Monday, February 22, 2010

नौ बहारों से तू होली खेलले इस दम 'नज़ीर'।



हिन्द के गुलशन में जब आती है होली की बहार।
जांफिशानी चाही कर जाती है होली की बहार।।

एक तरफ से रंग पड़ता, इक तरफ उड़ता गुलाल।
जिन्दगी की लज्जतें लाती है होली की बहार।।

ज़ाफरानी सजके के चीरा आ मेरे शाकी शिताब।
मुझको तुझ बिन यार तरसाती है होली की बहार।।

तू बगल में हो जो प्यारे रंग में भीगा हुआ।
तब तो मुझको यार खुश आती है होली की बहार।।

और जो हो दूर या कुछ ख़फा हो हमसे मियाँ।
तो , तो काफ़िर हो जिसे भाती है होली की बहार।।

नौ बहारों से तू होली खेलले इस दम 'नज़ीर'।
फिर बरस दिन के ऊपर जाती है होली की बहार।।

* नज़ीर अकबराबादी

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( चित्र : डा० नार्मन लुईस की कलाकृति , साभार )

7 comments:

अमिताभ मीत said...

और जो हो दूर या कुछ ख़फा हो हमसे मियाँ।
तो , तो काफ़िर हो जिसे भाती है होली की बहार।।

वाह साहब वाह !! दिल ख़ुश कर दिया सुबह सुबह ...... जवाब नहीं नज़ीर अकबराबादी का.

Udan Tashtari said...

वाह वाह!! आनन्दम आनन्दम!!

नज़ीर अकबराबादी साहेब को पढ़वाने के लिए आभार!!

Udan Tashtari said...

वाह वाह!! आनन्दम आनन्दम!!

नज़ीर अकबराबादी साहेब को पढ़वाने के लिए आभार!!

Suman said...

हिन्द के गुलशन में जब आती है होली की बहार।
जांफिशानी चाही कर जाती है होली की बहार.nice

Ek ziddi dhun said...

kai kabadi jag gaye hain.shukr hai. varna to akela sipahimorcha sambhale hue tha

Ek ziddi dhun said...

ashok\sidheshvar bandhujan kyun na ek post holi ki paintings ki dee jay. ye paintings dekhkar khyal aya. ek hussain ki bhi lagayee thimaine holi par.

मनीषा पांडे said...

होली का अच्‍छा समा बंध रहा है हुजूर। कबाड़ियों की जय हो।