Tuesday, April 26, 2011

अण्णा हज़ारे और इरोम शर्मिला

समकालीन यीसरी दुनिया के अप्रैल २०११ के अंक में सम्पादक श्री आनन्द स्वरूप वर्मा जी का लिखा यह सम्पादकीय कई अर्थों में सामयिक और महत्वपूर्ण है. उन्हीं की अनुमति लेकर मैं इसे यहां कबाड़ख़ाने के पाठकों के वास्ते प्रस्तुत कर रहा हूं. कबाड़ख़ाने के मॉडरेटर की हैसियत से मैं यह सूचित करना अपना कर्तव्य समझता हूं कि यह सम्पादकीय भूषणद्वय, महन्त हेगड़े व सदाशिव दिग्विजय सिंह के पुनरावतारों और कालिख की तरह पुच्छ-दन्तहीन अमर झण्डूबघीरे के वेदवाक्यों के डिजिटल स्खलन से पहले लिखा गया था.


अण्णा हज़ारे और इरोम शर्मिला

- आनन्द स्वरूप वर्मा

मणिपुर की इरोम शर्मिला ४ नवम्बर २००० से भूख हड़ताल पर हैं. पिछले साल उनकी भूख हड़ताल के १० वर्ष पूरे हुए. उनकी मांग है कि आर्म्ड फ़ोर्सेज़ स्पेशल पावर एक्ट समाप्त किया जाए जिसने मणिपुर को एक सैनिक छावनी का रूप दे दिया है. इस एक्ट की आड़ में मानव अधिकारों का अन्तहीन हनन तो हो ही रहा हैइसने सेना, पुलिस और नौकरशाही के स्तर पर ज़बरदस्त भ्रष्टाचार को जन म दिया है. इस अर्थ में देखें तो इरोम शर्मिला की लड़ाई अण्णा हज़ारे की लड़ाई से किसी मायने में कम नहीं है.

अण्णा हज़ारे की तरह इरोम शर्मिला भी गांधीवादी विचारों की अनुयायी हैं. २००६ में उन्होंने भी जन्तर मन्तर पर धरना दिया था. मणिपुर से पहली बार वह बाहर निकली थींऔर दिल्ली पहुंचते ही सबसे पहले उन्होंने राजघाट जाकर गांधीजी की समाधि पर फूल चढ़ाए. उन्हें ६ अक्टूबर २००६ को दिल्ली पुलिस ने जन्तर मन्तर से गिरफ़्तार कर लिया और पहले एम्स में और फिर बाद में राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां जबरन नाक के रास्ते उनके शरीर में आहार पहुंचाने का काम शुरू हुआ. आज अण्णा हज़ारे के अनशन को कवर करने में लगे अराजनैतिक राजदीप सरदेसाई से लेकर किसी ज़माने के धुर वामपंथी पुण्य प्रसून वाजपेई की कैमरा टीम जो गला फाड़ फाड कर "दूसरी आज़ादी" का जश्न मना रही थी और जिसे अण्णा हज़ारे में गांधी से लेकर भगत सिंह के दर्शन हो रहे थे, वह उस समय कहां थी जब इरोम शर्मिला अपने बेहद कमज़ोर शरीर लेकिन फ़ौलादी संकल्प के साथ जन्तर मन्तर में लेटी हुई थीं. आर्यसमाज से नक्सलवाद और जनता पार्टी से आर्यसमाज तथा फिर आर्यसमाज से माओवाद तक के घुमावदार रास्तों से चढ़ते उतरेते किसी अज्ञात मंज़िल की तलाश में भटक रहे स्वामी अग्निवेश को क्या कभी महसूस हुआ कि इरोम शर्मिला जिस मकसद के लिए लड़ रही हैं उसमें भी वह अपना योगदान कर सकें. बेशक अगर २००६ में टेलीविज़ल कैमरों की बटालियन वहां तैनात होती तो ढेर सारे कैमरोन्मुखी आंदोलनकारी वहां नज़र आते. हिंसात्मक आंदोलनों की व्यर्थता को रेखांकित करने के मकसद से जो लोग यह प्रचारित करने में सारी ताकत लगा रहे हैं कि शांतिपूर्ण तरीके से आन्दोलन के जरिये सरकार को झुकाया जा सकता है जो अण्णा हज़ारे ने महज़ चार दिनों में कर दिखाया उनकी पीलियाग्रस्त आंखों को इरोम शर्मिला का दस वर्षों का आंदोलन क्यों नहीं दिखाई दे रहा है.

