हिस्सा पेश है -


मैं हूं - ३

सुन्दर चन्द ठाकुर

मैं डर से बाहर निकल आया हूं
इसलिए अब कह सकता हूं कि ईश्वर नहीं है कहीं
ईश्वर डर में बैठा रहता है भूत की तरह
भूत नहीं है (मैंने नहीं देखा उसे आज तक)
इसलिए ईश्वर भी नहीं है (उसे भी नहीं देख पाया मैं)

मुझे कल का डर नहीं अब
कल मेरा क्या हो जाएगा?
लुट जाऊंगा?
कल मैं नहीं रहूंगा!

कल मैं नहीं ही तो रहूंगा!
(कृपया याद रखें)

पृथ्वी से एक खरब प्रकाशवर्ष दूर भी ऐसा ही ब्रह्माण्ड है
खगोल पिण्डों और ग्रह-नक्षत्रों से भरा हुआ
समय नहीं है कहीं
सब कुछ स्थिर है
आदि से अनन्त तक
आदि और अनन्त भी नहीं है
जैसे मोक्ष नहीं है
सिर्फ़ धर्म हैं झूठमूठ के
टाइमपास के साधन

इन्सान में आदतें हैं
गुणसूत्रों में फ़ीड हो गई कुछ दूसरों से अर्जित
बिना आदतों के मुश्किल है टाइम पास
मैं एक हंसती हुई लड़की को एक हंसती हुई लड़की की तरह देखता हूं
एक रोते हुए बच्चे को एक रोते हुए बच्चे की तरह
एक घायल चिड़िया को एक घायल चिड़िया की तरह
उनके बारे में मैं क्या लिख सकता हूं
वे वैसे ही दिखे मुझे क्योंकि वे वैसे ही थे
उनके बारे में क्या कल्पना करूं
कल्पना से दुख जन्म लेता है
कल्पना से सुख भी जन्म ले सकता है
मगर जो सामने होता है वही होता है
दुख और सुख की कल्पना भी एक आदत है

जबकि एक धड़धड़ाती हुई रेलगाड़ी की तरह है जीवन
जगहों, दृश्यों, और लोगों को सतत लांघता हुआ
हज़ारों झूठ हज़ारों सच के बीच गुंथे हुए
अतीत के भग्नावशेष और निर्माणाधीन
सब कुछ स्थिरता के साथ उड़ा जा रहा है
जैसे वह हमेशा से उड़ता ही रहा था
क्योंकि वही है जो चलाए हुए है दुनिया में सब कुछ
इच्छाएं, वासनाएं, योजनाएं, साज़िशें, हत्याएं, दया, परोपकार, युद्ध और प्यार

और मैं हूं एक बित्ता सा दिमाग़ लिए
पृथ्वी और ब्रह्माण्ड के बारे में सोचता हुआ
अपने पिता की, पूर्वजों की राह पर
जैसे सूरज पूरब से पश्चिम की ओर बढ़ता है
डूबने के वास्ते
ईश्वर नहीं है कहीं, सिर्फ़ मैं हूं
अपने नहीं होने की ओर बढ़ रहा हूं

मैं क्या लिख जाना चाहता हूं
जिसे पढ़कर पीढ़ियों का भला हो
कुछ काम की बातें
मगर क्या है जो काम का नहीं
सब कुछ लिखा ही जा चुका
अपने अर्थों, विम्बों यथार्थों और कल्पना में सब से बेहतरीन
बेहतरीनतम

अपने होने को सार्थक करता हुआ मैं ही हूं
ईश्वर कहीं नहीं
मेरे पास आओ और दिखाओ अपने दिल के छाले
सुनाओ मुझे क्या-क्या गुज़री तुम पर
मैं बढ़ाऊंगा तुम्हारी तरफ़ हाथ
मेरी आंखों में उतर आएगी गहरी सहानुभूति
मैं तुम्हारे साथ मिल कर कुछ देर रो लूंगा
हंस भी लूंगा
क्योंकि मैं हूं
अभी जबकि ईश्वर नहीं है
मैं हूं!

