Monday, January 28, 2008

ब्लॉग और भाषा का जनपक्ष

बिहारियों का लिंग कमजोर होता है (ये बात अक्सर मजाक के नाम पर किसी को अपमानित करने के लिए कही जाती है)।
नुक्ते की तमीज नहीं, और लेखक-पत्रकार बनने की जिद।
स और श का फर्क नहीं जानते, चले आए हैं साहित्य झाड़ने।
रफी साहेब को हैप्पी बर्थडे कहते शर्म नहीं आती।
एक मीडिया समूह ने हिंदी का सत्यानाश कर दिया है।
टीवी वालों को भाषा की समझ ही नहीं है।
गालियों का भी कहीं समाजशास्त्र होता है। गालियों पर बात करने वाले गंदे हैं।

ये सब किसी ऐसे आदमी के सामने बोलिए, जिसके स्कूल में अंग्रेजी हिंदी में और हिंदी स्थानीय बोली में पढ़ाई गई हो। नुक्ते से जिसका परिचय न हो। बड़ी ई और छो़टी इ या बड़ा ऊ या छोटा उ लिखने के लिए जिसके स्कूल और कॉलेज में नंबर कभी न कटे हों, तो उस पर क्या बीत रही होगी? जिनके लिए स्त्रीलिंग और पुल्लिंग का भाषाई कॉन्सेप्ट धुंधला हो, उसे हिंदी समाज में जीने का हक है या नहीं? या सीधे फांसी पर लटका देंगे या हिंदी से जाति निकाला दे देंगे। और अगर आप ऐसा करेंगे तो आप हिंदी के दोस्त हुए या दुश्मन?

भाषा का जनपक्ष

एक सवाल कई बार मन में आता है कि भारत की राजधानी का नाम अगर पटना या रांची या दरभंगा या चित्रकूट या बांदा या गोपेश्वर या कोपरगांव होता और हिंदी के अपेक्षाकृत समृद्ध प्रदेशों के नाम झारखंड, मिथिलांचल, पूर्वी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड या छत्तीसगढ़ होता तो भी क्या हिंदी का शास्त्रीय स्वरूप ऐसा ही बनता, जैसा आज है।

हिंदी का जो शास्त्रीय रूप हम लिख पढ़ रहे हैं ये कुछ सौ साल से पुराना तो नहीं है। यही तो वो समय है जब उन मुस्लिम/अंग्रेज/हिंदुस्तानी शासकों का दबदबा रहा, जिनकी सत्ता का केंद्र दिल्ली और आगरा जैसे शहर रहे।। यही तो वो इलाका है, जिसकी हिंदी आज सबकी हिंदी है। खड़ी बोली हिंदी की जिस शुद्धता का अहंकार कुछ लोग कर रहे हैं वो इसी इलाके की भाषिक परंपरा की बात कर रहे हैं। साहित्य की भाषा के बारे में अक्सर आग्रह होता है कि वो अभिजन की भाषा हो। लेकिन साहित्य सिर्फ अभिजन की भाषा में ही लिखा जाए तो सूर, तुलसी, कबीर, नानक सबको भुलाना होगा। और ऐसी है सैकड़ों, हजारों नामों के बगैर साहित्य भी कितना गरीब हो जाएगा। नए नायक क्या वही होंगे जो अभिजन की भाषा बोलेंगे, लिखेंगे?

और फिर ब्लॉग तो खुला मंच है। यहां तो आपको इस सोच/जिद के लिए भी स्पेस देना होगा कि मैं अपने तरीके की हिंदी लिखना चाहता/चाहती हूं और कि मैं देवनागरी स्क्रिप्ट में लोकभाषा का ब्लॉग लिख रहा/रही हूं। एसएमएस में, ईमेल में, फिल्मों में, एड में, गानों में और टीवी पर भी भाषायी शुद्धतावादियों को अक्सर हताश होना पड़ता है। रेशमिया जैसे संगीत के चांडाल आज हीरो हैं, जो करते बने कर लीजिए। इन जगहों पर बात को कहने के अंदाज की कीमत है। व्याकरण और वैयाकरणों को यहां विश्राम दिया जा सकता है। इन जगहों पर भाषाई महामंडलेश्वरों के लिए कोई जगह नहीं है। और ब्लॉग में तो गलत भी है तो मेरा है, पढ़ना हो तो पढ़ों वरना आगे बढ़ों बाबा। खाली-पीली टैम खोटा मत करो।

