Monday, November 17, 2008

अघिल सीटा चान-चकोरा, पिछाड़ सीटा जोशि



पंत-मटियानी स्मृति समारोह में भाग लेने जाते हुए गाड़ी में श्री वीरेन डंगवाल के अलावा लखनऊ से पधारे श्री नवीन जोशी भी थे. जोशी जी बड़े पत्रकार हैं. दैनिक 'हिन्दुस्तान' के लखनऊ संस्करण के सम्पादक और 'दावानल' नामक चर्चित उपन्यास के लेखक भी. पहले अल्मोड़ा पहुंचे वहां से कोसी. कोसी में कुछ देर रुकने के बाद कत्यूर-बोरारौ घाटी में प्रवेश करते ही जैसे उनके भीतर सारा बचपन जाग गया - उन्होंने बहुत संघर्षपूर्ण जीवन बिताया है. छः साल की आयु में बागेश्वर जैसे बीहड़ नगर से लखनऊ की पहली यात्रा के बाद की तमाम कहानियां उन्हें याद हैं.

कुमाऊं की ऐतिहासिक और अति उर्वर बोरारौ घाटी की सांस्कृतिक सम्पन्नता भी निर्विवाद रही है. भारत की आज़ादी के समर में कुमाऊं की तरफ़ से पहली हलचलें इसी घाटी में हुईं. सोमेश्वर, गरुड़, मनान और बागेश्वर इस घाटी की प्रमुख बसासतें हैं. और बागेश्वर तो अब ज़िला बन चुका है

सीधा-सादा जीवन बिताने वाले पर्वतीय जनों की बीते ज़माने की कहानियां याद करते हुए नवीन जोशी जी को एक क़िस्सा याद आया. धान की रोपाई के दिनों में बहुत देर रात तक लोगों को खेतों में काम करना पड़ता था. कुमाऊं में इस अवसर पर अभी हाल ही के सालों तक खेतों में बाकायदा लाइव-संगीत की व्यवस्था हुआ करती थी. हुड़के की धमक पर लोकगायक पुरानी लोकगाथाएं सुनाया करते थे. लोकगायन की इस परम्परा को 'हुड़किया बौल' कहा जाता है.

कभी कभार आधी रात तक चलने वाले इन धान-रोपाई कार्यक्रमों का अन्त आते न आते अपरिहार्य रूप से एकाध सद्यःप्रस्फुटित प्रेमप्रकरण लोगों की ज़ुबान पर आ ही जाया करते थे. बाद में उत्तरायणी के अवसर पर बागेश्वर में लगने वाले मेले में इन कथाओं को गीतों का विषय बनाया जाता था.

इसी क्रम में कभी किन्हीं जोशी जी को, जो संभवतः बाहर से आये कोई शिक्षक या कर्मचारी रहे होंगे, किसी स्थानीय कन्या से प्रीत हुई तो निम्न पंक्तियों का सृजन हुआ. ज़रा देखिये इस में कितनी सफ़ाई से सम्बन्धित कन्या की पहचान छिपाते हुए एक निश्छल किस्म की चुहल की गई है.

गरुड़ा बटि चलि मोटरा, रुकि मोटरा कोशि
अघिल सीटा चान-चकोरा, पिछाड़ सीटा जोशि


(अर्थात गरूड़ नामक स्थान से एक मोटर चली. यह मोटर आगे कोसी पहुंचकर रुकी. सुधीजनो! अगली सीट पर एक चांद-चकोरा था, जबकि पिछली सीट पर विराजमान थे कोई जोशी जी.)

* इसमें फ़ुटनोट के तौर पर मैं जोड़ना चाहूंगा कि इस छन्द को सुनने के बाद वीरेन डंगवाल साहब ने अपने मौला अन्दाज़ में नवीन जोशी जी से तस्दीक की कि उक्त कविता के नायक किंवा खलनायक कहीं वे ही तो नहीं थे.

5 comments:

ravindra vyas said...

ऐसे ही लम्हों में प्रेम बचा रहता है।

Naveen said...

jiyo Ashok Bhai.
Aur yeh yatra yaad rahegi.

Naveen said...

jiyo Ashok Bhai.
Aur yeh yatra yaad rahegi.

महेन said...

दाज्यू! देवस्थल रुक जाते। घर पर चहा-पाणि की व्यवस्था तो हो ही जाती।

eSwami said...

:)