Tuesday, August 19, 2008

ज़िंदगी जीने की ज़रुरत ही नहीं समझी; जीने का सलीक़ा भी नहीं आया

रश्मि रमानी समकालीन कविता परिदृष्य पर एक सशक्त हस्ताक्षर हैं.
इन्दौर में रहतीं हैं और मान कर चलती हैं कि कविता और उसे रचने
वाले के लिये एकांत से अच्छा संगसाथ और कुछ और नहीं हो सकता.
वे अपनी तमाम पारिवारिक व्यस्तताओं में से बेहतरीन कविताएँ रचतीं
हैं और देश भर के पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहतीं है.परिवेश,संबंध
और प्रकृति को लेकर अपने काव्य-बिम्ब तलाशने वाली रश्मि रमानी की
रचनाएँ आज कबाड़खाना के काव्य-प्रेमियों के लिये ...मुलाहिज़ा फ़रमाएँ



जीने की रीत


ज़िंदगी जीने की ज़रुरत ही नहीं समझी
तो जीने का सलीक़ा भी नहीं आया
गहरी नींद का तो सिर्फ़ एक एहसास था
सपने देखने का ख़्याल भी
एक सपना ही था

इतना पराया महसूस किया अपने आपको
किसी और से प्यार करने की हसरत ही मर गई

एक दिन
वीराने में देखा मैंने
अकेला अनजान फूल
उस बेनाम फूल में
न थी कोई ख़ूबसूरती, ना ही कोई रौनक़
पर, फूल के अस्तित्व ने
बदल दिया था
वीराने का अर्थ
सलीक़े से खिला था
वो मामूली फूल

मैंने
फूल को ध्यान से देखा
मेरी हैरानी पर फूल मुस्कुराया
कहा...
तुम क्या सोच रही हो?
चंद घंटों का मेरा जीवन और ये मस्ती ?
पर मेरी दुनिया में तो
यही है जीने की रीत


पतझड़ का फूल

पतझड़ के उदास मौसम में
खिला है
मेरे पहले प्यार का
आ़ख़िरी फूल

यह फूल कहीं कुम्हला न जाये
इसके लिये
सम्हाल कर रखे मैंने अपने आँसू

मेरे प्यार का बूटा सलामत रहे
इसलिए पसीना बहाया मैंने पानी समझकर
इस फूल की निराली ख़ुशबू की ख़ातिर
मैंने इसे दी
अपनी सॉंसों की सुगन्ध

सिर्फ़
इस एक फूल का अस्तित्व हो
ख़ूबसूरती और महक से भरपूर
मिटा दिये मैंने अपने ज़ज़्बात
बिखेर दिये सारे रंग
खो दिया अपने आप को
फिर जान पाई मैं
प्यार के अनजान सच को।


बाक़ी है


बाक़ी है
अब भी बहुत कुछ
तलछट की आख़िरी बूँद तक
पी सकते हो जिसे तुम
तृप्ति पाने के लिये

बाक़ी है
अनगिनत इच्छाएँ
जिन्हें पूरा करने के लिये
कम पड़ेंगे शायद
सौ-सौ जनम भी
कभी मत सोचना
कि अकेले रह गये तुम इस जहान में
अच्छी चीज़ों की तादाद भले ही कम हो
पर मिल ही जाती हैं अक्सर
वे भी हर किसी को

कभी-कभी
मिल जाते हैं वे ख़ुशमिजाज़ अजनबी
आख़िर तक दूर रखता है जिनका साथ
सफ़र की नीरसता और अकेलेपन को
अचानक
पता चलता है
ख़त्म हो गया है सफ़र
सामने खड़ी है मंज़िल

इन्तज़ार

यही है वह रात
जिसके इन्तज़ार में गुज़ारे मैंने कितने दिन
ये रात
भरपूर है अनगिनत तारों और चॉंदनी से
बेहद ख़ूबसूरत इस रात में
समायी है अनजान को जानने की इच्छा
नई दास्तान शुरू करने की हसरत

कल तक
तुम मेरे लिये एक अजनबी
पर आज मेरे वजूद का हिस्सा बनकर
बदल रहे हो सब कुछ
सिर्फ़ एक पल में
खिले हैं अनगिनत फूल
रजनीगन्धा की नशीली ख़ुशबू से महक उठी है हवा
स्याह रात में
जुगनुओं की चमक बन गई है
नूर का दरिया