भाषा को अविरल बहने दो

भाषा सिर्फ साहित्व का नहीं संवाद का भी माध्यम है। भाषा जब अभिजन से लोक में जाती है, तो अपना स्वरूप बदलती है। हर भाषा कई फॉर्म में चलती रहती है, बहती रहती है। इस पर दुखी होने का कोई कारण नहीं है। उर्दू के साहित्य में नुक्ता रहे। उर्दू से जुड़े हिंदी के भाषायी फॉर्म में भी उसका अस्तित्व बना रहे। कोई सही जगह नुक्ता लगा सकता है तो जरूर लगाए। कई लोगों को अच्छा लगता है। हिंदी से नुक्ते का गायब होना तो शायह इसलिए हुआ है कि स्कूलों में नुक्ते की पढ़ाई नहीं होती। इसलिए ज्यादातर लोगों को भरोसा नहीं होता कि ये सही जगह लग रहा है या गलत जगह पर। नुक्ते के बगैर शब्दों के अर्थ बेशक बदल जाते हैं, लेकिन हम शब्द नहीं वाक्य बोलते हैं और वो भी अक्सर एक संदर्भ के साथ बोलते हैं। नुक्ता न लगाएं तो कुछ लोग कहते हैं कि कान में खटकता है, लेकिन अर्थ का अनर्थ होते मैंने कम ही सुना है।

उसी तरह संस्कृतनिष्ठ भाषा से किसी को प्रेम है, तो वो वैसी भाषा लिखे। खुश रहे। लेकिन ये जिद नहीं चलेगी कि हिंदी में संस्कृत के ही शब्द चलेंगे। हिंदी में लोकभाषा के शब्द आए, संस्कृत के शब्द आए, विदेशी भाषाओं के शब्द भी आए और इनके आने से भाषा गरीब नहीं हुई। अंग्रेजी अगर इस देश में एलीट की भाषा है तो अंग्रेजी के असर से देश की कोई भाषा सिर्फ इसलिए नहीं बच जाएगी, कि आप ऐसा चाहते हैं।

भाषा अगर अपने लोकपक्ष के बारे में अवमानना का भाव रखेगी तो वो दरिद्र होती चली जाएगी और बाद में शायद मौत का शिकार भी बन जाएगी। भाषा को अलग अलग रूपों और फॉर्म में प्रेम करना सीखिए। कंप्यूटर, मोबाइल, गेमिंग, ई-कॉमर्स, इन सबका असर भाषा पर हो रहा है। छाती मत पीटिए, भाषा बिगड़ नहीं रही है, बदल रही है। अक्सर जिसे हम भाषा की गलती मानते हैं वो अलग तरह से बोली गई या लिखी गई भाषा होती है। भाषा शुद्ध तरीके से लिखी या बोली जाए, इससे शिकायत नहीं है, लेकिन जो शुद्ध नहीं है उसे भी जिंदा रहने का हक मिलना चाहिए।

(ये बातें आपसे एक ऐसा शख्स बोल रहा है जिसका परिचय इसी लेख में ऊपर दिया गया है)

8 comments:

संजय बेंगाणी said...

हिन्दी का नेट संस्करण रचा जा रहा है और हम इसके साक्षी है.

भाषा या भासा तो बहता पानी है, बहेगा...ही.

इरफ़ान said...

आपकी बात को उचित संदर्भ में समझने की कोशिश कर रहा हूँ उसी तरह जैसे आपने मेरी बात समझी होगी. भाषा के लोकपक्ष के समर्थन में आपकी बातों से उन्हें भी शक्ति मिलेगी जो अपनी मूर्खताओं को दार्शनिक जामा पहनाना चाहते हैं, इस ख़तरे से में अवगत हूँ. अगर हमारे लालन-पालन में और शिक्षण में कोई कमी है तो हम अपने बच्चों को उसका शिकार नहीं बनने देना चाहते और बच्चे ही क्यों, मौक़ा लगते ही अपनी कोशिशों से उस किये को अनकिया करना चाहते हैं.सीखना तो एक प्रक्रिया है जिसे उदाहरण के लिये अंग्रेज़ी का बरताव करते हुए जी जान से अपनाते हैं. मैं लोकभाषा के बारे में कुछ कहने के लिये ख़ुद को बहुत छोटा समझता हूँ और हर तरह की लोक अभिव्यक्तियों का सम्मान करता हूँ.
मुझे बताइये कि ख़लीफ़ाओं से जुडे ख़िलाफ़त शब्द को जब आप विरोध के अर्थ में प्रयोग करते हैं तो अर्थ बदलता है या नहीं? जब आप ख़ुलासा को खोलकर बताने के लिये काम में लाते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि खोल को आप ख़ोल से गड्डमड्ड कर रहे हैं.

