Sunday, February 22, 2009

नाहरगढ़, टुन्नेश्वरी देवी और बन्दर चटनी


नाहरगढ़ के किले की लोकेशन ने मुझे हमेशा बहुत आकर्षित किया है. जयपुर से कुल छः-सात किलोमीटर दूर एक ऊंचे पहाड़ीनुमा टीले पर मौजूद इस किले से जयपुर नगर का सुन्दर नज़ारा देखने को मिलता है.

हमसे थोड़ा आगे एक युवक गाइड ऑस्ट्रेलियाई पर्यटकों के एक दल को किले के बारे में बहुत-सी सच्ची-झूठी जानकारियां दे रहा था (ये जानकारियां आप किसी भी सम्बन्धित वैबसाइट या ट्रैवलबुक से प्राप्त कर सकते हैं). अपनी वाचालता, बददिमागी और बदशऊरी के चलते ऑस्ट्रेलियाई बाकी गोरी चमड़ी वालों से अलग पहचाने जा सकते हैं.

किले का शिल्प भी वाकई बहुत अचरजकारी है और इसकी अच्छे से देखभाल भी की गई है. किले में रहने की इच्छा रखने वालों के लिए कुछेक शाही कमरों को किराये पर लिया जा सकता है.

हम लोग फ़ुरसत से किले का दर्शन कर के रेस्त्रां की तरफ़ निकल ही रहे थे कि किले के प्रवेशद्वार के ठीक बग़ल में दो एम्बेसेडर गाड़ियां रुकीं. लाल बत्ती, गनर वगैरह. तदुपरान्त बुज़ुर्ग से दिखने वाले एक टाई-सूटधारी सज्जन बड़ी शान से उतरे और बहुत आधिकारिक मुद्रा धारण किये हुए किले में प्रविष्ट हुए. ऑस्ट्रेलियाइयों का गाइड फुसफुसाहटभरी आवाज़ में बताता है कि उक्त सज्जन नाहरगढ़ किले के वर्तमान उत्तराधिकारी हैं. चलिये साहब हम नाचीज़ भी अब सुकून से मर सकेंगे कि हमने एक जीता-जागता महाराजा देख लिया. यह दीगर था कि महाराज की शान-ओ-शौकत की अब ऐसी-तैसी फिर चुकी थी. हाथी-घोड़ों के बदले सरकार ने उन्हें लालबत्ती वाली एम्बेसेडर गाड़ियां मुहैय्या करवा दी थीं. शेरों के शिकार पर बैन है सो महाराजा को मुर्गी-बकरियों से काम चलाना पड़ता होगा. उनके ख़ानदानी मकान की बुर्जियों पर बन्दरों के झुण्ड और अहाते में फ़िरंगी टूरिस्ट काबिज़ हो चुके थे. मुझे बेसाख़्ता वीरेन डंगवाल की 'तोप' कविता याद आ गई.

जब तक हम रेस्त्रां पहुंचते, ऑस्ट्रेलियाई कुछ मेज़ों पर फैल चुके थे और बीयर की बोतलों का श्राद्ध कर रहे थे. उनके साथ बैठा गाइड युवक अब उनके सामने पहले से भी अधिक दुबला लग रहा था. ऑस्ट्रेलियाई पहले से ही टुन्न रहे होंगे क्योंकि एक-एक बीयर सूत चुकते ही वे मोटरसाइकिलों की सी बीहड़ आवाज़ों में हंसी-ठठ्ठा करने लगे थे. गाइड बार-बार घड़ी देख रहा था.

इस टुन्नसमूह का नेतृत्व कर रही करीब पचास साला एक महिला ने गाइड से ऊलजलूल सवाल पूछने चालू किये हुए थे. उसकी आवाज़ रपट रही थी और उसके नथुनों से निकलता सिगरेट का गाढ़ा धुआं छूटने ही वाले किसी भाप-इंजन का आभास दे रहा था.

उसके इसरार पर गाइड ने अपने बटुए से अपने मां-बाप की तस्वीर निकाली. "ओकै ... ओखै ... ज़ैट्स हिज़ फ़ैदा एन ज़ैट्स ज़ा मैदा ... स्वीट! ..." टुन्यासिनी देवी की आवाज़ में टाइमपास करने की आजिज़ी और बदतमीज़ी है. फ़ैदा-मैदा की तस्वीरें कई हाथों से होती हुई वापस गाइड के पास आती है तो टुन्नेश्वरी माता पूछती हैं "मो फ़ोटोज़?" गाइड अपनी बहन की तस्वीर दिखाता है: "ग्राएट ... ग्राएट ... शीज़ प्रटी ... वैवी प्रटी ..."

बीयरम्मा की दूसरी बोतल निबट चुकी है और वह खिलंदड़ी - मोड में आ गई है. "शो मी यो ब्रादाज़ फ़ोटो बडी ... आई वान्ना सी यो ब्रादा ..." मुझे लगता नहीं गाइड ने इस कदर विकट पर्यटकों के साथ कभी काम किया है. "शो मी यो ब्रादाज़ फ़ोटो बडी ... आई वान्ना सी यो ब्रादा ..." ...