Saturday, July 2, 2011

इन्सान की जिजीविषा से ज़्यादा सुन्दर कुछ कहां

मैं हूं - २

सुन्दर चन्द ठाकुर

अब उम्र मुझ पर हावी हो रही है

बहुत आहिस्ता वह हमेशा अपना असर दिखाती ही रही थी
आहिस्ता-आहिस्ता वह कहां पहुंच गई

जबकि मैंने जैसे अभी जन्म ही लिया है
मैं विस्मय से देखता हूं चीज़ों को
और अभिभूत होता हूं
एक चिड़िया की ख़ूबसूरती के आगे समर्पण कर देता हं
प्रकृति और पृथ्वी की सुन्दरता
इनका कहना ही क्या
वह मुझे हमेशा ही सम्मोहित कर जाती है
जैसे किशोर वय में स्त्री का खुला जिस्म सम्मोहित करता रहा
अब तो और भी ज़्यादा

इन्सान की जिजीविषा से ज़्यादा सुन्दर कुछ कहां

मैं बच्चा ही बने रहना चाहता था
संरक्षित और ग़लत बातों, विचारों, मंतव्यों से अनभिज्ञ
मगर मैं जान गया हूं अब बहुत कुछ
यही जानना जी का जंजाल बना
सोचने लगा हूं कि जीवन के कुछ तो मायने होने चाहिए

जीवन के क्या मायने हो सकते हैं
कि उसे जिया गया भरपूर
अच्छे भोजन अच्छे स्वास्थ्य और सुन्दर चीज़ों के बीच
एक विचारधारा भी हो तो बेहतर
मगर मैं उस दौर में बड़ा हुआ जब विचारधाराएं खोखली पड़ गईं थीं
हंसिये के नीचे फ़सल के हरे के बजाय खून का लाल दिखने लगा जब
विद्वज्ज्न बापू की लंगोट खींचने पर आमादा थे
रहस्य बेपर्दा होते रहे जब और चीज़ें रहस्यमयी होने लगी थीं

अब मैं कहता हूं कि जीवन के कुछ मायने नहीं होते हुए भी उसका मायना है
क्योंकि वह होता है और एक उम्र जीता है

मैं हूं
जहां भी हूं जैसा भी हूं जैसे भी हूं
मैं हूं
यही है जीवन का मायना
हिलता हुआ, सांस लेता हुआ, सोचता हुआ
जीवन में प्रेम है या नहीं
विचारधारा है या नहीं
रस है या नीरस
खुलती भोर में डूबती शाम में
बारिश अंधड़ झुलसती गर्मी में
भरा हुआ कभी खाली
खुश होता हंसता कभी रोता उदासी में सिकुड़ता
मैं हूं!

(जारी- अगले हिस्से में समाप्य)

कुछ भले लोगों ने मुझे बुराई से दूर रहना सिखाया

आज कल बम्बई में डेरा जमाए सुन्दर चन्द ठाकुर पुराने कवि-कबाड़ी हैं. आज से उनकी हालिया कविताओं की सीरीज़ "मैं हूं" की कुछ कविताएं -



मैं हूं - १

किसी के होने के क्या मानी हैं इस दुनिया में
कोई नहीं भी रहे तो पृथ्वी घूमती रहती है
मगर मैं हूं अभी
और पृथ्वी घूम रही है.

मैं एक हरा पेड हो सकता हूं
एक ठूंठ भी
एक नदी या एक सूखा हुआ नाला
एक खिला हुआ या मुरझा चुका फूल

एक दुत्कारा गया प्रेमी
बदले की आग में सुलगता हुआ

मैं कुछ भी हो सकता हूं

खुली हैं सारी दिशाएं
मगर मुझ पर सिर्फ़ गुरुत्वाकर्षण बल ही काम नहीं कर रहा
मैं शायद बना दिया गया मां के संघर्ष से
कुछ भले लोगों ने मुझे बुराई से दूर रहना सिखाया
वे कुछ आधी-अधूरी प्रेमिकाएं रहीं
जिन्होंने मुझ में प्रेम की प्यास भर दी
मेरे सिरहाने खड़ा पहाड़ भी चुपचाप भरता रहा मुझ में सहनशक्ति
मैं बना ऐसे ही
आसपास की चीज़ों और लोगों ने निर्मित किया मुझे