एक मोटा अंतर यह है कि कल तक लोग "प्रसारकों से" सीखा करते थे कि कैसे बोला जाय और प्रसारक इस ज़िम्मेदारी को समझते हुए अपनी तैयारी करते थे,आज प्रसारक "लोगों से" से सीखते हैं कि वे कैसे बोलते हैं क्योंकि अपनी तैयारी के लिये न तो उनमें इच्छाशक्ति है और न ही उसका माहौल. क्या आप भी कुएँ में गिरे आदमी को कुएँ में गिरकर निकालने के समर्थक हैं?
आइये इस ज़िम्मेदारी को समझें कि लोग हमसे सीखते हैं और इसके लिये हमें थोडा परिश्रम करना होगा. मैं ख़ुद जिस क़स्बे में पैदा हुआ वहाँ से किश्त, ग़ुफ़ा, सफ़ल और ग़ज़ जैसी बुराइयाँ लाया था लेकिन समझने के क्रम में मैंने इन्हें ठीक किया.

Kakesh said...

इरफ़ान भाई , मैं सीखने के लिये तैयार हूँ.शागिर्द बनायेंगे क्या?

आपका सही नाम लिखना तो सीख ही लिया. ;-)

Uday Prakash said...

दिलीप जी, आपकी बात से मै सहमत हू। हिन्दी एक बनती हुई भाषा है। इसका अभी स्थिरीकरण नही हुआ है। विकासशील जीवित भाषाओ का स्थिरीकरण होता भी नही है। मै खुद छ्त्तीसगढ के सीमान्त के एक गाव से हू। ६ से ८ दर्ज़े तक 'गलत हिन्दी' लिखने के लिए हमारे नम्बर काटे जाते रहे। हमे दण्ड मिलता रहा। बाद मे हमने जाना कि अरे ये तो खडी हिन्दी के भीतर भी 'कोलोनीज़' है। साहित्य मे आकर तो यह पारदर्शी आईने जैसा साफ़ हुआ। 'शुद्ध हिन्दी' लिखना और 'एक स्थिरीक्रित' 'मानकीक्रित' या फिर काशी-प्रयाग-उत्तरकाशी के 'महामण्डलेश्वरो'द्वारा निर्धारित 'हिन्दी' लिखना, और इसके बरक्स अपनी 'मात्रिभाषा हिन्दी' लिखना...अलग-अलग मुद्दे है। इतनी सहजता से इस बहुत गम्भीर मुद्दे को उठाने के लिए बधाई।

अभय तिवारी said...

आप की सब बातें जायज़ है पर साथ-साथ इरफ़ान की चिंताएं भी.. उन्होने परिश्रम करके अपने को ठीक किया है.. मैं खुद भी लगातार अपने हिज्जों और नुक़्तों को लेकर सचेत बने रहने की कोशिश करता हूँ और मानता हूँ कि जो भी ज़िम्मेदारी के स्थानों पर हैं वे भी इसे समझें.. नहीं तो एक मधुर भाषा की मधुर ध्वनियों को खोकर नुक़सान हमारा ही होगा..

swapandarshi said...

दीलीप जी तर्क और कुतर्क लगभग हर चीज़ के दिए जा सकते है। अपने जीवन मे बहुत कुछ हम स्व -अभ्यास से सीखते है, अपने आस-पास लोगो को सुनकर सीखते है, रेडियो- टीवी से भी सीखते है, और दूनिया भर की किताबो से भी। फिर इस सीख-सीख कर कभी इस लायक भी हो जाते है कि ज्ञान के सागर मे एक बूँद खुद भी मिला दे। स्कूल से, या कोलेज से सिर्फ बुनियादी शिक्षा मिलती है, या कहे तो एक मतलब मे साक्षर हो जाते है, शिक्षा जीवन के विभिन्न आयामों से जीवनभर हमारे चाहे-अनचाहे चलती रहती है। भाषा की शिक्षा भी इसके इतर नही है, इसे भी लागातार साधना पड़ता है, शब्दावली मे लगातार नए शब्द भरने पड़ते है. प्रवाह का ख्याल, नया ट्रेंड के शब्द, नए उच्चारण, ये सब भी स्कूल के बहुत आगे जाते है। फिर नुक्तों का इस्तेमाल को भी इसी सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा क्यो ना माना जाय। उर्दू के शब्द, संस्कृत के शब्द, देशज भाषाओं के शब्द, अंग्रेजी के शब्द, सभी से मिल कर हिन्दी बनी है। पर बहुत से देशज शब्द संस्कृत और उर्दू और अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों की टांग तोड़कर बने है।
खासतौर पर अगर सरल, सुगम, और सही शब्द है तो कम से कम लिखने वालों को उन्ही को इस्तेमाल करना चाहिऐ। कम से कम उन लोगो को जो लिखने-पढने के काम से रोटी खाते है। उद्दहरण के लिए, लगभग सारी हिन्दी पत्ती के देहाती, समय के लिए "टेम" बोलते है, हमारे पास सही शब्द वक़्त और समय दोनो है ।
इसी तरह सिगरेट अंग्रेजी से है, पर उसकी खोज भी अंग्रेजो ने ही की, उसके लिए 'धूम्रदंडिका' कहना फ़जूल है।
इसी तरह का शब्द है, 'चिरकुट' जो अवधी का है पर बड़ा उपयोगी।
हर चीज़ को अच्छा बनाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है, फिर पत्रकारों, लेखकों से ये उम्मीद क्यो न की जाय?

