Friday, July 23, 2010

एक दोस्त की आत्मकथा - ५

जून १९४१ में नैनीताल वापसी

जून के पहले हफ़्ते के आसपास मैं वापस नैनीताल पहुंचा. हमारे हाईस्कूल का परिणाम आ चुका था. ३३ छात्रों की कक्षा में औसत से ज़रा ही ऊपर रहने वाले मैंने अच्छे नम्बरों से सेकेन्ड क्लास पाई थी. अब मेरी प्राथमिकता अपने भविष्य को लेकर थी, किस कॉलेज में जाना है, कहां रहना है वगैरह. चूंकि मुझे रास्ता दिखाने वाला कोई न था, सारे फ़ैसले मुझे खुद ही लेने थे.

जैसा कि मैंने पहले बताया बाबू ने मुझे लखनऊ जाकर ओवरसीयर का कोर्स करने की सलाह दी थी. अगर मैं उनकी इच्छा का अनुसरण करता भी तो मुझे लखनऊ ले जाने वाला कोई न था. इसके अलावा पता नहीं किन वजहों से मैं डॉक्टर बनना चाहता था जबकि हमारे परिवार में कोई भी डॉक्टर नहीं हुआ था. इसके अलावा चार साल की पढ़ाई का खर्च उठाने के कोई साधन भी न थे. मैं जासूस भी बनना चाहता था, इसकी वजह यह थी कि स्कूल के दिनों में मैंने मिस्टर ब्लेक के कई हिन्दी उपन्यास पढ़ रखे थे जिनमें मुख्य नायक मिस्टर ब्लेक अपराधियों को पकड़ा करता था. मैं अंग्रेज़ी का पत्रकार भी बनना चाहता था. यह भी एक अनाथ बच्चे के किसी हवाई किले में रहने जैसा स्वप्न था.

सारी बातों को ध्यान में रखकर मैंने आखिरकार अल्मोड़ा के सरकारी इन्टर कॉलेज में विज्ञान और जीवविज्ञान के साथ इन्टरमीडियेट में दाखिला लेने का फ़ैसला किया. यह इस वजह से हुआ कि प्राइमरी स्कूल के समय से लगातार मेरे साथ रहे एम. एल. गंगोला, जिसके परिवार के साथ मेरे काफ़ी अच्छे सम्बन्ध थे, ने भी ऐसा ही करने का फ़ैसला किया था. इसके अलावा एम. एल. गंगोला के एक नज़दीकी सम्बन्धी श्री चौधरी का अल्मोड़े में अपना घर था जहां हमने रहने का निर्णय लिया. इत्तफ़ाकन सारे कुमाउं डिवीज़न में अल्मोड़ा में ही इकलौता इन्टर कॉलेज था.

अन्ततः एक दोपहर को हम अल्मोड़ा में थे. अगले दिन हमने सरकारी इन्टर कॉलेज में दाखिले के लिए अर्ज़ी लगा दी. भाग्यवश हम दोनों को एक सप्ताह के भीतर दाखिला मिल गया. वहां हमारे रहते हुए गजेसिंह चाचा एक खच्चर भर आटा, चावल और कुछ किलो दाल हर महीने भिजवाया करते थे. श्री चौधरी भले लेकिन सीमित संसाधनों वाले सज्जन थे.

उसके बाद हम दोनों के अलावा दामोदर पाण्डे और वी. डी. काण्डपाल, जो कक्षा तीन से हाईस्कूल तक हमारे साथी रहे थे, एक दिन हमें मिले और हमने एक अलग मकान किराये पर लेकर अपनी रसोई संचालित करने का फ़ैसला किया. हमें तीन कमरों का एक छोटा सा मकान झिझाड़ मोहल्ले में तीन रुपए मासिक किराये पर मिल गया. हमने मिलजुल कर बरतन खरीदे और हमारी रसोइ दो दिनों के भीतर चल पड़ी. काण्डपाल हम में सबसे बड़ा था और गांव से आया था. उसने हमारे लिए इस शर्त पर खाना बनाना मंजूर किया कि वह बरतन नहीं धोएगा. इस काम को करने के लिए हमने खुशी खुशी हामी भर दी.

दोपहरों को हम मिलकर घूमने जाया करते थे. इतवारों को हम अल्मोड़ा के नज़दीक पिकनिक पर जाते. काण्डपाल को छोड़कर हम यदा कदा रात को सिनेमा देखने जाते थे. हमारा स्तर थोड़ा बढ़ गया था और हम साढ़े चार आने यानी अठ्ठाईस पैसे का टिकट लेकर सबसे निचले दर्ज़े से एक ऊपर का टिकट ले सकते थे. हम मिल कर दैनिक अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स भी लिया करते थे जो एक आने (छः पैसे) का मिलता था.