और अब मैं हूं
सब कुछ समझता हुआ कि कैसे हूं
मां का संघर्ष अब मेरा संघर्ष बन गया है
मैं अच्छाई बांटता हूं
प्रेम की बूंदें भरता रहता हूं दिलों के कोश में
अपने आसपास में जीता हूं भरपूर

जिन चीज़ों से निर्मित हुआ मैं वे अब खुल रही हैं
वक्त मुझे उघाड़ रहा है
उघड़ता हुआ मैं हूं
मेरे तत्व वापस लौटने लगे हैं
जिस शून्य से बनना शुरू हुआ था
मैं लौट रहा हूं उसी शून्य की ओर
लौटाता हुआ सब कुछ

मैं शून्य हो जाऊंगा
मगर खुल चुका पूरा
ख़त्म होता
अभी मैं हूं.

(जारी)

Friday, May 20, 2011

मैं उड़ना चाहता हूं तुम्हारे साथ

सुन्दर चन्द ठाक्र बहुत दिनों बाद अपनी नई कविताओं के साथ नमूदार हुए हैं. उन्होंने मुझे आज ही मेल से अपनी कुछ ताज़ा अप्रकाशित रचनाएं भेजी हैं. उन में से सबसे पहले पढ़िये छोटी-छोटी पांच प्रेम कविताओं की यह सीरीज़. बाकी कविताएं भी जल्द ही.-


प्यारी

१.
धीरे से उंगलियां छुड़ाकर
अब तुम हंसकर कहोगी कि क्या हुआ
कल फिर मिलेंगे न

कल?
ख़ुशियों का कल कहां होता है

कल क्या चांद इतना ही वहशी होगा
हवा ऐसी पुरज़ोर
और तुम्हारी आंखों में उफनता ऐसा ही सैलाब

कल तक तो जासूसी नज़रें हमें खोज ले सकती हैं!

२.
अब सिर्फ़ तुम हो
पहले मां भी थी
जो देख लेती थी मेरी रुंआसी आत्मा
और बिना मांगे दे देती थी प्यार

तुम्हारे बाद
नहीं है
कोई

३.
समंदर से पहले तुम हो
भरी हुई नदियों और हरे पहाड़ों से पहले भी
बर्फ़, बारिश और तारों जड़ी रात
चिड़ियों के जादुई कंठ
पंखुरियां फैलाते फूलों और उम्मीदों से भरी
एक नई सुबह
ख़ुश ख़बर एक
पकी हुई फ़सल से भी पहले तुम हो

जीवन में कुछ न पाने के शोक
और सब कुछ पा लेने की ख़ुशी से भी पहले

मेरी अंतस से लगी देहरी
पहला पायदान
मुझ से पहले
मेरे लिए
तुम्हीं हो.

४.
मेरे शब्दों में मिठास भर आई है
मेरी आंखों में ख़्वाब घुस गए हैं
तितलियां हैं
कि बेधड़क बैठ जाती हैं मुझ पे

मैं एक मासूम-सी हंसी में बदल गया हूं

मैं तपती हुई रेत पर हंसते हुए चलता हूं
खुले ख़ंजरों के बीच बेसाख़्ता गुज़रता हूं

कहीं हो तुम
आसपास या दूर कहीं
मुझे तुम्हारी आवाज़ सुनाई देती है.

५.
कुछ था तुम्हारे भीतर
जिस तक पहुंचना चाहता रहा मैं
सिर्फ़ एक परदा थीं तुम्हारी आंखें
तुम्हारी हंसी एक धोख़ा

वह बिन्दु जहां से रिसता है जीवन
सुराख़ वह छिपा हुआ अंतस में कहीं
तुम्हारी बेबसी का राज़ छिपा था जहां
मुझे पहुंचना था वहां

मैं तुम्हारे सारे पोर खोल देना चाहता हूं
हवा की तरह भर जाना चाहता हूं तुम में
समुद्री हवा की तरह
उड़ा देना चाहता हूं उनमें जमा हुआ दुःख

मैं उड़ना चाहता हूं तुम्हारे साथ
नदी के पानी से प्यास बुझाकर
उड़ जाते हैं जैसे दो पक्षी
हवा में कुलांचें भरते.

