Friday, April 18, 2008

मां पर नहीं लिख सकता कविता

मां पर नहीं लिख सकता कविता

मां के लिए संभव नहीं होगी मुझसे कविता
अमर चिऊंटियों का एक दस्ता
मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता है
मां वहां हर रोज़ चुटकी - दो- चुटकी आटा डाल जाती है

मैं जब भी सोचना शुरू करता हूं
यह किस तरह होता होगा
घट्टी पीसने की आवाज़
मुझे घेरने बैठ जाती है
और मैं बैठे-बैठे दूसरी दुनिया में ऊंघने लगता हूं

जब भी कोई मां छिलके उतारकर
चने, मूंगफली या मटर के दाने
नन्हीं हथेलियों पर रख देती है
तब मेरे हाथ अपनी जगह पर
थरथराने लगते हैं

मां ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिये
देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे
और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया

मैंने धरती पर कविता लिखी है
चन्द्रमा को गिटार में बदला है
समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूंगा

मां पर नहीं लिख सकता कविता

-चन्द्रकान्त देवताले जी की यह कविता मांओं पर लिखी गई श्रेष्ठतम कविताओं में से एक है : इस पूरे विश्व के साहित्य में: कहीं भी, कभी भी

9 comments:

Dumuro said...
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Maverick said...

Adbhut! Poora subconscious jaise saakshaat saamne khada ho gaya. Waah!

Geet Chaturvedi said...

मां ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिये
देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे
और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया

बहुत अच्‍छी कविता पोस्ट की है. आभार.

Geet Chaturvedi said...

मां एक नि:शब्‍द कविता है. शब्दों से लिखी गई सारी कविताओं से बड़ी. बच्चे को पालने में वह जो-जो जतन करती है, उस वक़्त वह अपने तरीक़े से शायरी ही तो कर रही होती है.

जोशिम said...

अशोक - बहुत अलग कविता है - शायद अन्दर एक और है - वैसे जैसे तने में पानी शायद, सम्मान, मान, तृप्ति वगैरह - अच्छी लगी - धन्यवाद - मनीष

समर्थ वाशिष्ठ / Samartha Vashishtha said...

कमाल की कविता. अविस्मरणीय!

' मिसिर' said...

श्रेष्ठतम !
माँ के आगे हर शब्द बौना !
अद्भुत !

s.chandrasekhar.india said...

माँ के नज़रिये को समझ पाना, तत्पश्चात शब्दों में ढालना कोई आसान बात नहीं. बहुत खूब अभिव्यक्त किया है आपने...

hareram Sameep said...

maa par likhi yeh kavita ek mahakaavya hai jise baar baar padaa jaayega baar baar iski punarrachana main samaarth yeh ek amar kavita kee shrenee main aati hai..kavi ko prannam..Hareram Sameep