मेरे चेहरे पर हैं
इन्द्रधनुष के सातों रंग
क्योंकि आँसुओं पर पड़ रही है
तुम्हारी मुस्कुराहट की किरणें
तितली के परों पर सवार
आज मेरी ज़िंदगी
भूल गई है पीड़ा का भार
मेरे हाथों में है
सारा संसार


प्रतीक्षा


रात उदास है
और,
तारे ख़ामोश
सोये शहर की नींद के बीच,
जागती है एक लड़की,
गुमशुदा अतीत की याद-सी,
घूरती है पीली छत

याद करती है गुज़रे दिन
रोशन पगडंडियॉं,
नीला समुद्र,
गर्म दबाव, अनाम स्पर्श
यादों के फरफराते पन्नों से,
एक काला पड़ चुका गुलाब
गिर पड़ता है,
जो कभी लाल था।

उस सूखे काले गुलाब को
सीने से लगाकर
वह लड़की सो जाती है गहरी नींद
दूसरे लाल गुलाब खिलने की
प्रतीक्षा में।


पेड़


पेड़ खड़ा है अपनी जगह पर
बरसों से चुपचाप
जम गई हैं उसकी जड़ें
ज़मीन में अच्छी तरह

कभी बीज की शक्ल में
दबा था पेड़ मिट्टी की तहों में
सतह फोड़कर जब आया था नन्हा अंकुर
तो आँखें मलते हुए देखता था
आसपास के संसार को
हवा के मस्त झोंको से हिल गया था
नन्हा पौधा

उसने भी चाहा था दौड़े, कूदे, उछले
छोटे बच्चों की तरह
थक कर हो जाए चूर
सो जाए मीठी नींद में
पर पेड़ तो बढ़ता गया
पौधे से पेड़ बन गया
बरसों से एक ही जगह खड़े-खड़े
अब थक गया है पेड़
चाहता है कि बैठ जाऊँ, सुस्ताऊँ
पर नहीं सुस्ताते पेड़
वे तो खड़े रहते हैं उम्र भर

झेलते धूप, वर्षा, मौसमों की मार
पत्थरों की चोटें, कुल्हाड़ियों के प्रहार
जब हो जाते हैं बूढ़े
तो गिर जाते हैं भयानक चीत्कार के साथ
या मर जाते हैं ख़ामोशी से सूखकर


सिर्फ़ एक शब्द


कुछ भी नहीं हुआ था
आँसू की तरह जब गिरा था
आसमान से एक तारा
चॉंदनी
उतनी ही रही थी

क्या फ़र्क़ पड़ा था?
अलग हो गया था पेड़ से जब
एक सूखा पत्ता
और टूट गया था
एक पुराना रिश्ता
तारा कहॉं खो गया पता नहीं
पर,
धरती की मुलायम हथेलियों ने
सूखे पत्ते को मिट्टी में मिलाकर
पेड़ की जड़ों की ओर फिर से भेज दिया था
पुनर्जन्म के लिये।

सिर्फ़ एक शब्द कहा था तुमने धीरे-से
और मेरी ख़ामोश ज़िंदगी में पैदा हो गई थी हलचल
बदल गया था रिश्तों का अर्थ
मिल गया था जीने का मक़सद
शुरू हुई थी एक नई कहानी
क्या, स़िर्फ एक शब्द काफी होता है
किसी लंबी दास्तान के लिये।

श्रीमती रश्मि रमानी :0731-2477363

9 comments:

Udan Tashtari said...

आभार रश्मि रमानी जी को पढ़वाने का.

बालकिशन said...

बहुत ही अच्छी कवितायें है.
आभार प्रस्तुति के लिए.

सुशील कुमार छौक्कर said...

बहुत ही उम्दा कविताएं हैं। पढकर बहुत ही अच्छा लगा। आपका पढवाने का शुक्रिया।

सजीव सारथी said...

बहुत सुंदर, रश्मि जी मेरी तरफ़ से बधाई दीजियेगा संजय भाई

Priyankar said...

अच्छी कविताएं .

Parul said...

sundar bhaav sabhi ke....lekin sanjay bhayi agar ek-ek kar ke post kartey to padhney ka mazaa duna hota..ho sakta hai ek sath na padh pana meri hi mushkil ho....

वर्षा said...

अच्छी कविताएं पढ़ने को मिलीं

Ashok Pande said...

उत्तम काव्य!

विनीता यशस्वी said...

बेहद संवेदनशील रश्मि जी को ऐसी कविताएं लिखने की बधाई. संजय जी आपने यह अवसर उपलब्ध कराया, इस बात का आप का अहसान. सचमुच.