(चित्र: समकालीन अमेरिकी कलाकर जेसिका टॉरेन्ट की कृति "बिलवेड")

Wednesday, September 1, 2010

कृष्ण का बचपन देखकर लगता है कि अपना तो यूं ही गुज़र गया

परमप्रिय मित्र और शानदार कवि-पत्रकार सुन्दर चन्द ठाकुर की यह कविता उसके दूसरे संग्रह एक दुनिया है असंख्य से ली गई है और ख़ास आज के ही दिन लगाने के वास्ते बचा रखी थी.



कृष्ण और मैं

कृष्ण का बचपन देखकर लगता है कि अपना तो यूं ही गुज़र गया
कुछ भोलेपन कुछ निरीहता में
शैतानियां मैंने भी कम नहीं कीं
घरवालों से छुपकर नदी में तैरने जाता रहा
मां को एक दिन जब मालूम चला
लाल कर डाले उसने मेरे पैर बिच्छू घास से
फिर वह ख़ुद भी लगी रोने
वह जानती थी कि हर साल नदी किसी - न - किसी को लील जाती है
पता नहीं उसने मुझपर ग़ुस्सा निकाला या नदी पर

बचपन में ग़फ़लत में रहा कि मैं इन्सान नहीं भगवान हूं
अपने इस यक़ीन को परखने के वास्ते
मैंने कंचों का निशाना लगाने का खेल कई बार खेला
मन ही मन हर बार यही सर्त लगाकर कि अगर सारे निशाने सही लगे
तो निर्विवाद मैं अपनी नज़र में हूंगा भगवान
मैंने अपनी इसी ख़ब्त में कई दुपहरें बरबाद कर डालीं

मगर असल जीवन में मेरे कृष्ण जैसा ऐश्वर्य नहीं, बहुत थीं दुश्वारियां
बचपन में दही-दूध को मेरा भी जी ललचाता था
मगर दिल्ली की तंग गलियों में जहां
इमली तोड़ते और गन्ने चुराते बचपन के कई बरस
जब पिताजी फ़ौज में सिपाही थे
और मां गांव छोड़कर देश की राजधानी में आई
सहमी और उतनी ही विस्मित एक मृगनयनी
उन दिनों मैं नुक्कड़ की हलवाई की दुकान से महीने में एकाध बार
अपनी फटी नेकर में थिरकता-नाचता हुआ लाने जाता था दही
रसमलाई तो चखी मैंने कई सालों बाद
नौकरी से मिलने वाली तनख़्वाह का भी जब सुरूर ख़त्म हो चुका था

कृष्ण की तरह मैं भी गया गायों के संग बनकर ग्वालबाल
यह उन दिनों की बात है जब मूंछों की झांइयां दिखना शुरू ही हुई थीं
पिता ने मानसिक सन्तुलन खो जब छोड़ दी थी नौकरी
और मां को चूल्हे की लकड़ियों के लिए जंगल में भटकना पड़ता था
उसने तब बेचकर अपने सारे गहने ख़रीद ली थी दो गायें
मगर उनके लिये घास ख़रीदने की हमारी कूव्वत न थी
सो स्कूल से लौट रोज़ ले जाता मैं उन्हें एक हरे पहाड़ पर
लेकिन मेरे पास कोई बांसुरी न थी न उसे बजाने का हुनर
कि उसकी तान सुनकर चली आतीं मेरे पास ग्वालबालाएं
अलबत्ता मेरे साथ पड़ोस में रहने वालि एक हम म्र लड़की ज़रूर होती थी
काम के बोझ से इस क़दर टूटी हुई
कि पेड़ की छांह में हवा के पहले ही झोंके में ग़श खाकर सो जाती थी

यानी लगभग वैसे ही बचपन और किशोर वय से गुज़रते हुए भी
कन्हैया के जीवन जैसा न बन पाया मेरा जीवन
जवानी की तो बात ही क्या की जाए
क्योंकि वहां कृष्ण की हज़ारों रानियों का एक ऐसा वृत्तान्त है
जो उस युग में भी असम्भव प्रतीत होता है, इस युग की क्या बात
और अभी तो बाक़ी है महाभारत की पूरी कथा
जिसमें कृष्ण अर्जुन को दिखाते हैं अपना विश्वरूप
एक गीता का मसौदा तैयार होता है
ये बात दीगर है कि इन दिनों महानगर ही क्या
छोटे क़स्बों, गांवों या कहीं भी आप रहें, जीवन महाभारत से कम नहीं.

