Monday, February 23, 2009

सपनों की होती है हृदय की भाषा



अनीता वर्मा जी से सम्बन्धित पिछली पोस्ट में मैंने आपको बताया था कि दो-तीन साल पहले उनका बहुत बड़ा ऑपरेशन हुआ था. उस भीषण सर्जरी में काफ़ी समय तक उनके हृदय को देह से अलग निकाल कर रख दिया गया था.

ज़रा देखिये सतत आशावान अनीता जी उस विकट अनुभव से भी जीवन निकाल कर कैसे खींच लाती हैं. शायद इसी वजह से वे मुझे आज लिख रहे कवियों की जमात में बहुत बहुत ज़रूरी लगती हैं अपने लिए.

पढ़िये उनके दूसरे संग्रह 'रोशनी के रास्ते पर' से एक और कविता:


हृदय

इसकी भाषा सपनों की है
चला जाता है दूर
दूसरे हृदयों की खोज में
अदृश्य खिड़कियां खोलता हुआ
दुख की छाया में बैठकर सुस्ताता
हवा में पिरोता रोशनी के फूल

अभी यह मेरे भीतर था
ब्रह्मांड से एकाकार बजता हुआ
टिक-टिक टक-टक मेरा समय

अब यह टेबल पर रखा है
मुझसे बाहर और अलग
कुछ अनजान हाथों में
दिल के माहिर रफ़ूगरों के बीच
जीवन की आभा दमकती है
इसके रक्तहीन मुख पर
इस तरह वह जीता है मेरे बग़ैर
खुली हवा में सांस लेता हुआ
देखता हुआ रंग, स्पर्श और चेहरे

किसी टेबल पर रखा है मेरा अकेलापन
मैं एक कोने में वह दूसरे कोने में
बेसुध होते हुए भी मैं इन्तज़ार करती हूं
उसके लौटने का
अंधेरे में टटोलती हूं अपना आसपास
वह भेजता है अपनी धड़कन
दूर कहीं ब्रह्मांड से.

9 comments:

naveen kumar naithani said...

achi kavita lagaayee hai.dehradun mein kuch varsh poorva brahndevji ne bhee kuch alag tarah ka kam kiyaa tha.ve mooltah photographer the.unhone apani deh mein pace-maker plant karane ke drishya kaid kiye the.shaayad ve photographs ab bji khuraanaaji ke pas hon.
dil ke maahir rafoogaron ko kavitaa mein utaarane ke liye anitaji ko badhaayee

अनिल कान्त : said...

बहुत अच्छी कविता है .....अच्छी लगी ..

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

संगीता पुरी said...

बहुत अच्‍छी लगी यह कविता...महा शिव रात्रि की बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं..

Anurag Harsh said...

वो जिससे जीवन है
वो जिससे संसार है
वो ह़दय दूर कैसे हो सकता है
वो आपके अंदर ही था
आप बेसुध थे
उसे दूर समझ रहे थे
वो कविता लिख रहा था
आप ढूंढ रहे थे।

रंजना said...

मर्म को स्पर्श करती सुंदर अभिव्यक्ति.....वाह

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

अच्छी कविता.

trinetra said...

bahut hi jabardast kavitaen hain. Apne hee hridaya ko apne se bahar dekhna aur brahmand se usmein dharkano ka aana ek ati samvedansheel ghatna hai.Jo kavi ke yahaan hi ghat sakti hai aur itni gahanta ke saath use jeevit kavita mein badal sakti hai. kavita shayad sareer mein naheen balki pure aaspass mein tak-tak-tik-tik karti rahati hai. samvedma ki parakashtha se bhi paar ki anubhuti hai yah. Jeete raho ashok apni iss nayab post ke liye.

ravindra vyas said...

अनिता जी की कुछ और कविताएं पढ़वाइये न।

pallavi said...

kya kabhi hua hriday jeevan se door,kya feeka pada kabhi sindoor, vo to hum tum hain jo jeevan me rah k door kahin kho jate hain, jo pura na ho jagte hue unhe pane sapno me kho jate hain.