मुझे हर महीने पच्चीस रुपये मिलने लगे थे और इस लिहाज़ से मैं एक सम्पन्न छात्र था. इस तरह काण्डपाल को छोड़कर हम तीनों इन्टरवल के दौरान चाय और हल्का नाश्ता किया करते थे. काण्डपाल आर्ट्स का छात्र था और फ़कत तेरह रुपये पाने वाले चपरासी का पुत्र होने के कारण यह खर्च वहन कर पाने में असमर्थ था. हमें जब भी अवसर मिलता हम उसकी मुफ़्त सेवा किया करते.

मेरी मित्रमण्डली में ककड़ी, गन्ना और सन्तरे चुराने का शौक था और उसे बुरा भी नहीं माना जाता था. वैसे भी हम लोग पड़ोसियों के बगीचों में आधीरात के बाद ही हमला बोला करते थे.

हमारी सर्दी की छुट्टियां जनवरी में होती थीं. जनवरी १९४२ में मैं और काण्डपाल अपने अपने गांवों क्रमशः हड़बाड़ और काण्डा के लिए पैदल निकले. हमने काण्डपाल के पकाए नाश्ते से अपनि यात्रा शुरू की और क्रमशः ३३ और ३६ किलोमीटर का फ़ासला तय करके शाम सात बजे के आसपास अपने ठिकानों पर पहुंचे. मुझे लगता है कि अगर हमने बचपन में छात्रावास में समय नहीं बिताया होता तो ऐसा कर पाने के बारे में सोच सकना भी असम्भव था. छुट्टियों के बाद हम फिर मिले और जुलाई १९४२ तक जीवन ठीकठाक चलता रहा जब हमने दूसरे वर्ष में प्रवेश लिया.

भारत छोड़ो आन्दोलन

इसी समय महात्मा गांधी के नेतृत्व में आज़ादी का आन्दोलन अपने चरम पर पहुंच चुका था, अन्ततः ९ अगस्त का दिन आया जब देश के इस छोर से उस छोर तक अंग्रेज़ो भारत छोड़ो का नारा गूंज उठा.

ज़रूरत से ज़्यादा उत्साही होने के कारण मैं भी उस भीड़ का हिस्सा बन गया जो बस अड्डे की तरफ़ जा रही थी और जिसका मकसद अल्मोड़ा के जिलाधिकारी के दफ़्तर के ऊपर तिरंगा फ़हराना था. उक्त स्टेशन के उत्तर की तरफ़ जिलाधिकारी मिस्टर एटकिंसन को पुलिस दल के साथ हमारी तरफ़ आते देखा गया. वह भीड़ को तितरबितर होने का आदेश दे रहा था. लेकिन लोग आगे बढ़ते चले गए. जब हमारे बीच कुल पचास मीटर का फ़ासला रह गया, जिलाधिकारी ने हवाई फ़ायरिंग शुरू करा दी. लोग इधर उधर भागने लगे और अफ़रातफ़री मच गई.

जिलाधिकारी के दफ़्तर पर तिरंगा फ़हराने पर आमादा भीड़ का धधकता असन्तोष लोगों की बातचीत से स्पष्ट था. जिलाधिकारी का दफ़्तर बस अड्डे से करीब ७५ मीटर की ऊंचाई पर था. प्रदर्शन का विरोध कर रहे प्रशासन ने दफ़्तर की सुरक्षा के भरपूर इन्तज़ाम किए हुए थे. करीब एक घन्टे बाद यूं ही या उत्सुकतावश लोगों ने सड़क पर चलना शुरू कर दिया. मैं भी ऐसा ही कर रहा था और जिलाधिकारी के दफ़्तर को जाने वाले रास्ते पर खड़ा था जब एक खास पल मैंने कुछ झगड़ा सा होता देखा और पाया कि खिलाड़ियों की सी कदकाठी वाले नाथ सा्ह नामक एक आदमी ने एस डी एम ठाकुर मेहरबान सिंह को सशरीर उठा कर नीचे बिच्छू झाड़ियों की दिशा में दे फेंका. सो इस घटना के चन्द प्रत्यक्षदर्शियों में मैं भी था, जो उस दिन शहर भर के लोगों में चर्चा का विषय बनी रही. बाद में कुछ आन्दोलनकारियों को जिनमें हमारे स्कूल के तीन लड़के और नाथ साह शामिल थे, जेल भेज दिया गया. अल्मोड़ा जिले के दूरदराज़ हिस्सों से भी ऐसे ही प्रदर्शनों की सूचनाएं आती रहीं.

अगस्त १९४२ का महीना आमतौर पर अफ़रातफ़री वाला था जिससे हमारी पढ़ाई भी बाधित हुई. एक ही छत के नीचे रह रहे हम तीन दोस्तों ने अल्मोड़ा के एक रेस्टोरेन्ट में साढ़े सात रुपए महीने के हिसाब से खाना शुरू कर दिया. भोजन काफ़ी अच्छा होता था. काण्डपाल अब भी अपना भोजन पहले की तरह पकाया करता था. अक्टूबर १९४३ तक सब कुछ सामान्य रहा.