(फ़ोटो http://www.travelblog.org से साभार)

Friday, March 19, 2010

मैं नहीं रोया


कवि-कबाड़ी पत्रकार सुन्दर चन्द ठाकुर की कविताएं आप यहां पहले भी पढ़ते आए हैं.

आज पेश है उनके नए काव्य संग्रह एक दुनिया है असंख्य से एक मार्मिक कविता:

पिता-पुत्र

मेरे पिता एक फ़ौजी थे
मगर वे मरे एक शराबी की मौत

उन्होंने कभी मेरे सिर पर हाथ नहीं रखा
नहीं चूमा मेरा माथा
बचपन में गणित पढ़ाते हुए
उन्होंने गुस्से में मेरी गर्दन ज़रूर दबाई

उनकी मृत्यु के बारे में बताते हैं
उस रात वे बैरक में अकेले थे
उन्होंने छक कर शराब पी थी
पीकर सो गए
नींद में ही फटा उनका मस्तिष्क

पिता की तरह मैं भी एक फ़ौजी बना
और एक फ़ौजी का होना चाहिये कड़ा दिल
मां मेरे कन्धे पर सिर रख कर रोई
बहन के आंसू थमने को नहीं आए
मैं नहीं रोया

इस बात को जैसे एक जन्म गुज़रा
अब तक तो पिता का सैनिक रिकॉर्ड भी नष्ट किया जा चुका होगा
मगर मैं कभी-कभी नींद में अब भी छटपटाता हूं
मरने से पहले उन्होंने पानी तो नहीं मांगा

मुझे क्यों लगता है कि उन्हें बचाया जा सकता था.

(चित्र: साल्वादोर डाली की पेन्टिंग पर्सिस्टैन्स ऑफ़ मेमोरी) 

Friday, August 7, 2009

एक दुनिया है असंख्य



सुन्दर चन्द ठाकुर की बेरोज़गार शीर्षक कविता-सीरीज़ को आप लोगों ने बहुत सराहा था. उन का दूसरा संग्रह कल ही प्रकाशित हो कर आया है. सुन्दर एक उम्दा कवि-कबाड़ी-कहानीकार-पत्रकार हैं और कम आयु में ही काफ़ी काम और नाम कमा चुके हैं. उन्हें बधाईयां. कबाड़ख़ाना उनके रचनात्मक भविष्य की कामना करता है. प्रस्तुत है संग्रह से उनकी तीन कविताएं.

इन दिनों प्रेम

अवसाद से
सोचते रहने की बीमारी से
अकेले होने की यंत्रणा से
नाकारा होने के आत्महंता अहसास से
क्रूर चीजों से बचने के लिए
प्रेम एक नैसर्गिक शरण है

हालांकि इन दिनों प्रेम भी अब अपने में क्रूर हो चुका है बहुत
वह हत्याएं करवाने पर आमादा दिखता है
इसे मगर अपवाद ही माना जाए
और कहा जाए कि पूरी दुनिया दरअसल प्रेम ही खोजती रहती है
युवा तो और भी ज्यादा
उन्हें ज्यादा अवसाद घेर सकता है
सोचने की ज्यादा भयानक बीमारी लग सकती है
नाकारा होने के ज्यादा गहरे अहसास में डूब सकते हैं वे

कभी ऐसा भी था कि पेड़ की छांव कल्पना न थी
पेड़ की छांव थी
बादलों की इच्छा न थी
बादल थे
एकान्त की चाहत न थी
एकान्त था
प्रेम का डर न था
प्रेम था

नदी का समूचा तट था प्रेम के वास्ते
बारिश और जंगल के सारे रास्ते
प्रेम का फल एकान्त में पकता है
प्रेम का बीज छांव में फूटता है
प्रेम की आग बारिश में जलती है

शहरों में कम बचा है नैसर्गिक एकान्त
बहुत कम छांव
बहुत कम बारिश

जमाने की ओर पीठ फेरकर बुनते एकान्त
कभी दिख जाते हैं प्रेमीजन यहां
उजाड़ होते किसी बागीचे की
उजड़ती किसी झाड़ी की छांव में
सटकर बैठे वे एक-दूसरे को चूमने को होते हैं
उनके प्रेम को प्रेम से कोई नहीं देखता
आपने भी देखा होगा पुलिस वाले
जिनमें कई बार महिला कर्मचारी भी शामिल होती हैं
अश्लील फ़ब्तियां कसते किस तरह बरसते हैं उन पर