प्रख्यात बुद्धिजीवी नोम चोम्स्की ने काफ़ी पहले अपने महत्वपूर्ण लेख मैन्यूफ़ैक्चरिंग कॉंसेन्ट में बताया था कि किस प्रकार मीडिया जामत को अपने ढंग से हांकता और आकार देता है. किस तरह से वह अपने वर्णनों, आख्यानों, झूठों और फ़रेबों को सच मानने के लिए जनमत को प्रेरित करता है. पिछले कुछ वर्षों से जब से भारत में टेलीविज़न चैनलों की बाढ़ आ गई है, हम इसकी मनमानी को देख और झेल रहे हैं. नोम चोम्स्की ने जहां मीडिया के इस पहलू को उजागर किया था वहीम एक दूसरे बुद्धिजीवी ओटावा विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर माइकेल चोसुदोव्स्की ने "मैन्यूफ़ैक्चरिंग डिदेन्ट" के जरिये बताया किकिस प्रकार आज के पूंजीवाद के लिए ज़रूरी हैवह जनतन्त्र के भ्रम को बनाए रखे. उनका कहना है कि "कॉरपोरेट घरानों के एलीट वर्ग के हित में है कि वे विरोध और असहमति के स्वर को उस हद तक अपनी व्यवस्था का अंग बनाए रखें जब तक वे बनी बनाई सामाजिक व्यवस्था के लिए खतरा न पैदा करें. इसका मकसद विद्रोह का दमन करना नहीं बल्कि प्रतिरोध आन्दोलनों को अपने सांचे में ढालना होता है. अपनी वैधता बनाए रखने के लिए कॉरपोरेट जगत विरोध के सीनित और नियन्त्रित स्वरूपों को तैयर करता है ताकि कोई उग्र विरोध न पैदा हो सके जो उनकी बुनियाद और पूंजीवाद की संस्थाओं को हिला दे." दूसरे शब्दों में कहें तो डिसेन्ट (असहमति) के निर्माण का मकसद अपनी व्यवस्था को बचाए रखने के लिए सेफ़्टी वाल्व तैयार करता है.

अण्णा हज़ारे ने भ्रष्टाचार के जिस मुद्दे को उठाया वह निश्चित तौर पर एक ऐसा मुद्दा था जिसके लिए आन्दोलन की वस्तुगत स्थितियां पूरी तरह तैयार थीं और जिस से हर तबके के लोग घुटन महसूस कर रहे थे. फिर भी यह मुद्दा ऐसा नहीं था जो व्यवस्था की चूलें हिला देता और जिसे चैनलों ने इस तरह पेश किया गोया कोई मुक्ति आन्दोलन चल रहा हो. क्रिकेट वर्ल्ड कप के दौरान अन्धराष्ट्रवाद फैलाने की होड़ में लगे मीडिया बांकुरों ने अचानक एक ऐसा मुद्दा पा लिया जिस पर वे चौबीसों घन्टे शोर कर सकें. सैकड़ों की भीड़ को हज़ारों की भीड़ बताकर और लोकपाल विधेयक के बरक्स जनलिकपाल विधेयक कोनए संविधान निर्माण जैसा दिखा कर इन्होंने अण्णा हज़ारे के कद को इतना ऊंचा करना चाहा जितना कि खुद उन्होंने भी कल्पना नहीं की थी. पूरे देश में तो नहीं लेकिन दिल्ली और बंबई सहित प्रमुख शह्रों में जहां इन चैनलों को देखा जा रहा था लोगों के अन्दर इस "दूसरे स्वतन्त्रता आन्दोलन" में भाग लेने की होड़ पैदा की गई और इसमें चैनलों को सफलता भी मिली.

