Tuesday, April 15, 2008

वीरेन डंगवाल

SHAMSHER

The night is my mirror
In whose hard coldness is hidden also the morning
Bright, clear.

The seven sages, wetting their beards in the lake
Point at me and smile at each other
Only because I loved
I had to suffer such revenge

Loneliness was the evening star
Solitary
Which I swallowed
Like a sleeping pill but couldn't sleep

Winds, may I dissolve
Streams, spread me out to dry over the broad shoulders of the waterfalls
Leaves, let me, keep up like you, night and day - A soft, trembling stubbornness
Workers, may you be able to say - " This too is us"
Immortality, may I disappear in you
Sticking always in your heart
Like a sweet splinter.


Translated by ASHOK PANDE
(From 'Its been Long Since I Found Anything' - 2005 - Adharshila Publication)

3 comments:

अतुल said...

हिन्दी का अंग्रेजी अनुवाद क्यों किया अशोक पाण्डेय जी ने. बताएं.

कहने में क्या हानि said...

ये क्या है...छोडिए भी..

A SPL. DISPATCH OF PRAMODKAUNSWAL ON VIREN DANGWAL POEM- वीरेन डंगवाल का रामसिंह: इस कविता में एक ऐसी ताक़त है जिसको इसने नहीं पढ़ा है, वह दूसरों को ख़ूब बेवकूफ़ बना सकता है। मैंने भी ख़ूब बनाया है- हां इतना ज़रूर लिख देता हूं यह कविता का एक उत्ख़नन है। इसके अपने में ऐसे कोई मायने नहीं निकलते कि किसी की कविता से उठाकर बात कर रहा है। हमारे दफ्तर में एक सज्जन आए। बोले- क्या करते हो। मैंने कहा साहब टीवी का 12-13 साल काफी अनुभव हो गया है...। बच्चों- या दूसरे साथियों- को अनुभव बांटता हूं। लेकिन आप पूछ रहे हैं तो साफ़ बता दूं कि रोज़ रक्तपात करता हूं और मृतकों के लिए शोक़गीत गाता हूं...। वह हिचकिचाए..थोड़ा डरे भी। कुछ दो चार रोज बाद मिले, उन्होंने पूछा तो मैंने कहा, कल की ही बात है जब महसूस हुआ कि हत्यारों के हाथ बड़े लंबे हो गए हैं, वह साले नींद में आते हैं और डराते हैं। इस कविता में ऐसे कई धांसू पंच हैं कि आदमी हिल जाता है। ख़ैर ये महाशय हमारे बॉस के पास गए और बोले कि साहब आपके यहां बड़ा ख़तरनाक आदमी है एक...। उन्होंने मुझे तलब किया..। यहां भी मैंने वीरेनजी के तीर तलवार और कटार चलाए। मैं बोला सर ऐसा है ये अभी नए आए हैं। इनको पता नहीं है कि मैं कंपनी बाग में रखी वो ख़ामोश तोप हूं- जिस पर साल में एक दो बार पेंटिंग हो जाती है और मैं एक गौरैया की तरह उसमें दुबका रहता हूं...और आप जानते ही हैं कि चाहे तोप (ख़तरनाक या हिंसक) कितनी भी ताक़तवर हो एक दिन तो उसका मुंह होना ही है बंद। जी....मैं अपने फ्लोर का वह आदमी हूं जिसको सब डराते हैं- कोई कुछ भी बोल देता है, क्या मैं कोई गौरैया जैसा डरपोक बना रहूं...कई साल से काम रहे मेरे साथियों से पूछ लीजिए...। लगे हाथ बता दूं कि रामसिंह के साथ चाहे जो भी डरावने लोग कंचे खेलते हैं, वीरेन डंगवाल अपनी संवेदना में एक ख़ामोश चिड़िया का नाम है...। जितना बड़ा कवि उतनी महीन उसकी संवेदना। मैं उनको प्रणाम करता हूं...। आफ़िस की बात आफ़िस में ही रहने देते हैं- जिसका जीवन सारा बिगड़ा है-कोई और क्या बिगाड़ेगा।
(-प्रमोद कौंसवाल। उनकी संस्मरणों पर एक आने वाली पुस्तक का अंश है)

कहने में क्या हानि said...

नोट--- भाई लोगों -कहने में क्या हानि को हटा दीजिए (यह डेड है)..सिंपल नाम दे दीजिए..इसे रखें जहां भी पीस में अंग्रेजी वाला हिस्सा न मिटाएं...अशोक भाई सुना न...और राजेश.आप लोग कैसे हैं ...मेरा नमस्कार...अशोक जी आपको कविताएं भेज रहा हूं अनुवाद के लिए...राजेश ने तो कह दिया है--मैं (प्रमोद) झक मार रहा हूं---प्रमोद कौसवाल