कुछ बातें

ताकत कभी हक की बात नहीं करती
प्रेम की मांग नहीं करता भूखा आदमी
सूखा कंठ रक्त नहीं दो घूंट पानी मांगता है

विपदाओं को झेलने और खुशियों को जीने की कोई उम्र नहीं होती
अत्याचारों को सहने का कोई तजुर्बा नहीं होता
हम मरते हुए भी जीते हैं और जीते हुए भी मरते हैं

एक छोटा-सा अन्याय बच्चों की मासूमियत ले जाता है
एक नि:स्वार्थ उदारता मरने तक याद आती है
खुशी को रोशनी क्षणभंगुर साबित होती है
अपार बन जाती है मुसीबत की एक रात

परोपकार एक छलावा है मगर अत्याचार से बेहतर
अस्थायी लगाव एक धोखा है मगर नफरत से बेहतर
अंतिम सत्य मुत्यु नहीं वर्तमान क्षण होता है

मेरे गले में हिचकियां भर जाती हैं
देखता हूं अंधेरी दुनिया में सालों रियाज के बाद
एक अंधे को लेते कठिन सुर का सधा अलाप
एक बूढ़ा लड़खड़ाते शिशु की ओर सहारे के लिए बढ़ाता है हाथ
मैं रो पड़ता हूं
यह जानते हुए भी कि मारा जाएगा वह
एक शख्स उठाता है जब अन्याय के खिलाफ आवाज

मां का सपूत

जैसे मई के सूने आकाश में
कहीं से प्रकट होता है
पानी से भरा एक बादल
और उम्मीद बनकर छा जाता है

ढलती दुपहर में
आवाज लगाता दौड़ा आ रहा है
पहाड़ की ढलान पर
स्कूल से लौटता

घसियारन मां का सपूत

Thursday, April 10, 2008

एक बेरोज़गार की कविताएं

सुन्दर चन्द ठाकुर हिन्दी के नामी कवि हैं और कबाड़ख़ाने के कबाड़ियों में शुमार है उनका. यह अलग बात है कि आज तक उन्होंने अपने आलस्य के कारण यहां एक भी पोस्ट नहीं लगाई है. ख़ैर! अभी अभी नया ज्ञानोदय में उनकी कुछ कविताएं आई हैं. इन अच्छी कविताओं के शुरुआती पाठकों में मैं रहा हूं सो उनके आलस्य के बावजूद उनकी कविताएं यहां लगा रहा हूं. आशा है वे जल्द ही ख़ुद अपनी तरफ़ से कबाड़ख़ाने को नवाज़ेंगे.

एक बेरोज़गार की कविताएं

चांद हमारी ओर बढ़ता रहे

अंधेरा भर ले आग़ोश में

तुम्हारी आंखों में तारों की टिमटिमाहट के सिवाय

सारी दुनिया फ़रेब है

नींद में बने रहें पेड़ों में दुबके पक्षी

मैं किसी की ज़िन्दगी में ख़लल नहीं डालना चाहता

यह पहाड़ों की रात है

रात जो मुझसे कोई सवाल नहीं करती

इसे बेख़ुदी की रात बनने दो

सुबह

एक और नाकाम दिन लेकर आयेगी.

कोई दोस्त नहीं मेरा

वे बचपन की तरह अतीत में रह गए

मेरे पिता मेरे दोस्त हो सकते हैं

मगर बुरे दिन नहीं होने देते ऐसा

पुश्तैनी घर की नींव हिलने लगी है दीवारों पर दरारें उभर आई हैं

रात में उनसे पुरखों का रुदन बहता है

मां मुझे सीने से लगाती है उसकी हड्डियों से भी बहता है रुदन

पिता रोते हैं, मां रोती है फ़ोन पर बहनें रोती हैं

कैसा हतभाग्य पुत्र हूं, असफल भाई

मैं पत्नी की देह में खोजता हूं शरण

उसके ठंडे स्तन और बेबस होंठ

क़ायनात जब एक विस्मृति में बदलने को होती है

मुझे सुनाई पड़ती हैं उसकी सिसकियां

पिता मुझे बचाना चाहते हैं मां मुझे बचाना चाहती है

बहनें मुझे बचाना चाहती हैं धूप, हवा और पानी मुझे बचाना चाहते हैं

एक दोस्त की तरह चांद बचाना चाहता है मुझे

कि हम यूं ही रातों को घूमते रहें

कितने लोग बचाना चाहते हैं मुझे

यही मेरी ताक़त है यही डर है मेरा.

