Saturday, December 5, 2009

काने तिवाड़ी के धान 1

हमारे इधर पहाड़ों में तिवारी लोग तिवाड़ी कहे जाते हैं. गगास नदी के किनारे बसे एक गाँव में एक किसी तिवाड़ी का घर था. तिवाड़ी काना था यानी उसकी एक आँख फूटी हुई थी. सो गगास नदी के इस छोर से उस छोर तक के गाँवों में उसे काणत्याड़ि यानी काना तिवाड़ी के नाम से ख्याति प्राप्त थी. काणत्याड़ि बहुत साँवला था और हमारे इधर काले ब्राह्मण को बहुत ख़तरनाक माना जाता है. काणत्याड़ि खतरनाक ही नहीं झगड़ालू भी था. हर किसी से झगड़ा कर चुकने के बाद वह पूरी तरह से एकलकट्टू हो गया और गगास नदी से लगे एक खाली खेत में जा बसा. इस खेत में लम्बे समय से एक भूत रह रहा था और लोग उस से डरा करते थे.

लोग उस भूत से डरते थे ऐसा काणत्याड़ि ने भी सुन रखा था पर सारे गाँव से बैर ले चुकने के बाद उसके पास और कोई चारा नहीं बचा था. इस बेहद उपजाऊ खेत में किसी ज़माने में बढ़िया धान उगा करते थे पर कई पीढ़ियों से छोड़ा होने के कारण अब वह बंजर हो चुका था.

काणत्याड़ि ने मेहनत में कोई कसर नहीं छोड़ी और भूत ने उसे ज़रा भी परेशान नहीं किया. काणत्याड़ि ने सोचा कि भूत-हूत कुछ नहीं होता. गाँव के लोगों का भरम रहा होगा.

बारिशें आते ही बाकी के गाँववालों की तरह काणत्याड़ि ने भी अपने खेत में धान रोपे. सुबह उठकर वह क्या देखता है कि रात में धान के सारे पौध कोई उल्टे रोप गया है. काणत्याड़ि ने गाँववालों पर ही शक किया और बिना किसी तथ्य की तस्दीक किये एकाध लोगों पर हाथ साफ़ किया. धान दोबारा रोपने के बाद काणत्याड़ि उस रात देर एक पेड़ की ओट में छिपकर इन्तज़ार करता रहा कि कोई आए और उसे रंगे हाथों पकड़कर उसकी ठुकाई की जाए.

जब भोर होने को हुई तो काणत्याड़ि की आँख लग गई. आँख खुली तो सूरज चढ़ आया था और सारे पौध उलटे पड़े थे. यही क्रम कई दिनों तक चलता रहा.

अपनी मेहनत को यूँ व्यर्थ जाता देखना काणत्याड़ि की बरदाश्त से बाहर हो चुका था और उसने तय कर लिया कि किसी भी कीमत पर सोएगा नहीं. तब जाकर अगली भोर उसने देखा कि एक छहफुटा चुटियाधारी धान की पौधों को बिजली की गति से उलटाए दे रहा है. ग़ुस्से से आगबबूला काणत्याड़ि ने अचानक नोटिस किया कि चुटियाधारी के पैर उल्टी दिशा में मुड़े हुए थे. यानी चुटियाधारी और कोई नहीं गगास का भिसौण के नाम से कुख्यात वही भूत था जो उनके खेत को लगा हुआ था. एकबारगी तो काणत्याड़ि की हवा डर के मारे सरक गई पर अगले ही पल उसे पिछले कई महीनों की अपनी मेहनत याद आई और उसका नैसर्गिक गुस्सा फट पड़ा.

उसने पीछे से जाकर गगास के भिसौण की चुटिया थामी और कीचड़ में पटक डाला. भिसौण को मनुष्यों द्वारा इस प्रकार का व्यवहार किए जाने की आदत न थी. वे तो उसके सामने पड़ते ही सूखे पत्ते की तरह काँपने लगते थे और डर के मारे उनकी घिग्घी बंध जाती थी.

वह जब तक सम्हलता काणत्याड़ि ने अपने पिता से सीखी पहलवानी की कला का ज़ोर भिसौण पर आजमाने के साथ साथ उस पर लात घूंसों की बरसात चालू कर दी. भिसौण भी खासा ताकतवर था और किसी तरह काणत्याड़ि की दबोच से बचकर बग्वालीपोखर नामक गाँव की दिशा में भागा. काणत्याड़ि ने कुछेक मील उसका पीछा किया और दोबारा उसकी चुटिया थामकर ठुकाई कार्यक्रम चालू कर दिया.

