Monday, February 13, 2012

माफ करना हे पिता! – १

शंभू राणा के शानदार गद्य से आप लोग परिचित हैं. वही पूना से बागेश्वर मारुती के एडवेंचर वाले. उनका यह संस्मरण कुछ वर्ष पहले “नैनीताल समाचार” में छपा था. उनकी इजाज़त से हम इसे यहाँ पेश कर पा रहे हैं.


माफ करना हे पिता! – १

सभी के होते हैं, मेरे भी एक (ही) पिता थे। शिक्षक दिवस सन् 2001 तक मौजूद रहे। उन्होंने 70-72 वर्ष की उम्र तक पिता का रोल किसी घटिया अभिनेता की तरह निभाया मगर पूरे आत्म विश्वास के साथ। लेकिन मैं उन्हें एकदम ही ‘पीता’ नहीं कहने जा रहा। इसलिये नहीं कि मेरे बाप लगते थे बल्कि इसलिये कि चाहे जो हो आदमी कुल मिलाकर कमीने नहीं थे। किसी भी आदमी का यही एक ‘दुर्गुण’ बाकी सारे ‘गुणों’ पर भारी है। बाकी शिकायत, बल्कि शिकायतों का कपड़छान तो यही कि उन्होंने पिता के रोल की ऐसी तैसी करके रख दी। न जाने किस बेवकूफ ने उन्हें बाप बना दिया।

उनका बारहवाँ और वार्षिक श्राद्ध तो मैं हरिद्वार जाकर कर आया था उधार और चंदे के पैसों से, जैसा भी बन पड़ा। आज सोचता हूँ कि कलम से भी उनका तर्पण कर दूँ। ऊपर मैंने शिकायतों का जिक्र किया लेकिन यह तर्पण जाहिर सी बात है श्रद्धावश ही है, शिकायतन नहीं।

पिता का मेरा साथ लगभग 32 वर्षों तक रहा, लगभग मेरे जन्म से उनकी मृत्यु तक। माँ का साथ काफी कम और वह भी किस्तों में मिला। पिता के साथ यादों का सिलसिला काफी लम्बा है। यादें देहरादून से शुरू होती हैं। मेरी पैदाइश भी वहीं की है। यादें आपस में गुड़-गोबर हुई जा रही हैं, कौन पहले, कौन बाद में। लेकिन शुरू कहीं से तो करना पड़ेगा ही। सबसे पहले दिमाग में जो एक धुँधली सी तस्वीर उभरती है वह यूँ है- गर्मियों के दिन हैं, पिता बेहद हड़बड़ी में दोपहर को घर आते हैं। शायद दफ्तर से इजाजत लिये बिना आये हैं। मैं बीमार हूँ। मुझे कम्बल में लपेट कर दौड़े-दौड़े डॉक्टर के पास ले जाते हैं। डॉक्टर मुझे सुई लगाता है। पिता लौट कर माँ से कहते हैं- "डॉक्टर कह रहा था कि आधा घंटा देर हो जाती तो बच्चा गया था हाथ से।" उस दिन तो बच्चा हाथ आ गया पर फिर कभी उनके हत्थे नहीं चढ़ा।

एक और तस्वीर है यादों के एलबम में…..। बारिश हो रही है, सड़क में एड़ियों से ऊपर तक पानी भरा है। मुझे उल्टी-दस्त हो रहे हैं और पिता भीगते हुए पब्लिक नल में सरे बाजार मुझे धो रहे हैं। इन दोनों घटनाओं का जिक्र उन्होंने अपने अंतिम समय तक अक्सर किया कि ऐसे पाला तुझे मैंने। ऐसी बातें सुनकर अपने भीतर से अपना ही कोई अनाम/अदृश्य हिस्सा बाहर निकल कर सजदे में गिर जाता है। और हो भी क्या सकता है। ऐसी बातों का कैसा ही जवाब देना न सिर्फ बेवकूफी है, बल्कि बदतमीजी भी। मैं एक आदर्श बेटा नहीं, मगर ‘राग दरबारी’ का छोटे पहलवान भी नहीं हो सकता जो अपने बाप कुसहर प्रसाद से कहता है कि हमने लिख कर तो दिया नहीं कि हमें पैदा करो। तो पिताजी महाराज, ऋणी हूँ तुम्हारा और इस ऋण से उऋण होने की कोई सूरत नहीं। न तुम्हारे जीते जी था, न आज हूँ किसी लायक। जब तक रहे तुम पर आश्रित था आज दोस्तों पर बोझ हूँ। इंसान के अंदर जो एक शर्म नाम की चीज होती है, जिसे गैरत भी कहते हैं, मैंने उसका गला तो नहीं दबाया पर हाँ, उसके होटों पर हथेली जरूर रखे हूँ। शर्म आती है लेकिन जान कर बेशरम बना हूँ। सच कहूँ तुम्हारे जाने के बाद स्थितियाँ ज्यादा खराब हुई हैं। परिस्थितियों के डार्क रूम में किसी नैनहीन सा फँसा पड़ा हूँ। कामचोर तो नहीं पर हाँ, एक हद तक निकम्मा जरूर हूँ।

(जारी)

6 comments:

batrohi said...

