Saturday, May 7, 2011

मैं कोई कहानी नहीं सुना रहा - मार्सिन स्विएतलिकी की कविता - 4


संसार

सबसे शुरू में मेरा सिर है, मेरे हाथों में
फिर वहां से पसरना शुरू करते हैं घेरे.
एक चौकोर मेज़, एक वृत्त, कमरा, एक वृत्त. इमारत
एक वृत्त. सड़क, एक वृत्त. शहर, एक वृत्त. देश,
एक वृत्त. और महाद्वीप लिपटा हुआ एक वृत्त में.
अर्धगोलार्ध, एक वृत्त. एक वृत्त. सब कुछ, एक वृत्त.
एक नन्हीं सी बूंद के ऐन किनारे पर.


शनिवार, आवेग

मेज़ पर, एक सिगरेट के साथ.
बहुत बुरी नींद सोया हूं.
"कपड़े उतारो और वापस आ जाना," जाग चुकने पर वह कहती है,
"खिड़की खोल दो"
खुली खिड़की से कमरे के भीतर आती है
एक भोर-नीली उंगली. मैं वापस जाता हूं, हम एक दूसरे से लिपटते हैं.
सोता हूं बहुत बुरी नींद.


प्रारम्भ

बादलों से गिरी बर्फ़ शहर पर चमकती है
सफ़ेद फ़ुटपाथ
आख़िरी सफ़ेदी के साथ.

दवा की दुकानों से, टीबी की गन्ध. खिड़की पर
बिना नाम का, रोशनी और कीटाणुओं से बना
एक फूल.

मैं कोई कहानी नहीं सुना रहा, मैं कांप जाता हूं. जल्दी ही
उतरेगी कीचड़.

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

तीनों ही अच्छी लगी।

बाबुषा said...

कुछ कवितायेँ पढ़ने के बाद तो ऐसा लगता है कि क्या कहा जाए भला इनके बारे में...और हम हैं ही क्या जो कह सकें कुछ भी..सिवा इसके कि - सुन्दर !