इस पूरे प्रकरण में कुछ बातें , जो अब तक धुंधले रूप में सामने आती थीं बहुत खुलकर दिखाई देने लगीं. देश की अस्सी प्रतिसत आबादी के प्रति उपेक्षा का भाव रखने वाले इन कॉरपोरेटधर्मी चैनलों ने किन लोगों को सबसे ज़्यादा उद्वेलित किया. अण्णा हज़ारे के समर्थन में जिन लोगों ने आवाज़ें उठाईं उनके नामों को देखें तो भ्रष्टाचार के खिलाफ़ अण्णा के स्वर में स्वर मिलाने वालों का पाखण्ड खुद ही सामने आ जाएगा. ये नाम हैं अमिताभ बच्चन, अभिषेक बच्चन, रितिक रोशन, फ़रहान अख़तर, प्रियंका चोपड़ा, मधुर भंडारकर,अनुपम खेर, रितेश देशमुख, शाहिद कपूर, विपाशा बसु, जूही चावला, राहुल बोस, विवेल ओबेरॉय. दिया मिर्ज़्ज़, प्रीतीश नन्दी आदि आदि. ये बम्बई के फ़िल्म जगह के लोग थे जिन्हें इतना तो पता है कि बॉलीवुड में काले धन की क्या भूमिका है पर जिनमें से नब्बे प्रतिशत लोगों को मालूम ही नहीं होगा कि लोकपाल विधेयक/ जन लोकपाल विधेयक है क्या. क्या इन लोगों पर चैनलों पर पदा लिए गए हिस्टीरिया का प्रभाव था? जेल में सज़ा काट रहे बिहार के माफ़िया पप्पू यादव ने अन्ना के समर्थन में अनशन शुरू किया. गज़ब का समां था - नरेन्द्र मोदी की बिरादरी से लेकर भाकपा-माले (लिबरेशन) सब अण्णा के समर्थन में जन्तर मन्तर पहुंचे.

लेकिन अण्णा हज़ारे को समर्थन देने वालों में जब देश के कॉरपोरेट घरानों की सूची पर निगाह गई तो लाअ कि सारा कुछ वैसा ही नहीं है जैसा दिखाई दे रहा है. कॉरपोरेट घरानों से जो लोग अण्णा के समर्थन में खुलकर सामने आए वे थे बजाज ऑटो के चेयरमैन राहुल बजाज, गोदरेज ग्रुप के चेयरमैन आदि गोदरेज, महिन्द्रा एन्ड महिन्द्रा के ऑटोमोटिव एन्ड फ़ार्म इक्विपमेन्ट सैक्टर के अध्यक्ष पवन गोयनका, हीरो कॉरपोरेट सर्विसेज़ के अध्यक्ष सुनील मुंजाल, फ़िक्की के डायरेक्टर जनरल राजीव कुमार, एसोचाम के अध्यक्ष दिलीप मोदी तथा अन्य छोटे मोटे व्यापारिक घराने. हो सकता हैकि यह अनशन कुछ और दिनों तक चलता तो भ्रष्टाचार विरोधी इस महायज्ञ में आहुति डालने मुकेश अम्बानी और अनिल अम्बानी भी पहुंच जाते. जो लोग यह सवाल करते हैं कि अण्णा के आन्दोलन के लिए पैसे कहां से आ रहे हैं या कहां से आएंगे अथवा एन जी ओ सैक्टर की क्या भूमिका है, उनकी मासूमियत पर तरस आता है. अण्णा से पूछो तो उनका यही जवाब होगा कि लनता पैसे देगी लेकिन इस विरोध का निर्माण करने वाली शक्तियां इनई फ़ंडिंग की भी व्यवस्था करती हैं. एक बार फिर हम माइकेल चोसुदोव्स्की के लेख की उन पंक्तियों को देखें जिनमें उन्होंने कहा है कि विरोध की फ़ंडिंग का मतलब है"विरोध आन्दोलन के निशाने पर जो लोग हैं उनसे वित्तीय संसाधनों को उन तक पहुंचाने की व्यवस्था करना जो विरोध आन्दोलनों को संगठित कर रहे हैं." किसी व्यापक जनान्दोलन की आशंका का मुकाबला करने के लिए मुद्दा आधारित विरोध आन्दोलनों को बढ़ावा दिया जाता है और इस के लिए धनराशि जुटाई जाती है" अपने इस लेख में उन्होंने यह भी बतलाआ है कि किस तरह सत्ता के भीतरी घेरे में सिविल सोसाइटी के नेताओं को शामिल किया जाएगा.