हम अवाक इस बेहया कार्यक्रम को कुछ देर झेलते हैं. इसके पहले कि मेरा गुस्सा फूटे, मैं बाहर खुले में लगी एक मेज़ का रुख़ करता हूं. खुले में बन्दर-साम्राज्य का स्वर्णिम काल चल रहा है. एक बन्दर बाकायदा एक कुर्सी पर बैठा हुआ टमाटर कैचप की बोतल थामे बैठा है. कुछ देर उसे उलटने-पलटने पर उसे बोतल खोलने का जुगाड़ हासिल हो जाता है. वह इत्मीनान से दो तीन बार कै़चप सुड़कता है और आगामी कार्यक्रम के बारे में विचारलीन होने ही वाला होता है कि रेस्त्रां के भीतर से आकर एक वेटर उसे डपटकर दूर भगा देता है. उसके पीछे-पीछे आया, रेस्त्रां का मालिक लग रहा एक बुढ़ाता हुआ आदमी बन्दरों के साथ अपनी नज़दीकी रिश्तेदारी की घोषणा करता पांचेक ढेले उनकी दिशा में फेंकता है. उसकी निगाह खुली हुई कैचप बोतल पर पड़ती है. वह झट से वहां जाकर उसे उठाता है. जेब से गन्दा रूमाल निकालता है और ढक्कन को पोंछ कर उसे बोतल में फ़िट करता है और उसे पुनः मेज़ पर स्थापित कर देता है.

कालान्तर में हमारी मित्र सोनिया ने टमाटर कैचप को 'मंकी सॉस' कहना शुरू कर दिया था.

(जयपुर के आसपास पाये जाने वाले बंदरों और मनुष्यों की कुछ अन्य प्रजातियों से आपकी मुलाकात अगली किस्त में करवाता हूं.)

18 comments:

Sanjeet Tripathi said...

बहुत बढ़िया विवरण दिया आपने।
अच्छा लगा पढ़ना।
शुक्रिया।

मसिजीवी said...

नाहरगढ़ के हमारे अनुभव ऐन ऐसे ही थे।

टुन्‍यासिनी देवी, बीयरम्‍मा वाह वाह वाह

इस शब्‍द सृजन पर हम फिदा, आपके कीबोर्ड को चूम लेने का मन करता है।

Gagagn Sharma, Kuchh Alag sa said...

बियरम्मा का चित्रण नशेदार रहा।

रागिनी said...

आपका यात्रा विवरण बहुत अच्छा है और आपकी शैली भी रोचक है।

P.N. Subramanian said...

पांडे जी मजा आ गया. अच्छी बात बता दी "मोंकी सॉस". ऐसी जगह इस बात को याद रखना होगा. आभार.

विनय said...

अशोक भाई! लिखते हुए भी हँस रहा हूँ. गिर-गिर कर! अच्छा नापा है आपने!

परमजीत बाली said...

रोचक पोस्ट लिखी है।बधाई

Rajesh Joshi said...

अमे पैर में पिलाश्टर और जा रहे हैं नाहरगढ़... क्या हुआ गुरू.

अजब वृत्तांत है.

कान के नीचे दिया क्यों नहीं बियरम्मा के?

vijay gaur/विजय गौड़ said...

तो जयपुर के बन्दरों से खफ़ा है आप और गुस्सा निकाल रहे है - "अपनी वाचालता, बददिमागी और बदशऊरी के चलते ऑस्ट्रेलियाई बाकी गोरी चमड़ी वालों से अलग पहचाने जा सकते हैं." चलिए आगे बन्दरों की चमडी धुनिए।

sanjay vyas said...

कई जगहों पर बन्दर और आदमी एक दूसरे के इतने आदी हो चुके है कि दोनों चुपचाप दुनिया को ख़बर लगे बगैर परस्पर कायांतरण करते रहते है.वृत्तान्त आगे की भूख जगाने वाला.

महेन said...

ये हुई न बात. बंदरों से कोई नाराज़गी नहीं, आस्ट्रेलियाई बीयरम्मा से है.

Udan Tashtari said...

आभार इस वृतांत के लिए.

sidheshwer said...

टुन्नेश्वरी और बीयरम्मा !!
पहली वाली देवी तो नाम से अपने ही कुल की दीक्खे हैं-काम को गोली मारो जी !
दूसरी से भी की कम्मा.

*****बाबू जी इसे कहते हैं पहली तोड़ की पोस्ट!!

आशीष said...

वाह जी..जयपुर में रहने के बावजूद मैं इस नजर से नहीं देख पाया।

ANIL YADAV said...

गिर्राट। भोत दिन बाद संवेदना की रोड पर कबाड़ी का ठेला बिना ब्रेक के चला। जय हो।

नीरज गोस्वामी said...

अशोक जी मैं तो हाथ में गंगा जल लेकर ये कह सकता हूँ की इतना दिलचस्प यात्रा वृतांत मैंने बरसों में नहीं पढ़ा...नाहरगढ़ से जयपुर बहुत खूबसूरत दीखता है...मैंने अब तक सिर्फ़ ये ही देखा सुना था लेकिन आप की दृष्टि कमाल की है...और लेखन शैली...जबरदस्त...वाह.

नीरज

मुनीश ( munish ) said...

mast mahaul!

Anita Rathi said...

DIS-APPOINTING POST....


I think you shall not describe this under the Title name of 'Nahargah Fort'

this is your travel experience which might sound good to anybody as it is written in such a ironic way.

Treat this comment as my suggestion only , this note on Nahargarh Fort' reflects on the hangouts and the activities at the fort not about the fort. I think Spoiling the Image of Historical Place is not good by presenting it in such rude way. .