पिता को लेकर एक अलग तरह से देखने का सिलसिला शुरू हुआ था ज्ञानरंजन की कहानी 'पिता' से. 1960 के आसपास. वहां पिता को लेकर संबंधों का जो संशय है, वही नयी पीढ़ी के नए ढांचे में 'परिवार' की एक परिभाषा गढ़ता है. नए अहसासों में से पैदा हुई नई अभिव्यक्तियों ने नए शब्द गढ़े और नए शास्त्र का जन्म हुआ. इसी पीढ़ी में ही एक नया चेहरा उभरा जिसने बाद में अपने पिता से कहना शुरू किया कि तुमने मुझे अपने मजे के लिए पैदा किया है, इसलिए मेरी तुम्हारे प्रति क्या जिम्मेदारी है? पुराने शब्दों को इस दौर में तेजी से अपदस्त कर दिया गया और प्रतिक्रिया से यह अनुमान लगाना ही मुश्किल हो गया कि शब्दों और वाक्यों के द्वारा भावनाएं शेयर की जा रही हैं या मजाक उड़ाया जा रहा है. असल में पाठ की एक जातीय परंपरा होती है, और उसी में से रचना का आस्वाद पैदा होता है. शब्द को सन्दर्भ से अलग हम कैसे समझ सकते हैं? जिस समाज के अंतर्विरोधों की उपज काफ्का था, आज हमारा समाज भी भले ही उसी तरह का बन रहा हो, लेकिन समाज की वैसी परंपरा तो हमारे पास नहीं है, इसलिए हम हिंदी पाठ परंपरा के आदी लोग उस रचना के संवेदन और आस्वाद के साथ कैसे जुड़ सकते हैं? शम्भू राणा की रचना जब मैंने पहली बार 'नैनीताल समाचार' में पढ़ी थी, एक नए तरह के खिलंदड़े, मगर संवेदनहीन गद्य ने मुझे आकर्षित किया था, मगर जल्दी ही भाषा का छद्म उजागर हो गया... लेखक चमत्कार के नाम पर अश्लील गद्य लिखने लग गया. साहित्य भाषा की खिलंदड़ी नहीं है, वह मनुष्य का एक तरह से पुनराविष्कार है. और बेटा पिता का इस रूप में आविष्कार नहीं है कि वह माँ-बाप के निजी संबंधों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करे. प्रतिक्रिया के लिए पिता ने उसे एक विस्तृत ब्रह्माण्ड सौंपा है, पहले वह पिता की दी हुई इस विरासत के बीच घुस कर खुद का अहसास तो करे. भाई अशोक, हर नयापन रचना नहीं हो सकती, रचना के लिए रियाज़ और बौद्धिकता गुण हो सकते हैं मगर उसकी मौलिक और आधारभूत ताकत तो अनुभव ही हो सकते हैं.

batrohi said...

पिता को लेकर एक अलग तरह से देखने का सिलसिला शुरू हुआ था ज्ञानरंजन की कहानी 'पिता' से. 1960 के आसपास. वहां पिता को लेकर संबंधों का जो संशय है, वही नयी पीढ़ी के नए ढांचे में 'परिवार' की एक परिभाषा गढ़ता है. नए अहसासों में से पैदा हुई नई अभिव्यक्तियों ने नए शब्द गढ़े और नए शास्त्र का जन्म हुआ. इसी पीढ़ी में ही एक नया चेहरा उभरा जिसने बाद में अपने पिता से कहना शुरू किया कि तुमने मुझे अपने मजे के लिए पैदा किया है, इसलिए मेरी तुम्हारे प्रति क्या जिम्मेदारी है? पुराने शब्दों को इस दौर में तेजी से अपदस्त कर दिया गया और प्रतिक्रिया से यह अनुमान लगाना ही मुश्किल हो गया कि शब्दों और वाक्यों के द्वारा भावनाएं शेयर की जा रही हैं या मजाक उड़ाया जा रहा है. असल में पाठ की एक जातीय परंपरा होती है, और उसी में से रचना का आस्वाद पैदा होता है. शब्द को सन्दर्भ से अलग हम कैसे समझ सकते हैं? जिस समाज के अंतर्विरोधों की उपज काफ्का था, आज हमारा समाज भी भले ही उसी तरह का बन रहा हो, लेकिन समाज की वैसी परंपरा तो हमारे पास नहीं है, इसलिए हम हिंदी पाठ परंपरा के आदी लोग उस रचना के संवेदन और आस्वाद के साथ कैसे जुड़ सकते हैं? शम्भू राणा की रचना जब मैंने पहली बार 'नैनीताल समाचार' में पढ़ी थी, एक नए तरह के खिलंदड़े, मगर संवेदनहीन गद्य ने मुझे आकर्षित किया था, मगर जल्दी ही भाषा का छद्म उजागर हो गया... लेखक चमत्कार के नाम पर अश्लील गद्य लिखने लग गया. साहित्य भाषा की खिलंदड़ी नहीं है, वह मनुष्य का एक तरह से पुनराविष्कार है. और बेटा पिता का इस रूप में आविष्कार नहीं है कि वह माँ-बाप के निजी संबंधों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करे. प्रतिक्रिया के लिए पिता ने उसे एक विस्तृत ब्रह्माण्ड सौंपा है, पहले वह पिता की दी हुई इस विरासत के बीच घुस कर खुद का अहसास तो करे. भाई अशोक, हर नयापन रचना नहीं हो सकती, रचना के लिए रियाज़ और बौद्धिकता गुण हो सकते हैं मगर उसकी मौलिक और आधारभूत ताकत तो अनुभव ही हो सकते हैं.

प्रवीण पाण्डेय said...

आगे..

Neeraj Basliyal said...

I like it, and seriously wait for your prose, Sir.

सुशील कुमार जोशी said...

http://ulooktimes.blogspot.in/2014/04/175.html

Subhash Shrivastava said...

Great writing. i keep returning to Shambhu rana after forays into world's literature again and again. it's requires a real courage to write the way he writes.