एक और झटका

सितम्बर १९४२ में एक दिन अल्मोड़ा की बाज़ार में घूमते हुए एक विश्वसनीय सूत्र से मुझे पता चला कि सन्यासी बन चुकने के चार साल बाद बाबू फिर से हल्द्वानी में देखे गए हैं. यह मेरे लिए उत्साहित करने वाली बात भी पर इसके आगे जो पता चला उसे सुनकर मेरा दिल रो पड़ा. बाबू ने एक शादी और कर ली थी. मैंने अपने ऊपर काबू रखा और सूचना देने वाले के सामने अपनी भावनाओं को जाहिर नहीं होने दिया. घर पहुंचकर मैंने बाबू को एक चिठ्ठी लिख कर अपनी दुर्भावनाओं का इज़हार किया. यह पहला पत्र था जो मैंने अपने बाबू को लिखा था. रात को बिस्तर में तमाम गलत बातें याद आती रहीं, रामी मौसी के हाथों पाई सज़ाएं याद आती रहीं और भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में सोचकर डर लगता रहा.

हफ़्ते भर के अन्दर मुझे बाबू का साधारण सा जवाब मिला जिसमें उन्होंने मुझसे अक्टूबर के समय दशहरे में हल्द्वानी आने को लिखा था. मैंने ऐसा किया भी. उनके लिए अपनी पुरानी बुरी भावनाओं के बावजूद मैंने उन्हें पर्याप्त आदर और सम्मान दिया.

उनके सन्यासी जीवन के बारे में होने वाली हमारी अनौपचारिक बातचीत में कि उन्होंने पिछले चार साल किस तरह बिताए थे, बाबू ने मुझे अपनी ताज़ा शादी के बारे में भी मुझे बताया. मैंने उनसे विनम्रतापूर्वक पूछा कि बावजूद अपने पिछले जीवन में की गई भीषण गलतियों को नज़र अन्दाज़ करके, बावजूद हड़बाड़ में बड़ी मां की उपस्थिति के ऐसी कौन सी वजहें थीं जिनके कारण वे वापस दुनियावी समाज में लौट कर आए. बाबू ने अपना पक्ष रखते हुए कहा : "अगर सबकुछ ठीक होने वाला होता तो मैं तुम्हारी मां के साथ नहीं आ सकता था. उन्होंने कहा कि उनके स्वाभाव एक दूसरे से कतई मेल नहीं खाते थे और उनके बीच संवादहीनता की स्थिति थी.

बाद में मैंने उनसे पूछा कि उन्हें दोबारा शादी करने की क्यों सूझी तो उनका जवाब काफ़ी लम्बा था. इस ज़िक्र मैं रामी मौसी और उनकी गतिविधियों के बारे में बताते समय करूंगा.

(जारी)

8 comments:

VICHAAR SHOONYA said...

बाउजी पाठक को भक्त और ग्राहक कि श्रेणी में ही रखें थोडा उसका भी ख्याल करें. अपनी पोस्ट को या तो आठ बजे प्रकाशित किया करें या फिर साढ़े नो बजे के बाद. आप जब अपनी पोस्ट प्रकाशित करते हैं वो मेरे ऑफिस जाने का वक्त होता है. मैं कल भी लेट हो गया था आज भी लेट हो जाऊंगा. ये तो अपनी किस्मत है कि मेरा बॉस और उसका बॉस दोनों उत्तराखंड कि पैदावार ही हैं अतः लेट होने पर ऑफिसर के चरणों में लेटने कि जरुरत नहीं होती. प्रभु अपनी तो अरज है बाकि आपकी इच्छा....

प्रवीण पाण्डेय said...

कथानक गति में है और बिना रुके हुये एक चलचित्र की तरह आँखों के सामने से चल रहा है। आवारगी और संजीदगी, दोनों समान रूप से व्यक्त हैं। आगे की प्रतीक्षा है।

DHARMENDRA LAKHWANI said...

Badiya hai dada, likhte rahiye.

डॉ .अनुराग said...

jari rakhiye....

पारूल said...

शुरू से अभी तक बांधे हुए है ..

वाणी गीत said...

रोचक ..!

मुनीश ( munish ) said...

सारे कथानक में देखने वाली बात ये है कि रिश्ते-नातेदार कितने बढ़िया और मदगार हुआ करते थे . अब ये सिर्फ मरने या शादी के मौके पे जुड़ते हैं और चाह कर भी कोई किसी का मदगार नहीं होता .अगर इनके रिश्तेदार न होते तो आज आपको कहानी सुनाने को न होते बुज़ुर्गवार. जिसने ड़ी. एम. को उखाड़ फेंका उसका कोई बुत-शुत क्यों नहीं है नैनीताल में ? क्या भारत माँ के लाल मर , खप गए वहां ?

मुनीश ( munish ) said...

Naath Saah kee jay ho .!