Jan Sevak said...

पोस्ट में मेरी टिप्पणी का ज़िक्र है इसलिए लिख रह हूँ.

Apparently हिन्दी में एक saying है.. सब धान बाईस पसेरी.. आप ने वाही कर दिया.... दिलीप कुमार को happy birth day कहने पर objection raise करने वाला में ही था. लेकिन आपने मुझे उन लोगों के rank में put कर दिया जो language fanatic हैं. what I mean is that यार तुसी समझते हो न की this hindi fundamentalism is you know चलने वाला नही है. you are right... language को river के माफिक flow करने देना चाहिए... but you know... पुराने type की thinking hold करने वाले एकदम stupid बात करते हैं. After all हिन्दी को इस globalised world में survive करना है या नही?

Dilip, you are a genius. नही सच्ची मुची... jokes apart. Oh, by the way, who cares about लिंग भेद यार. as long as आप अपनी बात explain कर सकते हैं... किसे फुरसत है without any reason हिन्दी के grammer का रोना रोये... I mean, you know... why bother !!

And believe me you, में ख़ुद यही मानता हूँ, अगर हमारे आपके जैसे लोग language को open up .... your know.. open up नही करेंगे, ताब तक these hindi walas will not learn.

Keep it up, buddy.

अजित वडनेरकर said...

भाषा तो दरिया है । बहाव में ही शुद्धता भी है और ताज़गी भी। मगर लोक बोली के उच्चारण अगर हिन्दी पर थोपने की वकालत होगी तो हिन्दी भी गई और लोकभाषा भी गई। उच्चारण के फर्क से ही तो हिन्दी का उसकी बोलियों से मोटा मोटा अन्तर पहचाना जाता है न....
मैने शब्दों के सफर में http://shabdavali.blogspot.com/2008/01/blog-post_3081.html
यही लिखा है कि आमजन को हिन्दी के मठवाद से दूर रखें पर जो कर सकें तो हिन्दी को सलीके से इस्तेमाल करें। कायदे की बात में फायदा तो है खासतौर पर प्रसारण करने वालों के लिए तो यह मंत्र है। वर्ना भौपू लेकर नेताओं की सभा की मुनादी करनेवाले को भी प्रसारक ही कहा जाता है। शेरो शायरी का उल्लेख हो और नुक्ता न लगे तो हिन्दी का भी मज़ा नहीं । यह सब दरअसल इसलिए होता है कि हम डिक्शनरी देखना भूल चुके हैं। खुद को सुधारना भूल चुके हैं। अख़बारों , चैनलों के दफ्तरों में डिक्शनरी देखने की ललक तक नहीं है। पूछ कर काम चलाते हैं। चाहे जवाब देने वाले ने भी अंदाज़न ही बताया हो।
एक और बात। क्या हिन्दी की समृद्धि केवल अवधि, भोजपुरी और पुरबिया ज़बानों के शब्दों तक ही सीमित रहेगी ? हिन्दी विकसित होती भाषा है मगर शब्दकोशों में एक क्षेत्र विशेष के शब्द ठूंसने की जो गलती बीते कई दशकों से चल रही है उसका क्या ? दिल्ली और काशी से निकली तमाम शब्दकोशों को देख डालिए, ज्यादातर शब्दों के अर्थ, पर्यायवाची शब्द वही है जो पूरब की शैलियों में इस्तेमाल होते हैं। इसमें मालवी, राजस्थानी, कुमाऊंनी के शब्द नहीं मिलेंगे। दक्कनी शैली की हिन्दी का काशी के मठाधीशों ने खूब मज़ाक उड़ाया था । पत्रकारिता ने हमेशा ही नई भाषा गढ़ी है और हिन्दी के प्रवाह को शायद गति मिली है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि पहले साहित्य पत्रकारिता में रिश्त्दारी थी । आज की पत्रकारिता से साहितत्य सिरे से गायब है। साहित्यिक अभिरूचि वाले लोग मीडिया से जुड़ते थे । मगर आज की पत्रकारिता इसमें कोई योगदान नहीं कर रही है।
इरफान सच कहते हैं। प्रसारकों के उच्चारण से लोग सही बोलना सीखते थे। आज के भ्रष्ट उच्चारण वाले प्रसारकों को शायद सीखने की इच्छा भी नहीं है।