Saturday, February 28, 2009

प्रेमपत्रों के परिवार की ज़रूरतों के मांगपत्रों में बदल जाने की नियति

नवीन जोशी जी के उपन्यास से आपने कल एक अंश पढ़ा था जिसमें पीतांबर की पत्नी जानकी की लिखी प्रेमपाती को विवशताबद्ध पुष्कर बांचता है. इस प्रकरण का बाकी का हिस्सा ये रहा. कबाड़ख़ाना नवीन दा का आभारी है कि उन्होंने अपनी पुस्तक के इन हिस्सों को इस्तेमाल करने की अनुमति प्रदान की:



...
"अच्छा प्राणनाथ, अब लिखना बन्द करती हूं. छिलुका भी बुझ रहा है. कलम की गलती माफ़ करना. पत्र का जवाब आप ही आना.

आपकी प्राणप्यारी

जानकी"

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इसके बाद भी कागज़ में ऊपर-नीचे. दाएं-बाएं जो जगह बच रहती, वहां कुछ न कुछ लिखा रहता -

"यहां क्या लिखा है, ये तिरछा-तिरछा?" चिठ्ठी का बारीक मुआयना करता हुआ पीतांबर पूछता और उसे पढ़ना पड़ता.

ह्यूं पड़ो बरफ सुवा, ह्यूं पड़ो बरफ
पंछी हिनी उड़ी ऊनी, मैं तेरी तरफ


(मेरे प्रिय, यहां पड़ रही है बर्फ़. पंछी होती तो चली आती मैं तुम्हारी तरफ़!)

काटन्या-काटन्या पौली ऊंछौ, चौमासी को बन
बगन्या पाणी थमी जांछौ, नी थामीनो मन.


(बहते पानी को तो थामा जा सकता है लेकिन मन को थामना असंभव है.)

और इन चिठ्ठियों के जवाब में पीतांबर क्या लिखवाता था?

किसी दोपहर वह आता और पुष्कर से लिखवाता - "सिद्धी सिरी सर्वोपमायोग्य पूज्य इजा-बाबू को पैर छूकर नमस्कार. भाई बहनों को प्यार. मैं यहां राजी-खुशी हूं. आप सबकी कुशल के लिए सुबह-शाम भगवती मां से हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूं. एक सौ रुपए का मनीआर्डर कुछ दिन पहले किया था. मिलने पर चिठ्ठी देना ..."

"पीतांबर दा, भाभी के लिए कुछ नहीं लिखाएगा? पुष्कर पूछता.

"क्या लिखाऊं?" वह भोलेपन से कहता - आशक-कुशल तो हो गई."

"लेकिन वह तो तुम्हें बराबर इतनी चिठ्ठियां लिखती है. इतनी-इतनी बातें."

पीतांबर चुप लगा जाता, मग्र उसका चेहरा उसके मन की चुगली करने लगता. पुष्कर सोचा करता कि भाइयों के कुर्ते-पाजामे, बहनों के फ़्राक, मां की धोती, पिता की वास्कट और हर महीने एक मनीआर्डर का जुगाड़ करते हुए जवान पीतांबर के पास पत्नी की ऐसी चिठ्ठियों के कहां और कितनी जगह होती होगी?

कुछ वर्ष बाद एक साल जाड़ों में पीताम्बर अपनी घरवाली को लखनऊ लाया था. तब पुष्कर ने उसे देखा था और यह कल्पना करना भी मुश्किल हो गया था कि कुछ वर्ष पहले अपने पति को वैसे प्रेम पत्र लिखने वाली जवान पत्नी का चेहरा कैसा रहा होगा. पीतांबर उसे लखनऊ लाया था, घुमाने फिराने नहीं इलाज कराने. तब वह दो छोटे-छोटे बच्चों की मां थी और सूखकर पीली पड़ गई थी. पीतांबर ने उसे सरकारी अस्पताल में और प्राइवेट में भी दिखाया. लेकिन जब दो महीने लखनऊ रहकर वह पहाड़ के लिए रवाना हुई, तब भी उसके चेहरे का पीलापन और रातों का बुखार बरकरार था. धूप, आराम और साबुन-पानी से धोने के बाद तेल के लेप से एड़ियों की खतरनाक बिवाई ज़रूर कुछ भर गई थी.

वे उत्कट प्रेमपत्र कब के आशल-कुशल के लेखे और परिवार की ज़रूरतों के मांगपत्रों में बदल चुके थे.

4 comments:

अंशुमाली रस्तोगी said...

इस अंश को भी पढ़ लिया। भाई, हम आपके आभारी हैं कि आपने पुस्तक का अंश यहां उपलब्ध करवाया।

vijay gaur/विजय गौड़ said...

नवीन जोशी के उपन्यास दावानल पर http://likhoyahanvahan.blogspot.com/2009/02/blog-post_27.htmlसमीक्षात्मक टिप्पणी यहां पढ सकते हैं।

Ashok Pande said...

धन्यवाद विजय भाई!

Ek ziddi dhun said...

post khatm hote-hote hila gayi, varna main prempatr ka lutf le raha tha