Saturday, May 7, 2011

पेड़ों के सर्जक ने उनके लिए नर्क नहीं बनाया


मार्सिन स्विएतलिकी (जन्म १९६१) को अभी से समकालीन पोलिश कविता का सबसे जटिल, सब्से वैविध्यतापूर्ण और विद्रोही स्वर माना जाता है. अपने करियर की शुरुआत में ही उन्होंने मंच पर पोलिश कविता के स्तम्भ चेस्वाव मिवोश से एक पुरुस्कार लेने से इन्कार कर दिया और वहीं से अपनी एक कविता ’एक दिन मेरा होगा यह शहर’ का पाठ कर डाला. १९९२ में मार्सिन स्विएतलिकी के पहले संग्रह के छपने को पिछले दशक में पोलिश साहित्य में घटित सबसे सनसनीखेज़ घटना माना गया. वे क्राकोव में एक मशहूर साप्ताहिक पत्रिका में बतौर प्रूफ़रीडर काम करने के साथ ही अपना रंगसमूह चलाते हैं. उन्होंने अपनी कुछेक कविताओं को बाकायदा संगीतबद्ध कर उनके अल्बम रिलीज़ किए हैं. उनके तकरीबन एक दर्ज़न कविता संग्रह छप चुके हैं. अपनी कविताओं में स्विएतलिकी वक्तव्यात्मक कविता, राजनैतिक विरोध, अतिशास्त्रीय भाषा और छद्म ऊंचे आदर्शों को लेकर सवाल उठाते हैं. इसके स्थान पर वे व्यक्ति पर अपना ध्यान उसके दर्द और असुविधा के हिसाब से लगाते हैं जो एक व्यक्तिगत सरहद खींचने में तो उनकी सहायता करता ही है, आवारा अमूर्तन से भी उनकी कविता को बचाता है. अन्धकार और दर्द की अनुभूति कर पाने की उनकी यह क्षमता ही उन्हें अपने समकालीनों के बीच बचाए हुए है - रचनात्मकता और सतत परिपक्वता के साथ. स्विएतलिकी की भाषा में रूखा ह्यूमर, विडम्बना और क्षेत्रीय लहज़ा पाए जाते हैं – इन्हीं की मदद से वे अपनी कविता को आकार देते हैं जिसमें मृत्यु और दर्द, दर्द और जीवन और जीवन और इच्छा के बीच एक ज़ोखिमभरा सन्तुलन पाया जाता है.

सुबह की कविताओं के बाद अब उनकी कविताओं की दूसरी खेप -


१.
पेड़ों के बारे में कुछ सच


पेड़ों के पास नहीं होती अपनी पवित्र पुस्तक
पेड़ों के पास ज़रूरत से ज़्यादा रोशनी, हवा और बारिश होती है
पतली शाखाएं स्वर्ग तलक पसरती हुईं

पेड़ों का स्वर्ग हरा, ताकतवर और खुशबूदार होता है
पेड़ों का सर्जक उन्हीं जैसा हरा और ताकतवर होता है
उनके सर्जक ने पेड़ों के लिए नर्क नहीं बनाया

न कोई पाप है वहां न कोई कर्तव्य
इतना बहुत है कि हुआ जाए, फरफराया जाए पसरा जाए
इतना बहुत है कि बढ़ा जाए शाखाओं में फूटने की इच्छा की जाए

पेड़ों के सर्जक ने उनके लिए नर्क नहीं बनाया
जो सबसे ख़ास चीज़ ग़ौर करने की है वह है पेड़ की मुलायम बेपरवाही
जिसके साथ वे स्वीकार कर लेते हैं अपनी निचली शाखाओं से टंगे मनुष्यों को.

२.
पहली अप्रैल, वाग्रोविक, पोलैण्ड


जगा हुआ. तुरन्त उलझा
झील के मसलों से. भोर से कुछ
घन्टे पहले. सम्भवतः. और झील अभी से
जीवित है, सांस लेती हुई, हंसों को भेजती
उस पर निगाह मारने को - वह अन्धेरे में एक
छाया, ढूंढती हुई मानवीय टर्मिनल का रास्ता. चैतन्य. खोया हुआ.
घास की पहली कोंपलें उड़ान भरना शुरू करती हैं अन्धेरे मैदान से.
किसी अन्धे की तरह. किस लिए? खुद के बिना, समय के बिना.
समय इस कदर पसर गया है कि
उसे देखा नहीं जा सकता. खोया हुआ अन्धेरे में.
जगा हुआ. किस लिए? अगर अब भी होती उसके पास
पहले कम्यूनियन में मिली हुई घड़ी
अगर, किसी खास समय पर वह बन गया होता स्काउट
और होती उसके पास एक कुतुबनुमा, अगर उसे आता होता
ठीक से इस्तेमाल कर पाना कुतुबनुमा का

-यहां नहीं होता वह.

३.
फ़ोटोग्राफ़


गली के कोने पर एक प्रेत - जैसे
किसी धूलभरे तूफ़ान का नन्हा सा हिस्सा - जैसे
आवारा हो गए दुःख - निकल पड़े खोजने किसी को
मैंने खिड़की खोली - वह अब भी बना हुआ है
गली के कोने पर अब भी एक झोंके सा
मैं झुका हुआ आगे को, उम्मीद करता हुआ कुछ घटने की
और सर्दियों के एक सूरज के कड़ियल नक्श.

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

हमने हमारे लिये स्वर्ग बनाने वालों के लिये कब्र खोद दी है।