काणत्याड़ि की दबोच से बच भागने का सिलसिला सात दिन सात रात चलता रहा और इस चक्कर में वे दोनों काली कुमाऊं के आधे इलाके का भ्रमण कर आए. सातवीं रात वे वापस काणत्याड़ि के खेत में थे. बुरी तरह पिट चुकने के बाद भिसौण पस्त पड़ चुका था और उसका अंग अंग दुखने लगा था. अन्ततः रोते हुए उसने छोड़ देने की मिन्नतें करना शुरू किया. छोड़ देने के ऐवज में काणत्याड़ि ने उससे वायदा लिया कि वह पलटकर उसके खेत का मुंह नहीं देखेगा. भिसौण ने जार जार रोते हुए यहाँ तक कह दिया कि काणत्याड़ि के खेत क्या अब तो वह उस पट्टी पल्ला अट्ठागुल्ली के किसी भी गाँव का रुख़ नहीं करेगा.

इतनी लम्बी कुश्ती के बाद काणत्याड़ि के खेत में उस साल धान बहुत कम उगा था पर उगा. और यह अलग बात है कि इस कुश्ती के प्रत्यक्षदर्शी गाँववालों ने काणत्याड़ि से अब भी बात करना बन्द ही रखा पर भीषण मेहनत से प्राप्त होने वाली किसी भी चीज़ को काने तिवाड़ी के धान कहने की परम्परा शुरू हो गई.

पट्टी पल्ला अट्ठागुल्ली के लोग अब किसी भी तरह के भूत प्रेत के सामने आने पर खुद को काणत्याड़ि का सगा सम्बन्धी बतलाने में किसी तरह का गुरेज़ नहीं करते थे. नतीज़तन सारी पट्टी सभी तरह के भिसौणों, टोलों और एड़ियों से मुक्त हो गई. टोलों में भूतों की पार्टी हाथों में मशालें लेकर मनुष्यों को रातों को डराने का काम किया करती थी जबकि एड़ि नाम से जाने जाने वाले भूत लोग स्वाभावतः कमीने और काइयां हुआ करते थे. उल्टे ही पैरों वाली अनिन्द्य सुन्दरी आंचरियां इस प्रेतसमुदाय में ग्लैमर का तड़का लगाने का काम किया करती थीं. आंचरियों के बाबत काणत्याड़ि और भिसौण के दरम्यान क्या महासन्धि हुई इस बाबत कोई आधिकारिक साक्ष्य नहीं मिलते.

यह दीगर है कि इतने भूत-प्रेतों का पट्टी पल्ला अट्ठागुल्ली में रह रहे देवता भी बाल बांका नहीं कर सके थे.

हिन्दू धर्म में बतलाए जाने वाले तमाम तैंतीस करोड़ देवता तो इस सो कॉल्ड देवभूमि में पहले से ही रह रहे थे पर जिस तरह गली-मोहल्ले में उत्पात मचाने वाले हर दुकड़िया नवगुंडत्वप्राप्त लौंडे को सीधा करने को माननीय रक्षामन्त्री या फ़ौज के जरनील नहीं आ सकते उसी तरह एड़ि-आंचरि जैसे छोटे टटपुंजिया भूतों की सुताई करने को भोले बाबा से रिक्वेस्ट थोड़े ही की जा सकती है कि बाबा पप्पू के भाई ने मेरा बल्ला चुरा लिया है. उसके लिए तो मुन्नन भाई या कल्लू दादा टाइप के देवताओं की ज़रूरत पड़ती है क्योंकि वे घटनास्थल की लोकेल और जुगराफ़िये से भली भांति परिचित होते हैं और समय और ज़रूरत के हिसाब से लोकल सपोर्ट भी जुटा सकते हैं.

गगास के भिसौण का आतंक ख़त्म हो जाने के बाद बहुत सालों तक शान्ति बनी रही. काणत्याड़ि का लड़का अपने बाप जैसा वीर तो न था चतुर और कामचोर ज़रूर था. उसने एक मरे बैल की पूंछ के बालों की लट बनाकर अपने ख़ानदानी बक्से में छिपा कर रख ली और एक बार गाँव में पंचायत लगने पर जब चोरी का एक आरोपी अपना अपराध स्वीकार करने से मुकर रहा था तो काणत्याड़ि के बेटे ने सरपंच से मुखातिब हो कर कहा: “पधानज्यू, अगर ये साला गगास के भिसौणे की चुटिया को छू कर कसम खा ले कि इसने चोरी नहीं की है तो आप इसे छोड़ दोगे ना!”

गगास के भिसौणे की चुटिया का ज़िक्र सुनते ही वहाँ मौजूद तमाम लोगों में झुरझुरी सी मची. काणत्याड़ि के कारनामे को अभी तक लोग भूले नहीं थे. सरपंच के जवाब की प्रतीक्षा किये बिना काणत्याड़ि के बेटे ने अपने घर का रुख किया. मरता क्या न करता, सरपंच और चोर और पंच और ग्रामीण सारे के सारे उसके पीछे आने लगे. तब बहुत ठेटर-नौटंकी के बाद काणत्याड़ि के बेटे ने बक्से से बैल की पूंछ निकाली और चोर से कहा: ” है हिम्मत तो इसको देखकर खा कसम कि तूने चोरी नहीं की है. झूठ बोलेगा तो गगास के मसाण से बुला लाऊंगा भिसौणे को.”

