Saturday, February 6, 2010

मैं पिता हूँ दो चिड़ियाओं का


चन्द्रकान्त देवताले देश के मूर्धन्य कवियों में शुमार हैं. उनकी कुछ कविताएं और उन पर वीरेन डंगवाल का एक लम्बा आलेख कबाड़ख़ाने पर पहले भी लगाए जा चुके हैं. उनकी कविताओं के अंग्रेज़ी अनुवादों में मसरूफ़ हूं आजकल.

उनकी कविताएं उड़ान की कविताएं होती हैं और गहरी सम्वेदनाओं की. वे भारतीय मध्यवर्ग की आत्मा की आवाज़ बन कर बोलते हैं और उन्हें बारहा पढ़ते हुए यह अहसास होता है कि इस पाये के कवि हिन्दी में विरले ही बच रहे हैं. उनकी एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूं.


दो लड़कियों का पिता होने से

पपीते के पेड़ की तरह मेरी पत्नी
मैं पिता हूँ
दो चिड़ियाओं का जो चोंच में धान के कनके दबाए
पपीते की गोद में बैठी हैं
सिर्फ़ बेटियों का पिता होने से भर से ही
कितनी हया भर जाती है
शब्दों में
मेरे देश में होता तो है ऐसा
कि फिर धरती को बाँचती हैं
पिता की कवि-आंखें...

बेटियों को गुड़ियों की तरह गोद में खिलाते हैं हाथ
बेटियों का भविष्य सोच बादलों से भर जाता है
कवि का हृदय
एक सुबह पहाड़-सी दिखती हैं बेटियाँ
कलेजा कवि का चट्टान-सा होकर भी थर्राता है
पत्तियों की तरह
और अचानक डर जाता है कवि चिड़ियाओं से
चाहते हुए उन्हें इतना
करते हुए बेहद प्यार।

4 comments:

KESHVENDRA IAS said...

चंद्रकांत देवताले जी की बहुत ही सुंदर और मार्मिक कविता बांटी है हम लोगों से आपने...कविवर के साथ आपको भी बधाई.

sanjay vyas said...

अद्भुत. जैसे मेरे लिए ही लिखी गयीं हैं पंक्तियाँ!

पारुल "पुखराज" said...

चिड़ियाएँ फिर दूर देस
सीसा-सिसक रह जातीं हें
याद कर पिताओं का
मौन प्रेम ....
कविता बाँटने के लिए आभार

सुधीर साहु said...

देवताले जी से अरसे से नहीं मिल पाया, जब से मालवा या मध्‍य प्रदेश छूटा है। आज इस कविता के जरिये उनसे मुलाकात हो गई। मेरी दो बेटियों के लिए मैं भी ऐसी ही एक कविता लिखना चाहता रहा, लिख न पाया। उन्‍होंने मेरा काम कर दिया। मुझमें और मेरे प्रिय (लोकप्रिय) कव‍ि में यही एक फर्क है।
सुधीर साहु