Wednesday, July 14, 2010

मिलान कुंदेरा के ( निजी ) शब्दकोश से कुछ शब्द


                                 


मिलान कुंदेरा की किताब 'द आर्ट आफ़ द नावेल' में एक अध्याय है -'सिक्स्टी -थ्री वर्डस'।. यह एक कथाकार के निजी शब्दकोश जैसा है। इसमें शामिल किए गए तिरसठ शब्द वे शब्द हैं जो उसकी कथाकृतियों में प्राय: व्यवहृत होते रहे हैं या फिर इन्हें वे शब्द कहा जा सकता है जिनके माध्यम से कृति को समझा जा सकता है। दुनिया भर के तमाम शब्दकोशों के होते हुए इसकी जरूरत क्यों आन पड़ी? इस 'शब्दकोश' की भूमिका या पूर्वकथन में लेखक ने अनुवाद और अनुवादकों को लेकर कुछ बातें कही हैं :

" १९६८ और ६९ में 'द जोक' का पश्चिम की सभी भाषाओं में अनुवाद हुआ। आश्चर्य तो तब हुआ जब फ्रांस के एक अनुवादक ने मेरी शैली की सजावट करते हुए उपन्यास का पुनर्लेखन कर दिया। इंगलैंड में प्रकाशक ने बहुत से महत्वपूर्णस और जरूरी परिच्छेदों को उड़ा दिया,और एक तरह से यह दोबारा लिख दिया गया। एक अन्य देश में मैं एक ऐसे अनुवादक से मिला जिसे चेक भाषा का एक भी शब्द नहीं आता था। जब मैंने यह पूछा - 'तो तुमने इसका अनुवाद कैसे किया?' क्या ही विलक्षण और मासूम उत्तर था उसका - 'दिल से' और उसने अपने बटुए से मेरी तस्वीर निकाल कर दिखला दी। वह व्यक्ति इतना प्रेमिल और सौहार्द्रपूर्ण था कि मुझे लगभग विश्वास करना पड़ा कि हृदय की टेलीपैथी या इसी तरह के किसी दूसरे उपाय से अनुवाद भी किया जा सकता है।"

कुंदेरा आगे बताते है कि इसी तरह और भी कई बातें हुईं और मुझे अपनी ही कृतियों के अनुवाद पढ़कर यह पता लगाना पड़ा कि अब वे वास्तव में कैसी हैं तथा उनकी काया में अब कितना मेरा लिखा / कहा हुआ विद्यमान है। यह एक तरह से जंगली भेड़ों के झुंड में से अपनी वाली भेड़ को खोज निकालने जैसा काम है। इस तरह के काम में गड़रिया तो परेशान होता है लेकिन दूसरे लोग हँसी उड़ाते हैं। आइए उन्हीं के शब्दों इस बात का अगला सिरा देखते हैं :

" मुझे आशंका है इस गड़रिए की 'हुनरमंदी' को देखते हुए मेरे मित्र और 'ला देबात' पत्रिका के संपादक पियरे नोरा ने बहुत उदार सलाह देते कहा कि - देखो, कुछ समय के लिए तुम इस यंत्रणा को भूल जाओ और मेरे लिए  भी लिखना फिलहाल मुल्तवी कर दो। इन अनुवादों ने तुम्हारे ऊपर एक तरह से यह दबाव बनाया है कि तुम अपने लिखे एक - एक शब्द के बारे में गंभीरता से सोचो। अपने लिए एक निजी शब्दकोश का निर्माण करो। अपने उपन्यासों के लिए शब्दकोश बनाओ। इसमें अपने बीज शब्दों, समस्यामूलक शब्दों और प्यारे शब्दों को स्थान दो। तो लिजिए ये रहे...."

मिलान कुंदेरा का यह शब्दकोश कोई आम शब्दकोश नहीं है। यह एक लेखक की संवेदना का संवहन - संचरण करने वाले माध्यम / प्रतीक की एक पड़ताल और परख है। इसमें शब्द तो हैं लेकिन परंपरागत अर्थों में अर्थ नहीं हैं। यह एक तरह से एक लेखक की उन चाभियों का गुच्छा है जिससे वह कथानक और चरित्रों की रहस्यमयी दुनिया के कपाटों पर लगे ताले खोलने का उपक्रम करता है। तो , आइए आज इन तिरसठ शब्दों में से चुने हुए केवल तीन शब्द और उनके बाबत लिखे गए अर्थों को देखते हैं:

* हैट ( Hat )  : जादुई वस्तु। मैं एक सपना याद करता हूँ : दसेक साल का एक लड़का काला हैट पहले तालाब में कूद जाता है। लोग उस डूबते हुए को बचाते हैं। हैट अब भी उसके सिर पर शोभायमान है।

** हैटस्टैंड ( Hatstand ) : जादुई वस्तु। 'द जोक ' में लुडविक को चिन्ता होती है कि कहीं हेलेना ने स्वयं को खत्म तो नहीं कर लिया है। इसी दौरान उसे एक हैटस्टैंड दिखाई दे जाता है। " तीन पैरों पर टिकी हुई धातु की एक राड और धतु की ही तीन शाखाओं में विभक्त। चूँकि उस पर कोट आदि नहीं टँगे रहते हैं अत: यह एक इंसान की तरह दिखाई देता है - अनाथ इंसान की तरह। यह धातुई नग्नता है ,फूहड़पन और उत्सुकता में बाँहे पसारे।" " समर्पण करने को तैयार एक दुर्बल सैनिक की तरह"।  मैंने 'द जोक' के आवरण पर हैटस्टैंड लगाने की आलोचना की थी।

*** अक्षर ( Letters ) : वे पुस्तकों में दिन - प्रतिदिन छोटे और लगातार छोटे होते जा रहे हैं। मैं शनै: - शनै: साहित्य की मृत्यु की कल्पना करता हूँ - किसी के संज्ञान में आए बगैर। टंकण सिकुड़ता जा रहा है जब तक कि वह अदृश्य न हो जाय।
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मिलान कुंदेरा जब अपने शब्दकोश के निर्माण के लगभग बीचोबीच में थे तब उन्होंने उनचासवें स्थान पर एक एंट्री की है ; आक्तावियो। यह न तो बीज शब्द है , न समस्यामूलक शब्द बल्कि यह वैसा ही शब्द है जिसे भूमिका में 'प्यारे शब्द' कहा गया है। इस प्यारे शब्द और कुछ अन्य शब्दों के बारे में आगे..फिर.. ।

6 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

रोचक है शब्दों का यह लगाव।

मुनीश ( munish ) said...

Rochak maal !

Nisha said...

rochak lekh va shabdo ki paribhasha!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आस्था के आयामों को बल प्रदान करता हुआ यह आलेख बहुत ही सुखद और सुन्दर रहा!

अविनाश वाचस्पति said...

आज दिनांक 22 जुलाई 2010 के दैनिक जनसत्‍ता में संपादकीय पेज 6 पर समांतर स्‍तंभ में आपकी यह पोस्‍ट अपने कुछ शब्‍द शीर्षक से प्रकाशित हुई है, बधाई। स्‍कैनबिम्‍ब देखने के लिए जनसत्‍ता पर क्लिक कर सकते हैं। कोई कठिनाई आने पर मुझसे संपर्क कर लें।

iqbal abhimanyu said...

कुंदेरा को पढ़ना शुरू किया है और बहुत पसंद हैं, अब यह किताब भी पढ़ डालूँगा ढूंढ- ढाढ कर