पिछले कुछ वर्षों से इस व्यवस्था को चलाने वाली ताकतें इस बात से बहुत चिंतित हैं कि भारत के मध्य वर्ग और खास तौर पर शहरी मध्यवर्ग का रुझान तेज़ी से रेडिकल राजनीति की तरफ़ हो रहा है और उसे वापस पटरी पर लाने के लिए देश के स्तर पर कोई ऐसा नेतृत्व नहीण है जिसकी स्वच्छ छवि हो और जिसे राजनैतिक निहित स्वार्थों से ऊपर उठा हुआ चित्रित किया जा सके. अण्णा हज़ारे के रूप में उसे एक ऐसा व्यक्ति मिल गया है जिसके नेतृत्व को अगर कायदे से प्रोजेक्ट किया जाए तो वह तेज़ी से रेडिकल हो रही राजनीति पर रोक लगा सकता है. इसमें सत्ताधारी वर्ग, जिस में देश के कॉरपोरेट घराने तो हैं ही, मध्य वर्ग का ऊपरी तबका भी है, का हित पूरी तरह जुड़ा हुआ है. अण्णा हज़ारे के मंच पर दिखने वाले प्रतीक पहली नज़र में हिन्दुत्ववाद का एहसास कराते हैं. एक समाचार के अनुसार आर एस एस के महासचिव सुरेश जोशी ने अण्णा हज़ारे को अपना समर्थन व्यक्त करते हुए एक पत्र लिखा जिसे संगठन के प्रवक्ता राम माधव ने उन तक पहुंचाया. यह अनायास ही नहीं है कि २४ मार्च को भाजपा नेता वैंकैया नायडू ने एक वक्तव्य में कहा था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ़ शंखनाद के लिए आज जेपी जैसे एक नेता की ज़रूरत है. जन्तर मन्तर से उत्साहित अण्णा की योजना है पूरे देश में सभाएं करने और किसी बड़े आन्दोलन की भूमिका तैयार करने की. ऐसे में चार दिनों के अनशन्न और उस से पैदा सवालों पर गम्भीरता से विचार करना बहुत ज़रूरी है.

3 comments:

घनश्याम मौर्य said...

इरोम शर्मिला के बारे में मैंनें अखबारों में पढा था। लेकिन ईमानदारी से स्‍वीकार करना पडेगा कि मीडिया द्वारा चलाई गई अन्‍ना की आंधी के आगे मैं, और मेरे जैसे लाखों करोडों लोग भी इस महिला के त्‍याग को भूल गये होंगे। इरोम शर्मिला शायद दिल्‍ली में जंतर मंतर पर हडताल करतीं, तब शायद मीडिया उन्‍हें मेधा पाटेकर की तरह प्रक्षेपित करता।

आशुतोष कुमार said...

अन्ना के आन्दोलन से अनेक लोगों का ध्यान फिर से इरोम पर गया है. अन्ना जो कर रहे हैं , उन्हें करने दें. उन की सीमाएं सभी जानते हैं,इरोम को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की जिम्मेदारी हम सब की है. सारे काले क़ानून काले धन की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए ही हैं. इसे कहने में अन्ना कैसे बाधक हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जन उभार है. यह मौक़ा है काले धन और काले कानूनों के रिश्ते पर गंभीर बहस खड़ी करने का.

अजेय said...

इरोम को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने का ?