Saturday, July 10, 2010

वेदनाओं के रंग में हैं प्रेम की गहराईयां

जीवनानुभव की दशा और दिशा ही रचनात्मकता के मापदंड को नई ऊंचाई के साथ एक गहराई प्रदान करती है। सिर्फ व्यक्ति की चेतना ही नहीं बल्कि अंतर्द्वंद्व की मुकम्मल तस्वीर शब्दों के जरिए कविता का रूप लेती है। पवन करण की कवितायें ऐसी ही भट्ठी में तपकर सामने आती हैं जिसका विस्तृत फलक नए आयाम स्थापित करने में सफल होता है।

कविता संग्रह ‘अस्पताल के बाहर टेलीफोन’ की कविताओं में जो सामाजिक, पारिवारिक, राजनीतिक सोच दिखाई देती है वह वर्तमान के विरले कवियों में दिखाई देता है। ‘चांद के बारे में’ कविता में पवन करण लिखते हैं : ‘विदा लेते हुए हमेशा की तरह कहेगा/हमारी इस फाकामस्ती को जो लोग आवारागर्दी कहते हैं/ दरअसल वे जीवन के बारे में नहीं समझते कुछ भी/उन्हें नहीं पता वास्तविकताएं। इसके जरिए न सिर्फ उन्होंने चांद की बातें रखीं है बल्कि यह उनकी भी कहानी है जो हर मां के लिए बस एक ‘चांद’ होता है लेकिन घर से बाहर निकलते ही उनकी कहानी कुछ और हो जाती है। मजदूरों के दर्द को बयां करना मामूली काम नहीं होता लेकिन ‘साइकिल’ उसके बारे में लोगों से काफी कुछ कहना चाहती हैं जिनमें मुंह में जबान नहीं है, शब्द नहीं है। चाहे ‘साइकिल’ हो या ‘गेहूं’ हाशिए से बाहर रह रहे लोगों के दर्द को शब्दों में पिरोकर एक नई शैली हठात ही पाठकों को उद्वेलित होने के लिए मजबूर करती है। ‘स्कूटर’ सामाजिक परिवेश में ईर्ष्या की अभिव्यक्ति का नया मापदंड है, तभी तो वे कहते हैं, ‘हमारे यहां स्कूटर आने की बधाई देने की जगह/उन्होंने हमें स्कूटर के बारे में हिदायतें दीं/जहां भी खड़ा करो, ताला लगाकर खड़ा करना/चोरी चला गया तो दुबारा ले भी नहीं पाआ॓गे/और बीमा वाले भी पूरा पैसा थोड़े ही देते हैं।’ सभी कविताएं समझ के विस्तार की मुकम्मल तस्वीर हैं। ‘रिश्तेदार’, ‘चौथा खंभा’, ‘मकान’ जहां सामाजिक परिवेश की सूक्ष्म वेदनाओं को परिलक्षित करता है वहीं, ‘ये रास्ता जहां पहुंचता है’, ‘हिन्दू’, ‘मुसलमान लड़के’ सांप्रदायिकता की उन काले अध्यायों का रेखाचित्र सामने लाने का काम करता है जिसके लाल रंग से देश की धरती रंजित होती रही है।

पवन करण की कविताओं में सिर्फ सामाजिक या राजनीतिक वेदनाओं के रंग की नहीं दिखाई देते बल्कि प्रेम और इससे इतर दिल की गहराईयां भी शब्दों के जरिए सामने आती हैं। वह लिखते हैं, ‘क्यों लौट रही हो तुम अब जबकि/मेरे पास गुंजाइश ही नहीं कोई/हालांकि प्रेम कभी रहा है तो अब भी होगा/प्रेम बाकी है अब भी/मगर एक चेहरे में इस बीच खोता गया हूं मैं/जैसे कभी खो गया था बाजार में।’ ‘डाकिया’, ‘जनरल डायर और मैं’, ‘मुझ नातवां के बारे में : पांच प्रेम कविताएं’, ‘सरकारी पखाना घर : तीन कविताएं’ अनुभव को एक व्यापक फलक देने का काम करती हैं। ‘अस्पताल के बाहर टेलीफोन’ आम लोगों के दर्द और उनकी करूणा को सामने लाने में सक्षम हैं क्योंकि अस्पताल तो अधिकतर लोग जाते हैं लेकिन वहां की बारीकियों पर किसी की नजर नहीं जाती है।

स्वतंत्र तौर से सोचने और उसे लिख डालने का साहस मायने रखता है क्योंकि बाजार के साथ-साथ राजनीति हर किसी की सोच को इस कदर प्रभावित करती है जिससे बाहर निकलकर एक कवि ही अपनी मनोदशा को सामने रख सकता है। पवन करण की कविताएं सिर्फ शब्दों का घालमेल नहीं है बल्कि आम लोगों की जुबानी और आम शब्दों की कहानी है। अधिकतर कविताओं में कोई खास भी नहीं है, मतलब न तो शब्द और न ही पात्र खास हैं, सभी सामान्य हैं जो हमारे इर्द-गिर्द हैं, लेकिन उनकी आ॓र दृष्टिगत होने का साहस हममें नहीं है। सामान्य दृष्टिसीमा से परे इतिहास के गर्त को उड़ेलते हुए वर्तमान की परत को सामने लाने का काम पवन करण ने अपनी कविताओं में किया है। हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि कथात्मक विन्यास के कारण कई कविताओं की लंबाई थोड़ी वर्णात्मक हो गई है, हालांकि पवन करण की कविताओं की यही तो खासियत है जिससे  अंतर्द्वंद्व की उमड़ती-घुमड़ती दुनिया शब्दों में पिरोकर सामने आती है.

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किताब – अस्पताल के बाहर टेलीफोन (कविता संग्रह) / कवि – पवन करण
प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली / मूल्य – 150 रुपए / पृष्ठ - 128

5 comments:

sidheshwer said...

बढ़िया किताब की बढिया समीक्षा!

प्रभात रंजन said...

achhi review hai. pawanji ki kavitayen mujhe bahut priya rahi hain.

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी गहरी बात कह गये ।

kailash said...

achchi, dil ko chchu lene vali kavita ke kavi ki kitab jarur dekhenge

बाबुषा said...

औपन्यासिक होती हैं उनकी कवितायेँ ! कई बार 'बतकही' वाला अंदाज़ ! लेकिन बेहद बोल्ड. अगर आप उनकी बोल्डनेस देखना चाहते हैं तो 'स्त्री मेरे भीतर' ज़रूर पढ़ें.