Sunday, October 14, 2007

कू सेंग की कवितायें

पंख

जीवन में पहली बार
जब मैंने लड़खड़ाते हुए चलना शुरू किया
तो पाया
कि मेरे हाथ-पैर मेरे काबू में नहीं हैं
वे ऐसा कुछ नहीं कर पा रहे हैं
जैसा मैं
उनसे करवाना चाहता हूं

और अब मैं सत्तर के आसपास हूं
और एक बार फिर
मेरे हाथ-पैर मेरे काबू में नहीं हैं
वे ऐसा कुछ नहीं कर पाएंगे
जैसा मैं
उनसे करवाना चाहता हूं

कभी मैं लपकता था
लड़खड़ाता हुए भी
अपनी मां के बढ़े हुए हाथों की तरफ़
और अब मैं जीता हूं
सांस-दर-सांस
झुका हुआ सहारे के लिए
किन्हींअदृश्य हाथों की तरफ

अब मुझे जो चीज चाहिए
वह कोई जेट हवाई जहाज या अंतरिक्ष यान नहीं
बस पंख उगा सकने के सुख की इच्छा है छोटी-सी
उस इल्ली की तरह
जो अंततः बदल जाती है एक तितली में
और चल देती है फरिश्तों के साथ
उड़ने
और उड़ने
और बस उड़ते ही रहने को
मेरे इस बगीचे की-सी
पूरी आकाशगंगा में!


सपने

पिछली रात
मुझे एक गीला सपना आया -मेरी हमबिस्तर थी
एक फूल-सी नाजुक नौजवान औरत
जो मेरी पत्नी हरगिज नहीं थी
तो इस तरह यह सब
बेवफाई जैसा कुछ था
और जागने पर
मुझे अपराध-बोध हुआ

कुछ ही दिन पहले ही
मैंने सपने में देखा कि मैं कोरिया का सी0आई0ए0 प्रमुख़ बन गया हूं!
रोजमर्रा की जिन्दगी में
यों भी मुझसे अकसर कहते ही रहते हैं
मेरे मिलने वाले -" तुम्हें समाज में एक ऊंची हैसियत पाने की कोशिश करनी चाहिए"
और कभी-कभी मजाक में
मैं भी जवाब दे देता उन्हें- "हो सकता है कि मैं सी0आई0ए0 प्रमुख बन जाऊं "
लेकिन यह एक बेहूदी बात है

अब मैं सत्तर का होने को हूं
और इस बात पर यक़ीन करता हूं
कि हमारी इन मछली-सी गंधाती
देहों से अलग होने के बाद भी
(जैसे समुद्र तटों पर मिलते हैं सीपियां और शंख)
लहरों से दूर
जारी रहेगा हमारा जीवन
लेकिन
कुल मिलाकर यह सब सपने जैसा ही है - निरा बचपना !
या फिर

इस बात का संकेत
कि कितनी गहराई तक जड़ें जमा चुके हैं मेरे गुनाह
मेरे भीतर
मुझे हैरानी होगी
अगर मैं कभी मुक्त हो पाया इन फंतासियों से
जागते या सपना देखते हुए !


ऐसे या वैसे

किसी अपार्टमेंट में रहना
क्रंकीट के जंगल के बीचों-बीच बने मुर्गी के दड़बे में रहने जैसा होता है
लेकिन फिर भी वहां काफी धूप आती है
औरनिश्चित रूप से इसकी तुलना
दिओजेनेस के उस बड़े पीपे से नहीं की जा सकती
जिसमें वह जीवन भर रहा

पेड़ खड़े रहते हैं यहां-वहां
और चूंकि वे बदलते रहते हैं मौसम के साथ
इसलिए
कुदरत के करिश्मों का अहसास भी कराते हैं
गुलदाउदी
और गुलाब के फूलों में बिंध जाती है
मेरी आत्मा!

नदी किनारे
जहां जंगली पौधे उगते हैं टहलते रहना
और ताकते रहना नदी को
मेरा रोज का शगल है
और ऐसा करते-करते अब मैं खुद भी
तब्दील हो चुका हूं
बहते हुए पानी की एक अकेली बूंद में
और इस तरह
मैं खुद को कुछ नहीं कह सकता

सिर्फ मुझसे मिलने वाले लोग देख सकते हैं
बाहर छोड़ी हुई मेरी धीमी सांसों को
स्टेडियम में किसी एथलीट की दौड़ की तरह
लेकिन
एक दिन यह भी बदल जाएगा

दिक्कत तो यह है
कि जब मैं छोटा था
मेरे घर के लोग बहुत सीधे-सादे थे

ऐसे या वैसे
मेरा जीवन अपनी समाप्ति के कगार पर है
यहां तक कि मौत भी
जिसकी कल्पना भर से मैं भयाकुल रहा करता था
अब सुखद दिखाई देने लगी है
बिल्कुल मां के आगोश की तरह!

अनुवादक की टीप : दिओजेनेस सिकन्दर के समय का एक यूनानी दार्शनिक था जो जीवन भर एथेंस से बाहर एक बड़े-अंधेरे गोलाकार पीपे में रहा। कहते हैं कि वह कभी दिन के उजाले या धूप में अपने पीपे से बाहर नहीं आता था और रात भर शहर के छोर पर लालटेन लिए अपने वक़्त के सबसे ईमानदार आदमी की खोज किया करता था।

अनुवाद - शिरीष कुमार मौर्य
ये कविताएं `पुनश्च´ द्वारा प्रकाशित काव्यपुस्तिका से

4 comments:

सजीव सारथी said...

बहुत सुंदर रचनायें हैं, और अनुवाद भी अच्छा हुआ है

ANUNAAD said...

तारीफ के लिए घन्यवाद दोस्त !
शिरीष

काकेश said...

अच्छी कविताऎं.

इरफ़ान said...

wonderful