Thursday, April 3, 2008

डायनासोर का कंकाल

नोबेल पुरुस्कार से सम्मानित पोलिश कवयित्री विस्वावा शिम्बोर्स्का की रचनाएं आप पहले भी कबाड़ख़ाने में पढ़ चुके हैं।

बेहद रोज़मर्रा दिखाई देने वाली चीज़ें शिम्बोर्स्का के यहां धर्म, समाज, विज्ञान और दर्शन से सम्बन्धित गहनतम बहसों के विषयों में तब्दील हो जाती हैं। मिसाल के लिए देखिये इस रचना को, जिसे अधिकांश आलोचक बीसवीं सदी की सबसे धारदार चुनिन्दा कविताओं में शुमार करते हैं :

डायनासोर का कंकाल

प्यारे भाइयो!
हमारे सामने है अनुचित अनुपात का एक उदाहरण
ऊपर देखिये, यह रहा डायनासोर का कंकाल

प्रिय मित्रो!
बांईं तरफ़ हम देख सकते हैं अनन्त तक घिसटती एक पूंछ
और दाईं तरफ़ दूसरे अनन्त तक घिसटती गरदन

सम्मानित साथियो!
पहाड़ जैसे धड़ के नीचे
मजबूती से खड़ी हैं चार टांगें कीचड़ में

उदार नागरिको!
प्रकृति ग़लती नहीं करती
पर उसे पसन्द है अपना नन्हा लतीफ़ा:
कृपया ग़ौर करें हास्यास्पद रूप से छोटे सिर पर

देवियो और सज्जनो!
इस आकार के सिर में दूरदृष्टि के लिये जगह नहीं होती
इसलिये इसका स्वामी अब उजड़ चुका है -

माननीय अतिथियो!
बहुत सूक्ष्म मस्तिष्क और बेहद स्थूल भूख
अधिक तर्कहीन नींद बजाय अक्लमन्द भय के -

सम्मानित जन!
इस मामले में हम लोग कहीं बेहतर हैं
जीवन सुन्दर है और दुनिया है हमारी -

शिष्ट प्रतिनिधिगण!
सोचनेवाली शिरा के ऊपर तारों भरा आसमान
और नैतिक नियम उसके भीतर

परम उदार मान्यवर!
शायद इस इकलौते सूरज के नीचे
दो बार नहीं होते ऐसे करिश्मे -

अनन्य सज्जनो!
कितने सधे हुए हाथ
कैसे उस्ताद होंठ
कैसा सिर इन कन्धों के ऊपर

हे सर्वोच्च दरबार!
अदृश्य हो चुकी पूंछ के बदले
कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी -

1 comment:

जोशिम said...

ये कविता सही में ऐसी थी कि कमाल अनुवाद का है