इस तरह आधी रात

कभी न बैठा था खुले आंगन में

पहाड़ों के साये दिखाई दे रहे हैं नदी का शोर सुनाई पड़ रहा है

मेरी आंखों में आत्मा तक नींद नहीं

देखता हूं एक टूटा तारा

कहते हैं उसका दिखना मुरादें पूरी करता है

क्या मांगूं इस तारे से

नौकरी!

दुनिया में क्या इस से दुर्लभ कुछ नहीं

मैं पिता के लिये आरोग्य मांगता हूं

मां के लिये सीने में थोड़ी ठंडक

बहनों के लिये मांगता हूं सुखी गृहस्थी

दुनिया में कोई दूसरा हो मेरे जैसा

ओ टूटे तारे

उसे बख़्श देना तू

नौकरी!

सितारो

मुझे माफ़ कर देना

तुम्हारी झिलमिलाहट में सिहर न सका

पहाड़ो

माफ़ करना

मुझे सिर उठा कर जीना न आया

पुरखो

मुझ पर ख़त्म होता है तुम्हारा वंश

मेरे जाने का वक़्त हुआ जाता है

मैं खुश हूं कि कोई दुश्मन नहीं मेरा

मुझ नाकारा के पास हैं उदार माता-पिता

इस उम्र में भी पालते-पोसते मुझे

मेरी चिन्ता में ख़ाक होते हुए

वे मर चुके होते तो

ज़िन्दगी कुछ आसान होती.

मैं क्यों चाहूंगा इस तरह मरना

राष्ट्रपति की रैली में सरेआम ज़हर पी कर

राष्ट्रपति मेरे पिता नहीं

राष्ट्रपति मेरी मां नहीं

वे मुझे बचाने नहीं आएंगे.

मैं जानता हूं मैं खोखला हो रहा हूं

खोखली मेरी हंसी

मेरा गुस्सा और प्यार

एक रैली में किसी ने कहा मुझे

उठा लें हथियार

मरना ही है तो लड़ कर मरें

मैं किसके ख़िलाफ़ उठाऊं हथियार

सड़क चलते आदमी ने कुछ नहीं बिगाड़ा मेरा

इस देश में कोई एक अत्याचारी नहीं

दूसरॊं का हक़ छीननए वाले कई हैं

मैं माफ़ ही कर सकता हूं सबको

इतना ही ताक़त बची है अब.

इस साल वसन्त में मेरी बेटी दो बरस की हो जाएगी

ख़ुशी आएगी हमारे घर में भी वसन्त में हम मनाएंगे

विवाह की तीसरी सालगिरह

मेरी बहन ने नौकरी के लिए की है किसी से बात

वसन्त तक मिलेगा जवाब

वसन्त आने में

एक जन्म का फ़ासला है.

उम्मीदो

शुक्रिया तुम्हारा तुम्हीं रोटी बनीं तुम्हीं नमक

ग़रीबी

तुमने मुझे रोटी और नमक बांटना सिखाया

आवारा कुत्तो

पूरी दुनिया जब दूसरे छोर पर थी इस छोर पर तुम थे मेरे साथ

बेघर

शाम के धुंधलके में

भोर का स्वागत करते हुए.

१०

मेरे काले घुंघराले बाल सफ़ेद पड़ने लगे हैं

कम हंसता हूं बहुत कम बोलता हूं

मुझे उच्च रक्तचाप की शिकायत रहने लगी है

अकेले में घबरा उठता हूं बेतरह

मेरे पास फट चुके जूते हैं

फटी देह और आत्मा

सूरज बुझ चुका है

गहराता अंधेरा है आंखों में

गहरा और गहरा और गहरा

और गहरा

मैं आसमान में सितारे की तरह चमकना चाहता हूं.