चोर का रोना, चोरी के शिकार ग्रामीण का काणत्याड़ि के बेटे के पैर पड़ना और “त्याड़ज्य़ू की जै हो” के नारे का लगना एक साथ हुआ. कालान्तर में काणत्याड़ि के नाम पर एक मन्दिर गगास किनारे प्रतिष्ठित हुआ और काणत्याड़ि के बेटे ने मन्दिर के आचार्य की गद्दी सम्हाली. यूं काणत्याड़ि के कामचोर कुनबे के लिए फ़ोकट की रोटी का जुगाड़ बैठा.

कई पीढ़ियों बाद तैंतीस करोड़ देवताओं की वार्षिक मीटिंग में जब इस वाकये के ज़िक्र का नम्बर लगा तो पाया गया कि हिमालय की पंचचूली चोटियों की गुरुस्थली में पाँच गुरुभाई देवतावृत्ति की अप्रेन्टिसशिप का फाइनल परचा पास कर चुके हैं और यह भी कि जहाँ तैंतीस करोड़ वहाँ तैंतीस करोड़ पाँच भी चल जाएंगे. राउन्ड फिगर में तो संख्या उतनी ही रहनी है. नियत यह किया जा चुका था कि गगास किनारे हो रही इस अनियमितता को यही पाँच गुरुभाई काबू में लाएंगे.

क्रमशः गोल्ल, गंगनाथ, भोला, हरू और सैम के नाम से जाने जाने वाले ये पाँच भाई अपनी बहादुरी और अक्लमन्दी के चलते अपने जीवनकाल में ही काली कुमाऊं पाली पछाऊं के पाँच लोकदेवताओं के तौर पर प्रतिष्ठित हुए. ऊपर से मिले हुए ऑर्डर अलबत्ता अब तक पूरे नहीं हो सके थे.

देवता बन चुकने के बाद भी इनका मन एक जगह नहीं रमता था और अपनी वार्षिक यात्राओं के लिए ये लोग वसन्त के महीने में अलग अलग जगहों से पंचचूली की तरफ निकल जाया करते थे. तो ऐसे ही वसन्त के एक दिन जब मंजरियों, बौर, फूल, समीर, सुरम्य इत्यादि का ठाठ बंधा हुआ था ये पाँचों एक पूर्वनिश्चित स्पॉट पर मिले. हालचाल लेने के बाद सब ने अपने बैरागी मन में उठ रही मनोरंजन की तीव्र इच्छा के बाबत स्टेटमेन्ट जारी किए. आसपास पड़ी धूलि को मुठ्ठी में उठाकर उनमें से एक ने मन्त्रोच्चर किया और धूलि को पटककर वापस ज़मीन पर दे मारा.


(जारी)

8 comments:

मुनीश ( munish ) said...

gods and ghosts dwell together in all Himalayan states . Other indian states or haloween celebrating countries,however, should take note of this account of the origin of some ghosts to understand the origin of their respective ghosts.

चंदन कुमार झा said...

तो ऐसे भगवान और भूत बनते थे या बनाये जाते थे / है ।
और शब्द बनने की प्रक्रिया-

तिवारी = तिवाड़ी = काना + तिवाड़ी = काणत्याड़ि

शायद ऐसे ही बनते है शब्द ।

sanjay vyas said...

पुराने राजस्थानी बातपोशों की याद दिलाता गद्य.एक ऐसा गद्य लिख पाने की हसरत जाने कबसे मन में दबाये हूँ.खैर आप बात मांडते रहिये हुंकारा हम देते रहेंगे.
भिसौण नाम पर ध्यान अटका.पता नहीं ठीक याद है या नहीं, 'कसप' में भी भिसूण रानी का महल आता है. पक्का याद नहीं.भिसूण का मतलब शायद बदसूरत सेहोगा.

लोकेन्द्र बनकोटी said...

Behtareen!! Haste haste pet mein bal pad gaye dajyu!!

अजीत चिश्ती said...

wah , maja aa gya sir zaldi poora karey

महेन said...

अरे दाज्यु ये पुरानी कहानी फिर शुरु कर दी आपने। जितनी बार पढी-सुनी जाये मज़ा वही। ग्रांटी के साथ।

प्रीतीश बारहठ said...

अभी तीखापन कुछ कम लग रहा है।
छोटे और दलित देवताओं के लिये चबूतरों को न भूलें

Mired Mirage said...

वाह, मजा आ गया। मेरे परिवार में भी एक ऐसा किस्सा प्रचलित है। जिसके अनुसार हमें कोई भूत कभी नहीं सता सकता।
घुघूती बासूती